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| फ्रांत्स काफ़्का (3 जुलाई 1883 – 3 जून 1924) प्रसिद्ध अस्तित्ववादी जर्मन कथाकार। प्राग के जर्मन भाषी यहूदी परिवार में जन्म। 20वीं सदी के प्रभावशाली अस्तित्ववादी जर्मन लेखक। उनकी रचनाएं आधुनिक समाज में विलगाव को चित्रित करती हैं। 41 वर्ष की उम्र में टीबी रोग से ग्रसित होने के कारण मृत्यु। उनके लेखन को ‘काफ्काएस्क शैली’ के नाम से जाना जाता है। |
शिप्रा चतुर्वेदी 1984 से जर्मन भाषा की शिक्षक। जर्मन साहित्य के कई रचनाकारों का हिंदी में अनुवाद। एक निजी इंस्टीट्यूट में जर्मन भाषा का अध्यापन। मैक्समूलर भवन के केंद्रीय विद्यालय प्रोजेक्ट के लखनऊ क्षेत्र की समन्वयक। |

पिछले दशकों में भूखे रहने वाले पेशेवर कलाकारों में लोगों की रुचि बहुत कम हो गई है। ऐसे आयोजन करने में पहले बहुत फायदा होता था, आज की तारीख में यह बिलकुल असंभव है। वह अलग ही समय था। उन दिनों भूख के कलाकार के साथ पूरा शहर शामिल होता था, उपवास की शुरुआत के बाद हर बीतते दिन के साथ लोगों की संख्या बढ़ती जाती थी। प्रत्येक व्यक्ति भूख के कलाकार को प्रतिदिन कम से कम एक बार तो देखना चाहता ही था। बाद के दिनों में देखने के लिए अग्रिम आरक्षण कराने वाले दर्शक होते थे जो दिन भर जाली वाले छोटे से पिंजरे के सामने बैठे रहते थे। रात में भी लोग आते रहते थे। इसके प्रभाव को बेहतर बनाने के लिए मशाल की रोशनी की व्यवस्था की जाती।
जब दिन साफ होता था तो पिंजरे को खुले में ले जाया जाता और तब खासतौर पर बच्चे होते जिन्हें इस उपवास करते कलाकार को दिखाया जाता। वयस्कों के लिए जहां वह अकसर मनोरंजन मात्र होता था, जिसमें वे फैशन के लिए शामिल होते थे, बच्चों के मुंह अकसर खुले रह जाते थे। वे डर के मारे एक-दूसरे का हाथ थामे, पीले पड़ते गए, खेल-कूद वाली काली लचीली पोशाक पहने, कुर्सी को भी शर्मिंदा कर देने वाले, जबरदस्त रूप से उभरी हुई पसलियों वाले उस व्यक्ति को वे विस्मय से देखते।
वह पूरे में फैले भूसे पर बैठा, लेकिन किसी की भी परवाह किए बिना कभी विनम्रता से झुकता; तनाव से भरा हुआ मुस्कराते हुए प्रश्नों के उत्तर देता, जाली से बांह भी बाहर बढ़ाता ताकि लोग उसके कमजोर होने को महसूस कर सकें। उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण घड़ी, जो उस पिंजरे का एकमात्र फर्नीचर थी, के बजने की परवाह किए बिना, वह होंठों को नम करने के लिए यदा-कदा छोटे से गिलास से पानी के घूंट भरता और लगभग आंखें बंद किए हुए सिर्फ अपने आप में खोया रहता था।
नए दर्शकों के अलावा वहां लगातार जनता द्वारा चुने हुए पहरेदार होते। अजीब बात यह है कि वे अधिकतर कसाई होते, एक समय में हमेशा तीन। दिन-रात उस कलाकार पर निगरानी रखने के लिए कि कहीं वह छिपकर कैसे भी कुछ खा तो नहीं लेता! लेकिन यह एक औपचारिकता थी जो जनता की तसल्ली के लिए की जाती थी, क्योंकि इसका आयोजन करने वाले शायद जानते थे कि उपवासी कलाकार भूखे रहने के दौरान कभी, किसी भी हाल में, किसी