युवा कवयित्री। कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकशित। कविता संग्रह ‘स्त्री के सपनों में धंसा तीर’।

दुख

1.
मौसम की तरह
आते हैं
अदल -बदल कर

जादू की झप्पी से
नहीं बदलते
सुख में

लेकिन
एक उम्मीद में
बदल जाते हैं हम
आधे-अधूरे
कभी-कभी पूरी तरह।

2.
दुख
एक-एक ईंट सा
जमता है धीरे-धीरे
और ठोस दीवार बनकर
ठहर जाता है
हमेशा के लिए

काई जमती जाती है
साल दर साल

वह
अरसे बाद
अपनी सी लगने लगती है।

3.
बारिश में
सीलन की गंध सा
दोपहरी में कोयल की कूक सा
सर्दी की लंबी रात सा है दुख

इसका न होना
खालीपन है

इसके होने से
खनकता है जीवन।

4.
मानो तो
दुख होता है
भरोसेमंद साथी की तरह

खिलखिलाते मासूम
बच्चे सा सहज

रफ्ता-रफ्ता बढ़ती
अल्हड़ जवानी सा हसीन

झुर्रियों के साथ
लौटते बचपन सा है वह
मुझे तो यह
सुख से भी ज्यादा
सुंदर लगता है।

5.
वे
होते हैं अड़ियल
जोंक से चिपके रह जाते हैं

अपने घेरे से
कर देते हैं बाहर
खुशियों को

उसके गाढ़ेपन में
दब जाती है
छोटे-छोटे सुखों की तरलता

पसर जाता है
धुएं सा हमारे आसपास
छोड़ जाता है
अपनी राख

मुझे
दुख के ताले की चाबी
मिली प्रेम में
जिससे मुक्त हो गई
उसकी काली परछाई

और
बचा रहा प्रेम
चारों तरफ।

6.
दुख
हमेशा रहता है
जीवन में
बस कभी-कभी
जताता नहीं है
अपना होना
नमक की तरह।

संपर्क : द्वारा श्री बालमुकुंद जैन, छोटी देवी चौराहा, नगर भवन रोड, टीकमगढ़-472001 (म.प्र.) मो.830584100