चर्चित कथाकार। उपन्यास ‘गांव भीतर गांव’, कहानी संग्रह ‘भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान’, ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’, ‘काफ़िर बिजूका उ़र्फ इब्लीस’, ‘तीतर फांद’ (2018)। प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान से सम्मानित।

 

मुझे कहानियां सुनने और सपनों में नई-नई दुनिया की सैर करने में इतना मजा आता है कि मैं पचास-सौ जिंदगी तो यही-यही करते बगैर किसी शिकायत के बिता सकता हूँ।

क्या कहा कि मेरी बात पर यक़ीन नहीं! कोई बात नहीं। बहरहाल एक किस्सा सुनो!

उन दिनों स्कूल की छुट्टियां थीं। अखबारों में अचानक से बच्चों के बारे खबरों की बाढ़ आ गई थी कि बच्चों को छुट्टियों में ड्राईंग सिखाओ। डांस, ड्रामा क्लास भेजो। मोबाइल से दूर रखो।

‘बच्चों को मोबाइल से दूर रखो’ इसी बात के बहकावे आकर मम्मी ने मोबाइल कहीं छुपा दिया और मुझे कहा कि मोबाइल कहीं खो गया।

मोबाइल खोने वाली बात मेरे गले नहीं उतरी। इस बात पर मुझे रत्ती भर भी यकीन नहीं हुआ। मम्मी को डर था कि मोबाइल, मोबाइल नहीं कोई बम हो जो किसी भी क्षण हाथ में फट सकता या फिर हाथ पकड़ते ही मुझे राक्षस की तरह  निगल जाता।

हमारे घर में मम्मी ही थी, जिसे मेरा मोबाइल चलाना पसंद नहीं था, जब तब रोकती-टोकती रहती और हर समय मेरे सिर पर होमवर्क -पढ़ाई की बनेटी घुमाया करती।

उन दिनों मम्मी ने मोबाइल के साथ जो किया, वह तो किया ही था, लेकिन एक और कांड किया था कि टीवी में रिचार्ज भी नहीं भरवाया था। मैं ही नहीं, घर में दादी, आपा या पापा भी कहते कि टीवी में रिचार्ज भरवाओ, तो मम्मी तपाक से कहती- ‘महंगाई कितनी बढ़ गई है, कीचन में राशन ही जैसे-तैसे भरवाती हूँ और आप लोग को टीवी में रिचार्ज भरवाने की पड़ी है। वैसे भी उसमें ऐसा क्या आता है कि राशन में कटौती कर रिचार्ज भरवाऊं?’

या फिर कभी-कभी कहती- ‘देखते नहीं कि रिचार्ज भरने वाली कंपनियों में कैसी-कैसी सिर फुटौव्वल चल रही, एक से रिचार्ज भरवा लूंगी, तो दूसरी मेरा सिर फोड़ देगी।’ मम्मी की ऐसी बातें मेरे सिर के ऊपर से गुजरतीं। मम्मी की ऐसी लीलाएं मम्मी ही जानतीं।

मुझे समझने वाली बात, मैं समझ जाता कि मुझे अपनी छुट्टियां मोबाइल, टीवी देखते हुए नहीं, बल्कि कभी दादी से मालवी बोली में किस्से और कभी मम्मी से मनगढ़ंत कहानी सुनते हुए बितानी। दादी के किस्से मालवी में होते, इसलिए कई बार सिर के ऊपर से गुजर जाते। मम्मी की कहानी रसीली होती।

उन छुट्टियों में मेरी दिनचर्या कुछ ऐसी होती- सुबह नहा-धोकर, नाश्ता-वास्ता करता। दादी से किस्से सुनता। ऊबने पर लट्टू घुमाता। या दादी के साथ कैरम या सांप-सीढ़ी खेलता। जब मम्मी के पास वक्त होता, मम्मी से कहानी सुनता।