भी दबाव में एक कौर भी नहीं खाता। यह उसकी कला की शान में वर्जित था। निस्संदेह, हर पहरेदार यह समझ नहीं सकता था। कभी-कभी रातों में ऐसे पहरेदारों के समूह होते थे जो ढिलाई से निगरानी करते, जान-बूझ कर दूर एक साथ एक कोने में बैठ जाते और ताश खेलने में मशगूल हो जाते। वस्तुतः ऐसा वे भूख के कलाकार को एक छोटे से जलपान का अवसर देने के उद्देश्य से करते थे, जो उनके हिसाब से वह किसी रहस्यात्मक भंडार से ला सकता था। ऐसे पहरेदारों से ज्यादा कष्टकारक कलाकार के लिए कुछ नहीं था। ये उसे हतोत्साहित कर देते थे, उसके भूखे रहने को बेहद कठिन बना देते थे।
कभी-कभी वह अपनी कमजोरी पर काबू कर लेता और निगरानी के दौरान गाने लगता, उन लोगों को यह दिखाने के लिए कि वे उसपर शक करके कितना अन्याय कर रहे हैं। इससे बहुत कम लाभ हुआ, वे उसकी इस प्रतिभा पर आश्चर्य करने लगे कि वह गाते हुए भी खा सकता है। इनसे ज्यादा प्रिय उसके लिए वे पहरेदार थे, जो जाली के पिंजरे के पास बैठते, हॉल में रात की धुंधली रोशनी से संतुष्ट नहीं होते और उन टॉर्चों की रोशनी उसपर डालते थे, जो इंप्रेसारियो ने इस्तेमाल करने के लिए उन्हें दी थीं। आंखों को चौंधिया देने वाली वह रोशनी उसे कतई परेशान नहीं करती थी, वह बिलकुल नहीं सो पाता था लेकिन तेज रौशनी में, हर घंटे, लोगों की भीड़ में, शोर-गुल भरे हॉल में छोटी-मोटी झपकी हमेशा ले ही लेता था।
वह बेहद खुशी से ऐसी निगरानियों के साथ बिना सोए रात बिताने के लिए तैयार था। वह तैयार था उनके साथ मजाक करने के लिए, अपने देशाटन की कहानियां सुनाने के लिए, फिर उनकी कहानियां सुनने के लिए और यह सब सिर्फ उन लोगों को जगाए रखने के लिए, उन्हें बस यह दिखा सकने के लिए था कि उसके पास पिंजरे में कोई खाद्य-सामग्री नहीं है और यह कि वह उपवास कर रहा है जो उनमें से कोई नहीं कर सकता है।
सबसे ज्यादा खुश लेकिन वह तब होता था, जब सुबह होती थी और उन लोगों के लिए उनके खर्चे पर भरपूर नाश्ता परोसा जाता था, जिसपर वे स्वस्थ लोग प्रयासपूर्वक किए गए एक रात के जागरण के बाद भूखों की तरह टूट पड़ते थे। ऐसे भी लोग थे, जो इस नाश्ते को पहरेदारों के लिए अनुचित प्रलोभन के रूप में देखते थे, पर यह ज्यादा हो गया! जब उनसे पूछा गया कि क्या वे बिना नाश्ते के निगरानी करना चाहेंगे, तो वे हिचकते, पर उनके मन में शक फिर भी बना रहता।
निस्संदेह उपवास से यह शक ऐसे जुड़ा हुआ है कि उसे अलग किया ही नहीं जा सकता। कोई भी इस स्थिति में नहीं था कि वह बिना किसी रुकावट के दिन-रात भूख के कलाकार पर निगरानी रख सकता सो अपने अनुभव के आधार पर किसी को नहीं पता था कि क्या वास्तव में बिना रुकावट के भूखे रहा गया था।
सिर्फ भूख का कलाकार स्वयं यह जान सकता था। अतः सिर्फ वही अपनी भूख का पूर्णतया संतुष्ट साक्षी हो सकता था। पर वह किन्हीं और कारणों से कभी संतुष्ट नहीं रहा। शायद भूख की वजह से वह इतना कमजोर नहीं हुआ जितना इस बात को लेकर अपने आप से होने वाले असंतोष के कारण कमजोर हो गया था कि कुछ लोग उसे देखना बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इसलिए ऐसे लोगों को उसके आयोजनों से दूर रहना पड़ता था।
