अद्यतन कहानी संग्रह, ‘मेरी कहानियां आभासी दुनिया से 1’। भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत।

  1. बाजी

दाऊ हीरालाल ने बादशाह के सामने के प्यादे को दो घर आगे बढ़ाया। चोवाराम ने दाऊ जी की तरफ देखा मानो वह दाऊ जी के दिमाग को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। फिर वह मुस्कराया जैसे वह जान गया हो कि दाऊ जी की अगली चाल क्या होगी और उसने भी काली गोटियों से खेलते हुये अपने बादशाह के सामने वाले प्यादे को दो घर आगे ले जाकर दाऊ जी के इस प्यादे की चाल खत्म कर दी।

‘हूँ…’, बहत्तर वर्षीय दाऊ जी यानी दाऊ हीरालाल ने धीरे से हुंकार भरी और हौले से मुस्कराए। जहां तक दाऊ जी चोवाराम को जानते हैं, उन्होंने अंदाजा लगाया था कि चोवाराम जवाब में सिलिकॉन डिफेंस अपनाएगा, लेकिन इसने तो आक्रामक चाल से शुरुआत की है। आखिर इस समय इसका माइंड सेट क्या है? क्या उसे समझ नहीं आ रहा कि उसके बादशाह के ऊंट के सामने वाला खाना खतरे में आ सकता है? इसे जांचने के लिए दाऊ जी ने अपने वजीर को बादशाह के सामने लगा दिया और चोवाराम की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे।

‘ई लिफाफा कैसन हवे रे चोवाराम?’ किसी ने आवाज लगाकर पूछा।

‘अरे एह त नौकरी के बुलावा आय…’ चोवाराम ने जवाब दिया। नौकरी के बुलावा सुनकर सबके कान खड़े हो गए थे। ऐसे समय में जब पढ़-लिखकर सबके बच्चे निठल्ले घूम रहे थे, यह खबर सबको चौंकाने वाली तो थी ही।

‘काकर आय रे?’ अब दाऊ जी से भी नहीं रहा गया तो पूछ बैठे।

‘जवाहर के लईका के आय दाऊ।’ अगले ने जवाब दिया।

चोवाराम का ध्यान भंग हो गया। वह बड़ी लगन से यह सोचने में मगन था कि आखिर दाऊ जी के दिमाग में कौन-सी चाल है?

‘जवाहर? वो गहिरा जे हमर जानवर ल चराथे?’

‘हव दाऊ। एमे त नाम ओकरेच आय जीतन राम यादव।’

चोवाराम समझ नहीं पा रहा था कि आखिर दाऊ जी के दिमाग में चल क्या रहा है। दाऊ जी को अगर मेरे सी2 पे अटैक करना होता तो वे वजीर को एक घर आगे ले जाते। लेकिन यह चाल तो आजकल बच्चे ही चलते हैं, क्या वे अपना बादशाह साईड का घोड़ा बाहर निकालकर वही गेम घोड़े और वजीर की सहायता से खेलेंगे?

‘ला ये लिफाफा मोला दे दे। मैं खुद देवंव ओला।’ दाऊ जी ने लिफाफा लेकर अपने पास रख लिया।

चोवाराम का माथा ठनका। ये बड़े लोगों की नीयत का कोई ठिकाना नहीं।

‘नई दाऊ जी, मैं एकर बलदा में कुछ मिठाई अऊ पैसा मांगहू।’ चोवाराम ने ऐतराज किया, लेकिन दाऊ जी से ऐतराज जताने की हिम्मत उसमें नहीं थी, यह उसकी आवाज से साफ जाहिर था।

‘अरे, वो गहिरा कहां ले दिही। ले मै देवत हौं।’ कहकर दाऊ जी ने सौ-सौ के दो नोट चोवाराम की जेब में ठूस दिए। चोवाराम के पास अब ऐतराज करने की हिम्मत ही न रही। वह गेम छोड़ कर उठ गया। अपना बैग उठाया और दाऊ जी की बैठक से बाहर निकल गया।

‘अरे ई सारे चरवाहा मन के लईका पढ़ लिख कर नौकरी करही त हमर लईका मन का करही रे!’ चोवाराम के कानों में पीछे से ये आवाज सुनाई पड़ी। वह चिंतित हो गया। एक मिनट को वह रुका, लेकिन फिर अपनी साइकल उठाकर चला गया।

