युवा लेखक।कहानी संग्रह : अस्वीकार और अन्य कहानियां’, ‘कस्बाई औरतों के किस्से’, ‘आधी रात का किस्सागोउपन्यास : कालचिती’, ‘बापा की बेटी।भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का युवा पुरस्कार२०१९ से सम्मानित।

छोटीसी खिड़की पर उनका चेहरा झलका।गोरा, चौड़ा, बाएं नथुने पर बड़ी सी बूंदी, छोटी आंखें।घुंघराले बाल आंखों के आगे आ जाते तो उलटी हथेली से हटा देतीं।हाथों में फुर्ती साफ थी।

क्वार्टर के सामने उधर ही ताक लगाई भीड़ लपकी।उन्होंने भीतर से निकाल कर खिड़की के पल्ले की लकड़ी पर गत्ते का बोर्ड टांग दिया।वेज मोमो रु.१०/- प्लेट/नॉन-वेज मोमो रु.१५/- प्लेट!

शाम के पौने पांच होने ही आए थे।जहां पेड़ों और क्वार्टरों की कतार नहीं थी, वहां अभी तक तीखी धूप जमीन चूम रही थी।जेठ की गर्मी जून के पहले पखवाड़े की अपनी उठान पर थी।उमस के कारण पसीने का परनाला कनपट्टी, कॉलर बोन और गरदन से नीचे की ओर ढुलकता जा रहा था।

वे खिड़की से जबर्दस्त व्यस्त दिख रही थीं।रोजाना आने वालों को मालूम है कि वे टेबल पर स्टोव और चटनियों के बरतन, सूप के बाल्स, चमचों को करीने से लगा चुकी होंगी।अभी रोज की तरह ढलती शाम से रात तक उनका कारोबार चलेगा।फिर भी उनकी शानदार चपलता में आखिर तक यानी इस नामहीन दुकान का पल्ला खींचने तक कमी नहीं आएगी।

उमेश स्कूटर को नजदीक ले आया।नीम और सहजन के दो पेड़ों के तनों से पटरा बांध कर बनाए गए बेंच पर बैठ गया।उसकी नजर क्वार्टर की उसी खिड़कीनुमा काउंटर की तरफ उठी।आंटी जी मोमो उबालने वाले खास बरतन, जो नेपाल, दार्जिलिंग या कहीं से उन्होंने खास मंगवाया था, के कोरों से उठती घनी भाप के पीछे खड़ी थीं।उन्हें देखता हुआ उमेश यह सोचने लगा कि पृष्ठभूमि के अंधेरे पर आंकी हुई एक हिलती-डुलती कठपुतली नाच रही है।

उमेश उनकी बांह कटी मैक्सी से झलकती उजली बांहों पर पसीने को एकटक देखने लगा।कितनी बातें इसके बारे में वह अपने घर और टाउनशिप में सुन चुका है।इस कस्बे में नई तरह के कपड़ों और केश-सज्जा के ढंग की चौंक पैदा करने वाली पद्मा आंटी, पूरा नाम पद्मा लामा, जब से रहने आई थीं, तब से सबसे अलग रहन-सहन की आदतों से यह बता दिया था कि इस कस्बाई मूड की दिनचर्या में नवाचार क्या होता है? उमेश के मामा उससे कहते थे, यह औरत बहुत फॉरवर्ड है!

उमेश इस अंग्रेजी शब्द के मायने नहीं जानता था, लेकिन मामा इस एक लफ्ज की मार्फत कस्बे की और इस टाउनशिप की बाकी स्त्रियों से तुलना करते हुए उनके देहाती-कस्बाई मिजाज के बरक्स आंटी की आधुनिक रंग ढंग के आकर्षण की तारीफ किया करते हैं, यह समझता था।

उमेश ने आंटी के गोरे चेहरे और भरे भरे बदन को कई बार घूरा था।जब वह टीनेजर ही था, तब से यह ख्याल उसके जेहन में आता रहता था कि, लोग आंटी को क्या चीज समझते होंगे!

