युवा कवि और पत्रकार। ‘काल बैसाखी’ (कविता संग्रह) प्रकाशित।

धुन

‘और बता भाई’
‘बस सब बढ़िया’
ऐसे बात करते थे पुरुष
जैसे बात छुपा रहे हों
कोई भावुक होकर रख देता अपना दुख
तो खींच ली जाती उसकी टांग
या छिड़ जाती स्पर्धा पुरुषों के बीच
अपना दुख बड़ा बताने की

फिर सबने मिलकर तय किया
दुख छुपाना ही अच्छा है
भले एक दिन खुद को गोली मार लें
इस तरह राजनीति खेलकूद और भाषा विषय बने
ये वस्तुएं थीं जिनमें स्पर्धा संभव थी
उनका सबसे बड़ा दुख स्त्री थी
उन्होंने स्त्री को भी छुपाया दुख की तरह
उसके हर अंग प्रत्यंग भाव भंगिमा को
वस्तु में बदला
राजनीति खेलकूद और भाषा की तरह
और इस तरह पुरुष के दुख से
क्रोध ने जन्म लिया

इधर स्त्रियां खुलकर बतियाती थीं अपना दुख
डबडबाई आंखों से सुनती थीं एक दूसरे की बात
जैसे सबकुछ अपने साथ घट रहा हो
और भर जातीं इतनी संवेदना से
कि हर आहट से डर जातीं
मसलन वे बार-बार तिलचट्टे से डरीं
उन्हें लगा वो उनकी देह पर चल रहा है
जिसे पुरुष ने आकर कुचल दिया
निकल गया इससे पुरुष का थोड़ा-सा क्रोध
तिलचट्टे की मज्जा की तरह

स्त्री और पुरुष
अपनी-अपनी भाषा में कुछ बोले
इससे दुख थोड़ा कम हुआ
लेकिन इतनी अलग थी उनकी भाषा
कि वे बिलकुल नहीं समझ पाए
एक-दूसरे की बात
फिर उन्हें एक-दूसरे की गंध लगी
और प्यास जगी
और साथ रहे और बच्चे जने
और भी बच्चे बने
पुरुष ने गुनगुनाया कोई गाना
स्त्री उसकी धुन पकड़कर
गाने लगी कुछ और।

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