वरिष्ठ रचनाकार।सवाल सिर्फ शब्द नहीं’ (काव्य संकलन) तथा नूरनक्श का मकबरा’ (कहानी संकलन) प्रकाशित।संप्रति : भारत सरकार की सेवा से अवकाशोपरांत स्वतंत्र लेखन, उपाध्यक्ष जनवादी लेखक संघ, झारखंड।

यह तब की बात है जब दो गज की दूरी वाला टकसाली मुहावरा लोगों के जेहन में नहीं आया था।दूसरे गांव के लोगों की तरह दहेजू के लिए भी दो सौ गज की दूरी अनजानी थी, हालांकि वे दस-बीस या सौ-दो सौ मील की दूरी को बेशक समझते थे।इस गांव का दहेजू नाम अटपटा सा लगता है।दरअसल इसके साथ एक घटना जुड़ी हुई है।किसी समय यह एक बड़े गांव का हिस्सा था, जिसे वहां के राजा ने इसी गांव के जमींदार जीत सिंह को दहेज में दे दिया और लोग इसे दहेजू गांव कहने लगे।उनके बाद की पीढ़ी के किसी वारिस ने अपने गौरव के समय वहां एक मंदिर बनवाया और एक तालाब खुदवाया।वह आज भी मौजूद है, हालांकि उसकी वह चमक-दमक नहीं है जो तब रही होगी।उस खानदान के मौजूदा वारिस टुनटुन सिंह अपनी विपन्नता के बावजूद मंदिर परिसर के पेड़-पौधों के रखरखाव में लगे रहते हैं और इस तरह लोगों को यह एहसास दिलाते रहते हैं कि मंदिर उनके खानदान की विरासत है।मंदिर परिसर के आम-अमरूद-केला-बेल आदि के पेड़ों में लगे फलों को बेचना उनकी जरूरत भी है और उनपर अपना अधिकार दिखाने का जरिया भी।यह गांव का इकलौता मंदिर है, जहां गांव के सभी जातियों के लोग पूजा करने आते हैं और यहां होने वाले आयोजनों में अपने हिसाब से हिस्सा लेते हैं।हां, लोगों ने भेद-अभेद की परंपरा में अपना अलिखित विधान यह गढ़ लिया है कि जब कोई गैर दलित मंदिर में पूजा कर रहा हो तो दलित बाहर इंतजार करता है और जब कोई दलित मंदिर में है तो गैर दलित उसके बाहर निकलने पर ही मंदिर में प्रवेश करता है।गांव के लोग इसे अपने गांव का मंदिर और दूसरे गांव के लोग इसे दहेजू का मंदिर कहते हैं।

मंदिर के एक तरफ ठाकुरों, ब्राह्मणों और कुछ अन्य ऐसी ही जातियों के लोग रहते हैं, जो अपने को फारवर्ड कहते हैं और दूसरे इन्हें बड़ी या अगड़ी जाति कहते हैं।यहां कई आलीशान मकान है और कई ऐसे मकान भी, जो अपनी विपन्नता और दरिद्रता की कहानी स्वयं ही बयान करते दिखते हैं।इस मुहल्ले के कई लोग गांव के अन्य लोगों की तरह ही बड़े शहरों में छोटे-मोटे धंधों में लगे हुए हैं।मंदिर के उत्तर की तरफ दलितों को छोड़कर अन्य सभी जातियों के लोग रहते हैं।यह सबसे बड़ा मुहल्ला है।यहां भी कुछ परिवार बहुत समृद्ध हैं।इनके बड़े घर हैं, पर कई ऐसे भी हैं जिनके यहां दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता है।यहीं पर रामजतन का घर है और उनकी छोटी दुकान ‘रामजतन भंडार’ भी है, जिसे उनका बेटा चलाता है।यह दुकान चाहे जैसा हो, वह पूरे गांव के लिए डिपार्टमेंटल स्टोर का काम करता है।मंदिर से थोड़ी दूर दक्षिण-पूर्व की ओर दलितों का मुहल्ला है।पहले यहां खपरैल या फूस के मकान हुआ करते थे, किंतु अब अधिकांश पक्के छत वाले हो गए हैं।कुछ बड़े भी, पर ज्यादातर छोटे और साधारण।मुहल्ले अलग-अलग होने के बावजूद, गांव के लोग एक दूसरे से जुड़े हुए रहते हैं।दिल से भी और जरूरत के हिसाब से भी।उनके बीच कुछ प्रचलित रूढ़िगत विभेदों को छोड़कर अन्य कोई दूरी नहीं दिखती।

