वरिष्ठ कथाकार।पांच कहानी संग्रह और दो उपन्यास अब तक प्रकाशित।

सा नहीं है कि इससे पहले मैंने रेलगाड़ी के इस कूपे में यात्रा नहीं की।पहली बार फर्स्ट क्लास में यात्रा करना अजीब-सा लगा था।बंद-बंद सा।न खिड़की से बाहर झांक सको, न चाय वालों का हो हल्ला, न खुली हवा।बस बंद कमरे में तीन अनजान यात्रियों के साथ आभिजात्य बने बैठे रहो।

‘अनजान’ …तो कहानी यहीं से शुरू होती है।

इन दिनों सांप्रदायिक दंगों के समाचार से लोग भयभीत थे।दोनों तरफ आग लगी हुई थी।दोनों तरफ लोग डरे हुए थे।नेताओं की बयानबाजी आग में घी का काम कर रही थी।अफवाहों का बाजार गर्म था।तनाव तो कुछ हिस्सों में था, लेकिन असर पूरे देश में था।यात्रा अर्जेंट थी, टालना मुमकिन नहीं था।चाहती तो ‘तत्काल’ सुविधा का लाभ भी ले सकती थी, लेकिन सुरक्षा का सोचकर रेल के फर्स्ट क्लास की टिकिट बुक करा ली।एक ही बर्थ खाली थी।

मेरी रेल यात्रा का समय रात भर का था।मैं समय पर स्टेशन पहुंच गई।गाड़ी भी अपने नियत समय पर आकर स्टेशन पर खड़ी हो गई।जब कुली मेरा सामान फर्स्ट क्लास के कूपे में मेरी बर्थ पर रखकर गया तब मेरे अलावा उसमें कोई यात्री नहीं था।रात में कूपा अंदर से बंद करना अनिवार्य है।न करो तो अटेंडेंट आकर बंद करवा देता है… कारण सिक्युरिटी।खैर लोअर बर्थ के नीचे मैं अपना लगेज रखकर पैर ऊपर कर आराम से बैठ गई।पर्स से किताब निकालकर रख ली और खिड़की का परदा थोड़ा सरकाकर कांच में से बाहर देखने लगी।अभी कुछ ही मिनिट बीते थे कि एक बुर्के वाली औरत और उसके साथ दो पठानी सूट पहने लंब तडंग मर्द कूपे में आए और टिकिट से अपनी बर्थ नंबर का मिलान करने लगे।निश्चिंत होने पर उन्होंने अपना लगेज दूसरी लोअर बर्थ के नीचे रखा और एक मर्द ने लड़की से कहा, ‘शाजिया, तुम ऊपर की बर्थ पर चले जाना।इस अपर बर्थ पर नजीब आ जाएगा और मैं यहीं नीचे की बर्थ पर लेट जाऊंगा।’

‘जी’ …लड़की ने शायस्तगी से जवाब दिया।अब लड़की ने अपना बुर्का उतार दिया था, सिर्फ दुपट्टा सर से लपेट रखा था।वे तीनों मेरे सामने वाली लोअर बर्थ पर बैठ गए।गाड़ी चलने पर उन्होंने खाना निकाला और खाते हुए धीरे-धीरे बातें करने लगे।बीच-बीच में वह लड़की मेरी ओर देखती।मुझे लगा कि बातें करते समय मर्दों ने भी मुझे कनखियों से देखा था।

मैंने दरवाजे की ओर देखा।चटखनी भीतर से बंद कर दी गई थी और कांच के दरवाजे के पीछे का पर्दा भी बंद कर दिया गया था।यानी चिल्लाओ तो भी कोई सुनने वाला नहींसोचकर मेरी सांस गले को आ गई।एक सिहरनसी दौड़ गई।मुझे कुछ ख्याल आया और मैंने अपने माथे पर लगी बिंदी को धीरे से निकाल लिया।

बीच में दो बार उस आदमी ने नीचे रखे बैग को खोलकर उसमें से कुछ निकालकर अन्य दोनों साथियों को दिखाया।उनमें से एक आदमी बाहर चला गया।कुछ देर में वह लौटा और उसने दूसरे आदमी से कुछ बात की।फिर लड़की ने बुर्का पहना और पहले आदमी के साथ चली गई।अब वहां एक आदमी बचा था।