‘आंटी, एक प्लेट पैक कर दो और एक प्लेट ऐसे दे दो, खाएंगे।’ उसने जोर से आवाज दी।

‘रुक जा।सिझा नहीं है।पांच मिनट में निकालती हूँ।’ भाप की धुंध के पीछे से आवाज आई।उमेश को यह आवाज सबसे अलग लगती है।

बेंच पर कुछ और लोग उसके बगलगीर हो चुके थे।बगल के क्वार्टर के बगल में अवैध रूप से बनी छोटी-सी झोंपड़ी का खाप भी खुल चुका था।उसके सामने कुछ मजदूर उकड़ूँ बैठ गए थे।यह समय था यहां गुलजार होने का।आंटी की दुकान और इस भट्टी के बीच कुछ आपसी था।अधिकतर ग्राहक दोनों के साझा थे।

कच्ची शराब की भट्टी से सफेद द्रव्य गिलास में भरकर, कभी पूरी बोतल ही, ग्राहकों के हाथों तक पहुंचने लगी।फैक्टरी एरिया में बने कंपनी क्वार्टरों में से ये आखिर के क्वार्टर थे, इसके बाद रेलवे की पटरियां गुजरती थीं।मजदूरों की टोलियां दो-तीन-चार की हिस्सेदारी से किसी झाड़, पटरियों की ढलान पर या पेड़ों के नीचे बैठ गई थीं।कुछ, जिन्हें उधर कोई मुफ़ीद जगह नहीं मिली या मन नहीं किया, वे पद्मा आंटी की मोमो दुकान के सामने जम गए थे।उमेश जब भी इधर आता, यह नजारा देखता था।यानी यह रोज की गतिविधि थी।

उसे आंटी के मोमो बहुत अच्छे लगते थे।वैसे मोमोजैसी कोई खाने की चीज इस कस्बे में अजूबा थी! और इसका नाम भी क्या गजब था! इसमें वही आकर्षण था, जो पद्मा आंटी में था।दोनों, इस टाउनशिप में, कस्बे में, इससे पहले देखेसुने नहीं गए थे!

‘ऐ लड़का, ले।’ मोमो सजा हुआ एक प्लेट बढ़ाए आंटी ने आवाज दी।

उसने दूसरी ओर से नजर मोड़ कर आंटी की तरफ देखा।व्यस्तता कुछ खीजा हुआ-सा चेहरा।लेकिन यह उनके चेहरे और मूड का असल रंग नहीं है।उनके चेहरे की मुस्कान और जोरदार हँसी जिसने एक बार देखी, भूल नहीं पाया।भले ही, कभी कभी… अकस्मात!

उमेश ने उठकर उनके हाथ से प्लेट ले लिया और वापस वहीं बैठ गया।

मोमो इतने नरम और लजीज थे कि उमेश गर्म मोमो फटाफट खा गया।सूप थोड़ी तीखी थी, उसके मुंह से सी-सी निकलने लगी।वह उठकर पास रखे मग लेकर गटागट गले में उंडेल गया।

‘ले ले, पैक कर दिया है तेरा।’ आंटी ने पुकारा।पोलिथिन की छोटी सी थैली में फोयल पेपर में मोमो को पैक कर दिया था और चटनी, सूप की दो दो पाउच डाल दिए थे।उसने जेब से तीस रुपये निकालकर दिए और बाएं हाथ से पार्सल ले लिया।

उमेश को घर जल्दी लौटना नहीं था।वह वापस उसी बेंच पर जाकर बैठ गया और आसपास के नजारे देखने लगा।

पास वाले क्वार्टर से चल रहे व्यवसाय का रंग और हलचल अलग थी।महुआ मौसी एक कुर्सी पर बैठी, सामने के टेबल पर रखे पैसे उठाकर गिनती और टेबल के नीचे से माल निकाल कर ग्राहकों को बढ़ा देती।