उस दिन रामजतन की छोटी बहू के दरवाजे से बाहर निकलते ही उसकी नजर बाहर दालान में खाट पर सोए लंबी खिचड़ी दाढ़ी और बालों वाले तगड़े साधुनुमा आदमी पर पड़ी।वह चौंक कर सर्र से अंदर भाग गई, जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो।

अंदर से तमतमाई हुई रामजतन की पत्नी चरनाउती निकली – ‘ए बाबा, ई धरमशाला नहीं है कि आए और खाट पर पसर गए, ई बहू बेटियों वाला घर है।जाइए यहां से, जाइए बाहर खड़े होकर मांगिएगा तभी कुछ मिलेगा।घर में घुसिएगा तो लोग मार-मार के हाथ पैर तोड़ देंगे’, चनराउती चिल्लाते हुए एक सांस में कह गई।उसके अंदर क्रोध और भय एक साथ उफन रहा था।

वह धीरे से खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर कहा – ‘भउजी परनाम’, रामजतन की पत्नी का गुस्सा सूखे पत्ते में लगे आग सा भभक गया। ‘भउजी-भइया के नाता लगावतार, भाग ना त मार के कपार फोर देब, भाग राकस इहां से।’

वह हाथ जोड़कर थोड़ा और आगे बढ़ा- ‘मैं गैर नहीं हूँ… भउजी, ई हमार घर है, तुम मुझे पहचान नहीं रही हो, मैं रामरतन हूँ, रामजतन का छोटा भाई, तुम्हारा देवर।’

रामरतन! चनराउती को टन्न से लगा।ई कहां से उपर हो गया एतना दिन बाद।हम लोग समझे थे कि वह कहीं मर खप गया होगा, जिंदा भी होगा तो इधर फिर मुंह दिखाने की हिम्मत नहीं करेगा।मगर आज इहां? यह कोई बहुरूपिया तो नहीं? कहां लिक्कड़ एक काठ का रतना और ई मोटा थुलथुल दाढ़ी वाला! चनराउती का संदेह बरकरार था। ‘एतना बदल गए हो कि पहचाने में नहीं आ रहे हो।कहां थे एतना दिन?’

‘का कहें भउजी, मेरी बुद्धि मारी गई थी, पागलपन सवार हो गया था।जब बात बढ़ी तो मैं बहुत डर गया।लगा कि लोग मुझे मार डालेंगे या मुझे जेल भिजवा देंगे, जहां मैं जिंदगी भर सड़ूंगा।बचने का बस एक ही उपाय सूझा – भाग जाना।’ थोड़ी देर के लिए वह चुप हो गया। ‘इधर-उधर भटकता रहा।दो हजार रुपये, जो लेकर भागा था वे खतम होने को आ गए।पुलिस का डर हमेशा लगा रहता था।घूमते-घामते हरिद्वार पहुंच गया।वहां एक आश्रम में जगह मिली, वहीं रहा।मगर घर घर होता है, वह खींच लाया।’

