
1963, कलकत्ता में जन्मे प्रतिष्ठित उर्दू कथाकार और अनुवादक। रचनाएं देश–विदेश की प्रायः सभी श्रेष्ठ उर्दू पत्रिकाओं में प्रकाशित। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें दो उपन्यास और एक कहानी संग्रह शामिल। कई पुरस्कारों से सम्मानित।

अब उन्होंने यही तरीका अपना रखा था। दामन पसार कर हाथों को यूं फैला देतीं जैसे नीचे कोई चिराग धरा हो, और वे आंचल को फ़ानुस बनाकर उस की हिफ़ाज़त कर रही हों। पिछले तीन महीनों से यही कर रही थीं। नमाज़ पूरी करके इसी तरह हाथ ऊपर करतीं, आंचल का फ़ानुस बनातीं और गिड़गिड़ाने लगतीं। आज भी इशा की नमाज़ के बाद इसी तरह दुआएं मांग रही थीं।
लौ तो कब की जा चुकी थी। फ़तीले पर बस एक छोटी सी चिंगारी टिकी हुई थी। दुआओं की हल्की हल्की फूंक से वो इस चिंगारी को फिर से लौ में बदल देना चाहती थीं।
शरीर काँप रहा था। होंठ थरथरा रहे थे। कमरे का सन्नाटा चुप्पी साधे एक कोने में दबक गया था। करुणाजनक याचना अब और भी तीव्र हो गई थी:
‘अए अल्लाह, अए रबबुल-करीम, अपने हबीब के सदक़े, मुझ बेसहारे पर रहम फ़रमा। इस ख़ानदान का चिराग़ मत बुझा। अए अल्लाह…!’
दुआओं के बाद भी वे इसी तरह मुसल्ले पर बैठी रहीं। जब दीवार पर टंगी घड़ी ने दस बजने का संकेत दिया तो उन्होंने आंसू पोंछे, मुसल्ला तह किया और कुर्सी की मूठ थाम कर धीरे-धीरे खड़ी हुईं। वाशबेसिन का नल खोला। मुंह पर पानी के दो चार छींटे मारे। फ्रीज़ से खाना निकाल कर माइक्रोवेव में गरम करने लगीं। आज-कल वे खाना पका कर फ्रीज़ में रख देती हैं और ओवन में गरम कर-कर के कई दिनों तक काम चलाती हैं।
माइक्रोवेव ओवन के अंदर प्लेट धीरे-धीरे घूम रहा था। स्क्रीन पर अंक एक-एक करके घट रहे थे। निर्धारित समय का अभी कुछ हिस्सा ही गुज़रा था कि डाइनिंग टेबल पर पड़ा मोबाइल खड़खड़ा उठा।
उन्होंने आंखों पर ऐनक चढ़ाई। नाम देखते ही माथे पर बल पड़ गए। ‘सिमरह का फ़ोन और इस वक़्त!’ वो बुदबुदाईं।
माइक्रोवेव बंद कर दिया और ‘अए अल्लाह रहम कर’, कहती हुई फ़ोन कान से लगा लिया।
अल्लाह मियां ने रहम ही किया था, जभी तो उनकी बुझी-बुझी आंखें चमक उठीं। होंठों पर मुस्कुराहट फैल गई। उनकी दूरदर्शिता काम आ गई। महीनों बाद उनके चेहरे पर ऐसी चमक और मुस्कुराहट आई थी। मगर बिस्तर पर लेटते ही ज़हन के पर्दे पर अदील नमूदार हुआ और शोक और पीड़ा ने उन्हें फिर से आ घेरा।
अदील उनके साथ ही सोया करता था। सोते समय कहा करता, ‘दादी, लोरी सुनाओ ना।’
दादी लोरी गाना शुरू करती: ‘चंदा मामा दूर के…’
‘नहीं ये वाली नहीं। उड़न खटोले वाली।’ वह दादी की गर्दन में बांहें डाल कर हठ करता।
दादी हँस कर गाल थपक देती। उन्हें मालूम था, जब कभी शाम को वह नींद भर सो लेता है तो रात को इसी लोरी की फ़र्माइश करता है। और फिर लोरी की धीमी मीठी ध्वनि कमरे में तरंगित हो जाती।
‘आ रे आजा, निंदिया तू ले चल मुझे
उड़न खटोले में…’
आज भी वो लेटे लेटे यही लोरी गा रही थीं।
‘दूर दूर दूर यहां से दूर…’