उसके इस अस्थिपंजर शरीर के पीछे उसका अपना असंतोष था क्योंकि कोई और ज्ञानी व्यक्ति नहीं बल्कि अकेला वही जानता था कि भूखा रहना कितना आसान था। यह दुनिया की सबसे आसान चीज थी। वह इस बात पर चुप भी नहीं रहा, पर लोगों ने उसपर विश्वास नहीं किया। बल्कि परिस्थिति के अनुरूप इसे विनम्रता माना। अधिकतर लोगों ने इसे प्रचार का लालच माना या उसे एक धोखेबाज माना, जिसके लिए बेशक भूखे रहना आसान था क्योंकि वह इसे आसान समझता था और जिसमें कुछ हद तक इसे स्वीकार करने की शक्ति भी थी। उसे यह सब बर्दाश्त करना पड़ता था।
बीतते समय के साथ-साथ वह इसका आदी हो गया था, पर अंदर ही अंदर यह असंतोष उसे खाए जा रहा था और उसे लोगों को यह साबित करने की नौबत किसी भी उपवास के बाद कभी नहीं आई कि उसने पिंजरा स्वेच्छा से खाली किया था।
इंप्रेसारिओ ने भूखे रहने का अधिकतम समय चालीस दिन का निश्चित किया हुआ था। उससे ज्यादा वह कभी भूखे नहीं रहने देता, महानगरों में भी नहीं और जाहिर है एक उचित कारण से। अनुभव के आधार पर वह जानता था कि धीरे-धीरे बढ़ते हुए प्रचार की मदद से चालीस दिन तक शहर की रुचि को उकसाया जा सकता है, लेकिन फिर जनता उपेक्षा करने लगती है। लोकप्रियता में कमी ने इसे सिद्ध किया है। जाहिर है अलग-अलग शहरों और देशों में इस प्रतिक्रिया में मामूली फर्क था, पर यह तय था कि चालीस दिन अधिकतम सीमा है।
चालीसवें दिन पिंजरे का फूलों से ढका हुआ दरवाजा खोला जाता। उत्साहित दर्शक एंफीथिएटर में भरे होते, एक आर्मी बैंड धुन बजाता। दो डॉक्टर भूख के कलाकार की सभी आवश्यक जांच के लिए पिंजरे में जाते। एक मेगाफोन द्वारा हॉल में जांच के परिणाम की घोषणा की जाती। अंत में दो जवान लड़कियां आतीं, इस बात पर खुश कि उन्हीं को यह काम सौंपा गया है। वे भूख के कलाकार को पिंजरे से सीढ़ियां उतरने में मदद करतीं, जहां एक छोटी सी मेज पर सावधानीपूर्वक चुना हुआ भोजन परोसा जाता।
इस पल भूख का कलाकार हमेशा प्रतिरोध करता। यद्यपि वह स्वेच्छा से अपनी हड्डीली बाँहें उसकी ओर झुकी हुई लड़कियों के सहायता के लिए बढ़े हुए हाथों में दे देता, पर वह खड़ा नहीं होना चाहता था। सिर्फ चालीस दिनों बाद ही उपवास क्यों तोड़ दिया जाए? वह उसे और लंबा खींच सकता था, असीमित समय तक बर्दाश्त कर सकता था, अभी क्यों रुक जाए जबकि यह उसका सर्वोत्तम, उसका अपना सर्वोत्तम उपवास नहीं था।
लोग क्यों उसे और ज्यादा भूखे रहने से, कालजयी भूख का कलाकार बनने की प्रसिद्धि से वंचित करना चाहते थे? वह शायद वंचित था भी। उपवास की अपनी वर्तमान क्षमता को वह अकल्पनीय रूप से पार कर लेता, क्योंकि उसकी भूखे रहने की क्षमता की कोई सीमा उसे महसूस नहीं होती थी। भीड़ उसकी इतनी प्रशंसा करती थी, पर उसके और अधिक भूखे रहने को लेकर उन लोगों में इतना कम धैर्य क्यों था? जब वह बर्दाश्त कर सकता था तो वे इसे क्यों नहीं बर्दाश्त करना चाहते थे?