घर खींच लाया या चार बीघे जमीन का लालच? चनराउती के मन में खटका।

ई रतना दलित मुहल्ले की लड़की मीनवा की इज्जत लूटा, उसे घायल कर बेहोश किया और फिर दुकान से दो हजार रुपये लेकर भाग गया।उसके बाद आफत हम लोगों पर टूटा।पूरा दलित मुहल्ला उमड़ कर घर घेर लिया।सब इसी रतना को खोज रहे थे।उन्हें लगता था हमने इसे कहीं छुपा दिया है।इसलिए इसके भैया को तो खूब मारा।उन्हें मार ही डालते, अगर मैं और परबतिया के माई ने उन्हें खींच कर घर के अंदर बंद नहीं कर दिया होता और दरवाजे पर खड़ी नहीं हो गई होती।उनलोगों ने दुकान लूट लिया, खिड़की-दरवाजे-छप्पर तोड़ डाले।किसी तरह समझा बुझाकर उन्हें लौटाया गया।ओह! कितना भयंकर दिन था वह! फिर इस मुहल्ले के लोग भी गुस्से में आ गए।दलितों की यह मजाल कि दिन दहाड़े हमारे घर को लूट लें और हम देखते रहें।उसी रात दलितों के मुहल्ले पर हमला हुआ, कई घरों में आग लगा दी गई।उनके घरों में था ही क्या जो लुटा जाता, फिर थाना-पुलिस-गिरफ्तारी -कोर्ट-कचहरी, बाप रे! कितना कुछ हुआ।कई साल तक हमलोग उसी झमेले में डूबे सने रहे, एक बीघा खेत भी बिका इसी चक्कर में।किसी तरह जान बची।यहां हमलोग कैसा-कैसा आफत विपद झेलते रहे और यह रतना वहां किसी आश्रम में खा-मोटा रहा था।अब आया है अपना हिस्सा लेने।हम लोगों ने जो सांसत-आफत झेला है उसका हिसाब देगा? भरपाया करेगा? बात तो ई सही-सही बता रहा है, फिर भी डर लगता है।कोई बहुरूपिया तो नहीं, हिस्से की जमीन बेचकर भाग जाने वाला? चनराउती के मन में कई सवाल, कई शंकाएंं चक्कर काटने लगीं।

‘भइया कैसे हैं?’

‘दस बरस हुए गुजर गए।तुम्हारा मामला सलटा।जेल से लौटे, तब से बीमार रहने लगे।उनके मरने के बाद तो हमलोगों पर आफत का पहाड़ ही टूट गया।तब कोई बेटा काम करने, कमाने लायक भी नहीं हुआ था।छोटका को पोलियो मार दिया था।जब दोनों लड़के बाहर काम करने लगे तो हालत थोड़ी ठीक हुई है।’

‘बेटी का बियाह तो हो गया होगा?’

‘हां, हो गया है।’

‘और बेटों का?’

‘दोनों का हो गया है, छोटे का बाकी है।’

‘उसका भी हो जाएगा, भगवान सब करा देंगे।’

देयादी, मुहल्ले के बारे में उसके पूछने से चनराउती को यह विश्वास हो गया कि वह रामरतन ही है।वह अंदर चली गई और थोड़ी देर में एक थाली में खाना लेकर लौटी।रामरतन के सामने रख कर खाने के लिए कहा।

‘उसे भूख लगी ही थी उसने जमकर खाया।’

‘देखो, मैं तुमको अगाह कर दे रही हूँ, दलित मुहल्ले से झगड़ा भले खतम हो गया हो, सब मेल मिलाप से रह रहे हैं, मगर वे लोग तुम्हारी गलतियों को नहीं भूले हैं।मीनवा के तो शादी बियाह हो गया है।बाल-बच्चे हैं, यहां आती-जाती भी है, उसका भाई बड़ा दबंग निकला है।यदि उन लोगों को यह भनक लग गई कि तुम यहां आ गए हो तो तुम्हें नहीं छोड़ेंगे, मार डालेंगे।हम लोगों को भी नहीं छोड़ेंगे, क्या होगा कोई नहीं जानता।हमलोग फेरू आफत-विपद में पड़ जाएंगे।इस बार गोतिया देयाद भी मदद करने नहीं आएगा।टेम बदल गया है।तुम्हारे लिए यही अच्छा है कि तुम तुरंत यहां से चले जाओ।जहां कहीं भी रहो, अपनी पहचान छुपा कर रहो।’ उसकी आंखों में आशंका और डर का साया तथा चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं।उसकी नजर बाहर टिकी हुई थी, जैसे खतरा उधर से आ रहा हो।

‘भउजी, मैं तुम लोगों को और दिक्कत तथा परेशानी में डालना नहीं चाहता।मैं घर में नहीं रहूंगा।जहां भी रहूंगा अपनी असल पहचान छुपाकर अनजाने की तरह रहूंगा।तुम भी बिलकुल अनजान बने रहना और हां, मेरी पहचान के बारे में किसी को नहीं बताना, घर वालों को भी नहीं।’ रतन क्षण भर चुप रहने के बाद चनराउती की ओर देखते हुए ऐसे कहा, जैसे जवाब पहले से तैयार कर रखा हो।वह धीरे से उठा और घर से थोड़ी दूरी पर एक पेड़ के गिर्द बने चबूतरे पर जाकर बैठ गया।

