पिछले एक दशक से लेखन में सक्रिय। संप्रति स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक

‘शब्दों पर बात करने के लिए शब्दों का प्रयोग करना ठीक वैसा ही है जैसा कि पेंसिल का चित्र बनाने के लिए पेंसिल का इस्तेमाल करना। एक निहायत ही मुश्किल, पेचीदा और गुमराह करने वाली कवायद!’ -पैट्रिक रूथफ़्स

निश्चय ही शब्द जिनसे मुखर है जीव और जीवन, जिनसे आश्वस्त है भावों का अनाम अरूप संसार और जिनसे बनता है साहित्य समाज का दर्पण, उन्हें वहन करना इतना सरल नहीं। लेकिन भावों की तुष्टि के लिए करनी ही पड़ती है यह कवायद। लेना ही पड़ता है अभिव्यक्ति का जोखिम और वहन करना पड़ता है शब्दों का भार, अर्थों के साथ। क्योंकि यह कवायद किए बगैर, यह जोखिम लिए बगैर, यह भार उठाए बगैर, न ‘शब्द’ हो पाना संभव है और न मौन, क्योंकि मौन भी तो आख़िर एक शब्द ही है, एक गुज़रता हुआ शब्द! मगर देखने और समझने की बात यह है कि शब्दों से आक्रांत हमारे समय की समस्या ‘मौन’ नहीं ‘शब्दों की आड़ में घटित हो रहा अर्थों का दुखांत’ है। जो कई बार शब्दों को उनके अपने अर्थों से बहुत दूर ले जाकर खड़ा कर देता है। इतनी दूर कि उन्हें देखकर वे तमाम ‘मैले उपमान’ याद हो आते हैं जिन पर से न पुराना मुलम्मा छूट पा रहा है और न नया चढ़ पा रहा है।

हालांकि शब्दों की मुट्ठी से अर्थों का खोना, छीजना, मिटना या बदल जाना किसी एक भाषा की पीड़ा नहीं है। चॉसर की अंग्रेज़ी से भारतेंदु की हिंदी तक, दुनिया के नक्शे पर मौजूद हर भाषा कभी न कभी इस पीड़ा से गुज़र चुकी है या कहें आज भी गुज़र रही है। शब्दों को असीम शायद कहा भी इसीलिए गया था ताकि खाली पात्रों के समान लगातार मनचाहे अर्थ भरते रहने पर भी उनके भीतर नए अर्थ की गुंजाइश बनी रहे। उनमें समय के साथ चलने जैसा भाव हो, घिसटने जैसा नहीं। हम जान सकें कि कब उन्हें तलवार बनाना है, कब सुई। पर सब कुछ उतना सहज नहीं, जितना दिखाई दे रहा है। नेपथ्य में इसकी जड़ें वहां तक जाती हैं, जहां एक छोर पर अनेकानेक गुम हो चुके शब्द हैं, तो दूसरी ओर साहित्य की, समाज की, समय की मुट्ठी से छिटके हुए अर्थ हैं।

“डॉ० अमरनाथ झा ने ‘हिन्दुस्तानी’ में ‘हिन्दी के कुछ भूले हुए शब्द’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। यह लेख उनके निबन्ध-संग्रह ‘विचार धारा’ में भी है। इस लेख में उन्होंने डेढ़ सौ से ऊपर शब्दों की एक सूची दी हैं, जिनकी मृत्यु इधर दो सौ वर्षों के भीतर हुई है।

यह सूची उन्होंने जॉन शेक्सपीयर की ‘हिन्दुस्तानी इंगलिश डिक्शनरी’ के आधार पर तैयार की है। अंग्रेजों की डिक्शनरियों में प्रायः उस काल के प्रचलित शब्दों को ही विशेष स्थान दिया जाता था, क्योंकि वे मिशनरी तथा अफ़सर लोगों को हिन्दुस्तानी बोलने और हिन्दुस्तानी लोगों की बात समझने की योग्यता प्रदान करने के लिए बनाई जाती थीं। शेक्सपीयर, फालन, हैरिस तथा टेलर आदि के प्रसिद्ध कोषों के आधार पर इस प्रकार हाल में लुप्त हुए या मरे शब्दों की सूची कई हज़ार की बनाई जा सकती है। डॉ० झा की सूची में दिये गए कुछ हाल के मरे शब्दों के शव यहाँ देखे जा सकते हैं।“ (भोलानाथ तिवारी अपनी किताब ‘शब्दों का जीवन’ में)