वह थका, भूसे पर आराम से बैठ जाता। अब उसे सीधे खड़े होकर खाने के लिए जाना चाहिए, जिसकी कल्पना मात्र से उसे उबकाई आती थी। इस विचार को वह उन दोनों लड़कियों का लिहाज करके बड़ी मुश्किल से दबा लेता था। इतनी नेक लगने वाली पर वास्तविकता में इतनी क्रूर लड़कियों को वह श्रद्धा भरी दृष्टि से देखता और अपनी कमजोर गर्दन पर भारी सिर लुढ़का देता।
पर तब वह होता, जो हमेशा होता था। इंप्रेसारिओ मौन आता, क्योंकि संगीत के शोर में बातचीत असंभव थी। वह भूख के कलाकार के ऊपर अपनी बांहें हिलाता, मानो वह ऊपरवाले को भूसे पर स्थित अपनी कलाकृति, इस दयनीय शहीद को एक बार देखने के लिए आमंत्रित कर रहा हो जो कि बेशक वह भूख का कलाकार था भी, बस एकदम अलग अर्थों में। वह भूखे कलाकार की पतली कमर को पकड़ता, ऐसा करते हुए वह बढ़ा-चढ़ा कर की गई सतर्कता के दिखावे से भूखे कलाकार की कमजोर स्थिति का विश्वास दिलाता, जैसे उसके हाथ में कोई भंगुर वस्तु हो और भय से मौत जैसी पीली हो गई लड़कियों को सौंप देता, लेकिन चुपके से उसे झकझोर देता, जिससे उस भूख के कलाकार की टांगें और शरीर का ऊपरी हिस्सा लड़कियों के बीच में असंयमित रूप से हिलने लगता।
भूख का कलाकार सब कुछ बर्दाश्त करता। सिर छाती पर, ऐसे जैसे वह मुड़ कर वहां टिक गया हो और अजीब सा वहां पड़ा रहता, झुका हुआ शरीर, टांगें आत्म-परिरक्षण की नैसर्गिक प्रवृत्ति के तहत आपस में घुटनों में दबी हुईं, लेकिन जमीन पर कुरेदते हुए, जैसे ये वास्तव में जमीन पर न हो, उसे ढूंढ रही हों। समूचे शरीर का वजन, निस्संदेह बहुत कम, तेज सांसों के साथ सहायता ढूंढ़ती उनमें से एक लड़की पर होता। उसने ऐसे सम्मानित पद की कल्पना नहीं की थी।
सबसे पहले उसने गर्दन को यथासंभव खींचा, कम से कम भूख के कलाकार के स्पर्श से अपने चेहरे को बचाने के लिए, लेकिन फिर, चूंकि वह इसमें सफल नहीं हुई और उसकी सौभाग्यशाली सहयोगी उसकी सहायता के लिए नहीं आई तो खुद को इससे संतुष्ट कर लिया कि कांपती हुई, भूख के कलाकार के हाथ, इस छोटे से हड्डियों के गट्ठर को, अपने सामने लाई, हॉल के हर्षोन्मत्त ठहाकों के बीच रो पड़ी और बड़ी देर से पहले से तैयार खड़े सेवक की मदद से उसे अलग करना पड़ा।
फिर आया भोजन, जिसमें से कुछ इंप्रेसारिओ ने, एक बेहोशी जैसी अवस्था में, अधनींदे भूख के कलाकार के मुंह में, दिलचस्प बातचीत के साथ डाला, जिससे भूख के कलाकार की स्थिति पर से ध्यान हट सके। फिर जनता के साथ मद्यपान की शुभकामना कही गई, जो कथित रूप से भूख के कलाकार द्वारा इंप्रेसारिओ के कान में कही गई थी। ऑर्केस्ट्रा सप्रमाण इसकी पुष्टि कर रहा था। लोग तितर-बितर हो गए, और जिसे भी, देखा गया था, उससे असंतुष्ट होने का अधिकार नहीं था। किसी को नहीं, सिर्फ भूख के कलाकार को, हमेशा उसी को।
इस प्रकार वह कई वर्षों तक छोटे-छोटे अंतराल पर दिखावे की चमक के साथ, दुनिया से इज्जत पाते हुए, लेकिन इन सबके साथ विषादपूर्ण जीवन जीता रहा। वह इस बात से और अधिक विषादग्रस्त होता गया कि किसी में भी उसे गंभीरता से लेने की समझ नहीं थी। आखिर उसे किस चीज से सांत्वना दी जा सकती थी? उसकी क्या कोई इच्छा बाकी रह गई थी? अगर कभी कोई नेकदिल इंसान, जिसे उसकी अवस्था पर दुख होता और उसे यह समझाना चाहता कि शायद भूख उसकी इस उदासी का कारण है तो भूख के कलाकार का गुस्सा फूट पड़ता। वह एक जानवर की तरह पिंजरे की जाली को खड़खड़ाने लगता, जिससे सब डर जाते।