महुआ मौसी का असल नाम किसी को नहीं पता।लोगों ने, माने उनकी शराब के रसिकों ने उन्हें महुआ बोलना शुरू किया और यही नाम फेमस हो गया।

रात साढ़े नौ बजे का पोंगा बजा।पद्मा और महुआ की कारोबारी व्यस्तता कम हुई।अब आज की दुकान को समेटना था।बरतनों की खनखनाहट और झाड़ू की खरखराहट पास के पेड़ों पर सोई चिड़ियों की नींद में खलल डाल रही थी।

पद्मा अपने लड़के से सामने के हिस्से की सफाई करने को कह रही थी।ग्राहकों ने बेतरह गंदगी फैलाई थी।यह रोज की बात थी।

‘कल फिर ग्राहक आएगा।जू-जू, थोड़ा साफ कर दो ना बाबू, हमारा हालत तो देख रहा है, क्या क्या करें?’

‘मम्मी, आपको इसी टाइम सफाई का क्यों लगा है? कल भी हो सकता है।’

‘जू-जू-जू, कल तुम्हारे पास टाइम होगा? हमको ही करना पड़ेगा।कल दुकान की चीज बनाएंगे कि यह सब काम करेंगे।आज साफ करके रख दिया जाएगा तभी न कल का काम टाइम से होगा?’

‘मम्मी आपका न, काम समझ में नहीं आता! स्टाल लगाने को कौन बोलता है आपको? खुद भी परेशान होती हैं और लोगों को भी परेशान करती हैं।’

‘जू-जू-जू… तुमको नहीं करना है, मत करो।लेक्चर मत दो।जू-जू जाओ, अपना खाना लेकर खाओ और सो जाओ।स्टाल नहीं करेंगे तो तुम्हारे स्मगल के कपड़े और जूते बेचकर महीना भर का खाना भी आएगा? बाप नागा कर-करके ड्यूटी का कितना कमाई करता है? जू-जू, हरदम मुंह से बड़ा बोलता है… दिन से रात तक खटो, मरो और उसका ऊपर बाबू का लेक्चर सुनो!’

लड़का कुछ नहीं बोला।पद्मा जूठे पत्तलों और गिलासों को समेटकर एक तरफ करने लगी।

स्थूल शरीर के बावजूद पद्मा का हर काम नफासत से ही होता था।साफ सफाई पसंद पद्मा को बरतन और कपड़े धोते हुए कोई देख ले तो समझ सकता है कि कितनी सघनता से काम किया जा रहा है!

महुआ की लड़की झाड़ू लेकर निकली थी, ‘आंटी, भैया नहीं सुन रहा’, हँसी, ‘रात में झा़ड़ू नहीं लगाना चाहिए ना।’

‘जू जू… कौन बोलता है?’ पद्मा आंटी जब गुस्से में होती है तो उनका ‘जू जू’ तकिया कलाम होता है।

‘सब बोलता है, हमलोग नहीं।’ वह इस तरफ आ गई, ‘हम लगा देते हैं।’

‘तुम ही तो हर बार लगा देती है।घर का लड़का है, इतना काम भी नहीं करेगा।खाली खाएगा-पिएगा और टांग फैलाकर सोएगा? और दो महीना, तीन महीना में… जू जू, हमको नेपाल जाना है।मम्मी कुछ पैसा दो।’

महुआ की लड़की मुस्कराती हुई पद्मा के आंगन में झाड़ू देने लगी।पद्मा कचरे को एक तरफ करके इकट्ठा कर रही थी।

महुआ भी निकली और आगे की जमीन पर पानी की छींटे मारने लगी।कच्ची शराब की बू की उसे आदत कभी की हो चुकी थी, लेकिन पीने के बाद ग्राहक जो गंदगी करते थे, वह बर्दाश्त नहीं होता था।

महुआ ने लड़की को पद्मा की तरफ की जगह को अक्सरहां की तरह झाड़ू लगाते देखा।वह भी  इधर आ गई और नीम के पेड़ पर हाथ रखकर खड़ी हो गई।

‘आज धंधा कैसा रहा पद्मा?’