दिन ढलने में बस थोड़ी ही देर थी।रोज की तरह इस चबूतरे पर लड़कों का जमा होना शुरू हो गया था।इनमें गांव के सभी मुहल्लों तथा प्राय: सभी जातियोंफार्वड, बैकवार्ड, दलित के लड़के होते और वे अपनी इस पहचान को घर में छोड़ कर आए होते।इन सभी में सामान्य बात यह थी कि पढ़ाई से इनका रिश्ता टूट चुका था।किंतु रोजीरोजगार, काम धंधे के जुए के नीचे इनका कंधा नहीं जुड़ा था।

ये रोज यूं ही अपनी शाम हँसी, ठहाकों, फब्तियों और नर-मादा के हिस्सों और किस्सों, जिन्हें प्राय: सार्वजनिक रूप से इजहार नहीं किया जाता, को अपनी भाषा में कह सुन कर गुजार लेते और जुगाड़ हो जाने से दो-चार फुक्के भी मार लेते।उनके लिए यह बेहतरीन समय होता।छुट्टे सांढ़ की तरह इन्हें न आज की फिक्र होती न भविष्य की चिंता, किसी स्वप्न का दबाव भी नहीं था उनके माथे पर।आज गुजर गया, यह एहसास ही उनके लिए काफी होता।

वहां बैठे दाढ़ी और लंबे वालों वाले बाबानुमा सख्श, उनके चुहल और टाइम पास के लिए अच्छा आइटम लगा।एक ने पूछा- ‘बाबा कहां जाना है?’

‘वहीं, जहां सबको जाना होता है।’ उत्तर मिला।

दूसरे ने कहा- ‘सभी तो एक जगह जाते नहीं, कोई अपनी बीवी के कमरे में जाता है, कोई अपने दालान में।’ सभी हू-हू कर हँस दिए।तीसरे लड़के ने दूसरा सवाल दागा- ‘बाबा, आप आ कहां से रहे हैं?’

‘जहां से सभी आते हैं।’

‘सभी तो मां के पेट से निकल कर आते है, आप भी क्या इन दाढ़ी मूछों के साथ सीधे वहीं से आ रहे हैं।’ ठहाके, इस बार तालियां भी बजीं।

उन्हें समझ आ गया कि ऐसे जवाबों के दम पर उनके सामने वे टिक नहीं पाएंगे और अब एक-दो सवालों के बाद उन्हें स्वयं भागना पड़ेगा या हो हा- हो हा कर भगा दिया जाएगा।

‘मैं आपके सीधे सवालों का टेढ़ा-मेढ़ा उत्तर दे रहा था।’ उन्होंने थोड़ा रुक कर स्वयं ही कहना शुरू किया – ‘आश्रम में प्राय: साधुओं के बीच मन बहलाव के लिए ऐसे सवाल जवाब चलते हैं।मैं आप लोगों के सवालों का वैसा ही जवाब दे रहा था।असल में मैं हरिद्वार से आ रहा हूँ, मैं वहीं के एक आश्रम में रहता हूँ।’

‘आप रहने वाले कहां के हैं, मतलब आपका जन्म स्थान कहां है?’ किसी ने पूछा।

‘अपना जन्म स्थान तो मुझे भी नहीं मालूम, जब से मुझे याद है, मैं आश्रम में ही हूँ।मैं वहीं पला हूँ।आश्रम के मेरे गुरु बताते हैं कि बहुत वर्ष पहले हरिद्वार में कुंभ स्नान के समय बहुत बड़ी भगदड़ हुई थी।बहुत लोग मरे और घायल हुए थे।तब मैं बहुत छोटा था और नदी में डूब रहा था।आश्रम के एक बाबा ने मुझे बचाया और अपने आश्रम में लाए, तब से मैं वहीं हूँ।संभव है, मेरे माता-पिता उस भगदड़ में मर गए हों और यदि जीवित बचे होंगे भी तो मेरी खोज खबर नहीं मिलने के कारण मुझे मृत मानकर घर लौट गए होंगे।अब मेरे माँ-बाप, मेरा घर सब आश्रम ही है।’

