
रांची विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अध्यापन। विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी, आदिवासी कला, संस्कृति, भाषा साहित्य, पर्यावरण के अध्ययन में विशेष रुचि। काव्य संग्रह ‘दिसुम का सिंगार’ प्रकाशित।
धरती और प्रेम
हम जंगल में जंगल के हिस्से होते हैं
और पहाड़ों में पहाड़ के हिस्से
दुलारते हैं हम इस धरती को
हम सरई धरती की संतान हैं
धरती के लिए प्रेम के गीत गाते हैं
हम नफरत और हिंसा के बीज नहीं बोते
हमारे पुरखे युद्ध के समर्थक नहीं थे
हम युद्ध उन्माद का नशा नहीं फैलाते है
सहिया और फूल जोड़ाकर
सरई धरती में प्रेम से रहते हैं
हमारी प्रकृति-संस्कृति में
हिंसा, क्रूरता नहीं है
हमें अतिरिक्त की आकांक्षा नहीं है
और हमारी जीवन संस्कृति में
मुनाफे के लिए अनवरत यात्रा नहीं हैं
बांसुरी, मांदर और नगाड़े
बजाते हुए जंगल, पहाड़ की
पगडंडियों का सिंगार करते हैं
और पूर्वजों की तरह गीतों से भरते हैं
पुरखों ने खुद को सजाया तीर-धनुष से
और पुरखिनों ने हंसिया और दाउली से
हीरे, सोने की लालच में हम
जंगल का समूल विनाश नहीं करते हैं
पुरखों ने नहीं बनाए विध्वंसक हथियार
और न कभी किया जनसंहार
बारूद, बम आदिम भाषा के शब्द नहीं हैं
परमाणु हथियारों के खिलाफ
हम आदिवासी ही सबसे पहले उठाते हैं आवाज
नफरत, हिंसा के खिलाफ
हम एकजुट होते रहेंगे
इंसानियत से प्रेम रखने वाले
जोड़ देंगे समान विचार वालों को
जो युद्ध और हिंसा के खिलाफ हैं
प्रकृति परब सरहुल मनाते हुए
प्रकृति परब करम मनाते हुए
जूड़े में फूल खोंसकर
कानों में फूल खोंसकर
धरती के लिए प्रेम के गीत गाते हैं
हम धरती का सम्मान करते हैं
हम धरती से प्रेम करते हैं
हिंसा का विकल्प प्रेम ही तो है
हम सरई धरती की संतान हैं
धरती के लिए प्रेम के गीत गाते हैं।
संपर्क :आसरी रेसीडेंसी, 3सी, ब्लॉक सी, न्यू गितिलपीड़ि, दिनकर नगर, हटिया स्टेशन रोड, बिरसा चौक, रांची, झारखंड-834003 मो.6207937207