‘धंधा क्या है, जितना मरो उतना थोड़ा ज्यादा होता है।’

महुआ हँसने लगी।

‘हरमेसा (हमेशा) नहीं होता।’

तुम्हारा कहिले धंधा खराब गर्दैन।यो चीज का धंधा गर्छ, आदमी घर, ईमान या बोलो खुद को बेचकर पनि लत गर्छ!’ (तुम्हारा तो कभी धंधा खराब नहीं होता।ऐसी चीज का धंधा करती है, आदमी घर, ईमान या बोलो खुद को बेचकर भी लत करता है।)

महुआ को नेपालन की यह बात समझ नहीं आई।वह चुप उसका मुंह देखती रही।फिर अपनी लड़की से पूछा, ‘हो गया?’

‘बस आयो, हो गया।’ वह झाड़ू देती रही।

‘एक बात तो तुम भी जानती हो महुआ, तेरा धंधा से ही मेरा भी थोड़ा जमता है।नहीं तो यहां मोमो का नाम भी कोई नहीं जानता! दार्जिलिंग का देहात में जो हम लोग ऐसे ही पका खा लेता है, यहां का लोग उसको क्या समझ के खाता है!’ पद्मा थककर अपने आंगन की बेंच पर बैठ गई थी।कुछ देर पहले बीसियों ग्राहक उसी बेंच पर बैठे मोमो चाभते, बगल से शराब ले आकर पीते रहे थे।

‘तेरा आदमी ड्यूटी से अभी तक नहीं आया?’ महुआ उसके क्वार्टर की तरफ देखकर पूछती है।

‘क्यों, फिर से पिला कर बेकार करना है उसको?’

‘हम क्या करते हैं? वो खुद आता है’, महुआ भी बैठ गई।

‘तुम ही तो ये खोलके बर्बाद कर दी।’ पद्मा ने बगल में महुआ के ठेके की ओर हाथ उठाया, हो, तिम्रो र मेरो धंधा एक अर्कामा टक्किएको छ, थाहा छैन किन? (हां, तेरा और मेरा धंधा एक दूसरे पर टिका हुआ है, पता नहीं क्यों!) हम दोनों के धंधों में यारी है!’

‘हां, धंधा नहीं करेंगे तो भूखा मरेंगे क्या? चोरी कर रहे हैं कि किसी को सोने बुला रहे हैं?’

पद्मा कुछ नहीं बोली।महुआ बहुत तेज बोलती है।कारोबार करने वाली औरतों को तेज बोलना आना चाहिए।

‘और तुम क्या कर रही है, धंधा नहीं चला रही है?’

‘चलाना पड़ता है।’ पद्मा छोटे उत्तर के बाद अपने बिखर गए बालों को समेटकर जुड़ा बनाने लगी।बांह कटी मैक्सी से उठे हुए बांह की कांख महुआ के सामने उजागर हुई।

‘तुम्हारे पास ढंग का कपड़ा नहीं है?’

‘पद्मा ने उसका मुंह देखा, ‘तुम भी यही सब सोचोगी महुआ, जो ये लोग सोचता है!’

महुआ चुप रही।पद्मा की बोली बहुत ‘मार’ है!