  1. खिलाड़ी

‘माल गुजर गे अऊ गुजारा चलत हे. . .’ मालगुजारों के बारे में यह कथन छत्तीसगढ़ के गांव देहात में आजकल बड़ा प्रचलित है। लेकिन दाऊ हीरालाल के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनके माल का हिसाब न तो इनकमटैक्स वालों के पास होगा न उनकी अपनी पार्टी और न चुनाव आयोग के पास। उनकी जमीन कोई एक गांव तक सीमित थोड़ी है। दाऊ जी के जमीन जायदाद का हिसाब तो उनके मस्तिष्क में मौजूद तंत्रिका तंत्र के जाल में ही छुपा हुआ है। कौन सी जमीन कहां पर है, कितनी है और उस पर कौन काम करता है। जमीन का कौन-सा टुकड़ा रेगहा में बोया जा रहा है, कौन-सा अधिया में और किस खेत में मजदूर लगाकर खेती हो रही है। कहां मॉल है, कहां मकान, यह सब उन्हें जुबानी याद रहता। बेशक इतने बड़े साम्राज्य में उनके पुरखों का उतना योगदान नहीं जितना स्वयं दाऊ जी का है। यानी दाऊ हीरालाल सिर्फ नाम के मालगुजार नहीं हैं। और सच कहें तो मालगुजार शब्द उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर सकता। वे कभी विधायक, कभी सांसद और कभी मंत्रीपद को भी सुशोभित कर चुके हैं; और अब बस अपने कई पदों की पेंशन पर सुख शांति भरा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हां, यह जीवन सुख-शांति भरा कतई नहीं होता, अगर उनकी यह राजनीतिक विरासत उनका पुत्र न सम्हाल रहा होता।

दाऊ जी ने अपनी राजनीति कांग्रेस के सहारे चलाई थी। लेकिन अब तो जमाना कांग्रेस का रहा नहीं, इसीलिए बेटे को सत्तारूढ़ पार्टी में फिट कर दिया। अब पार्टी कोई भी हो, दाऊ हीरालाल का बेटा होना ही पार्टी में अच्छी पोज़िशन की गारंटी है। सो आजकल दाऊ जी निश्चिंत रहकर अपनी राजनीतिक विरासत को फलते-फूलते देख रहे थे।

जब दाऊ जी ने होश सम्हाला तो आजादी का जोश और जुनून, देश की रगों में अभी ठंडा नहीं पड़ा था। देश की बागडोर भी अभी कांग्रेस के हाथ में ही थी और हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं जैसे जुमले दाऊ जी को आशा से भर देते थे।

होश सम्हालते ही दाऊ जी को समझ आ गया था कि मालगुजारी का भविष्य राजनीति में ही है। राजपाट के पुराने तरीके हवा हो चुके हैं। आज बाजुओं के जोर से शासन नहीं चलने वाला। शासन तो चलने वाला है पैसे के जोर से। उन्होंने पूंजीवाद को जितनी अच्छी तरह पहचाना उतनी अच्छी तरह तो कम्युनिस्टों ने भी नहीं पहचाना था। और उन्होंने तो न सिर्फ पहचाना, बल्कि उससे फायदा उठाना भी खूब सीखा। इसीलिए तो उनके धुर विरोधी कम्युनिस्ट आज कहां नजर आते हैं?

दाऊ जी ने तो अच्छी तरह जान लिया कि इन्वेस्टमेंट ही पूंजीवाद का मूल मंत्र है। और हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था भी इसका अपवाद नहीं। यहां राजनीति में भी वही मंत्र चलता है, पैसा लगाओ पैसा कमाओ। वह भी बहुत-सी सुविधाओं और छूट और तामझाम के साथ। यहाँ इन्वेस्ट करो और पुराने दौर के सामंतों जैसा जीवन जियो। आगे पीछे फौज फर्राटा और नौकरशाहों की बिछ-बिछ जाने वाली भीड़। यह सब भला पुरानी मालगुजारी में भी इतना आसान तो नहीं।