लड़कों का परिहास वाला मूड ठंडा हो गया था। ‘आश्रम में कोई काम तो होगा नहीं, दिनभर भजन-कीर्तन करते रहते होंगे?’ एक लड़के ने बस यूं ही पूछ दिया।

‘नहीं नहीं, वहां जीवन बहुत नियमित है, समय पर सोना, समय पर उठना, साधना करना और आश्रम के ढेर सारे काम।इतने सारे लोग जो आश्रम में रहते हैं, आते-जाते हैं उनके रहने, खाने-पीने का इंतजाम, आश्रम के स्कूलों में पढ़ाना, उसकी देख-रेख और भी कितने काम हैं।जैसे आश्रम के औषधालय के लिए जड़ी-बूटियां लाना आदि।’

‘फिर आप यहां कैसे आ गए?’

‘अन्वेषण, यानी खोज में।’

‘खोज? किस चीज की खोज?’

‘मुझे साधना के दौरान यह स्वप्न आया कि पिछले जनम में मैं इसी गांव में पैदा हुआ था।मुझसे रहा नहीं गया, मैं निकल गया उस गांव की खोज में।थोड़ी और साधना करता तो शायद नाम या कुछ और याद आ जाता, किंतु मुझमें इतना धीरज कहां था? निकल गया अपने पूर्वजन्म के गांव को देखने।सोचा, वहां जाकर कुछ और याद आ जाए या कुछ पता चल जाए।’

‘बाबा, आपका कोई नाम है या…’

‘नाम तो सबका होता है, चोर हो या साधु’ उन्होंने बीच में ही बात काट कर कहा, मेरा असल नाम क्या था नहीं मालूम।मां मुझे हीरा-मोती कहती थी वही याद है’, उन्होंने आसमान की ओर देखते हुए पूरे निर्लिप्तता से कहा। ‘दीक्षा देते समय मेरे गुरु ने इसलिए मेरा नाम रत्नानंद रख दिया।अब मैं रत्नानंद स्वामी के नाम से जाना जाता हूँ।’

उन शोहदों की ठट्ठे की हवा निकल गई थी और उनपर बाबा का प्रभाव अच्छा खासा जम गया था।उनके खोखले दिमाग ने इसके पहले न कभी गंभीर बातें सोची थीं और न कभी गंभीर बातों का सामना ही किया था।बाबा, यानी रत्नानंद स्वामी ने उनसे बहुत देर तक बातें कीं।नैतिक-अनैतिक, झूठ-सच, श्लील-अश्लील, सही-गलत की परिधि के पार विचरण करने वाले ये लफंगे वैसे आश्रम, सिद्धि, गुरु, दीक्षा, पूर्वजन्म, साधना जैसे पवित्र लगने वाले शब्द से अनजाने नहीं थे, किंतु अब वे इन शब्दों को इतने निकट से रत्नानंद स्वामी के मुंह से सुनकर इसकी रहस्यमयता और प्रभाव से सराबोर हो रहे थे।उनमें से एक ने कहा- ‘बाबा, आप यहां हमारे गांव में रहिए, रहने का इंतजाम हो जाएगा।हमलोग आपकी मदद करेंगे।’

दूसरे दिन शाम होतेहोते पास के एक सरकारी जमीन के टुकड़े पर रत्नानंद के लिए मिट्टी का एक चबूतरा और एक झोपड़ी बन गई।उन युवा लफंगों के लिए यह धरमकरम का काम था और रत्नानंद के लिए उनके भोलेपन का परिणाम।बाबा अब पूरी तरह रत्नानंद स्वामी और उनकी झोपड़ी आश्रम हो गया और बाबा को भी इन लफंगों की ताकत का अंदाजा हो गया।

आश्रम में रोज प्रार्थना और व्यायाम कराया जाता।थोड़ी धर्म चर्चा भी होती।इनमें कितना सही होता कितना गलत इस पर विचार करने की न किसी को समझ थी, न किसी का मन और न जरूरत ही।बाबा रत्नानंद ने कहा है बस इतना ही पर्याप्त था।इनमें प्राय: उपस्थिति बहुत कम होती, किंतु इससे रत्नानंद को कोई परेशानी या शिकायत नहीं थी।