शब्दसूची

१. उभराना
बर्तन को ऊपर तक भर देना।

२. अपटक
जो हाथ-पैर चलाने में असमर्थ हो ।

३. उजान
नदी के प्रवाह के विरुद्ध।

४. अर्गनी
कपड़ा सुखाने की रस्सी ।

५. असौं
इस वर्ष।

६. इंडुआ
कपड़े का टुकड़ा, जिस पर गट्ठर रखा जाय ।

७. भँभुआ
वह फ़कीर, जो चोरी करने पर बाध्य होता है ।

८. पसर
मवेशी को रात को चराना

९. पोआना
धूप सुखाना

१०. फसकड़
ज़मीन पर पाँव फैलाकर बैठना ।

११. ततरी
चपला कुमारी

१२. थांग
चोरों का श्रद्धा

१३. त्योंधा
जिसे कुछ कम दिखाई देता है

१४. चफाल
ऐसा स्थान जिसके चारों ओर दलदल हो।

१२. दसौंधी
प्रशंसात्मक कविता लिखने वाला।

१६. डायक
कुएँ का ताज़ा पानी ।

१७. खव्या
बाएँ हाथ से काम करने वाला।

यह सूची इस बात का प्रमाण है कि हम अपनी भाषा और शब्दों के साथ क्या कर रहे हैं। इस संदर्भ में शब्द विस्तार, शब्द संकुचन और शब्द परिवर्तन के सहारे भले यह तर्क दिया जा सकता है- ‘संसार में जो पैदा होता है, वह मरता है और शब्द भी इसके अपवाद नहीं हैं। वे भी पैदा होते हैं और मरते हैं।’ (भोलानाथ तिवारी की किताब ‘शब्दों का जीवन’) मगर ‘शब्दों के चुकने’ का आरोप सहती भाषा के लिए न शब्दों का स्मृतियों से मिटना सही है और न अपने अर्थों से दूर कर दिया जाना। उसके लिए दोनों ही स्थितियां कष्टकारी हैं, दोनों ही स्थितियां चिंताजनक हैं।

उदाहरण के लिए भगवतीचरण वर्मा अपनी कहानियों में ‘चट्टियों’ और ‘चबैना’ की बात करते हैं। कबीर सरिग्ग (स्वर्ग) की, दादू जेबरी (रस्सी) की, अमरकांत ओसारे (बरामदे) की, कमलेश्वर बारजे (बालकनी), नरेश मेहता ‘रान्नीघर’ की और मोहन राकेश अलगौझी (अलग होने) की; लेकिन वर्तमान साहित्य को कितना ही झाड़-खंगाल कर देख लीजिए, यहां न आपको खाने के लिए चबैना मिलेगा, न झांकने के लिए बारजे, न खड़े होने के लिए ओसारे और न मरने के लिए सरिग्ग। साहित्य की सड़क पर दौड़ते ‘इक्कों’और ‘चट्टियों’ की आवाज तो परिदृश्य से वैसे ही धुल गई है, जैसे ‘साबुन’ से काया पखारू बट्टी। जैसे ट्यूबलाइट की चकाचौंध से ‘पंचलैट’ की रोशनी और जैसे निरर्थक, कर्कश आवाज़ों के शोर से चि… गो! चि…ध! चि…न! की ध्वनि!