ऐसी स्थिति से निपटने के लिए इंप्रेसारिओ के पास एक दंड था जिसका प्रयोग वह खुशी से करता था। वहां इकट्ठे जनसमूह के सामने वह कलाकार की सफाई पेश करता, स्वीकार करता कि सिर्फ भूख से उपजी वह अनुभूति, चिड़चिड़ापन, भरे पेट लोगों के लिए बिना कोई बतंगड़ बनाए समझने योग्य, माफी योग्य मामला होना चाहिए।
इसी के साथ सफाई देता हुआ कलाकार का वह वक्तव्य भी सामने आता कि वह जितने दिन भूखा था उससे और ज्यादा दिनों तक भूखा रह सकता था। कलाकार की उस क्षमता के लिए इंप्रेसारियो उसकी प्रशंसा करता, शुभेच्छा, बड़ा आत्मत्याग भी निश्चित रूप से इस दावे में शामिल था। लेकिन तभी फोटो दिखाकर वह अपने इस वक्तव्य का विरोधाभास प्रमाणित करता। वे तस्वीरें हाथों-हाथ बिक जाती थीं, क्योंकि तस्वीरों में भूख का कलाकार चालीसवें दिन बिस्तर में, दुर्बलता के कारण लगभग बुझा हुआ दिखता। यद्यपि कलाकार सच्चाई के इस विकृतिकरण से भली-भांति परिचित था, पर अधीर कर देने वाला यह वर्णन हमेशा नए सिरे से उसके लिए बहुत ज्यादा होता था। उपवास को समय से पहले खत्म कर देने का जो परिणाम था उसे कारण की तरह प्रस्तुत किया जाता। इस नासमझी के खिलाफ, पूरी नासमझ दुनिया से लड़ना असंभव था। अब भी वह जालीदार पिंजरे में इंप्रेसारिओ की बात को उत्सुकता से सद्भावपूर्वक सुनता, लेकिन तस्वीरों के सामने आने पर वह हर बार जाली को छोड़ देता, गहरी सांस के साथ भूसे पर गिर जाता और शांत हो चुकी भीड़ फिर से आगे आ कर उसे देख सकती थी।
इस प्रकार के दृश्यों के प्रत्यक्षदर्शी जब कुछ वर्षों बाद इस के बारे में सोचते तो खुद ही भ्रम में पड़ जाते। क्योंकि इस बीच वह निश्चयात्मक मोड़, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया था, सामने आ चुका था, लगभग अचानक ही ऐसा हो गया था। इसके पीछे अवश्य कुछ गूढ़ कारण रहे होंगे, पर उन्हें ढूंढ़ने की किसको पड़ी थी! बहरहाल ज्यादा सम्मान से बिगड़े भूख के कलाकार ने एक दिन देखा कि मनोरंजन के लिए जनता अन्य प्रदर्शनों की ओर बढ़ गई है।
एक बार फिर इंप्रेसारिओ ने उसके साथ आधे यूरोप में दौड़ लगाई, यह देखने के लिए कि पुरानी रुचि कहीं दिख जाए। पर सब व्यर्थ था। एक रहस्यात्मक रजामंदी के तहत भूख के प्रदर्शन के खिलाफ लोगों में अरुचि पैदा हो गई थी। स्वाभाविक है, यह परिवर्तन अचानक नहीं हो सकता था। जब पीछे मुड़कर उन दिनों को याद किया तो पाया कि उसने सफलता की तेजी में कुछ समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया और समाधान का तुरंत उपाय नहीं किया। उसके लिए कुछ करने के हिसाब से काफी देर हो चुकी थी। निश्चय ही यह सच था, इस उपवास प्रदर्शन के लिए फिर से समय आएगा, पर वर्तमान में जी रहे लोगों के लिए यह कोई संतोष की बात नहीं थी।
अब भूख का कलाकार क्या करे? उसे देखकर हजारों लोगों ने तालियां बजाई थीं। वह छोटे-छोटे वार्षिक मेले के शो बूथ में प्रदर्शन नहीं कर सकता था। एक नया पेशा अपनाने के हिसाब से वह भूख का कलाकार न सिर्फ बहुत बड़ा था, बल्कि बड़ी बात यह थी कि उपवास करने की कला के लिए वह कट्टर रूप से समर्पित था। इसलिए वह अपनी बेमिसाल व्यावसायिक प्रगति के साथी इंप्रेसारिओ से अलग हो गया। उसने तुरंत एक बड़े सर्कस से संपर्क किया। वक्त की नजाकत को देखते हुए उसने कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया।