‘भाईजान, अंदर से बंद कर लेना’ जाते जाते वह कह गया।

आधी रात का वक्त, रेल के बाहर घटाटोप अंधेरा, रेल की धड़-धड़ आवाज के शोर में सब कुछ शांत, बंद कूपा, उसमें एक अनजान वह भी दूसरे कौम का मर्द, मेरा दिमाग अब तक लगभग सुन्न हो गया।शक की सुई तेजी से घूमने लगी।दिमाग में सैकड़ों सवाल उग आए।आदमी अब मोबाइल पर बातें कर रहा था। ‘हां अर्जेंसी है, तुम वहां पूरा इंतज़ाम रखना, हम लोग समय पर पहुंच जाएंगे।देखो, देरी से मुश्किलें बढ़ जाएंगी।वक्त पर सब होना चाहिए’ वाक्यों के ये टुकड़े मेरे कानों तक आ रहे थे, जिन्हें मैं जोड़कर पूरा करने और समझने की कोशिश कर रही थी।किस इंतजाम की बात कर रहा था यह आदमी? कहीं कोई वारदात तो नहीं करने जा रहे ये लोग? पहले तो नक्सलवादियों के कुछ खास इलाके थे, लेकिन अब तो पूरे देश में ही …।किसके मन में क्या है, कौन कब क्या कर दे, कोई भरोसा नहीं।क्या जरूरत थी नागरिकता कानून का शगूफा छोड़ने की? देश में वैसे ही कम जनसंख्या और गरीबी है क्या कि दूसरे देशों से नागरिकों को न्योत रहे हैं? हर नई सरकार कोई न कोई खुराफाती कदम जरूर उठाती है।भुगतने तो आम जनता को ही पड़ते हैं न।दिमाग में सैकड़ों आशंकाएं सर उठाने लगी थीं।

अब तक वह लड़की और मर्द आए क्यूं नहीं? कहीं उतर तो नहीं गए? किसी घटना को अंजाम देने तो नहीं गए? या इस कूपे में बैठे मर्द की कोई खतरनाक योजना तो नहीं? ए सी केबिन के बावजूद मैं पसीने से लथपथ थी।मैंने सर तक ओढ़े हुए चादर में से थोड़ा झांक कर सामने बर्थ पर बैठे उस आदमी को देखा।मैंने देखा, वह आदमी अब भी मोबाइल पर बात कर रहा था।उसकी आवाज भारी और डरावनीसी थी।

अचानक मैं उठी।मैंने चप्पल पहनी और दरवाजा खोलकर बाहर आ गई।रात के वक्त फर्स्ट क्लास की बोगी डरावनी-सी लगती है।सब अपने-अपने केबिन में ए सी में सो जाते हैं और केबिन के बाहर एक संकरे से लंबे सुनसान कॉरीडोर में रोशनी के बावजूद रहस्य फैला रहता है।मैं वाशरूम की तरफ गई।सोचा था, वे दोनों लड़की और मर्द चलती रेलगाड़ी में वाशरूम के अलावा और कहां जा सकते हैं।लेकिन वे मुझे यहां भी नहीं दिखे।संदेह और बढ़ने लगा। ‘यदि यहां भी नहीं तो फिर कहां।’ मैं कुछ देर वहीं खड़ी रही।मन में आया अटेंडेंट को कहूं कि मेरा केबिन बदल दो।लेकिन यहां से वहां तक बस सन्नाटा पसरा था।कोफ्त हुई कि टी सी से ही बर्थ क्यूं नहीं बदलवा लिया।कोई दिखाई दे तब तो कहूं? सब घोड़े बेचकर सो रहे हैं बिंदास।

मैंने कॉरीडोर के दाहिनी तरफ की सुंदर परदे लगी खिड़की के परदे को बेवजह थोड़ा सरकाया, ये जानते हुए कि इस कूपे में खिड़कियों में कांच जड़े रहते हैं।निराश होकर एक बार पूरी बंद बोगी में चक्कर लगाया।कहीं कोई आवाज नहीं।सब केबिन के दरवाजे पर्दों सहित मुंदे हुए।ट्रेन सरपट दौड़े जा रही थी।निराश होकर ‘अब जो होगा देखा जाएगा’ सोचकर अपने केबिन के सामने आई।केबिन का दरवाजा यूं ही भेड़कर गई थी, लेकिन ये क्या, ये तो जोर से धकियाने के बावजूद नहीं खुल रहा था।मैंने जोर-जोर से दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया।मैं घबरा गई।जब मैं खुला छोड़कर गई थी तो भीतर से बंद क्यों कर दिया? किसने? अंदर तो वह आदमी… जोर की खटखटाहट सुनकर एक लड़का आंखें मीड़ता हुआ आया ‘क्या हुआ मैडम’ उसने पूछा।

‘आप कौन?’ मैंने बाहर से कुछ सख्त होते हुए कहा, लेकिन भीतर से मेरी क्या स्थिति थी मैं ही जानती थी।

‘मैं इस बोगी का अटेंडेंट हूँ।’ उसने सुस्ती से कहा।

 ‘तुम लोगों को यहां रेलवे ने क्यों रखा हुआ है? सोने के लिए? यहां पैसेंजर परेशान हो रहे हैं और तुम…’ मैं जैसे फट पड़ी।

‘उपदेश देकर टाइम बरबाद मत करिए।काम बताइये’ उसके चेहरे पर यही भाव था, लेकिन उसने बस इतना कहा ‘मैडम झपकी लग गई थी… क्या हुआ?’

