
कवि तथा कहानीकार। एक कविता संग्रह ‘यहां से इस तरह’ और एक कहानी संग्रह ‘पीली पर्ची’ प्रकाशित। जैव विविधता विषय पर एक पुस्तक।

कजरी आज देर से सोकर उठी। फर्श, बिस्तर, सब गंदे हो गए थे, देर रात तक वह सफाई करती रही, सड़ी-सी महक जा ही नहीं रही थी। क्या कर सकती थी, पति परमेश्वर उर्फ परमू कहीं से पी-खाकर आए, आते ही उल्टी करने लगे थे।
कोठरी से बाहर आई तो आंगन में बैठी हुई सासू मां की घूरती आंखों से सामना हुआ। उसने पलकें झुकाईं, माथे का पल्लू सुहराया और रसोई की ओर सरक ली। चौखट लांघते ही गौरी चाची पर नजर गई, वह आकर काम में जुट गई थी। उसने खिड़की खोली तो ताजा पुरवा का झोंका आया, वह सिहरकर बाहर ही देखने लगी। सब्जियों की क्यारी में पानी चल रहा था और वहीं कहीं से खरहरा लगाने की आवाज आ रही थी।
सहदेव के घर में कल उसके पोते का ब्याह था, आज सुबह-सुबह कौन खरहरा लगा रहा होगा? कहीं ससुर जी तो नहीं जुत गए? उन्हें ही सफाई की बीमारी है।
और कोई नहीं कर सकता तो वह खुद करेगी, ससुर जी से खरहरा छीन लेगी सोचते हुए वह बाहर आई। दालान में ससुर जी बैठे अखबार पढ़ रहे थे। अपना कुतूहल न रोक पाई, पूछ लिया, ‘बाबूजी, सहदेव आ गया क्या?’
‘हां बहू, वह तो मुंह-अंधेरे ही आ गया आज।’
दरवाजे की ओट में खड़ी वह देखती रह गई। गायें नाद पर लग गई थीं, गोबर उठा लिया गया था, नीम के पेड़ के नीचे कुर्सियां रख दी गई थीं, ससुर जी यानी शिवनाथ सिंह की मारुति कार भी धुली-पुछी खड़ी थी। बाहर गेट तक सहन बुहारा जा चुका था।
बायोगैस प्लांट के पीछे झमड़े पर चढ़ी हुई करेले की सूखी लतर के बीच में सहदेव के सिर पर लिपटा गमछा हिलता-डुलता दिखाई दिया। वह वापस रसोई में चली आई और गौरी को चाय चढ़ाने के लिए कहकर वहीं खड़ी-खड़ी सोचती रही, पोते की बारात सुबह लौटी होगी, दुल्हन उतरी होगी, घर में उसके मेहमान भी होंगे, सहदेव आज आ कैसे गया? क्यों? गौरी के लड़के गणेश को आने के लिए कहा गया था, वह सबकुछ संभाल लेता है, फिर सहदेव क्यों आ गया?
वह आंगन में आई तो उछलते-कूदते आते देवर ईश्वर उर्फ ईसू बाबू सामने पड़ गए।
‘अम्मा, हमारे लिए आलू-पराठा बनवा दो!’
