चर्चित कथाकार। प्रकाशित कृतियां ‘गांव भीतर गांव’ (उपन्या), ‘भेम का भेरू मांगता कुल्हाड़ी ईमान’, ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’, ‘काफ़िर बिजूका उ़र्फ इब्लीस, ‘तीतर फांद’। प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान से सम्मानित।

 

मैंने स्कूल में अपने दोस्त अनेय के पास नया पेंसिल बॉक्स देखा, तभी से दिमाग में वही-वही घूम रहा। उसका ब्रॉउन कलर मुझे आकर्षित कर रहा। उसका टेक्सचर मुझे बहुत शानदार लग रहा। उस पर बनी खूबसूरत पेंटिंग मुझे लुभा रही। आंखों के सामने से वह हट ही नहीं रहा। कहा न कि दिमाग के भीतर और आंखों के सामने वही-वही नाच रहा।

मैंने अनेय से कहा- ‘देखना, मैं भी पापा के साथ जाकर ऐसा का ऐसा ही पेंसिल बॉक्स लूंगा। कल स्कूल में नया पेंसिल बॉक्स लेकर ही आऊंगा। सेम टू सेम।’

उस दिन स्कूल से घर लौटा, देखा कि घर में पापा कहीं नजर नहीं आ रहे। मेरे स्कूल जाने से पहले ही पापा ड्यूटी चले गए थे, लेकिन लौटे नहीं। 

मैं यह सोचकर थोड़ा उदास हो गया कि पापा जाने कब लौटेंगे! मैंने मन ही मन तय किया कि जब बड़ा हो जाऊंगा, पापा की पुलिस नौकरी छुड़वाऊंगा। सड़ी नौकरी। कोई टाइम-टेबल नहीं। हुंह।

फिर जब मम्मी मेरी स्कूल युनिफॉर्म उतारवा रही थी, सोचा कि मम्मी को नए पेंसिल बॉक्स के लिए राजी कर लूं, हालांकि मम्मी से ज्यादा उम्मीद नहीं थी। फिर भी कोशिश करने में क्या हर्ज है।

मैंने कहा- ‘मम्मी, मुझे भी वैसा पेंसिल बॉक्स लेना है, जैसा अनेय के पास है। सेम टू सेम।’

मेरे अंदेशे के मुताबिक मम्मी ने पहली बार में ही मेरी बात अनसुनी कर दी।

जब मैंने बटर पॉलिस वाले स्वर में फिर वही बात दोहराई, तो मम्मी ने मुझे अजीब सी नजरों से देखा और रूखे स्वर में बोली- ‘क्यों लेना है? पिछले सप्ताह ही तो कार जैसा पेंसिल बॉक्स दिलवाया! दो पहले से धरे हैं! तीन पेंसिल बॉक्स है, फिर और क्यों लेना है? फिजूलखर्ची के लिए मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है।’

कहते हुए मम्मी किचन में चली गई और मेरे अरमा मुरझाने लगे, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी थी, बस उचित मौके की ताक में मौन ओढ़ लिया था।

मैं मन ही मन सोचने लगा कि फिजूलखर्ची क्या होती है? फूटी कौड़ी क्या होती है? पापा आएंंगे तो पूछूंगा। लेकिन पापा कब आऍंगे?

पापा की याद जहन में चलने लगी। पास होते तो कहते- ‘चलो, लेकर आते हैं।’

मुझे दुकान पर ले जाते। झट से दिलवा देते। पापा कभी किसी चीज के लिए मुझे नहीं तरसाते। होली आती, तरह-तरह की पिचकारी और ढेर सारा रंग दिलवा देते। दीवाली आती तो झोला भरकर फूलझड़ी, अनार, चक्री और लहसुन बम दिलवा देते। लेकिन आज पता नहीं क्यों पापा अभी तक नहीं गए? किसी मुलजिम को खोज रहे होंगे! किसी नेता की रैली में ड्यूटी लगी होगी! किसी गुमशुदा की तलाश में भटक रहे होंगे! जाने क्या कर रहे होंगे!