एक बड़ा सर्कस, जहां इंसान, जानवर और यंत्र हर समय एक-दूसरे के साथ संतुलन बैठाते, एक-दूसरे की जगह लेते रहते हैं। वहां हर एक की और हर समय जरूरत बनी रहती है। भूख के कलाकार की भी, बशर्ते उसी के अनुरूप साधारण मांग के साथ। इसके अलावा इस विशेष मामले में वह खुद सिर्फ भूख का कलाकार ही नहीं था जो शामिल था, बल्कि उसका पुराना प्रसिद्ध नाम भी था।
उसकी कला के बारे में बात की जाए तो यह भी नहीं कहा जा सकता था कि बढ़ती हुई उम्र के बावजूद उसमें कोई कमी आ गई थी या एक कलाकार अपनी क्षमता के चरम पर नहीं, अवकाश प्राप्त करने के बाद एक शांत सर्कस में शरण लेना चाहता था, बल्कि ठीक इसके विपरीत भूख के कलाकार ने आश्वासन दिया कि वह अब भी पूर्णरूप से विश्वसनीय है, पहले की ही तरह भूखा रह सकता है। यहां तक कि उसने यह भी कहा कि अगर उसकी इच्छा पर छोड़ दिया जाए तो वह वास्तव में दुनिया को बेशक चकित कर सकता है और इसका बिना किसी शर्त के वचन भी दे दिया गया। निस्संदेह समय के मिजाज के हिसाब से उसकी यह अभिव्यक्ति विशेषज्ञों के होंठों पर बस एक मुस्कान ही ला सकी, जिसे भूख का कलाकार जोश में भूल गया था।
लेकिन उसने वास्तव में सच्ची परिस्थितियों से नजर नहीं हटाई थी। जाहिर है, उसने स्वीकार कर लिया था कि उसे उसके पिंजरे सहित एक मुख्य आकर्षण की तरह भीड़ की जगह पर नहीं बल्कि बाहर एक आसानी से पहुंचने योग्य जगह पर दड़बे के पास रखा जाएगा। रंग-बिरंगी बड़ी लिखावट का लेबल पिंजरे के चारों ओर चिपका हुआ था जिसमें लिखा था कि वहां क्या दर्शनीय है। कार्यक्रम के अंतराल में जब लोग जानवरों को देखने के लिए दड़बे की तरफ धकेलते हुए आगे बढ़ते तो यह लगभग असंभव था कि लोग उस भूख के कलाकार के सामने से न गुजरें और कुछ देर न रुकें।
वे वहां कुछ देर रुकते। शायद वे ज्यादा रुकना पसंद करते, लेकिन उन पतली संकरी गलियों में पीछे से धकेलती भीड़ के कारण, जो अपने इच्छित दड़बे के रास्ते में आने वाली इस रुकावट को समझ नहीं पाती, एक लंबा शांत निरीक्षण असंभव हो जाता। यह भी कारण था कि भूख का कलाकार, दर्शकों से मिलने के समय, जिनकी उस समय सबसे ज्यादा लालसा थी, उनके आते ही थर्रा जाता था।
शुरुआत के दिनों में कार्यक्रमों के बीच अंतराल का इंतजार करना मुश्किल हो जाता था। खुश होकर वह अपनी ओर बढ़ती हुई भीड़ को आशा भरी दृष्टि से देखता, पर तभी उसे जल्दी ही इस बात का विश्वास हो जाता कि सबसे हठीली, लगभग जान बूझ कर की गई आत्म-प्रवंचना भी इस अनुभव के सामने टिक नहीं पाती, भीड़ के इस इरादे को समझते हुए इस बात पर यकीन करना कि अधिकतर, बार-बार, शोर मचाते हुए ये लोग दड़बे को जाने वाले थे।
यह दृश्य दूर से अब भी सबसे सुंदर था। क्योंकि जब तक वे उसके पास तक आते, उसे लगातार भागते हुए लोगों की भीड़ का शोर सुनाई देता, एक तो वह जो इस भूख के कलाकार को ध्यान से देखना चाहता था, कोई समझ के साथ नहीं बल्कि एक झक और छेड़छाड़ की दृष्टि से, उसके लिए ये लोग जल्दी ही कष्टकारक हो जाते, और दूसरी भीड़ जो सिर्फ सीधे जानवरों के दड़बे की ओर बढ़ जाना चाहती थी। यह बड़ा झुंड गुजर पाता तब तक देर में आने वाले आ जाते।