उनके पीछे-पीछे दूध की बाल्टी लिए हुए गणेश भी आ गया।
कजरी इस पूरे द़ृश्य से कटी हुई-सी अपनी कोठरी में चली गई।
सहदेव के लिए रोटी और चाय लेकर गौरी बाहर आई, चच्चा-चच्चा आवाज देती रही, वह कहीं निकल गया था। धनिया और मुनिया के आने के साथ आंगन में अनाज कूटने, फटकने, बीनने के काम नेवध दिए गए, सासू मां कुर्सी डालकर निगरानी करने बैठ गईं और दिन की गतिविधियां अपनी गति से चलने लगीं। दोपहर में वह उसकी थाली में डालने के लिए दाल, भात, रोटी और मिर्च का भरवां अचार लेकर आई। सहदेव इस समय अपनी थाली लेकर खड़ा रहता था। आज वह नाद के पास अधलेटा पड़ा था। चच्चा-चच्चा सुनकर थाली लेकर आया और परोसी गई थाली लिए हुए वापस नाद पर चला गया। गौरी के पीछे-पीछे कजरी भी आ गई थी, वह उसे थाली लेकर जाते हुए देखती रही। रोज की तरह आज उसने दालान का कोना नहीं पकड़ा, जहां वह दीवार की ओर मुंह करके चुक्का-मुक्का बैठकर निवाले लेना शुरू करता था और थोड़ी देर बाद आराम से पालथी मार कर खाना खतम करता था।
दिन में जब भी गौरी उसे बुलाने गई, या तो वह नाद पर अधलेटा-बैठा था, या कहीं और चला गया था। कजरी को अचार-खटाई के लिए कच्चा आम मंगवाना था, मगर गौरी ने जो उससे कहा, वह जैसे सुन ही नहीं सका या सुनकर समझ नहीं पाया। बिना कुछ जवाब दिए एकटक गौरी का मुंह ताकता रहा। गौरी डरकर भीतर चली गई।
सांझ बेला परमू धड़धड़ाते हुए आए और मोटरसाइकिल खड़़ी करके बाहर से ही सहदेव को आवाज लगाते हुए आंगन तक आ गए। इतना तो कभी नहीं चिल्लाना पड़ा किसी को उसे बुलाने के लिए। घर के हरेक सदस्य का कोई न कोई काम आज रह गया था, सहदेव के इस तरह चुपचाप गायब हो जाने से।
रात में गणेश बाहर का गेट बंद करके लौटने वाला था, टार्च की रोशनी में उसे खंभे से पीठ टिकाए अधलेटा सहदेव दिख गया। सांप-बिच्छू का भी डर नहीं? चौंककर उसने उसके चेहरे पर टार्च की चौंधियाती रोशनी फेंकी। सहदेव की देह में कोई हरकत न पाकर वह भागता हुआ भीतर आया।
घर में कोहराम मच गया। परमू पूछ रहे थे, दोपहर में उसे खाना किसने दिया था, सांझ के समय वह कहां चला गया था। शिवनाथ सिंह गांव के प्रधान रह चुके थे, उनकी अपनी परेशानियां थीं, भविष्य में एमएलए बनने का सपना मन में पाले हुए थे। ईसू बाबू खाना खाकर अपनी कोठरी में घुसे गाना-वाना सुन रहे थे, उन्हें दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं। कजरी की सासू मां सुबकने लगी थीं, क्या मालूम परिवार के सामने कौन-सी विपदा आन पड़े, बिना हारी-बीमारी घर का नौकर दरवाजे पर मर गया।
सहदेव की देह को बिना हाथ लगाए, बिना हिलाए-डुलाए या ध्यान से देखे ही सभी ने मान लिया कि वह मर गया है। मर गया तो क्या कर सकते हैं, सुबह देखेंगे, जो करना होगा, सुबह करेंगे।