आपा बात-बात पर मेरे कान खींचती है। मम्मी से मेरी शिकायत भी करती है, फिर भी मम्मी जितनी कड़क नहीं है। अभी होती, तो मुझे सपोर्ट ही करती। 

मुझे पापा की कही बात याद आई। एक बार उन्होंने कहा था कि उनकी मां के पास बहुत पैसा है।

मैंने सोचा- पापा सही कहते हैं, उनकी मां के पास बहुत पैसा है।

मैंने खुद से कहा- ‘खूब पैसा होगा भी, तभी तो दादी पैरों में भारी-भारी चांदी की कड़ियां पहने रहती है। गले और कान में सोने के जेवर पहनती हैं। पापा ने ही बताया था कि सोना-चांदी बहुत महंगी धातुएंं होती हैं। इन धातुओं के जेवर के लिए मनुष्य ही मनुष्य को मार देता। आए दिन अखबार में छपता है- मंदिर जा रही महिला के गले से सोने का मंगलसूत्र छीना। वॉक करते इंसान के गले से सोने की चेन उड़ाईं। शादी में गई महिला को चाकुओं से गोदा और जेवर उतरवाकर भाग गए।

इस मामले में मेरे पापा की आदत अच्छी है, वे कभी सोने-चांदी की अंगूठी नहीं पहनते और न चेन पहनते हैं। मैं भी कभी ऐसी धातुओं को अपने पास नहीं रखूंगा, जिनकी खातिर आदमी ही आदमी की जान लेने पर अमादा हो जाए।

लेकिन दादी को जेवर पहनने का बहुत शौक़ है। मेरी नजर दादी के पैरों में चमकती चांदी की कड़ियों पर जा टिकी। कम से कम एक-एक किलो की तो होगी! अगर दादी अपने पैरों में पहनी कड़ियां और जेवर मुझे दे दे, तो कड़ियों और जेवर को बेचकर मैं पेंसिल बॉक्स की फैक्ट्री खोल सकता हूँ! दादी तो यूं ही पैरों में पहने-पहने ठुमुक-ठुमुक घूमती रहती है इधर-उधर! अपनी जान जोखिम में डालती हुई। दादी के पास जेवर नहीं होंगे, तो दादी को जान का खतरा भी नहीं होगा!

जब मेरे दिमाग में यह सब चल रहा था। तब दादी गर्म शाल ओढ़ाकर पलंग पर बैठी थी।

मैं भी पलंग पर चढ़ गया। दादी कुछ ऊंचा सुनती, इसलिए मैंने उनके कान में ऊंचे स्वर में कहा- ‘दादी, पैसे दे दो।’

मैंने एक ही बात को दो-तीन बार दादी के कान में जोर से कही, तब दादी समझी कि मैं उनसे पैसे मांग रहा हूँ।

दादी ने पोपले मुंह से पूछा- ‘क्यों?’

और खुद ही मुस्कराते हुए बोली- ‘चॉकलेट खाना है! चॉकलेट खाने से तुम्हें खांसी हो जाती है! मैं पैसा नहीं दूंगी, तुम्हारी मम्मी मुझे आंखें दिखाएंगी।’

मैंने ऊंची आवाज में दादी के कान में कहा- ‘दादी चॉकलेट नहीं खाना है, मुझे दूसरा काम है।’

दादी ने झुंझलाते हुए कहा- ‘मेरा नाम क्यों लेगा? मैंने चॉकलेट खाने का कब कहा?’

मैंने दादी से कहा- ‘दादी काम है, कुछ लाना है।’

दादी ने तपाक से कहा- ‘कहां जाना है, अकेले नहीं जाना। मम्मी-पापा के साथ जाना।’

मैंने दादी को समझाने की कोशिश करते हुए कहा- ‘दादी, कहीं नहीं जाना है, पैसे मांग रहा हूँ, पैसे दे दो, पैसे।’

‘ऐसे… ऐसे क्या बोल रहा, सही बोल, क्या बोल रहा!’

मैं दादी से हिंदी में बोलता। दादी मालवी में बोलती। दादी की मालवी समझने में भी मुझे थोड़ा वक्त लगता।

दादी से बात करते हुए झुंझलाहट होने लगी। तभी मुझे पापा की सीख याद आई, कभी धैर्य का दामन मत छोड़ना।

मुझे नया पेंसिल बॉक्स लेना था। मेरे दिमाग में वही-वही घूम रहा था। मैं स्कूल में अनेय से कह कर आया था- ‘कल नया पेंसिल बॉक्स लेकर आऊंगा। नहीं लेकर जाऊंगा, तो खिल्ली उड़ेगी।’

मैंने धैर्य के साथ दादी से कहा- ‘अरे दादी, कान में हियरिंग एड लगवा लो। मैं क्या कहता हूँ। आप क्या सुनती हो! आने दो पापा को, कहूंगा कि आपको हियरिंग एड ला दे।’

दादी ने कहा- ‘क्या बड़बड़ा रहा, जोर से बोल, कौन सा एड ला दे?’

मैंने जोर से कहा- ‘पैसा दे दो। हियरिंग एड लाना है।’

दादी ने फिर खीज कर कहा- ‘तो ढंग से बोल, चिल्ला क्यों रहा? कितने पैसे चाहिए?’

