
वरिष्ठ कवि और गीतकार। अद्यतन नवगीत संग्रह ‘एक मुट्ठी भात’।
गांव को हम जानते तबसे
गांव को हम जानते तबसे
जबसे वह पगडंडियों का
पेट-पीढ़ा-पैर होता था
कुएं का पानी फसल को
जल चढ़ाता था
सूर्य भागड़-फ्रेम में
फोटो मढ़ाता था
बाप बेटी को नहीं
पहले पढ़ाता था
गांव को हम जानते तबसे
जबसे वह पगडंडियों का
स्वत्व-हिस्सा-सैर होता था
खेत कुर्ता घाम का हर
दिन पहनता था
गाय-बछरू-आदमी
का मन मचलता था
आपसी संबंध का
आंगन धमकता था
गांव को हम जानते तबसे
जबसे वह पगडंडियों का
देव-मंदिर-खैर होता था
नित सबेरे खबर देकर
काग जाते थे
एक घर से दूसरे घर
राग जाते थे
भूख का चूल्हा जलाने
साग जाते थे
गांव को हम जानते तबसे
जबसे वह पगडंडियों का
मित्र-अपना-गैर होता था।
संपर्क :‘शिवाभा’,14 विवेकानंद कालोनी, भगवानपुर–लंका, भगवानपुर, वाराणसी–221005 (उ.प्र) मो. 9412212255