घर के सभी लोग सोने की तैयारी करने लगे लेकिन कजरी की आंखों की नींद गायब थी। वह भागकर पति परमू से कुछ कहती, देवर ईसू बाबू को झंझोड़ती कि बाहर निकलकर एकबार देख तो आओ, फिर सासू मां की चिंता में कही गई बात में अपनी आशंका जोड़ देती। अपने लाडले के पास लेटकर उसे सहलाती रही, वह भी गहरी नींद में था। उठकर वह अपनी कोठरी में लगी मेज पर रखी किताबों के पन्ने उलटने लगी। पिछली बार मायके से लौटते समय अपनी कुछ किताबें उठा लाई थी, पढ़ने का समय नहीं मिला था, उन्हीं के पन्ने उलटती रही।
जब बाहर से लगातार कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगीं, तब ससुर जी हरकत में आए। घर के दरवाजे पर नीची जाति के एक नौकर के अकस्मात मर जाने का मामला था। न कोई बीमारी, न दुर्घटना। लिहाजा बाहर जाकर देखना पड़ा। सचमुच ही सहदेव की सांसें थम चुकी थीं। पुलिस को खबर दी गई, एंबुलेंस बुलाया गया। शिवनाथ सिंह ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, खरचे की कोई चिंता नहीं की, अस्पताल से दिल के दौरे के कारण मौत होना लिखवा कर आश्वस्त हुए और घर लौट आए। जब लौटे तो सुबह हो चुकी थी, गणेश गायों की सेवा में लगा हुआ था और भीतर गौरी काम पर आ चुकी थी। रतजगा के कारण परमू सोने चले गए मगर वह नहा-धोकर, अखबार लेकर दालान में चाय पीने के लिए बैठ गए। कजरी ने एक प्लेट में दो पेड़े, चने का भूजा और हरी चटनी लाकर उनके सामने रख दी।
एक दिन पहले जिस सहदेव के पोते का ब्याह था, अगले दिन उसके घर से उसकी अर्थी उठ रही थी। जिस घर में उसने पूरी जिंदगी सेवा करते हुए निकाल दी थी, उस घर का कोई सदस्य न दुख प्रकट करने आया, न कंधा देने। नीची जाति के आदमी की मौत हुई थी, नीची जाति के लोग ही अर्थी उठाने आए थे।
शिवनाथ सिंह दालान में बैठे चैन से चाय की चुस्की लेते हुए अखबार पढ़ रहे थे। कुछ लोगों की बातें करने की आवाज उन्हें सुनाई पड़ी। सहदेव था तो वह आकर खबर दे देता था कि कौन लोग आए हैं। चाय की आखिरी चुस्की तक में अखबार के पन्ने जल्दी-जल्दी पलटकर वह बाहर आए। नीम के नीचे पुजारी जी, सहकारी संघ के बाबू साहब और तहसील के वकील साहब खड़े बातें कर रहे थे। गणेश को आवाज देकर उन्होंने कुर्सियां मंगवाईं और उन्हें बैठाकर गांव का हाल-चाल लेने लगे। आधा-पौन घंटा बतियाकर वे जाने को हुए तो वह अटकल लगाने लगे, जो भी बातें हुईं, उनमें कौन सी खास बात थी जिसके लिए ये लोग इधर आए थे? उन्हें उनकी बातों में कोई मकसद नहीं दिखा तो ‘हुंह’ करते हुए दालान में आकर अखबार उठा लिए। अचानक उनकी नजर भीतरी पन्ने पर छपी अपने गांव की खबर पर पड़ी। खबर पढ़ते ही वह उठे और परमू और ईसू बाबू को आवाज लगाते हुए भीतर आंगन में आए। आंगन में उन्हें पत्नी और पतोहू उनके पोते को बुकुआ-मालिस करती, नहलाती-धुलाती दिखीं। पोता भी अब तीन साल का समझदार बच्चा था, सिर उठाकर उनकी ओर देखने लगा। पत्नी ने उनके ही जितने ऊंचे स्वर में चिल्लाकर पूछा, ‘अब कौन मर गया? क्यों इतना चिल्ला रहे हैं?’