रात होने पर मम्मी-पापा, दादी और आपा के साथ खाना खाता और जैसे ही बिस्तर पर लेटता,  नींद मुझे किसी गहरी झील में खींच ले जाती। नींद की झील पानी से नहीं, सपनों से भरी रहती, जैसे ही मैं सपने में दाखिल होता, किसी दूसरी दुनिया का जादुई द्वार खुल जाता।

उस रात भी जादुई द्वार खुला और मैंने खुद को एक हरे-भरे और सुनसान जंगल में पाया। कुछ परिचित और कुछ अपरिचित पेड़ों से घिरे हुए। किसिम-किसिम की घास, झाड़ियों और रंग-बिरंगे फूलों के बीच खड़े हुए। कुछ जाने-पहचाने पक्षियों मधुर और कुछ जानवरों की कर्कश आवाज में भीगते हुए ।

मैं उस असीम खूबसूरती, खुशबू, भांति-भांति के स्वर की मदहोशी में गाफिल था कि तभी झाड़ियों के पीछे हल्की सरसराहट हुई । लगा कि कोई खरगोश, शाही, या फिर हिरण गुजरा होगा।

जब फिर सरसराहट हुई। मैं थोड़ा शंकित हुआ। सच कहूं तो थोड़ा डरा भी। मैंने इधर-उधर देखा। और जब पीछे पलटकर देखा- आंखें फटी की फटी रह गई। शब्द फूल कर गले में फंस गए। भेड़िए की चमकती आंखों ने मेरी आंखों की चमक, चेहरे की रंगत छीन ली। भेड़िया के जबड़ों की बीच से चमकते नुकीले दांत देख, जीभ से टपकती लार देख, मेरे पैर धूजने लगे। लगा कि बस…जीवन का खेल खत्म।

लेकिन जब भेड़िया मेरी तरफ स्नेहिल भाव से मुस्कराया। मैं चकित रह गया। फिर भेड़िया मुस्कराते हुए बोला- ‘कैसे हो दोस्त छोटू?’

दोस्त…छोटू!

मैं असमंजस में पड़ गया। लगा कि भेड़िया जंगल का कोई बहुरूपिया है। कहीं जंगल में चुनाव-वगैर तो नहीं है।

‘मैं कोई छोटू-वोटू नहीं हूँ, मेरा नाम चीका है।’

‘ठीक है दोस्त चीका, बताओ कैसे हो? जंगल में कैसे आना हुआ?’

मैं उससे ज्यादा देर तक अकड़ कर बात नहीं कर सकता था। मुझे भान था कि वह मेरी गर्दन में दांत फंसा कर एक झटके में मेरा राम नाम सत्य कर सकता है। सोचा कि जब वह मुस्कराकर बात कर रहा, तो बेवजह अकड़ दिखाना समझदारी नहीं है।

मुझे भेड़िया की यह बात अच्छी लगी कि वह मेरी भाषा में बतिया रहा। वह मुझे खाने के लिए लपक नहीं रहा। लेकिन यह समझ नहीं आ रहा कि वह अपनी जगह से जरा भी आगे-पीछे क्यों नहीं हो रहा? मेरे दिमाग में यही उधेड़बुन चल रही थी।

तभी भेड़िया कराहता हुआ बोला- ‘दोस्त, मेरी मदद करिए… प्लीज।’

‘मदद…’

भेड़िया के मुंह से ‘मदद’ सुनकर मुझे अचरज हुआ। सोचा- ‘मैं भेड़िया की क्या मदद कर सकता हूँ भला!’

मुझे भेड़िया की बात कुछ हजम नहीं हुई। मुझे मम्मी द्वारा सुनाई एक कहानी ‘ठग’ याद हो आई। इस कहानी में एक ठग था। लगभग बूढ़ा। सिर से पैर तक चांदी के बाल।