मैंने दादी को दो उंगली दिखाते हुए कहा- ‘दो सौ रुपए।’

लेकिन दादी दस-दस रुपए के दो नोट देने लगी।

मैंने दादी को फिर कान में जोर से कहा- ‘दो सौ, टू पर टू जीरो वाला नोट दे दो।’

दादी दस-दस के नोट वापस थैली में रखती बोली- ‘अब काहे का वोट, चुनाव तो भोत पहले हो गए!’

मैंने फिर और जोर से कहा- ‘नोट.., नोट.., दो सौ का नोट। नोट।’

‘दो सौ का नोट? दो सौ के नोट का क्या करेगा?’

‘हियरिंग एड लाऊंगा, नहीं, नहीं पेंसिल बॉक्स लाऊंगा।’

मेरी बात सुन मम्मी किचन में हँसने लगी, तो मैं गुस्से में बुदबुदाया- ‘खुद तो फूटी कौड़ी देने को तैयार नहीं। दादी से मांग रहा, तो मेरी बात सुन हँस रही हो। क्या हो गया, जो मैं थोड़ा गड़बड़ा गया तो!’

दादी ने फिर पूछा- ‘बता न कि क्या करेगा, दो सौ के नोट का?’

मैंने चिढ़ते हुए ही दादी से कहा। ‘दो सौ का नोट दोगी, तो नाचूंगा’ और मैं ग़ुस्से में पलंग से नीचे उतर आया।

दादी ने फिर पूछा- ‘बता, दो सौ के नोट का क्या करेगा?’

मेरा धैर्य जवाब दे चुका था। भीतर ग़ुस्सा उबाल मारने लगा। मैंने अपना दाहिना हाथ अपने भाल पर मारा और बुदबुदाया- ‘दादी तुम्हारा क्या करूं?’

दादी ने फिर पोपले मुंह से पूछा- ‘बोल, दो सौ के नोट का क्या करेगा?’

मैंने खीज से भरकर दादी की तरफ देखा और दादी ने पूछने के लिए फिर से अपना मुंह खोला, तभी मैं ग़ुस्से में दादी के सामने नाचने लगा।

मुझे नाचता देख दादी ताली बजा-बजाकर पोपले मुंह से मालवी में कुछ गाने लगी। फिर पलंग से नीचे उतरकर खुद दादी भी ठुमुक-ठुमुककर ठुमके लगाने लगी।

फिर दादी ठुमकते-ठुमकते हांफने लगी और पलंग के किनारे पर बैठ गई। फिर दादी ने अपनी घाघरी में कमर के पास खोंसी छोटी थैली में हाथ डाल अनजाने में या फिर खुश होकर मुझे पांच सौ का नोट पकड़ा दिया।

पांच सौ का नोट पाकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, मेरे कदम थम नहीं रहे थे।

दादी पलंग पर बैठी ताली बजाते हुए पोपले से मुंह से गा रही थी।

मैंने अपनी पोपले मुंह वाली दादी को इतनी खुश कभी नहीं देखी थी। मेरे मन में आया कि पोपले मुंह वाली दादी के ठुमकों पर पेंसिल बॉक्स बनाने वाले लाखों कारखाने कुर्बान। मैं फिर से नाचने लगा।

पता नहीं कि उस दिन कोई त्यौहार था या यूं ही, घर के दरवाजे पर एक ढोली चला आया। वह ढोल बजाकर कुछ मांगने आया था।

ढोल की आवाज सुन दादी अचानक फिर से पूरे जोश में उठी और ठुमुक-ठुमुककर ठुमके लगाने लगी।

ढोल की आवाज मम्मी को भी किचन से आंगन में खींच लाई। मैंने देखा कि मेरी कड़क स्वभाव की मम्मी रुई के फाहे-सी नाच रही है। मम्मी का चेहरा बहुत प्यारा लग रहा है। दादी और मम्मी के साथ मैं नाच में इतना मगन हो गया था कि पेंसिल बॉक्स और अनेय से किया वादा भूल चुका था।

ढोली ने हमें आंगन में नाचते देखा, तो वह मांगना भूल गया और जोरदार ढंग से ढोल बजाने लगा। ढोली का जोश देख, मैंने दादी का दिया पांच सौ का नोट, दादी और मम्मी पर औरते हुए ढोली को दे दिया। अब ढोली ढोल बजाते हुए अपनी जगह पर ही नाचने भी लगा।

थककर चूर होने तक ढोली ढोल बजाता रहा और हम नाचते रहे। जब नाच थमा तो देखा, ढोली के पीछे से पापा मुस्कराते हुए आ रहे थे।

संपर्क :एम-2/199 अयोध्यानगरी, (बाल पब्लिक स्कूल के पास) इंदौर-452011 bizooka2009@gmail.com