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रात भर आसमान साफ़ था। चांद पूरे आब-ओ-ताब से चमकता रहा था। हवा भी आरामदायक थी। मगर सुबह को मौसम का रंग अचानक बदल गया। आसमान मेघमय हो गया। काले बादलों ने सूरज को आ घेरा और रह-रह कर बिजली भी चमकने लगी। मगर मौसम का ये मिज़ाज उमैरह बानो का क़दम भला कैसे रोक सकता था। रोज़ की तरह आज भी वो वक़्त पर ही निकल पड़ीं।
पहले तो जालिब और सिमरह के लौटने के बाद दोपहर को निकला करती थीं, लेकिन उनके चले जाने के बाद अब वो सुबह को ही निकल पड़ती हैं। बस से उतरती हैं। दस बारह मिनट पैदल चलती हुई मेन गेट में दाख़िल होती हैं। सामने वाले दरख़्त के नीचे बेंच पर बैठ कर कुछ देर दम लेती हैं। फिर धीरे-धीरे आई.सी.यू. वार्ड की ओर चल देती हैं।
मगर इधर कई दिनों से पहले बच्चा-वार्ड की तरफ़ जाती हैं। उस के बाद आई.सी.यू. वार्ड की तरफ़ जाती हैं। तीसरी मंज़िल पर पहुंच कर बाएं मुड़ती है और कमरे में घुस कर पोते को ग़ौर से देखती हैं। पेशानी सहलाती हैं। और फिर बैग से मोबाइल निकाल कर वाट्सएप् खोलती हैं। सिमरह के नाम पर वीडिओ कॉल का बटन क्लिक करते ही दूसरी जानिब से आवाज़ आती है, ‘सलाम-अलैकुम, अम्मां कैसी हैं?’
‘वा-लैकुम सलाम, बेटी। ठीक हूँ। तुम लोग कैसे हो? जालिब कैसा है?’
‘अम्मां, हम सब ठीक हैं।’
इसके बाद कैमरे का रुख पोते की तरफ़ मोड़ कर कुछ देर मोबाइल थामे रहती हैं। कहती हैं, ‘बेटा, देखो, यहां सब पहले जैसा ही है।’
और फिर फ़ोन ऑफ कर के पायंती बैठ जाती हैं। पोते के जागने का अपेक्षा करती रहती हैं। चेहरा देखते हुए मुंह बिसूर कर मन ही मन कहती हैं, दुनिया के सारे बच्चे बाहर कूद फांद रहे हैं और तू बिस्तर पर पड़ा है। अपनी ज़िंदगी को पाइप और मशीनों के हवाले किए। न कोई ज़िद, न कोई हठ। न रोना चिल्लाना। सारी दुनिया से बेख़बर! मालूम नहीं तू कैसी नींद सो रहा है? और जब आंसू छलक उठते हैं तो बैग से रूमाल निकाल कर आंखें मलने लगती हैं।
आज भी बस उसी जगह आ ठहरी थी। वे संभल कर धीरे–धीरे उतरीं। किनारे आकर उन्होंने नज़रें ऊपर कीं। आसमान और भी मटमैला हो गया था। मोटे काले बादलों के घने जत्थों ने सूरज के गिर्द डेरा डाल रखा था। चीलों का झुंड मंडरा रहा था। वातावरण में अजब घुटन थी। सड़क की दोनों ओर पेड़ों पर परिंदों का शोर भी बढ़ गया था।
वे तेज़–तेज़ चलने लगीं। लेकिन बुढ़ापे के कारण इनकी गति एक हद तक ही तेज़ हो पाई थी। अस्पताल की तरफ़ बढ़ती जा रही थीं कि सहसा बिजली की एक कौंध उनके अस्तित्व को कंपन दे गई। तीन महीने पूर्व ऐसी ही एक कौंध गिरी थी। ज़मीन पर नहीं उनके हृदय पर। पता नहीं कैसे अदील मकान की छत से गिर पड़ा था। ‘धम’ की आवाज़ सुनकर वे भी दौड़ी थीं। ख़ून में लथ–पथ देख कर उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया था।
जालिब ख़ान गरमियों की छुट्टी में घर आया हुआ था। बेटे की हालत देखकर कांप गया। गोद में लिए नर्सिंग होम को दौड़ पड़ा। बहुत चेष्टा की गई परंतु उसे होश न आया। आख़िरकार एक बड़े अस्पताल में दाख़िला कर देना पड़ा।