उन दिनों भी वे कम्युनिस्टों की इस थ्योरी से इत्तफाक नहीं रखते थे कि पूंजीवाद सामंतवाद की लाश पर कायम होता है, बल्कि वे यह मानते थे कि पूंजीवाद तो सामंतवाद का परिष्कृत रूप है। यह सामंतों को पनाह भी देता है, क्योंकि सामंतों का धन यहां नई पूंजी के रूप में उपयोगी है।…    और ठीक इसीलिए सामंतवाद के पूंजीवाद में संकरण को उन्होंने न सिर्फ खुले दिल से स्वीकारा, बल्कि स्वागत किया और उसे अपनाया भी। उनका कहना था कि पूंजीवाद में राजनीति भी एक उद्योग ही है जहां से आप अच्छे रिटर्न्स की आशा कर सकते हैं। यह राजनीति में उनका इंवेस्टमेंट ही था जो आज अच्छा खासा रिटर्न दे रहा है। वे अच्छी तरह जान गए थे, आज के दौर की ताकत है, पैसा! जो पैसा लगाएगा वो पैसा बनाएगा। यह भी बड़ी अच्छी तरह जान चुके थे कि राजनीति भी एक पेशा है, जैसे व्यापार, वकालत या वेश्यावृत्ति।

हां, अगर हवा का रुख पहचानने में वे इतने माहिर न होते तो इनका भी वही हाल हुआ होता जो इनके चाचा और उनके चचेरे भाइयों का हुआ। राजनीति में इनकी जैसी सफलता इनके चाचा और भाइयों को नसीब नहीं हो सकी। कारण? वही निजी प्रतिभा।

शिक्षा के चलते दाऊ हीरालाल जी का प्रारंभिक जीवन रायपुर में बीता और उन्हे यहीं से शतरंज की लत लगी थी जो अब तक उनके साथ है। गांव में वापस बसने के बाद उन्हें शतरंज में कोई जोड़ीदार चाहिए था सो उन्होंने अपने नौकर-चाकर से लेकर मिलने-जुलने वाले हर एक को शतरंज का खिलाड़ी बना दिया। गांव में शतरंज को लोकप्रिय बनाने या कहिए कि, गांव को शतरंज से परिचित कराने के लिए भी उन्हें सम्मान की नजर से देखा जाता है। ऐसा नहीं कि वे शतरंज की कोई चैम्पियनशिप जीत लाए हों, लेकिन आजकल उनके इर्द-गिर्द हर किसी को शतरंज का जो ज्ञान है वह दाऊ जी की ही देन है। उनसे जुड़ा हर व्यक्ति यह जानता है कि जो शतरंज के जितना करीब वह दाऊ जी के उतना ही करीब। यानी इसी बैठक में जमाने से शतरंज की बिसात बिछी रही है। बिछी रही और चलती रही। अबाध गति से। फिर चाहे दाऊ जी गांव में हों या न हों।

राजनीति से रिटायर होकर दाऊ जी ने अपने पुश्तैनी गांव को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया था। यहां मालगुजारी का ठाठ था। अपनों की संगत थी। सुकून था, और सबसे बढ़कर तो अपने साम्राज्य, संतान और जात-बिरादरी का राजनीति पर नियंत्रण था।

शतरंज की इन्हीं बैठकों के एक महारत्न थे पोस्टमैन चोवाराम। चोवाराम के बारे में यह कहा जाता कि दाऊ जी को शतरंज में कोई टक्कर दे सकता है तो वह है चोवाराम। कुछ लोग दबी जबान में चोवाराम को दाऊ जी से बीस मानते। और दाऊ जी को भी किसी और से ज़्यादा चोवाराम के विरुद्ध खेलना भाता। खिलाड़ी टक्कर का हो तभी तो मजा है। दाऊ जी चोवाराम के बारे में यही कहा करते। सच पूछो तो शतरंज चोवाराम का शौक नहीं, बल्कि लत थी।

बात यूं है कि, गांव के प्रवेश स्थल पर ही दाऊ जी की हवेली है। हवेली पुरखों की जरूर है लेकिन इसकी आन-बान उन्हीं के दम से कायम है। यानी दाऊ हीरालाल के दम से। हवेली के एक सिरे पर एक चबूतरे पर उनकी बैठक है। इस चबूतरे के आधे हिस्से पर छप्पर है और आधा हिस्सा खुला है। यहां दिन भर गांव के, जात-बिरादरी के और राजनीति में रुचि रखने वाले लोगों की महफिल जमी रहती। गांव की राजनीति में जात-बिरादरी के वर्चस्व की सारी रणनीतियां इसी बैठक में बनती। चुनाव के समय गांव में जो शराब की नदियां बहती हैं, उनका स्रोत यही बैठक है। पैसा, कपड़ा सबकुछ इसी दरबार से पालागी करके गुजरता है।