‘कहां हैं ये दोनों? कब तक सोते रहेंगे? ये देखो, अखबार में क्या छपा है।’
कजरी और उसकी सासू मां, दोनों सकपकाकर उनका चेहरा देखने लगीं। कजरी ने एक मोढ़ा उनकी ओर बढ़ाकर कहा, ‘आप पहले बैठ जाइए, बाबूजी! मैं बुलाती हूँ इनको।’
दोनों पुत्र उठकर आ गए। थोड़ी ही देर में आंगन में तनाव छा गया। गौरी रसोई से बाहर आती, फिर भाग कर रसोई में चली जाती। पहले बातें जोर-जोर से होती रहीं, फिर धीरे-धीरे खुसुर-पुसुर में बदलती गईं। खबर छपी थी कि बीते सप्ताह मुंडेरवा गांव के दलित की बारात में दूल्हा घोड़े पर सवार था, जिसे गांव के एक भूतपूर्व प्रधान के बेटे ने गुंडों के साथ मिलकर पीटा और घोड़े से उतार दिया। इस बेइज्जती से दुखी होकर दूल्हे के दादाजी, सहदेव सदमे में आ गए और दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। घटना की रिपोर्ट बांसडीह थाने में लिखवा दी गई है और पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है।
ससुर जी ने सामने बैठे दोनों बेटों की ओर हाथ उठाया और पूछा, ‘अब तुम लोग बताओगे, क्या मामला है? तुममें से तो कोई नहीं है शामिल इसमें?’ उनके बेटों में सबसे बड़े थे सर्वेश्वर उर्फ संवरू, जो वकालत की डिगरी लेकर हाई कोर्ट में वकील हो गए थे। पढ़ाई में वह गंभीर रहे, अपने बलबूते हाई कोर्ट पहुंचे थे, कभी-कभी ही गांव आते थे और घर-परिवार के मामलों से कटे-कटे रहते थे। परमू बीए की पढ़ाई अधूरी छोड़ कर पंचायत सचिव लग गए थे। एक ईसू बाबू ही थे जिनका पढ़ाई में कम और खेत-बगीचे, गाड़ी-गाड़ा और लट्ठबाजी में अधिक मन लगता था। पढ़ाई तो अब छूट चुकी थी, दुनिया भर के दूसरे काम के लिए हाजिर रहते थे। इन दोनों भाइयों में पटती बहुत थी और उन्हें शक था कि इन दोनों ने ही कुछ उल्टा-पुल्टा किया होगा।
दोनों ही नजर नीची किए देखते रहे। आंगन में मसान-सी चुप्पी छाई रही। ससुर जी को फिर चिल्लाना पड़ा, ‘कुछ बोलोगे तुम लोग? जवाब दोगे?’
परमू ने ईसू बाबू की ओर इशारा किया। अब ईसू बाबू को बोलना पड़ा। उन्होंने कहना शुरू किया, ‘जैसे वह वहां गए तो थे, अपने दोस्तों के साथ, सहदेव के पोते वरुण को घोड़े से उतार दिया था, लेकिन इसमें जुर्म कहां हुआ?’
कजरी आश्चर्य से ईसू बाबू का मुंह ताकने लगी- ‘बाबू, तुमने दूल्हा बने हुए वरुण को घोड़े से उतारा, वह भी बारात रोक कर। जुर्म तो वाकई तुमने नहीं किया, बाबू!’ अगले क्षण ससुर जी खड़े हुए और उसे थप्पड़ पर थप्पड़ जड़ने लगे। ये भूतपूर्व प्रधान के थप्पड़ थे, नतीजा ईसू बाबू गश खाकर नीचे गिर पड़े। सासू मां बीच-बचाव करने के लिए उठीं और उन्हें टोका, ‘अब जो हुआ सो हुआ, पहले पूरी बात तो समझिए!’
