
विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। संप्रति गोरखपुर विश्वविद्यालय में शोध छात्र।
गजल
एक
चमकना भूलकर ये आफताब से बच्चे
घिरे रहते हैं बस कॉपी-किताब से बच्चे
महकना चाहते हैं पर महक नहीं पाते
किसी चूते हुए घर में गुलाब से बच्चे
शहर के एक कोने में ठिठुरते हैं शब भर
बिलखते गांव में जो थे नवाब से बच्चे
सभी की ख्वाहिशों का पूरा ध्यान रखते हैं
किसी दरबार में पहुंचे शराब से बच्चे
दबाते पांव, तलवे और घुड़कियां सुनकर
रहम की भीख न पाते जनाब से बच्चे
बगावत खून में थी खून हो गया पानी
डरे रहते हैं अब तो इंकलाब से बच्चे
वहां नौकर हैं पर अपने यहां के दीपक हैं
अरे हजरत! खरच करना हिसाब से बच्चे।
दो
है कहीं रेशम कहीं खादी गजल
है कहीं पिछड़ी सी आबादी गजल
मां अगर कविता है उसकी गोद में
बनके इठलाती है शहजादी गजल
उम्र भर शायर इसे ही ढूंढ़ते
और दिखलाती है उस्तादी गजल
फूल, भौंरे, तितलियां सब हैं यहां
लग रही है इक हसीं वादी ग़जल
बादशाहत लार टपकाने लगी
आई जब दरबार फरियादी गजल
हमने कोठे से उतारी और फिर
आम जन के बीच पहुंचा दी गजल
वो गजल सा पार्क जिसमें साथ तुम
वक्त भी लिखता था उन्मादी गजल
झूमते थे घर दरो-दीवार सब
जांत पर गाती थीं जब दादी गजल
बात सच्ची बोलती थी बिन डरे
इसलिए राजा ने चिनवा दी गजल
बेड़ियों को, रूढ़ियों को तोड़कर
मांगती है आज आजादी गजल
है गजल में तो रिवायत का चलन
मैं लिखूंगा किंतु जनवादी गजल।
संपर्क :ग्राम–रुद्रपुर, पोस्ट–खजनी, जिला–गोरखपुर– 273212 मो. 6386578871