इसी चबूतरे की परिक्रमा करते हुए एक राह गुजरती है जो गांव में प्रवेश के लिए सबसे प्रचलित रास्ता है। अब यह संभव ही नहीं कि गांव में कोई जाए-आए और दाऊ जी की पालागी का सौभाग्य प्राप्त किए बिना गुजर जाए। फिर पोस्टमैन चोवाराम की मजाल नहीं कि गांव की डाक लेकर आए और नजर बचाकर यहां से गुजर जाए? ग्राम देवता की आज्ञा के बिना भला ग्रामप्रवेश कैसा? यहां पहुंचते ही चोवाराम अपना पोस्टमैन वाला बैग एक तरफ फेंकता और दाऊ जी को प्रणाम कर सीधा शतरंज की बिसात पर जा बैठता। फिर चोवाराम के ‘अरे! तोर हाथी त मरत हे रे!’ या ‘घोड़ा से चेक दे रे! जैसे जुमलों के चलते हाथापाई की नौबत आ जाती। मजबूरन लोग गेम छोड़कर उठ जाते और चोवाराम को खेलने का मौका मिल जाता। वहां मौजूद लोग चोवाराम का बैग खोलकर अपनी-अपनी डाक खुद ही निकाल लेते। गांव की बाकी डाक निकाल कर वहीं बैठक में रख देते। फिर वहां से गुजरते हुए लोगों को आवाज दे-देकर उनकी डाक थमा दी जाती। अब इससे चोवाराम को यह फायदा होता कि उसे घर-घर जाकर डाक बांटने से छुट्टी मिल जाती। दाऊ जी को यह फायदा होता कि मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में जहां चिट्ठियां आती नहीं, तब किसके पास कौन से कागज़ात आ रहे हैं यह पता चलता रहता। यानी कि गांव की गतिविधियों पर नजर रहती। कौन अपनी जमीन किसे बेच रहा है, कौन किस मुकदमे में लगा है और उसका क्या मामला बनता है, आदि आदि।

3.चाल यानी रणनीति

आज पोस्टमैन चोवाराम सफेद मोहरों से खेल रहा था। उसने आज प्यादों को फारवर्ड रख कर खेलने की ठान ली। कभी सुन रखा था कि प्यादों के आधार पर बनाई गई रणनीति सबसे सफल होती है।

उसने प्यादों को एक-दूसरे के सपोर्ट से आगे बढ़ाना शुरू किया। अनुभवी दाऊ जी के चेहरे पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान उभर आई। नौजवान चोवाराम ने अपनी रण्नीति नहीं बदली। देखते-देखते बिसात पर एक खूबसूरत कॉम्बिनेशन उभर आया। हैरान दाऊ जी ने सफेद प्यादों की इस आड़ी-तिरछी दीवार को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन प्यादे के बदले अपने ताकतवर मोहरों की कुर्बानी देने की हिम्मत नहीं जुटा सके। भरी बिसात का सबसे स्वतंत्र मोहरा घोड़ा, जो मोहरों के ऊपर से जंप करके विरोधी के खेमे में घुस जाता है; वह भी इस दीवार को भेद न सका, क्योंकि प्यादों की इस दीवार के सामने का हर खाना किसी न किसी प्यादे की मार में था और मुफ्त में प्यादे से घोड़े को मरवाना कोई समझदारी की बात नहीं थी। गांव के लोग देख रहे हैं। क्या सोचेंगे?

मजबूरन दाऊ जी को भी प्यादे आगे रखने पड़े और देखते-देखते बड़े ताकतवर मोहरों के पास हिलने-डुलने की भी जगह नहीं बची।

दर्शकों ने ऐसी चाल पहले कभी नहीं देखी थी। ऐसी बाजी नहीं देखी थी। अब क्या होगा? वे सांस रोके इस अजीब जमावड़े का तोड़ देखने का इंतजार करने लगे।

लेकिन जीतन राम यादव की डाक दाऊ जी के हाथ में जाने के बाद चोवाराम को चैन ही नहीं था। ये दाऊ लोग अपने सामने किसी को आगे बढ़ते हुए देख ही नहीं सकते। रह-रह कर उसे अपने पीछे से सुनाई दिए वे शब्द याद आते, ‘अरे ई सारे चरवाहा मन के लईका पढ़-लिख कर नौकरी करही त हमर लईका मन का करही रे!’