मम्मी जब ठग कहानी सुनाती, तो कहानी  कहते-कहते कई बार ठग की मिमिक्री भी करती। ठग कहानी सुनते हुए मुझे अक्सर पापा द्वारा कंप्यूटर पर दिखाई एक फिल्म के पात्र की याद आती। फिल्म में उस पात्र का नाम ‘हिटलर’ होता। मेरे मन में ठग और हिटलर की एक-सी छवि उभरती, बल्कि मम्मी की कहानी का ठग भाषण देने की कला और जोश में हिटलर को भी पटखनी देता हुआ लगता। ठग झूठ बोलने के हुनर में गोयबल्स को भी धूल चटाता लगता। मम्मी की कहानी में ठग देश भर में घूम-घूम कर भाषण देता। भाषण में सपना दिखाता और अंत में बहुत मार्मिक अपील में कहता- ‘मेरे देशवासियो, मुझे मात्र साठ महीने का समय दीजिए। मैं देश का कायाकल्प कर दूंगा। किसी को बेरोजगार नहीं रहने दूंगा।’

‘मैं अच्छे दिन लाऊंगा!’ मम्मी की कहानी में ठग पर देशवासी भरोसा करते। जिस दिन से ठग ने साठ महीने ठगे, उसी दिन से खून के आंसू रुलाने का नया दौर शुरू हुआ। खैर…।

वह कहानी अपनी जगह है। लेकिन वह  कहानी मुझे सदा सजग रखती और मैं हर कदम फूंक-फूंककर रखता।

उस दिन जंगल में भी मुझे भेड़िया पर भरोसा नहीं हो रहा था, बल्कि मुझे तो संदेह हो रहा था कि किसी भी बहाने से भेड़िया मुझे पास बुलाना चाह रहा है। मैं जैसे ही उसके नजदीक जाऊंगा, वह मेरी गर्दन में दांत फंसाकर मेरा खेल खत्म कर देगा!

मैंने मन ही मन ठाना- ‘कुछ भी हो, भेड़िया की बातों में नहीं आना है।’

मुझे लगा- ‘जैसे भेड़िया, ठग और हिटलर मौसेरे भाई है!’

तभी भेड़िया स्वर में शहद घोलकर बोला-  ‘यार चीका, मुझे बहुत जोर की भूख लगी है। मुझे जल्दी कोई फल-वल खिला दो, वरना मैं भूख से दम तोड़ दूंगा।’

मुझे मन ही मन हँसी आई। लेकिन मैंने हँसी का भाव चेहरे से जाहिर नहीं होने दिया।

मैं ख़ुद से बोला- ‘मुझे बुद्धु समझ रहा,  गोश्तखोर कहीं का! फल खाने की बात कर रहा!’

फिर मैंने भेड़िया से कहा- ‘खुद क्यों नहीं तोड़  लेते फल, तुम तो शिकारी हो! अमरूद तोड़ना कौन सा मुश्किल काम है।’

भेड़िया बहुत थकी आवाज में बोला- ‘कल से यहां फंसा हूँ। निकल नहीं पा रहा हूँ। अमरूद की गंध सूंघ-सूंघ कर ही जिंदा हूँ।’

भेड़िया की बात पर मैंने आंखें बंद करके यकीन नहीं किया। खुली आंख और सतर्कता से कुछ उसके नजदीक गया। गौर से देखने पर समझ में आया- झाड़ियों के भीतर टेढ़ी-मेढ़ी डगालों वाला एक पेड़ छुपा था, जिसकी आड़ी-तिरछी डगालों और टहनियों ने भेड़िया को ऐसे जकड़ रखा था कि जैसे अमेरिकी आड़ी-तिरछी नीतियों ने किसी कुपढ़ और धूर्त वजीरेआजम को घापे ले रखा हो! उसका हिलना-डुलना भी मुश्किल हो रहा। वह सच में ऐसी मुसीबत में उलझ गया था कि यदि मदद नहीं मिली, तो मर ही जाएगा। मुझे उसपर दया आ गई।

मैं तुरंत अमरूद के पेड़ के पास गया, सबसे निचली डगाल पकड़ कर हिलाने लगा। कुछ पके अमरूद नीचे गिरे। मैंने तीन-चार अमरूद भेड़िए को खिलाएं। एक मैंने भी खाया। भेड़िया खुश हुआ। मेरा शुक्रिया करने लगा।

अब तक हम एक-दूसरे से दोस्त की तरह या भाई की तरह घुल-मिल गए।

मैंने भेड़िया से निडर होकर पूछा- ‘मोटे भाई, यह बताओ, यहां फंसे कैसे? मतलब… झाड़ियों में घुसे ही क्यों? बाहर-बाहर भी गुजर सकते थे!’