अचानक हवा के एक झोंके ने उमैरह बानो के क़दम रोक दिए। शरीर मोड़ कर चेहरे को हथेली से ढक कर थोड़ी देर खड़ी रहीं। फिर आहिस्ता-आहिस्ता खिसक कर एक पेड़ की ओट में खुद को छुपा लिया। और जब हवा का ज़ोर कम हुआ तो दुबारा अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ीं।
कल डॉक्टर सिंह ने कहा था, आज सुबह मेडिकल टीम की मीटिंग बैठेगी। परंतु उन्हें अब इसमें कोई रुचि न थी। पिछली मीटिंग में डाक्टरों की बस एक ही रट थी, बच्चे का लाईफ़ स्पोर्ट बंद कर दिया जाए। स्विच ऑफ़ द वेंटिलेटर।
डॉक्टरों की टीम में चटर्जी ही ऐसे सदस्य थे जो तुलनात्मक नए और कम उम्र होने के बावजूद सिनीयरों की राय से सहमत न थे। पहली मीटिंग में जालिब और सिमरह को बुलाया गया था। बेटे की अवस्था देख एवं डॉक्टरों की दलीलें सुनकर दोनों ने हथियार डाल दिए थे। परंतु डॉक्टर चटर्जी ने हार नहीं मानी। डटे रहे। उनकी इस निष्ठा ने डॉक्टर सिंह को कहने पर मजबूर कर दिया था, ‘वेल, डॉक्टर चटर्जी की बात की हम अवज्ञा नहीं कर सकते। मेडिकल साईंस में बहुत कुछ नया हो रहा है। डॉक्टर चटर्जी की ये बात विचारणीय है। पिछले सत्ताईस दिनों से मरीज़ की हालत अगर सुधरी नहीं है तो बिगड़ी भी नहीं है। ऑर्गन फेल्यर की भी कोई रिपोर्ट नहीं। वेल, वी मे गिव हिम ए चांस।’
और इस तरह दूसरी मीटिंग तक वेंटिलेटर ऑन रखने का निर्णय लिया गया। मरीज़ को पूरे तौर पर डॉक्टर चटर्जी की निगरानी में दे दिया गया।
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जालिब ख़ान अब थक चुका था। इतने दिनों तक सुबह शाम, घर अस्पताल एक करता रहा किंतु आशा की कोई किरण नज़र न आई। उसे डॉक्टर चटर्जी की कमउमरी पर भरोसा न था। कॉलेज खुले तीन हफ़्ते गुज़र चुके थे। बुलावे पर बुलावा आ रहा था। बच्चों का भी नुक़्सान हो रहा था। अब और छुट्टियां मुनासिब नहीं।
और जब उसने अपना निर्णय प्रकट किया तो सिमरह चौंक पड़ी। परंतु उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया। बस आंसू पीकर रह गई।
उमैरह बानो चाय का ट्रे लिए ड्रॉइंग रूम में दाख़िल हुईं तो उनके चेहरे पर तनाव महसूस किया। औलाद के दुख का एहसास उनसे अधिक भला और किसे हो सकता था। ट्रे रखा और सिमरह के सर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘वो ठीक कह रहा है, बेटी। यहां तो एक बच्चा है, वहां उसके सैकड़ों बच्चे हैं। उसे मत रोक।’
वे जानती थीं, ऐसी परिस्थिति में भावुकता का मामूली सा साया भी उनकी औलाद और ख़ानदान के भविष्य के लिए लाभदायक नहीं। महीने भर वह बेटे को तिल-तिल मरता देख रही थीं। उन्हें वर्तमान से ज़्यादा भविष्य की चिंता थी। अतः सिमरह का हाथ पकड़कर अंदर कमरे में ले आईं। मृदु स्वर में बोलीं। कहते समय उनके शब्द लड़खड़ाए भी थे, परंतु दूरदर्शिता ने उनका दामन थाम रखा था। ‘मैं कहती हूँ, तू भी साथ चली जा। ऐसी हालत में उसे अकेला छोड़ना ठीक नहीं।’
‘ये क्या कह रही हैं आप?’ सिमरह के माथे पर बल पड़ गए थे।
‘ठीक कह रही हूँ, बेटी।’ उन्होंने समझाया।
‘मगर अदील?’ सिमरह प्रायः झुंझला उठी थी।
