
सुपरिचित कवि। तीन कविता संग्रह ‘दूसरे दिन के लिए’, ‘पदचाप के साथ‘ और ‘इंकार की भाषा’ प्रकाशित। संप्रति अध्यापन।
सीढ़ियां
जिन्हें चढ़ने की जरूरत है
वे सीढ़ी को महज एक रास्ता समझते हैं
कितनी आसानी से
किसी की पीठ पर रख देते हैं अपने पांव
अपना वजन दूसरे की देह पर रखते हुए
हिचकते नहीं जरा भी
वे और जोर से दबाते हैं पांव
उन्हें गिरना नहीं ऊपर जाना है लगातार
जो ईंट और गारे की तरह
खप रहे हैं सीढ़ियां बन कर
उनकी जिंदगी कुचली जाती है रोज
वे बोलना चाहते हैं तो भूख याद आती है
वे मुंह खोलते हैं तो दिख जाती है रोटी
रोटी उनकी जिंदगी को खा जाती है
कौर में तोड़ कर।
खेती की जमीन
जो दिख रहे हैं खेतों में
वे किसान नहीं
खेतों के खरीददार हैं
उनकी जेबों में इतना वजन है कि
निकल पड़े हैं जिद पर
कुछ भी खरीदने का हौसला लिए
किसी को भी नाप सकते हैं वे
कोई भी जमीन
कोई भी रकबा
उनकी पहुंच से बाहर नहीं
वे जब भाव पूछते हैं तो किसान
दीन हीन की तरह जोड़ कर हाथ
हो जाता है खड़ा
इस तरह बेचने से पहले बिक जाती है जमीन
इस तरह खरीदने से पहले हो जाता है उसका
जमीन पर कब्जा।
बदलने की चाह
थके और उदास दिनों के बोझ तले
दब रहे हैं सपने
नींद के ऊपर बड़ा सा पत्थर
जम गया है इस तरह
जैसे यह पहाड़ सदियों से यहीं था
एक फूल के सूखने के कितने दिन बाद तक
संभाल सकता है कोई
जबकि वह महज एक फूल है
प्रेम का सबूत नहीं कि
किताब के पन्नों में छिपा लिया जाए
जैसे पन्नों का पलटना होता है सहसा और
चीजें बदल जाती हैं एक झटके में
मैं सबकुछ पलट देना चाहता हूँ
ठीक उसी तरह।
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