आश्रम गांव के लोगों के लिए बहु-उपयोगी स्थान हो गया था।काम धंधे से थके लोगों के लिए सुस्ताने के लिए एक साफ सुथरी जगह।निठल्लों के लिए टाइम पास की जगह और लुहेड़ों के लिए जब कभी बैठकी लगाने की जगह और हां रामजतन के लड़के के लिए दुकान की बिक्री  बढ़ने की वजह भी।

उस दिन वह आश्रम के बगल की पगडंडी से गुजर रही थी।भरा चिकना देह।चेहरे पर चमक।ठीक ठाक कपड़े।रत्नानंद उसे पहचान ही नहीं पाए होते यदि पीछे से कोई औरत उसे मीना कह कर पुकारी नहीं होती।उनके मन में टनका-यदि वह आवाज से उन्हें पहचान गई तो? यही है वह मीनवा जिसका उन्होंने…।सुना है उसकी शादी हो गई है।बच्चे हैं, ठीक ठाक हाल में है।उनका मन हुआ, दौड़कर उसे छू लें।उसके शरीर की चिकनाई को महसूस कर लें, किंतु इस विचार से वे स्वयं सहम गए और अपनी झोपड़ी के अंदर चले गए।उन्हें खयाल आया, यदि उनकी जाति के किसी लड़की के साथ ऐसे ही बलात्कार हुआ होता तो? तो, वह जिंदा नहीं बची होती।उसके परिवार वाले उसे काट कर फेंक दिए होते या वह स्वयं कुएं-तालाब में कूद कर जान दे दी होती।उन्होंने अपनी जाति को मन ही मन एक भद्दी-सी गाली दी।

शिवरात्रि के दिन हर साल की तरह खूब भीड़ उमड़ी थी।मेले में इस मुहल्ले की लड़कियों पर कुछ शोहदों ने फब्बतियां कसीं।कुछ लोगों ने कहा, छेड़-छाड़ भी हुई।ऐसी छोटी-मोटी घटनाएं प्राय: हर वर्ष होती थीं, मगर इस साल ज्यादा हो हल्ला हुआ।बुजुर्गों के हस्तक्षेप, डांट-फटकार और बीच-बचाव से मामला शांत हो गया।वे लड़के उन्हीं में से थे जो रोज वहां अड्डाबाजी करते थे।पता चला वे अगड़ों के मुहल्ले के थे।इस मुहल्ले के लड़के उन्हें सबक सिखाने की योजना बनाने लगे।उनमें व्यायाम से उपजा जोश था और पीछे बाबा के रहने का भरोसा।मगर इसमें रत्नानंद स्वामी की सलाह भी जरूरी थी।उनकी यह योजना सुनते ही रत्नानंद का माथा ठनका।मार-पीट होगी तो पुलिस आएगी इनक्वायरी होगी।यदि उनकी पहचान जाहिर हो गई तो? कहा, ‘न, न! हिंसा ठीक नहीं, हम इसका दूसरा हल निकालेंगे।’

‘दूसरा हल! दूसरा हल क्या होगा? हम लोग वहां धरना देंगे? या लड़कियों का बॉडीगार्ड बनकर खड़े रहेंगे मेले में।’ किसी ने आतुरता से कहा।

‘ऐसा कुछ करना नहीं होगा।हम इस मुहल्ले के लिए एक अपना मंदिर बनाएंगे।’

‘मंदिर! अपना मंदिर बनाएंगे?’ कई आवाजें एक साथ गूंजी।

‘हां।’

‘मगर इतने पैसे आएंगे कहां से?’

युवा वर्ग में फैली यही निराशा, संदेह तो हिंदुओं को रसातल की ओर ले जा रही है। ‘सिंह शावक हो, संकल्प कर लो तो कुछ भी कठिन नहीं।’

‘संकल्प कर भी लें तो कैसे होगा, यह आप ही बताएं।हम तो कुछ समझ नहीं पा रहे हैं।’

‘मुहल्ले में दो सौ घर होंगे।घर-घर जाकर चंदा मांगो।आस-पास में ईंट भट्टे हैं उनसे धरम के नाम पर ईंटें माँग लो, पहले विनम्रता से, बात न बने तो सख्ती से, या धमकी से।वैसे ही सीमेंट, लोहे वगैरह का जुगाड़ कर लो।बगल के गांव में पूल बन रहा है, यदि चालाकी से काम लोगे तो वहां से ये सारी चीजें प्राप्त हो जाएंगी।सभी श्रमदान करेंगे, दलितों के मुहल्ले में कई राजमिस्त्री हैं, उनसे भी श्रमदान लेंगे।हमारा संकल्प जरूर पूरा होगा।’

