
युवा कवि। ‘दोस्तोएवस्की का घोड़ा’ (डायरी) और ‘कुतुब मीनार खड़े-खड़े थक गया होगा’ (कविता संग्रह) प्रकाशित।

धागे
गर्मी की दुपहरों में जब कभी
एक चींटा दूसरे चींटे को
खींच कर ले जाते हुए दिखता है
तब लगता है
उनमें बची रह गई हैं कुछ नमी
कुछ स्मृतियां, कुछ स्वप्न
उनमें बची रह गई हैं, एक साथ चलने
और उसमें खो जाने पर भी
वापस लौट आने की संभावना
उनमें बचे रह गए हैं धागे
कुछ कमजोर और कुछ मजबूत
वही रचते हैं
पीछे वापस लौटा ले जाने वाली लीक
सोचता हूँ
मेरे पास भी बचे रहते कुछ ऐसे धागे
ऐसे रास्ते
जहां भीतर लौटते चींटे की तरह
मैं भी लौट पाता।
संपर्क : आर्य समाज (अनरकली), मंदिर मार्ग, नई दिल्ली-110001