आवाज सुनकर निकट के केबिन का दरवाजा खुला।उसमें से एक बुजुर्ग यात्री ने सर निकालकर बाहर देखा।वह उनींदा था, फिर उसने दरवाजा बंद कर लिया।लड़का मुझसे पूछ रहा था, ‘क्या हुआ मैडम जी बताइए न

‘हुआ क्या…दरवाजा यूं ही भेड़कर गई थी और अब ये खुल नहीं रहा और ट्रेन की आवाज इतनी जोर की है कि अंदर भी सुनाई नहीं दे रहा शायद’ …मैंने रुआंसी होकर कहा।

‘हां मैडम …अंदर लोग सो रहे होंगे न …कांच में से आवाज नहीं जाती भीतर’, उसने कहा।

तब तक मेरे केबिन का दरवाजा भी खुला और वही लंबा चौड़ा आदमी सामने खड़ा था।उसे देखकर एक बार फिर मैं डर गई।

‘क्या हुआ?’ उसने मुझसे न पूछकर अटेंडेंट से पूछा।

‘सर, इस केबिन के दरवाजे की अंदर की चटखनी खराब हो गई है, अपने आप बंद हो जाती है।मैडम वाश रूम गई थीं, लौटीं तो यह बंद हो गया होगा।मेरी असल में नींद लग गई थी।’ अटेंडेंट लड़का सफाई दे रहा था 

‘हद करते हो तुम लोग।आधी रात का वक्त है यहां पेसेंजर परेशान हो रहे हैं और तुम सो रहे हो?’ उस अनजान सहयात्री ने अटेंडेंट को फटकारा, फिर मेरी और मुखातिब होते हुए बोला, ‘मोहतरमा, वो वाशरूम के पास कम्प्लेंट नंबर लिखा है।आप फोन करिए …अच्छा आप रुकिए मैं करता हूँ। …मजाक बनाकर रखा है इन लोगों ने रेलवे को।’ कहकर वह जाने लगा। ‘सॉरी सर …मैं चटखनी कल ही बदलवा दूंगा।’ लड़का गिड़गिड़ा रहा था।

‘रहने दीजिए …अब तो सॉल्व हो गया’ …मैंने उस आदमी से कहा।

‘आप आराम से सोइए।मैं भोपाल में आपको उठा दूंगा और आपका लगेज भी उतरवा दूंगा।’ अटेंडेंट लड़के की आवाज अब भी डरी हुई थी।

‘ठीक है’, मैंने कहा और केबिन के भीतर आ गई।

अब तक वह लंब तड़ंग सहयात्री केबिन में जाकर बैठ गया था और मोबाइल में कुछ देख रहा था।मोबाइल की ओर देखते हुए उसने कहा, ‘गेट अब बंद मत करिए …खुला रहने दीजिए …टाइम होने वाला है।’

‘जी…, थैंक्यू सो मच’, मैंने उससे कहा।

‘इट्स ओके’, …उसने कहा

‘भोपाल में गाड़ी पांच बजे पहुंचती है।आप अकेली हैं।कुछ देर स्टेशन पर रुक सकती हैं।थोड़ा उजाला होने पर चले जाइएगा’ उसने मशविरा दिया।

जी वही करूंगीमैंने कहा।हालांकि पिछले कुछ मिनटों में जो गुजरा, उससे मेरे दिल की धड़कनें अभी तक बढ़ी हुई थीं, लेकिन अब तक मेरा भय खत्म हो चुका था।मैंने पूछा, ‘आपके साथ और लोग भी थे, वे कहां गए?’

‘वह मेरी बीवी है।उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है।साथ में मेरा छोटा भाई था।हम लोग भोपाल में दिखाने जा रहे हैं।दरअसल मेरी वाइफ को यहां घुटन-सी हो रही थी, तो वह दूसरी बोगी में शिफ्ट हो गई।वह खाली थी।वहां खिड़की खोल सकते हैं न, इसलिए उसे वहां भेज दिया।वैसे भी उसे ए सी बर्दाश्त नहीं होता।’

‘ओह वेरी सैड…’ मेरे मुंह से निकला।अब वह खामोशी से बैठा कुछ सोच रहा था।

स्टेशन पर उतरने के बाद मैंने उससे कहा, ‘आपकी वाइफ के लिए ईश्वर से प्रे करूंगी।आपका शुक्रिया।’

उसने फीकी मुस्कराहट के साथ मुझे देखा, जैसे पूछ रहा हो, ‘शुक्रिया तो आप दे चुकी थीं, अब किस बात का?’

मैं मुस्करा दी ‘खुदा का शुक्रिया…।’ शुक्र है कि रात भर की इस यात्रा में उसने तमाम शक शुबहों पर गिरह लगा दी वरना…।