‘अदील की देख-भाल के लिए नर्स है। और वैसे भी वह बेसुध पड़ा रहता है। उसे क्या ख़बर, कौन आया कौन गया। नर्स और डॉक्टर दिन-रात उसकी निगरानी करते हैं। और फिर में हूँ न।’ वे उसे समझाती रहीं।
बहू का लहजा नरम पड़ता गया। वो कहती गईं, ‘मेरी बात मान, बेटी। साथ चली जा। मैं उसे इस हाल में अकेले नहीं छोड़ सकती। वह अंदर से टूट चुका है। अब बस तू ही उसका सहारा है। अदील की फ़िक्र न कर। तू वहां से भी उसे देख सकेगी। तू जा। यहां में सब संभाल लूंगी।’
और तभी से उन्होंने यहां सब कुछ संभाल रखा था। रोज़ सुबह दस बजे अस्पताल आ जातीं। वीडियो कॉल के माध्यम से सिमरह को पोते के हाल से अवगत करतीं। छुट्टी के दिनों में जालिब भी बेटे का दीदार कर लेता था। इस तरह वे दोनों संतुष्ट थे। परंतु वे उन्हें हर बात बताना आवश्यक नहीं समझती थीं। मेडिकल टीम की मीटिंग और निर्णय के बारे में तो बिल्कुल नहीं।
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आखरी मीटिंग एक माह पहले हुई थी। अभिभावक की हैसियत से उन्हें भी बुलाया गया था। सदस्यों की राय जान लेने के बाद डॉक्टर सिंह ने डॉक्टर चटर्जी को तिरछी निगाहों से देखा था। कहा था, ‘वेल, मैं आप सभों से सहमत हूँ, डॉक्टर्स। अब कोई मिराकल नहीं होने वाला। वेंटिलेटर ऑफ़ कर देना चाहिए।’
ये सुनकर वह उत्तेजित हो गई थीं, ‘मेरे पोते को मार देना चाहते हैं? उस मासूम ने क्या बिगाड़ा है आप लोगों का?’
डॉक्टर सिंह की पेशानी पर सिलवटें उभर आई थीं। उन्होंने ग़ुस्से पर क़ाबू पाते हुए कहा था, ‘मां जी, किसी मरीज़ को हम हमेशा के लिए तो वेंटीलेटर पर नहीं रख सकते। ऐसी स्थिति में…’
‘क्यों नहीं रख सकते? आपका अपना बेटा होता तब भी नहीं रखते?’ उनका स्वर तिक्त हो गया था।
‘हां तब भी नहीं। मैं उसे इस पीड़ा से मुक्ति दे देता। यहां वेंटिलेटर कम हैं और मरीज़ों की संख्या अधिक।’ डॉक्टर सिंह उत्तेजित हो गए थे।
वह भी तैश में आ गईं। बोलीं, ‘ओहो! मैं तो भूल ही गई थी कि मरीज़ का नाम है मोहम्मद अदील ख़ान…।’ उन्होंने ‘मुहम्मद’ और ‘ख़ान’ को कुछ ज़्यादा ही खींच दिया था। परंतु दूसरे ही क्षण अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उन्होंने अपने बाक़ी शब्द निगल भी लिए थे। परंतु तीर कमान से निकल चुका था।
डॉक्टर सिंह हक्का-बक्का रह गए। दूसरे डॉक्टर भी सवालिया नज़रों से एक दूसरे को ताकने लगे। कुछ देर निस्तब्धता छाई रही। फिर सभी ने परिस्थिति और माहौल अनुसार निर्णय लिया। सिर हिला कर एक दूसरे तक इस निर्णय का संचरण किया। डॉक्टर सिंह ने निस्तब्धता तोड़ी, वेल, ‘जेन्टलमैन, एक बात तो मगर अब भी इस केस में पाज़िटिव है और वो ये कि मरीज़ के सभी आर्गन इंटेक्ट हैं। थोड़ा समय दिया जा सकता है।’
टीम के इस फैसले से वह ख़ुश तो हो गई थीं मगर मानसिक रूप से अब भी तनाव में थीं। तीसरी मंज़िल पर जाने के बजाय नीचे उतर आईं। बाहर खुले में सांस लेना चाहा। बेंच पर बैठे आंखें मूंदे दम ले रही थीं कि किसी ने आवाज़ दी, ‘तोहार बचवा का भी अडमीसन नइखे लेत का, माई?’