भेड़िया ने गुजारिशी लहजे में कहा- ‘छोटे भाई, सब कुछ बताऊंगा, पहले यहां से निकालने की जुगत तो भिड़ाओ!’

मैंने कहा- ‘हां, मैं कुछ सोचता हूँ। लेकिन बताओ तो सही, यहां कैसे फंसे?’

‘क्या बताऊं चीका भाई! लालच बहुत बुरी चीज है। भेड़िया ने पछतावे वाले स्वर में कहा और आगे बताया- ‘बहुत जोर की भूख लगी थी। इधर अमरूद खाने ही आया था। जब अमरूद के पेड़ से कुछ दूर था, तब मैंने देखा कि एक खरगोश अमरूद के पेड़ के नीचे बैठा अमरूद खा रहा है। बस, उस खरगोश को देख मेरे मन में लालच आ गया।

‘अमरूद खाने का ख्याल छोड़, खरगोश का मुलायम गोश्त खाने को मन मचल उठा और मैं खरगोश खाने के लिए दौड़ पड़ा। जैसे ही मैं दौड़ा, खरगोश भागकर इन झाड़ियों में घुस गया। मैं भी उसके पीछे-पीछे घुस गया। खरगोश नन्हीं जान। छोटा-सा डिल-डौल। वह झाड़ियों से बाहर निकल गया। मैं झाड़ियों में छुपे इस जालिम पेड़ की गिरफ्त में फंस गया।

‘यहां से निकाल लो दोस्त। वरना जीवन यहीं अस्त हो जाएगा!’

‘लेकिन भाई, अमरूद खाकर भी पेट भर सकते थे, खरगोश खाने को सोचा ही क्यों?’ मैंने भेड़िया से जरा रूखेपन से पूछा।

‘हम्म, यही तो गलती हो गई भाई। आज कसम खाता हूँ माई की। कभी किसी जीव का शिकार नहीं करूंगा।

‘अगर वादाखिलाफी करूं, तो जिस चौराहे का कहोगे, आ जाऊंगा। मुझे जूते मारना। मेरे भाल पर थूकना। मैं चूं तक नहीं बोलूंगा। मैं तुम्हारा एहसान मानूंगा। कभी तुम्हारा थूका नहीं उलाऊंगा। बस, इस मौत की पकड़ से मुक्त करा लो।’

मैंने देखा- बोलते-बोलते भेड़िया का गला रुंध गया। आंखों में आंसू आ गए।

भेड़िया को सुनते-देखते मुझे मम्मी की कहानी का ठग याद हो आया। मानस पर उसी की छवि उभर आई। उसके आंसुओं से मेरा मन भीग गया। मैंने उम्मीद बंधाते हुए कहा- ‘ठीक है भाई, धैर्य रखो, कुछ करता हूँ।’

भेड़िया को आश्वासन तो दे दिया। लेकिन क्या करूं? तुरंत कुछ सूझ नहीं रहा था। कुछ देर बाद आइडिया आया।

कोई ऐसी चीज़ खोजी जाए जिससे झाड़ियों में छुपे पेड़ की पतली-पतली डालों को काटी जा सके।

थोड़ी देर इधर-उधर खोज-बीन के बाद एक काला पत्थर हाथ लगा, जिसका फल कुल्हाड़ी की तरह चौड़ा और धारदार था।

उस कुल्हाड़ीनुमा पत्थर से कुछ देर झाड़ियां साफ करने में लगी। जब पतली-पतली डालों तक पहुंच हो गई, उन्हें काटना शुरू किया। करीब दो-ढाई घंटे की मेहनत रंग लाई। भेड़िया को मुक्त करा लिया। मुक्ति पाकर भेड़िया खुश हुआ। उसकी खुशी में मैं भी शरिक़ हुआ।