पद्मा ने कचरा समेट दिया।महुआ की बेटी भी झाड़ू रखकर आकर बैठ गई।हवा अच्छी चल रही थी।दोपहर से, बल्कि दिन भर की दुकान खोलने की विकट मेहनत से चूर बदन को अब आखिरकार थोड़ी राहत मिली थी।मगर यह निश्चित नहीं था कि कितनी देर।

राम लामा ड्यूटी से लौटा।उसे देखकर पद्मा उठ गई और क्वार्टर के दरवाजे पर जाकर उसके हाथ से टिफिन ले ली।

‘तुमको बोले थे न कल से ड्यूटी बदल रही है।छह बजे की पाली लगेगी।’ राम अंदर आकर अपनी वर्दी उतारने लगा।

‘हो, याद छ। (हां, याद है)

‘खाना निकालो।’

दरवाजे के पास के गुसलखाने में राम लामा दाखिल हो गया।

पद्मा ने दरवाजे के बाहर देखा।महुआ और उसकी लड़की जा चुकी थी।पद्मा का बदन टूट रहा था।लड़का अपने बिस्तर पर औंधा पड़ा था।उसके सिर की तरफ एक टेबल पंखा सांय-सांय चल रहा था।छत का पंखा खराब हो गया था, इसलिए वह भड़क कर टेबल पंखा खरीद कर लाया था।

पद्मा जानती थी कि वह खाकर सोया है।फिर भी मां के मन ने उसे पुकारा, ‘निक्कू, खाना खा के सो।’

लड़का हिला भी नहीं।यों भी कान के पास पंखे का शोर था।लेकिन उसे नींद नहीं आई थी, यह इससे पता चला था कि पद्मा ने उसको एक पैर से दूसरा पैर खुजलाते देखा।

‘खा लिया है?’

‘मम्मी, ये पूछकर फोर्मालिटी मत करो।तुम जब आओगी, तब तक बैठे रहें? जो मिला, खा लिया है।सोने दो।’

लड़का औंधे पड़े हुए बोला।

पद्मा बाहर निकल गई और जो सामान बाहर पड़ा था, अंदर लाकर उसकी जगह पर रख दी।कल फिर स्टाल लगाते समय निकालेंगे।राम नहा रहा था।रसोई में जाकर पद्मा ने खाना तैयार किया।रोटियां ही गर्म निकालनी थी।दाल और सब्जी दोपहर की बनाई हुई थीं, उन्हें हल्का गर्म करके परोसना था।पद्मा को मालूम था कि अब भी चपलता की जरूरत है, नहीं तो बेटा बक ही रहा है, आदमी भी कुछ न कुछ बकेगा।

महुआ मौसी के आंगन में भी पसरे हुए सन्नाटे को बिनती हुई रात खड़ी थी।पद्मा के घरवाले की नाक बज रही थी।पद्मा ने गर्मी के मारे खिड़कियां खोल रखी थीं, इससे आवाज महुआ के क्वार्टर के अंदर तक आ रही थी।महुआ हल्के से मुस्कराई।पद्मा कितनी बार इन खर्राटों से परेशानी का जिक्र कर चुकी थी।बल्कि शिकायतइतना मुस्टंडा आदमी कैसे खर्राटा लेता है!महुआ हँसती और पद्मा कुढ़ती।

महुआ कहती, ‘माताल!’ माताल सिपाही…

सिपाही मतलब कंपनी का गार्ड।सुरक्षा गार्ड भी खाकी वर्दी-टोपी पहनते थे।चमड़े का वही चौड़ा चॉकलेटी रंग का कमरबंद और इसी रंग के जूते।कंपनी के कई गार्ड बेईमान और भ्रष्ट थे, लेकिन कुछ बेहद ईमानदार और कंपनी के नमक का हक अदा करने के लिए प्रतिबद्ध भी।

पद्मा के आदमी की कोटि कौन-सी थी, यह महुआ तय नहीं कर पाई।अलबत्ता उसने कुछ ऐसा-वैसा नहीं सुना था।उसकी भट्टी पर बहुत तरह के लोग आते थे।और पूरे कस्बे की नब्ज़ गौर करने से पकड़ में आ जाती थी।

महुआ जानती थी कि यह चौड़े माथा वाला गोरा नेपाली बहुत दम वाला है।एक दिन उसने राम लामा से कहा, ‘दाजू, तुमको पैसा नहीं मांगेंगे, एक काम कर दो।’

‘क्या काम?’