आंखें खुलीं तो देखा, एक औरत गोद में मरियल सा एक बच्चा लिए खड़ी है। बच्चे की आंखें बंद हैं और गर्दन एक तरफ़ ढलकी हुई। उमैरह बानो ने पूछा, ‘क्या हुआ इसे?’
‘नमोनया हो गाइल बा, डगडर लोग भर्ती लिख देलेबा, मगर आपिस का बाबू लोग बोलता बेड खाली नइखे। आउर ऊजो फूलपैन्ट पहने खड़ा सिगरेट पीअतबा, बोलता कि हम भर्ती करवा देब, मगर चार हजार रुपया लगी। हम बहूत बोलनी हँ कि हमार पास बस पंद्रह सौ बा, लेले। मगर ओ हमके भगा देलस।’ ये कह कर वह फूट-फूट के रोने लगी।
उन्होंने पहले तो बच्चे को ग़ौर से देखा, फिर पेशानी पर हथेली रखकर कहा, ‘अरे, इसका बदन तो तप रहा है!’
औरत बच्चे की तरफ़ देखकर और भी ज़ोर -जोर से रोने लगी। ‘माई, हम बहूत दूर से आइल बटी।’
उन्होंने पतलून वाले आदमी को हांक लगाई। जब वह क़रीब आया तो कहा, ‘बेटा, ग़रीब औरत है। बच्चे पर रहम कर, कुछ कम सम कर। अल्लाह तेरे बच्चों पर रहम करेगा।’
ये सुनकर वह बोला, ‘माई, वो साले बाबू लोग हैं। मेरे बस में होता तो मैं बिना पैसे ही एडमीशन करा देता, मगर वो लोग इससे कम में नहीं मानेंगे।’ इतना कहकर उसने सिगरेट का एक कश लिया और फिर धीरे से कहा, ‘अच्छा, ऐसा कर, दो सौ कम दे देना।’
ये सुनकर वह औरत से बोलीं, ‘ला दे कितने पैसे हैं तेरे पास।’
औरत ने आंचल खोल कर रुपये निकाले और कहा, ‘हमार पास ईहे पंद्रह सौ बा, बस।’
उन्होंने रुपये ले लिए। पर्स से दो हज़ार का एक नोट निकाला। उस आदमी की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, ‘ले बेटा, ये साढ़े तीन हज़ार रुपये रख। बेचारी ग़रीब है। तू तो देख ही रहा इसकी हालत।’
‘हां वह तो ठीक है मगर इतना बड़ा नोट बाबू लोग लेंगे?’ उसने दो हज़ार के नोट को उलट-पलट कर देखते हुए कहा।
‘क्यों नहीं लेंगे? सरकारी नोट है।’
‘सो तो में भी जानता हूँ, मां जी। मगर उसके छुट्टे कहां मिलेंगे कि वे आपस में भाग-बंटवारा…’
‘देख बेटा, जल्दी कर। अगर जल्दी भर्ती नहीं किया तो ये मासूम मर जाएगा। जा करा दे भर्ती इसे, ईश्वर तेरे बच्चों का भला करेगा।’
वो दो हज़ार के नोट को उलटता पलटता, मुंह बिसूरता, चला गया।
दरअसल उमैरह बानो के दिल में एक गुमान पैदा हो गया था, ‘अगर ये बीमार बच्चा स्वस्थ हो गया तो मेरा अदील भी स्वस्थ हो जाएगा।’
और अब जब भी वे अस्पताल आतीं तो पहले उस बच्चे का हाल पूछने चली जातीं। डॉक्टरों की लिखी हुई दवाई ले आतीं। उसकी हर संभव सहायता करतीं।
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तूफान का ज़ोर कम हो चुका था। मेन गेट के पास आकर उमैरह बानो ने कंधे से बैग उतारा। थपकियां लगा कर गर्द झाड़ी। ऐनक उतारकर आंचल से हाथ मुंह पोंछे। फिर आगे बढ़कर संदेश और मुसम्मी ख़रीदे। बच्चों के वार्ड में दाख़िल हुईं तो देखा, बच्चा रो रहा है। मां संभालने की चेष्टा कर रही है परंतु वह पछाड़ें खा रहा है। किंतु उनपर नज़र पड़ते ही चुप हो गया। मां से लिपटकर अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराने लगा।
उन्होंने पूछा, ‘क्यों रे, देवकी, क्या हुआ मेरे नंदू को? क्यों रो रहा था ये?’