कौन जाने यह ख़ुद कलम की बगावत थी या काल की कारीगरी, लेकिन साहित्यिक प्रयोग और भाषाई चमत्कार के नाम पर जो योग-प्रयोग हुए, उनके चलते बहुत औचक, अनायास ढंग से कवि केशव दास ‘कठिन काव्य के प्रेत’ के अर्थ में रूढ़ हुए, पीड़ा ढूंढती हर कवयित्री ‘महादेवी’ बनी। फिर धीरे-धीरे मोरी, विपद, पतोहू, बहंगी, खटबुना, पन्हैया, चमरौधा जैसे देशज शब्द किताबों से गुम होते चले गए। ऐसे में किम आश्चर्यम् कि भक्तिकालीन सूर ने अपने पद ‘जै मुरली अधरा न धरैयों’ में जिस ‘अधर’ शब्द को ‘निचले होठ’ के लिए प्रयोग किया, उसी ‘अधर’ को छायावादी ‘बच्चन’ ने अपनी ‘मधुशाला में ‘दोनों होठों’ के अर्थ में प्रयोग किया- ‘अधरों पर हो कोई भी रस, जिह्वा पर होगी हाला।’ साहित्य में यह प्रयोग ‘अर्थ-विस्तार’ के संदर्भ में मान्य हुआ। और मान्य क्यों न हो, जब उसी साहित्य में एक ही शब्द के अलग-अलग काल में, अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किए जाने के उदाहरण मौजूद हैं। 

यथा कबीर ने बताया कि ‘पंडित’ वह है, जो पोथियों से पैदा नहीं होता। प्रेमचंद ने दिखाया कि पंडित ‘जाति की तंग गलियों’ में घूमता है और परसाई ने कहा पंडित ‘पोथियों से पैदा होता है।‘ भले इसे दृष्टिगत अंतर कहा जाए, तब भी स्वीकार करना पड़ेगा कि यह ‘अर्थ पतन’ है। प्रकट और स्पष्ट पतन!

यह केवल साहित्य की स्थिति नहीं है, लोक और समाज भी इस दौड़ में बराबर खड़े नज़र आते हैं। यहां कभी जो ‘तेल’ ‘तिल’ से निकलता था; वह सरसों, मूंगफली, सोयाबीन से निकलते-निकलते एक दिन आदमी से भी निकलने लगता है और हम सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। हम ‘विभीषण’ शब्द को परिवार का साथ न देने वालों के अर्थ में स्वीकार कर लेते हैं और ‘नारद’ शब्द को खबरें फैलाने वालों के अर्थ में। सीता, सावित्री, मंथरा, कैकयी, धृतराष्ट्र, शकुनि, जयचंद, हरिश्चंद्र जैसे ‘चरित्र’ भी ‘गुण विशेष’ का पर्याय बनकर अपने मूलार्थ से सर्वथा अलग और नया अर्थ ग्रहण कर लेते हैं और हम स्वीकार कर लेते हैं। यहां तक कि वात्सल्य के अमर गायक ‘सूर’ भी एक दैहिक स्थिति का पर्याय बनकर रह जाते हैं। हम इस स्थिति को स्वीकार भी कर लेते हैं बगैर यह सोचे कि हर शब्द का अपना एक इतिहास है, भूगोल भी। और उन्हें उनके मूलार्थ से अलग करने का अर्थ है, उन्हें उनके इतिहास, उनके भूगोल से अलग करना। इससे बेहतर क्या यह नहीं होता कि हम अपने अर्थों के लिए नए शब्द गढ़ लेते, अपने इतिहास और अपने भूगोल से संपन्न नए शब्द?

लेकिन चूंकि हम एक के बाद दूसरे ‘अर्थ का दुखांत’ स्वीकार करते जाते हैं, इसीलिए एक रोज़ ‘गंवार’ शब्द अपने मूलार्थ ‘गांव के वासी’ से छिटककर ‘मूरख’ बन जाता है। ‘जलज’ की पहचान कमल में गुम हो जाती है। ‘महाराज’ तख्त से उतरकर ‘रसोईघर’ में जा पहुंचते हैं। यही नहीं, 

बाज़ार भी इस कोशिश में जुट कर ठंडे का एक नया अर्थ (कोकाकोला) पैदा कर देता है और घूंट में तृप्ति के बजाय ‘स्वैग’ घुल जाता है। और तब न हम कुछ कर पाते हैं, न समय!