‘वो कोयला का बोरा अंदर रखना है।मदद कर दो।’

‘महुआ, मदद का बोलो तो फिर दाम का पैसा क्यों नहीं लेगा तुम? दोनों एक चीज नहीं है।मदद एक तरफ, अपना हक का पैसा एक तरफ।’

महुआ हँसी, ऐसी हँसी जिसे उसके संपर्क में आने वाले चीरने वाली कहते हैं, ‘ठीक है, तुम ठीक बोल रहा है।’

राम लामा ने जेब से बड़ा सा रुमाल निकाल कर माथे पर बांधा।वह दोनों बोरियां एक-एक करके अहाते से उठाकर अंदर रख आया।मजबूत काठी का यह आदमी इसीलिए ‘सिपाही’ की नौकरी में आराम से लग गया, महुआ सोचती।

महुआ ने तैयार बोतल उसकी ओर बढ़ाया।हाथ झाड़कर राम लामा ने बोतल पकड़ा।महुआ ने फिर एक गिलास उठाकर उसकी ओर बढ़ाया, ‘लो।तुम्हारे लिए एकदम खर्रा तैयार किया है।’

वह सामने पुरानी ईंटों की बिठान पर बैठकर पीने लगा।महुआ भुना हुआ नमकीन-चना एक कागज के टुकड़े पर लाकर रख दी।

उसे दारू पीते हुए महुआ तब तक ताकती रही, जब तक दिन की पाली खत्म होने पर मजदूर ग्राहक आ नहीं गए।रोजाने का शोर होने लगा।

महुआ का अपना घरवाला ट्रेन से कट कर मर गया था।क्योंकि उसे वहम हो गया था कि उसकी औरत के कई चाहने वाले हैं और उनमें से कई के साथ इसका संबंध हँसी-मजाक से आगे का है! पास से गुजरने वाली रेलवे लाइन पर उसकी चप्पल की जोड़ी में से एक दुर्घटना के नजदीक और दूसरी कुछ मीटर के फासले पर मिली थी।जिस्म का एक साबुत टुकड़ा मिला था, बाकी सुपर फ़ास्ट ट्रेन के साथ जाने कहां उड़ गया था।न खून, न मांस… पाए गए चिथड़े पर पाए गई कमीज के टुकड़े से पहचान हुई।

गर्मी की दोपहरी थी।पद्मा राम लामा को घर के भीतर बंद करके बाजार गई थी।लड़का नेपाल गया हुआ था।

महुआ ने क्वार्टर के बाहर झाड़ू लगाना शुरू किया था कि देखा खिड़की के खुले पल्लों के बीच सलाखों से हाथ निकाले राम लामा गुहारने लगा है।

‘खोल दो बहिनी, ए बहिनी… बहिनी खोल दो…’

महुआ ने देखा कि दरवाजे पर ताला पड़ा है।उसने उसकी तरफ और नहीं देखा।नजर मिलने पर वह ऐसे ही चीखेगा।पहले भी देख चुकी है।महुआ को सब मालूम है।राम लामा को साल में एक दौरा ऐसा पड़ता था।दारू के लिए पागल होने वाला दौरा।राम लामा को वह हिंदी फिल्म के नायक देवानंद जैसा कहती थी, वो वैसा ही मोहम्मद रफी के गाने गाता था।जब रात को ड्यूटी से लौटता या छुट्टी के दिन बाहर बैठकर साइकिल धोता या कोई काम करता रहता… देवानंद पर फिल्माए गए गाने गाता रहता।वैसा ही बाल बनाता… या हो सकता है कि महुआ को ऐसा लगता हो।हट्टे-कट्टे, अच्छे डील डौल वाले नेपाली पुरुष को देखना उसे अच्छा लगता।वह उसे प्रभावित करता था।वह अन्य स्थानीय मर्दों से उसकी तुलना करती।