देवकी ने कहा कि आपको ढूंढ रहा था। कह रहा था, दादी अभी तक क्यों नहीं आई। आपके आने में तनिक भी देर हो जाए तो इसी तरह हठ करने लगता है।
‘क्यों रे, बदमाश तू हठ भी करता है?’ ये कहते हुए उन्होंने मुसम्मी की थैली देवकी को थमाई और बांहें फैला दीं। ‘चल आ, मेरे पास। देखा नहीं, कितनी ज़ोर की आंधी चल रही थी।’
वह जब भी नंदू को छाती से लगातीं, उनका मन भर आता। उन्हें ऐसा लगता जैसे अदील लंबी नींद से जाग कर उनकी छाती से लिपट गया हो।
नंदू रफ़्ता-रफ़्ता स्वस्थ होता गया, परंतु उमैरह बानो का गुमान गुमान ही रहा। अदील अब भी कोमा में पड़ा था।
उन्होंने नंदू की ज़ुल्फ़ों में उंगलियां फेरीं। डिब्बा खोल कर संदेश खिलाया। और देवकी से पूछा, ‘छुट्टी कब होगी?’
देवकी ने बताया कि डॉक्टर बाबू शाम को आएंगे। छुट्टी के बारे में वही बताएंगे। इतना कहकर वह उनका हाथ थामे रोने लगी, ‘माई, अगर तू नाहीं होती तो हमार बेटवा…’
उन्होंने ढाड़स बंधाते हुए कहा, ‘बेटी, सब ऊपर वाले की मर्ज़ी है। कोई कुछ नहीं करता। अगर मैं कुछ कर सकती तो मेरा पोता बिस्तर पर पड़ा इस तरह तकली़फें न झेलता।’
देवकी उदास नज़रों से उन्हें तकने लगी। कुछ देर वातावरण में ख़ामोशी छाई रही। इसके बाद उन्होंने ऐनक उतार कर आंचल से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘तेरा ये नंदू, मेरे लिए नंदलाल साबित हुआ है। अल्लाह को मुझ अभागन पर आख़िरकार रहम आ गया। रात बहू का फ़ोन आया था। मेरे घर उम्मीद की एक किरण फूटी है।’
उमैरह बानो के चेहरे पर खुशी की हल्की हल्की लहरें उभरने लगी थीं। उन्होंने एक-बार फिर नंदू को छाती से भींच लिया।
वह पिछले तीन महीने से पोते को उसी अवस्था में देखती आ रही थी। परंतु आज उनका मन बैठने लगा था। कमरे में दाख़िल हुईं तो सांस हमेशा की तरह फूल रही थी। नर्स मॉनीटर देख रही थी। काग़ज़ पर कुछ नोट कर रही थी। उसने उन्हें कन-अंखियों से देखा। थोड़ी देर वह चुप-चाप उसी तरह नोट करती रही। उसके बाद काग़ज़ एक तरफ़ रख दिया। बिस्तर की चादर खींच-तान कर बराबर करने लगी। जब उनका सांस फूलना कुछ कम हुआ तो नर्स ने कहा, ‘मासी मां, आज मेडिकल टीम की मीटिंग थी। क्या हुआ?’