बेशक इन्हें खड़े रहने की मनाही नहीं थी, लेकिन ये जल्दी बड़े-बड़े कदमों से जानवरों के पास सही समय से पहुंच पाने के लिए लगभग कनखियों से भी देखे बिना आगे बढ़ जाते थे। ऐसा सौभाग्य बहुत कम होता कि एक पिता अपने बच्चों के साथ आता, भूख के कलाकार की ओर उंगली से इशारा करता, सब कुछ अच्छी तरह से समझाता कि इन सबका क्या अभिप्राय है, पिछले सालों के बारे में बताता; जब वह ऐसे ही शानदार प्रदर्शनों में होते जिनकी इससे तुलना नहीं की जा सकती और फिर बच्चे, नासमझ से खड़े रहते। क्योंकि उनके लिए भूख क्या थी, इस विषय पर स्कूल और जीवन शैली द्वारा प्रदत्त उनकी समझ नाकाफी थी।
पर उनकी खोजी निगाहों की चमक में कुछ नया, आगामी, बेहतर समय छिपा हुआ था। भूख का कलाकार कभी-कभी अपने आप से कहता, शायद सब कुछ बेहतर होता, अगर उसका स्टैंड दड़बे के इतनी नजदीक नहीं होता। उससे लोगों के पास उसके बारे में इस विषय पर बात न करने के चयन की सुविधा होती कि उसे दड़बों की गंध, रात में जानवरों का शोर, मांसाहारी पशुओं के लिए कच्चे मांस के टुकड़ों का ले जाया जाना, खिलाते समय चिल्लाहट, यह सब बहुत आहत करता था, लगातार मानसिक कष्ट देता था। पर इस मांग के साथ निर्देशक से मिलने जाने की कभी हिम्मत नहीं हुई।
फिर भी वह जानवरों का शुक्रगुजार था उन दर्शकों के लिए, जिनमें से कभी कोई तो उसके लिए भी होता और कौन जाने वे उसे कहां डाल देते, अगर वह उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में याद दिलाता और सच देखा जाए तो वह दड़बों में जाने वाले रास्ते में एक रुकावट तो था ही।
एक छोटी-सी अड़चन बहरहाल सदा छोटी होती जाती अड़चन थी। इंसान इस निरालेपन का आदी हो गया। आज के समय में एक भूख के कलाकार के ध्यान आकर्षित करने की इच्छा का, और इस अभ्यस्तता के तहत उसके बारे में यह निर्णय हो गया। वह इतना ज्यादा भूखा रहना चाहता था, जितना वह रह सकता था और उसने यह किया भी पर कुछ फायदा नहीं हुआ। लोग उसके पास से गुजर जाते। चेष्टा करो, किसी को भूख की कला समझाने की! पर जो इसे महसूस नहीं करता, उसे समझाया भी नहीं जा सकता।
सुंदर लिखावट गंदी और धुंधली हो गईं, उनसे पढ़ा नहीं जा सकता था। उसे फाड़ दिया गया था। किसी का इस बात पर ध्यान नहीं गया कि उसे बदल दिया जाए, वह बोर्ड जिस पर बीत गए भूखे दिनों की संख्या लिखी होती थी, शुरू में बड़े ध्यान से रोज बदली जाती थी, पर कई दिनों से वही थी, क्योंकि शुरू के कुछ सप्ताह के बाद इस छोटे काम से कर्मचारी तंग आ चुका था।
यद्यपि भूख का कलाकार लगातार भूखा रह रहा था, जैसा कि उसने पहले सपना देखा था और बिना किसी प्रयास के उसके लिए यह संभव हो सका जैसा उसने तब पहले से ही कहा था, पर वहां कोई भी व्यक्ति दिन नहीं गिन रहा था, यहां तक कि भूख के कलाकार को भी यह नहीं पता था कि उसका प्रदर्शन कितना बड़ा था और वह दुखी हो गया।
एक बार जब उधर से गुजरता हुआ व्यक्ति वहां ठिठक गया, पुरानी संख्या का मजाक उड़ाया और इसे धोखा बताया, तो यह इतनी बेवकूफी भरा झूठ था जो मन में उदासीनता और विद्वेष भरने वाला था, जबकि भूख के कलाकार ने फरेब नहीं किया था, उसने तो ईमानदारी से काम किया था, लेकिन दुनिया ने उसके पुरस्कार को लेकर फरेब किया था।
फिर कई दिन बीत गए और इसका भी अंत हुआ। एक बार पिंजरे के निरीक्षक का इसपर ध्यान गया। उसने नौकर से पूछा कि इतने अच्छे पिंजरे को यहां सड़े हुए भूसे से भरकर बिना किसी उपयोग के क्यों डाल रखा है। किसी को यह नहीं पता था, जब तक कि किसी ने संख्या लिखे जाने वाले बोर्ड की तरफ इशारा किया। ‘क्या तुम अब भी भूखे हो?’ निरीक्षक ने पूछा।
‘आखिर तुम कब इसे समाप्त करोगे?’