‘बहिनी… ए बहिनी… खोल दो… खोल दो ना…!’ राम लामा हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा था।

महुआ मुंह दूसरी तरफ कर अपना काम करने लगी।पद्मा कितनी परेशान होती होगी, जब ऐसे कैद करके बाहर जाती है।महुआ को एक बार राम लामा पर दया आती, दूसरी तरफ पद्मा की जिंदगी को अब तक जैसा समझ चुकी थी, यह जरूरी ही लगा।आदमी पी कर मारता-पिटता नहीं, घर में हुड़दंग नहीं मचाता, लेकिन चार पैसे की कमाई फूंक डालता है।उनके झगड़े की बातें महुआ को सुनाई पड़ती हैं।दारू पीकर, माताल होकर काम छोड़कर इतने-इतने दिन घर में पड़ा रहेगा।पद्मा के मोमो स्टाल की अंगीठी सुलगती न रहती तो पेट की आग कैसे बुझती!

‘बहिनी..!’

महुआ को फिर से राम लामा की कातर आवाज सुनाई दी, लेकिन वह नहीं मुड़ी।ऐसा हर साल होता है।एक बार उसने कुंडी खोल दी थी, पद्मा कितना कुछ बोली थी और सही भी था।तब राम महुआ की भट्टी से नहीं, दूर किसी दूसरी भट्टी में जाकर पीकर पगला गया था।

उमेश पैदल आता दिखाई दिया।उमेश भी उनकी देखा-देखी उसी स्टायल में बाल कंघी करता।वही किनारे वाली मांग।बच्चा बुतरू लोग बड़ा का देखा-देखी करता है! उमेश सहजन के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया।महुआ से डरता है।पद्मा से जितना खुला हुआ है, महुआ मासी से उतना ही झेंपता है।उसे लगता है कि मद बेचे कि मोमो, बेचने वाली औरतें मुंहफट लड़ाका होती हैं।लेकिन महुआ मौसी से पता नहीं क्यों ज्यादा ही डर लगता है।शायद ऐसे कि मोमो का कारोबार बच्चा-बड़ा सबके साथ होता है, लेकिन मदिरा का सिर्फ बड़ों के साथ… नशे में घुत्त मर्दों से उसकी बातचीत का ढंग उमेश के डर का कारण है।

‘ए उमेश, इधर आ तो।’ महुआ ने उसको पुकारा।

उमेश झिझकता हुआ आके पास में खड़ा हुआ।

‘इतनी जल्दी आ गया? मोमो बंद है आज।’ महुआ ने उससे कहा।

‘आंटी नहीं खोलेंगी क्या?’

‘नहीं।एक दो दिन बाद आना।’

उमेश ने खिड़की की तरफ नजर डाली।राम लामा सलाखों में हाथ दिए नंगे बदन खड़ा था।उमेश ने एक बार देखकर फिर उधर नहीं देखा।लेकिन राम उसे देखकर नहीं पुकार रहा था और न ही दरवाजा खोलने की गुहार लगा रहा था।उमेश लौटने लगा।तो उसके कानों में पड़ा…

‘ए बहिनी, खोल दो ना…।’