उमैरह बानो ने एक सर्द आह भरी। कहा, ‘क्या मालूम, मैं नहीं गई। जाकर होता भी क्या? वही पुरानी बात! अब तो मुझे भी लगने लगा है, हम इस अभागे पर ज़ुल्म कर रहे हैं।’
ये कहकर उन्होंने रोज़ाना की तरह बैग से मोबाइल निकाला और व्हाट्सएप पर ‘उस अभागे का विडियो सिमरह को भेजने लगीं। और फिर उसे उपदेश दिया, ‘ख़बरदार, भारी चीज़ न उठाना। और जितनी जल्दी हो सके यहां चली आ।’
नर्स जा चुकी थी। वह बिस्तर के पायंती आंखें मूंदकर सिर टेके बैठ गईं। किसी गहरी चिंता में डूबी हुई थीं। न चाहते हुए भी शायद वह आज के निर्णय के बारे में ही सोच रही थीं। और तभी उनके कानों में डॉक्टर सिंह के शब्द गूंजने लगे। ‘हां, मैं उसे इस पीड़ा से मुक्ति दे देता। यहां वेंटिलेटर कम है और मरीज़ की संख्या अधिक…।’
उन्होंने ग़ौर से पोते की ओर देखा। नाक मुँह में वही पाइप, कलाइयों एवं पिंडुलियों में वैसे ही चुभी हुईं सुइयां! वही गहरी नींद!
मॉनीटर पर निगाहें डालीं। लहरों की तरह ऊपर नीचे करती हुईं वही लकीरें, दाएं से बाएं जाती हुईं।
वे टकटकी बांधे उन मध्यम मध्यम लकीरों को देख रही थीं कि कानों में आवाज़ आई, ‘दादी लोरी…!’
दादी लोरी सुना रही थी:
‘आ रे आजा, निंदिया तू ले चल मुझे उड़न खटोले में…’
उमैरह बानो हौले से उठीं। पोते का चेहरा हथेलियों में भरकर पेशानी पर हल्का सा चुंबन लिया।
आंखों से आंसू बह रहे थे। लोरी की हल्की मीठी ध्वनि कमरे में तरंगित हो रही थी।
‘दूर दूर दूर यहां से दूर…’
और इस के साथ ही वेंटिलेटर के स्विच पर थरथराते शरीर की सारी शक्ति सिमट आई।
अब वह तेज़ तेज़ क़दमों से सीढ़ियां उतर रही थीं। दूसरी मंज़िल पर डॉक्टर सिंह का केबिन था। केबिन की ओर बढ़ती जा रही थीं। उनसे अंतिम बार मिलना चाहती थीं। क्षमा मांगना चाहती थीं। उन्हें धन्यवाद कहना चाहती थीं।
उन्होंने केबिन के सामने खड़े होकर ख़ुद को समेटा। फिर धीरे से दरवाज़े पर दस्तक देकर अंदर दाख़िल हो गईं।
डॉक्टर सिंह कुर्सी पर बैठे थे। मेज़ पर फाईल खुली पड़ी थी। बाएं ओर डॉक्टर चटर्जी अध-झुके अंदाज़ में खड़े थे। संभवतः वे दोनों किसी मुद्दे पर विचार-विमर्श कर रहे थे।
उन्हें देखते ही डॉक्टर सिंह हँसते हुए खड़े हुए। डॉक्टर चटर्जी के होंठों पर भी मुस्कुराहट फैल गई। डॉक्टर सिंह ने पूछा, ‘आज आप मीटिंग में नहीं आईं?’
वह ख़ामोश खड़ी रहीं। डॉक्टर सिंह ने डॉक्टर चटर्जी की तरफ़ इशारा करते हुए उत्साहपूर्वक कहा, ‘मां जी, इस पट्ठे ने कमाल कर दिया। इसका एक मित्र साउथ कैरोलीना में रहता है। अमरीका के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर डग वॉल्ट का अस्सिटेंट है। पिछले हफ़्ते इसने अदील की केस फाइल उसे भेजी थी। प्रोफेसर वॉल्ट का कहना है, इस तरह के मरीज़ों को कोमा से निकाला जा सकता है और वह सामान्य जीवन जी सकता है। उन्होंने एक नुस्खा भेजा है। आज मेडिकल टीम की मीटिंग में सभी डॉक्टर चिकित्सा की इस प्रणाली से सहमत हो गए हैं। चिंता न करें, अब आपका पोता…
वे अंधाधुंध घूरे जा रही थीं। उनका सर चकराने लगा। आंखों के आगे अंधेरा छा गया।
डॉक्टर चटर्जी तेज़ी से लपके। डॉक्टर सिंह भी हड़बड़ाकर कुर्सी से उठे और उमैरह बानो की तरफ़ दौड़ पड़े।
संपर्क : 11बी/1, के.बी.बोस लेन, टॉलीगंज, कोलकाता-700033 मो. 8961491731