भूख का कलाकार फुसफुसाया, ‘सब लोग मुझे क्षमा करें’। सिर्फ निरीक्षक जो जाली से कान सटाए था, उसे समझ सका। ‘जरूर’, निरीक्षक ने कहा और उंगली माथे पर लगाई, ताकि भूख के कलाकार की स्थिति औरों को बता सके, ‘हम तुम्हें माफ करते हैं।’ बिना रुके हुए कलाकार बोला, ‘मैं चाहता था, कि तुम लोग मेरे भूखे रहने की प्रशंसा करो।’
‘हम प्रशंसा करते भी हैं’, अहसान जताते हुए बोला।
‘पर तुम लोगों को इसकी प्रशंसा नहीं करनी चाहिए’, भूख का कलाकार बोला।
‘तो अब हम इसकी प्रशंसा नहीं करते हैं’, निरीक्षक बोला।
‘लेकिन हमें प्रशंसा क्यों नहीं करनी चाहिए?’
भूख का कलाकार बोला, ‘क्योंकि मुझे भूखा रहना पड़ा था, मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था।’
निरीक्षक बोला, ‘कैसे इंसान हो, तुम्हारे पास कोई विकल्प क्यों नहीं था?’
भूख का कलाकार होंठों को चुंबन लेने की मुद्रा में लाकर निरीक्षक के कान में बोला ताकि कोई शब्द छूट न जाए, ‘क्योंकि मैं, क्योंकि मुझे वैसा खाना नहीं मिला, जो मुझे अच्छा लगता था। अगर मुझे वह मिलता, तो मेरा विश्वास करो, मैं कोई झमेला नहीं करता और तुम्हारी और बाकी सबकी तरह जी भरकर खाता।’ ये उसके अंतिम शब्द थे पर उसकी निराश आंखों में दृढ़ भाव था, भले ही गर्व भरा आश्वासन नहीं, कि वह आगे भी भूखा रहेगा।
‘अब लेकिन सब साफ़ करो!’ निरीक्षक बोला।
भूख के कलाकार को मय भूसे के दफना दिया गया। उस पिंजरे में एक जवान पैंथर लाया गया। लंबे समय से उस नीरस पिंजरे में पैंथर के उछल-कूद करते देखने का दृश्य किसी भी उदासीन से उदासीन व्यक्ति का मनोरंजन कर सकता था।
किसी चीज़ की कमी नहीं थी। खाना जो उसे पसंद था, बिना ज्यादा सोचे-विचारे गार्ड ले आते, कभी ऐसा भी नहीं लगा कि उसे स्वतंत्रता की कमी अखरती है। किसी को भी चीर सकने लायक क्षमता से परिपूर्ण इस बलिष्ठ जंतु का शरीर, लगता था स्वतंत्रता भी अपने साथ लिए घूम रहा है, जो मानो उसकी दंतावली (हँसी) में छिपी थी। जीवन की खुशी उसके हलक में लाल अंगारे जैसी ऐसे चमकती कि दर्शकों के लिए उसे झेलना आसान नहीं था। लेकिन वे अपने आप पर काबू पाते, पिंजरे के चारों ओर जमा होते और उन्हें आगे बढ़ने की इच्छा ही नहीं होती!
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