वह बरसों से गांव की सारी डाक दाऊ जी की बैठक में ही छोड़ता आया है, लेकिन वह कभी इतना चिंतित नहीं रहा। डाक अपनी सही जगह पहुंची या नहीं, यह कभी उसकी चिंता का विषय नहीं रहा। फिर इस बार वह हर रोज पूछ ही लेता, ‘जीतन राम यादव के लिफाफा पहुंच गे?’ और हर बार उसे जवाब में इनकार ही मिलता।

उसने फिर यह सवाल पूछा और बिसात पर विकट स्थिति में फँसे दाऊ जी बुरी तरह झुंझला उठे।

‘तोला बड़ चिंता लग गे हे रे चोवाराम? तोला पईसा त मिलगे न, अब चुप लगा के बइठ जा, नई त इहां तोर नौकरी खतरा में पड़ जाही।’

चोवाराम जानता है झुंझलाया हुआ खिलाड़ी गलत चाल खेलता है।…

  1. एंड गेम

आज बहुत दिनों के बाद चोवाराम का मन खेल में लग रहा था। आज उसके खेल की धार देखते ही बनती थी। एक से बढ़कर एक चाल दाऊ जी को लगातार परेशानी में डाल रही थी। देखने वाले दर्शकों को डर था कि कहीं यह आज दाऊ जी को हरा ही न दे। दाऊ जी फिर भी मालिक आदमी ठहरे। अपनी हार उन्हें कभी पसंद नहीं रही। फिर हार चाहे राजनीति में हो, मुकदमे में हो या शतरंज में। दाऊ जी को हार कभी स्वीकार नहीं। लेकिन दाऊ जी भी कोई कच्चे खिलाड़ी न थे। वे भी चोवाराम की एक गलती का इंतजार कर रहे थे,  ‘बस एक चूक और…’

‘चेक! अचानक दाऊ जी चिल्लाए। यह अच्छी चाल थी। अब चोवाराम का बादशाह पिन में है। भले उसका एक प्यादा सातवें खाने तक पहुंच गया है… अगर वह अपना बादशाह हटाता है तो अपना वजीर गंवाता है। हुआ भी वही।

‘राम राम दाऊ जी’, तभी जीतन राम यादव ने दाऊ जी को पालागी करते हुए बैठक में प्रवेश किया।

‘कहां चले गे रेहे रे जीतन? एक महीना ले ऊपर होगे तोर लेटर आ के माढ़े हे।’ दाऊ जी ने दिखावटी स्वर में कहा।

‘तोर आसिर्वाद से नौकरी म लग गेंव दाऊ जी। जाईन करे बर गे रहेंव।’ जीतन ने कहा।

‘लेकिन तोर लेटर तो इहींच माढ़े आय रे! फेर नौकरी कैसे जाईन कर डारे रे?’ दाऊ जी ने अंदर ही अंदर तिलमिलाते हुए पूछा।

‘वाह, पहले के जमाना नी रह गे दाऊ जी। मोला त मोर मोबाइल से पता लाग गे रेहे। ये इंटरनेट के जमाना हे दाऊ जी।’

दाऊ जी का मुंह खुला का खुला रह गया।

‘मिठाई नाने हंव दाऊ जी, मुंह मीठा करके मोला आसीस देवव।’ जीतन राम यादव ने दुर्ग के जलाराम स्वीट्स की मिठाई का डिब्बा खोलकर आगे बढ़ा दिया।

दाऊ जी की आंखों में खून उतर आया था।

चोवाराम ने वजीर की कुर्बानी देकर, अब तक सातवें खाने में अटके अपने प्यादे को आठवें खाने में पहुंचा दिया।

‘चेक और मेट’ चोवाराम ने शतरंज की बिसात से उठते हुए कहा।

दाऊ जी ने देखा चोवाराम ने अपने प्यादे को आठवें घर में पहुंचा कर वजीर बना कर चेक दिया था और अब दाऊ जी के पास कोई चाल नहीं बची थी।

बेबस दाऊ जी के मुंह से दांत पीसते हुए इतना ही निकला, ‘तैं चीटिंग करे हस रे चोवाराम यादव।’

लेकिन पोस्टमैन चोवाराम यादव को यह सुनने की फुर्सत कहां?

संपर्क सूत्र : स्पर्श स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के सामने, द्वारा : शिव शंकर किराना स्टोर, श्रीराम मार्केट, सिरसा रोड, सुपेला, भिलाई, दुर्ग, छत्तीसगढ़490023 मो.9009113456