इस तौर पर भाषा या कहें शब्द एक अत्यंत महत्वपूर्ण पैरामीटर है। इसके माध्यम से समाज की गति, प्रगति और मानसिकता का विश्लेषण किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर विकलांगता के प्रति एक अचीन्ही उदासीनता से भरा हमारा समाज अर्थ प्रेषित करने के और तरीक़े होते हुए भी विकल्पों को नहीं चुनता। वह ‘अपंग अर्थव्यवस्था’ (पैरेलाइज्ड इकोनोमी),’बैसाखियों पर दौड़ती सरकार’ जैसी अभिव्यक्तियां चुनता है। बिडंबना यह है कि इस तरह के चयन पर कोई ‘सवाल’ नहीं उठता। कोई ‘बहस’ नहीं होती। कोई ‘मार्च’ नहीं निकाला जाता, बल्कि इस बात पर गौर किए कि इस तरह की अभिव्यक्तियों से जो अर्थ प्रकट होगा, वह कहां चोट करेगा, हम बड़ी सहजता के साथ इन्हें अपनी भाषा का हिस्सा बना लेते हैं। (मार्तंड झा)

अगर वास्तव में हमें एक ऐसी भाषा चाहिए जिसका प्रयोग हम व्यवस्था बनाने में भी कर सकें और व्यवस्था की चूलें उखाड़ने में भी, तो हमें ईमानदारी से स्वीकार करना होगा कि रोजमर्रा के दुखों से लेकर आध्यात्मिक चिंताओं तक, प्रेम से लेकर प्रताड़ना तक और चमत्कार से लेकर आविष्कार तक हमारी अभिव्यक्तियों के आशय वही नहीं हैं, जो शब्दों से ध्वनित हो रहे हैं। सुविधा और दुविधा के द्वंद्व में फंसे हमारे आत्म ने हमारी अभिव्यक्तियों को इतना उलझा दिया है कि उनके मूलार्थ कुछ और हैं, भावार्थ कुछ और, और निहितार्थ कुछ और ही!

बेशक इस तरह हम जवाबदेही से बच गए, पर उस मानसिक-च्युति से नहीं बच पाए, जिसकी अनुगूंज बहुत-कम समय में बहुत स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी है। वरना क्या वज़ह थी कि यह जानते हुए भी कि ‘लोकतंत्र’ में ‘शब्द’ सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, हमने न केवल लोकतंत्र को उसके अर्थ के उलट राजतंत्रकी तरह जीने का अपराध किया, बल्कि देश में ‘लोकतंत्र’ लाने में सहायक शब्दों (जैसे देशप्रेम, राष्ट्रवाद, स्वाधीनता, विश्व-बंधुत्व आदि) को आज़ादी की एक सदी बीतने से पहले ही इतना खोखला कर दिया कि उनके भीतर से ‘उदात्त’ अर्थ नहीं ‘हीनता’ की ध्वनि पलटकर आती है।

आज अगर कोई ‘राष्ट्र’ के विचार को ‘सड़ा-गला, वीभत्स’ (‘द बुक ऑफ जेकोब’ में नोबेल विजेता पोलिश लेखिका ओल्गा तोकाचुर्क) महसूस करती है, अगर ‘भक्त’ शब्द एक ‘अपशब्द’ बन गया है और ‘धर्म’ व्यवहार से अधिक ‘राजनीति’ का विषय, तो इसमें इन शब्दों का नहीं, हमारा दोष है, हमारे समय का दोष है और हमारे मूल्य-बोध का दोष है। इनके चलते हमने शब्दों को बाण बनाना तो सीख लिया, लेकिन उनके अर्थों को संभालना नहीं सीखा। यदि सीखा होता, हमें मालूम होता कि हर शब्द अंतत: जिंदगी का दस्तावेज़ है। इसके हर सफ़े में वही नज़र आता है, जो घट रहा है। हम लाख फूल लिखना चाहें, लेकिन अगर हमारा वर्तमान जल रहा है, तो कलम की नोक पर केवल चिन्गारी होगी और राख!

समस्या अतीत में भी वही थी, जो वर्तमान में है। यानी जिस क्षण हम शब्द हो सकते थे, हमने मौन होना चुना। अब शब्दों के परों पर सवार भाषा को यह उड़ान किस ओर ले जाएगी, इसे तय करना केवल हवाओं के हाथ है और यह एक विडंबना है!