मैंने खुशी-खुशी भेड़िया से कहा- ‘मेहनत करते-करते भूख लग आई, चलो दोस्त, अमरूद तोड़ कर खाते हैं।’

‘अमरूद!’ भेड़िया ने दोहराया और आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखने लगा।

‘हां अमरूद, तुम ऐसे आश्चर्य से क्यों देख रहे हो? क्या तुम्हें अमरूद पसंद नहीं है?’ मैंने पूछा।

‘फल… मजबूरी में खाना पड़े तो खा लो! वरना फल खाने में वह मजा कहां, जो गोश्त खाने में और हड्डियां चबाने में होता है।’ भेड़िया कहते हुए मेरी तरफ़ ललचाई नज़रों से देखने लगा। उसके जबड़ों से लार रिसने लगी और जीभ फिरा-फिराकर लार चाटने लगा।

मुझे एहसास हुआ कि मुझसे गलती हो गई। जैसे कि मम्मी की कहानी में देश से गलती हुई थी।

‘लेकिन मेरे दोस्त, मेरे भाई तुमने कहा था कि जिंदगी भर किसी जीव का शिकार नहीं करोगे! तुमने माई की कसम खाई थी।’ मैंने कांपते स्वर में पूछा।

‘भाई, वह महज जुमला था। समय-समय पर परिस्थिति के मुताबिक जुमले उछालने पड़ते हैं।’ भेड़िया ने अपने मुंह में रिसती लार का घूंट गटकते हुए कहा।

मुझे लगा कि यह भेड़िया नहीं, मम्मी की कहानी का ठग है या फिर उस ठग का मौसेरा भाई है।

डर के मारे मेरे पाजामा में बरसात हो गई।

मेरी चीख से मेरा गला फट गया। बगल में सोई मम्मी के कान लाल हो गए। वह उठकर बैठ गई। दादी ऊंचा सुनती थी, वह नहीं जागी। आपा भी घोड़े बेचकर सोई रही।

मम्मी से नाभि-नाल का संबंध था, वह तो मेरे करवट बदलने पर भी आंखें खोल देख लिया करती। मम्मी ने पसीने से भीगा मेरा भाल व गला अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए पूछा- ‘क्या तुमने सपना देखा?’

मैंने धीमे स्वर में कहा- ‘आपकी कहानी में जो ठग था न, जो किसी देश के करोड़ों लोग को बार-बार ठगा करता था…।’

‘हां’

‘मैंने उसके मौसेरे भाई को देखा।’

‘लेकिन कहानी में तो ठग का कोई मौसेरे भाई नहीं था! लगता है कि तुम्हारे सपने में ठग ही रूप बदल कर आया होगा! वह ठग सिर्फ लच्छेदार बातें ही करने में पारंगत नहीं, बल्कि वह बहुरूपिया कला में भी निपुण था।’

‘मम्मी, वह जो भी था, लेकिन अच्छा हुआ कि सपने में था, हकीकत में नहीं था।’

उस रात के सपने में मुझे यह सीख हासिल हुई कि भेड़िया हो, या कोई भी जीव-जंतु, पेड़-पौधे या कोई मनुष्य ही क्यों न हो! शायद वह अपना नैसर्गिक गुण नहीं बदल सकता है।

मैं फिर से सोने की कोशिश करने लगा। लेकिन आंखें बंद करता, तो भेड़िया, ठग या मौसेरा भाई या जो भी था वह, दांत निपोरते मुस्कराता हुआ नजर आता और मैं सो नहीं पाता। उस रात से बिदकी मेरी नींद आज तक नहीं लौटी। वह रात बीते सवा दशक बीत गया।

संपर्क :एम-2/199 अयोध्यानगरी, (बाल पब्लिक स्कूल के पास) इंदौर, संपर्क – bizooka2009@gmail.com