रत्नानंद की बातों ने लड़कों में उत्साह भर दिया।वे इस काम में जुट गए।मुहल्ले के लोगों में भी उत्साह जग गया था।उनके मुहल्ले का अपना मंदिर होगा।कुछ लोगों के लिए यह रुतबा दिखाने का मौका था तो कुछ लोगों के लिए मुहल्ले को गर्व करने की वजह और जो गरीब थे उनके लिए धरम का काम।सभी यह समझने लगे थे कि रत्नानंद बाबा जैसे सिद्ध पुरुष के गांव में आने से ही यह कार्य संभव हो रहा है।

दलितों से कहा गया कि उनके दस लोगों का बैच सात दिनों तक लगातार श्रमदान करेगा फिर दूसरा बैच उनका स्थान लेगा, किंतु दलितों को इसमें आपत्ति थी।सात दिनों तक श्रमदान करेंगे तो परिवार को खिलाएंगे क्या।महीने में एक या दो दिन श्रमदान के लिए राजी थे, किंतु लड़के सात दिन वाली बात पर अड़े हुए थे।उनके साथ रत्नानंद स्वामी की सिद्धि का ताव था और अपने जातिगत उच्चता का गुरूर।इस बात पर बहुत बकझक हुई।तैश में आकर लड़कों ने कह दिया- ‘यदि तुम लोग सात दिन श्रमदान नहीं करोगे तो भी हम मंदिर बनाएंगे, किंतु तब दलित मुहल्ले के किसी व्यक्ति को मंदिर में घुसने नहीं देंगे।’ दलितों ने इसे दिल पर लिया और उन लड़कों ने इसे चैलेंज के रूप में।थोड़े व्यवधान के बाद मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हुआ, किंतु थोड़े दिनों बाद कोरोना के कारण लॉकडाउन लग गया।

उसी रात दलितों की मीटिंग हुई और तय हुआ, वे भी अपना मंदिर बनाएंगे।शनीचरी मुसम्मात  अपने हिस्से की सवा कट्ठा जमीन मंदिर के लिए देने को राजी हो गई।कहा, ‘मेरा वारिस तो कोई है नहीं, जमीन धरम के काम में लग जाए तो अच्छा है।’ उनके यहां राजमिस्त्री भी थे और मजदूर भी थे।बस मंदिर बनना शुरू हो गया।

कोरोना की आपदा रत्नानंद के लिए अवसर बन गया।घर लौटे प्रवासी मजदूरों की श्रमशक्ति श्रमदान के लिए सहज ही प्राप्त हो गई।मंदिर निर्माण का कार्य तेजी से होने लगा।दोनों मंदिर लगभग एक साथ तैयार हुए।पहले दलितों का छोटा मंदिर, जिसके द्वार पर लिखा था।शनीचरी द्वारफिर रत्नानंद का मंदिर।

धार्मिक आयोजनों पर प्रतिबंध के बावजूद दोनों मंदिरों में प्राण प्रतिष्ठा भी हो गई और सुबह-सुबह लाउडस्पीकर से भजनों का प्रसारण भी प्रारंभ हो गया।दहेजू के मंदिर की भी रंगाई पुताई हुई, लाउडस्पीकर लगा और बिजली बत्ती भी लग गई।प्रात: पौ फटने पर इन तीनों मंदिरों के लाउडस्पीकरों से भजन शुरू हो जाते तो लगता कोई घोर स्पर्धा चल रही है।मुहल्लों के इन मंदिरों के बीच की दूरी भले ही दो सौ गज हो किंतु इन मुहल्लों में रहने वालों के मन के बीच की दूरी अब इससे कई गुणा अधिक हो गई थी।चुनाव आना अभी बाकी था।

मंदिर की स्थापना के बाद रत्नानंद की प्रसिद्धि और प्रभाव बढ़ गया था।रत्नानंद कभी-कभी गांव में घूम आते।यदि रामजतन भंडार के सामने से गुजरते, तो वहां थोड़ी देर रुकते, वहां उपस्थित लोगों से बातें करते।उस दिन वर्षा थोड़ी ही देर पहले रुकी थी।दुकान पर ग्राहक नहीं थे।चनराउती उन्हें आता देख कर बाहर आई और धीरे से कहा, ‘आपकी चिट्ठी आई है।’