वह मुड़ा।महुआ की आंखें उससे मिलीं।

पद्मा बाजार का थैला लेकर आती दिखाई दी।झोले में से सब्जियां झूलती हुई दिख रही थीं।वह बेहद थकी थी।पद्मा के हाथ से थैला लेने के लिए कोई नहीं था।महुआ को उस प्यारी सी नेपाली लड़की की याद आई, जो कुछ महीने पद्मा के घर आकर गई थी।पद्मा ने उसे दार्जिलिंग से किसी रिश्तेदार के यहां से आया बताया था।कितना सुंदर और खुला खुला-सा उसका पहनावा था।ठंडी की कड़कड़ाती सर्द रात में मोमो की दुकान समेटने से पहले ही वह घर के सब लोगों को लेकर टैप रिकॉर्डर बजा कर कितना नाचती थी।बढ़िया नाचती थी… ‘हरे रामा, हरे कृष्णा…’ ‘रम्बा हो हो…’ ‘कोई यहां, आहा नाचे नाचे…’ ऐसे गीत पर बेसुध होकर नाचती लड़की।बहुत बार लड़की द्वारा खिंच कर नाच में शामिल की जाती पद्मा और एकाध बार राम लामा भी! राम लामा तब उससे कहता, ‘तुम वो गीत बजाओ…’ और उस गीत पर राम लामा नाचता नहीं, अदाकारी करता था, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया।’

वह लड़की, नाम नयना था, पद्मा की मदद किया करती थी।उन दिनों पद्मा को मोमो का स्टाल लगाना भारी नहीं लगता था।खिलखिलाती हुई वह लड़की उसके हर काम में हाथ बंटाती थी।सब्जी लाती हुई पद्मा के पास भागकर जाती और थैला ले लती।लाड़ से डांटते हुए पद्मा कहती ‘जू-जू, छोड़िदेउ तिमी किन यति धेरै गर्छौ? (छोड़ दो, तुम क्यों इतना करती हो?) लड़की, रहने दो तो।’

पद्मा पास आ गई तो नजर उमेश पर डालकर बोली, ‘एक दो दिन मोमो नहीं मिलेगा।बाद में आना।’

‘आंटी, मोमो लेने नहीं आए हैं।ऐसे ही।’ उमेश अपनी पतली आवाज में बोला।झेंपता हुआ।

पद्मा ने खिड़की पर राम लामा को उस हालत में देखा।उसका चेहरा सख्त हुआ, ‘जू-जू-जू… वहां से हटो।इधर-उधर सब देख रहा है।तमाशा बन कर खड़ा है!’

राम यह डपट सुनते ही अलगनी पर सूखते कपड़े-सा हिला और सरक कर भीतर ओझल हो गया।

महुआ ने भी उमेश को डपट दिया, ‘जाओ न रे।तुमलोग का इधर ही चक्कर काहे लगा रहता है?

उमेश अब लज्जित-सा चला गया।पद्मा झोले को जमीन पर रखकर घर के सामने बैठ गई।

महुआ भी पास बैठकर बोली, ‘हमसे बोल रहा था, खोल दो।’

पद्मा ने उसकी ओर देखा।महुआ सहानुभूति से बोल रही थी।

पद्मा ने उस खिड़की की ओर देखा, जिस पर थोड़ी देर पहले राम खड़ा था।

‘दारू के लिए छटपटा रहा है।तुमको दया आ रहा है तो पिला दो, फिर देखना क्या हाल करता है ये आदमी।’

‘ऐसा काहे बोलती हो पद्मा? हमको क्या समझ में नहीं आता है।रोटी खाने के लिए जो तुमको आता है, वो तुम करती है, जो हमको आता है, वो हम करते हैं।’

पद्मा चुपचाप उठी और घर के अंदर चली गई।

महुआ मुंडा को अपनी भट्टी खोलनी थी।पद्मा लामा की मोमो स्टाल वाली खिड़की अभी कुछ दिन बंद रहेगी।नशे की लत में बौराए घरवाले को जितने दिन संभालने में जाएंगे, उतने दिन…।’

संपर्क : बीडीएसएल महिला महाविद्यालय, राष्ट्रीय राजमार्ग १८ के निकट, घाटशिलापूर्वी सिंहभूम८३२३०३, झारखंड मो.९८५२७१५९२४

(All Images : Bairu Raghuram)