सुनते ही रत्नानंद का चेहरा फक हो गया।जैसे उनका सारा खून निचुड़ गया हो, आंखें फ्यूज बल्ब की तरह बुझ गई।उन्होंने हाथ बढ़ाकर लिफाफा ले लिया और चुप-चाप चोर की तरह दबे कदमों से आश्रम की ओर बढ़ गए।वहां रोज की तरह अड्डाबाजी करने वाले लड़के नहीं थे, शायद बरसात की वजह से आए नहीं थे या आकर चले गए थे।उन्होंने थोड़ी देर बाहर खड़े हो वहां आने वालों की संभावना टटोली फिर अंदर जाकर लिफाफे को देखा, वह खुला हुआ था।उन्हें जैसे बिजली का जोर का झटका लगा हो, हाथ-पांव सुन्न हो गए।भउजी तो पढ़ना जानती नहीं, किसने पढ़ी होगी यह चिट्ठी, शायद बहुओं ने।बाप रे! उनके मुंह से निकलते निकलते बचा।कांपते हाथों से दीये की रोशनी में चिट्ठी पढ़ना शुरू किया।

मेरे प्यारे,

आपकी हत्या कर आपके लाश को गायब करने के झूठे आरोप में जिस आदमी को दल ने जेल भिजवाया था, जेल में उसकी मृत्यु हो गई है।एक बार वह मामला फिर गरमा गया है।उस घटना के बाद आपका दल के मीटिंग में भाग लेने और किसी अधिकारी से मिलने की खबर फोटो के साथ देश तथा विदेश के अखबारों में छपी है।बाध्य हो पुलिस ने आपके बारे में खबर देने वाले को पचास हजार रुपये का ईनाम देने की घोषणा की है।तब संभव है दंगे के दूसरे आरोपों की फाइलें भी खुल जाए।वैसे दल के केंद्रीय सचिव ने केस को मैनेज कर लेने का आश्वासन दिया है, किंतु यह भी पता चला है कि भेद खुलने की स्थिति में दल अपने हित में आपकी हत्या करा कर लाश सचमुच गायब करा सकता है।अपना ख्याल रखेंगे।

 आपकी नीरा

कांपते हाथों से उन्होंने पत्र और लिफाफे को टुकड़े-टुकड़े कर धुनी में डाल दिया जैसे आहुति दे रहे हों।एक लपट उठी और बुझ गई।कंपकंपी और थरथराहट के कारण वे स्वयं को संभाल नहीं पा रहे थे।थस्स से चबूतरे पर बैठ गए।

कितनी चतुर और चालाक है नीरा।वह खतरों को पहले ही भांप लेती है।तभी तो दल वाले उसे इतना महत्व देते हैं।चरस गांजे के धंधे में भी वह कभी पकड़ी नहीं गई।नीरा से मुलाकात, उसके साथ दिल्ली आना, उससे शादी, दल में उन दोनों का शामिल होना -कितनी ही बातें घनघनाती हुई उनके जेहन से होती हुई गुजर गई।उनकी बेचैनी और थरथराहट बढ़ती जा रही थी।उनके अंदर भय तूफानी लहरों की तरह दहाड़ने लगा था।वे अपने को संयत करने की पूरजोर कोशिश कर रहे थे।जैसे भी हो खुद को संभालना ही होगा, उन्होंने स्वयं से कहा।

दूसरे दिन आश्रम में बाबा रत्नानंद का कहीं पता नहीं था।कहीं भी नहीं दिखे।तरह-तरह की बातें कही गईं।

‘बाबा सच्चे संत थे।सच्चे संत एक जगह नहीं ठहरते।’

‘रत्नानंद साधु नहीं साक्षात शिव भगवान थे।आए और मंदिर बनवाकर अंतर्ध्यान हो गए।किंतु चनराउती ने कहा- ‘कोरोना था, आया चला गया।’

संपर्क : १७३१, सिंडिकेट कॉलोनी, उलियान, कदमा, जमशेदपुर८३१००५ (झारखंड) मो.९४७०५०५९१५

(All Paintings Pankahj Tiwari)