परमू ने बीच में कुछ जोड़ा तो वे उस पर भी बिफर पड़े, ‘तो तुम्हें पता था, इसने क्या किया था? सहदेव मर गया जानकर भी तुमने मुझे कुछ नहीं बताया?’ वह उसे भी थप्पड़ रसीद करने वाले थे लेकिन रुक गए। एक बच्चे का बाप हो गया है यह, बीवी भी सामने बैठी है।
सासू मां ने ईसू बाबू को पुचकार कर पूरा घटनाक्रम सुनाने को कहा, जिससे बाबूजी उसे पुलिस केस से बचाकर निकाल सकें। गाल और बांहें सहलाते हुए ईसू बाबू ने पूरा घटनाक्रम सुनाया। बांसडीह के उनके दोस्त दुर्गेश त्रिपाठी ने गांव के गया अहीर का बारात के लिए सजा घोड़ा जाते हुए देखकर पूछा कि किस गांव की बारात है तो गया अहीर ने बता दिया, मुंडेरवा के भोला चमार के लड़के की बारात निकलनी है। यह बात उसने अपने साथियों को बताई तो वे कहने लगे, तुम्हारे गांव का घोड़ा है, वही सबकी बारात में जाता है, कल को तुम्हारा ब्याह होगा तो तुम भी उसी घोड़े पर चढ़ोगे, जिसपर चढ़कर चमार की बारात निकली! दुर्गेश ईसू बाबू के क्लासफेलो रह चुके थे दसवीं में, ईसू बाबू दसवीं में ही अटके-अटके स्कूल जाना बंद कर दिए जबकि दुर्गेश बाबू बारहवीं में पहुंचकर अभी अटके हुए थे। दोनों ही लट्ठबाज थे, उनकी दोस्ती बरकरार थी और ईसू बाबू परमू की हीरो मोटरसाइकिल लेकर दुर्गेश की बुलेट के साथ रेस लगाया करते थे, कभी-कभार हाईवे पर भी स्टंटबाजी करने निकल जाते थे।
मोटरसाइकिल वाला एक और दोस्त मिल गया और कुल सात-आठ जने मिलकर बारात निकलते ही उसके आगे-पीछे चलने लगे। जब बारात के लोग सहम गए तब उन्होंने बारात रोक कर दूल्हे वरुण को घोड़े से उतर जाने को कहा। अब यह तो उनका लड़कपना था, इसमें कोई ऐसा बड़ा जुर्म तो नहीं हो गया, यह कहना था ईसू बाबू और परमू का।
कजरी का मन हुआ, जलती हुई लकड़ी उठाकर लाए और देवर जी के मुंह पर मार दे, लेकिन उसके बाबूजी उसे समझाते रहते थे कि बेटी, संयम रखना, तुम ज्यादा ही न्यायप्रिय हो पर यह ध्यान में रखना, तुम मंच पर किसी नाटक में अभिनय करने के लिए नहीं खड़ी हो, तुम अपनी ससुराल में हो। उसके ससुर जी गहन विचार में डूब गए और अब क्या कैसे करना है, इस जुगत में लग गए।
उन्होंने सबसे पहले सहदेव के पुत्र भोला से बात करने का फैसला किया। भोला सचमुच भोला था, उनके एक बुलावे पर हाजिर हो गया। बताने लगा कि वह इतने जानता था कि उसके बेटे वरुण का नाम ऊंची जाति वाले लड़कों को खटकता है, क्या पता इसी वजह से ये लोग उस दिन पीछे पड़ गए। उसके भाई और चचेजात भाई, मंगल, सोनू और भगेलू बुलाने पर इन लड़कों के दरवाजे पर छोटे-मोटे काम के लिए अक्सर जाते थे, सभी एक दूसरे को पहचानते थे। वे लड़कों के सामने गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उन पर कोई असर नहीं हुआ। दद्दा यानी सहदेव अपना मुंह बंद किए चुपचाप खड़ा रहा, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उसके बाल-बच्चों का क्या कसूर है, सिवाय इसके कि वे नीची जाति के हैं, मेहनत-मजदूरी करते हैं और गरीब हैं मगर इतने भी नहीं कि भुखमरी हो उनके घरों में। दूल्हा वरुण अपने स्कूल में पढ़ाई में अव्वल आता था और लड़कों की बास्केट बाल की ब्लॉक लेवल की टीम का कप्तान था। उसने घोड़े से उतरने से साफ मना कर दिया।
उसके बाद सहदेव छटपटाकर अपना माथा पीटने लगा जब उसने देखा कि उसके पोते वरुण को घोड़े से उतारकर सात-आठ लड़के उसकी पिटाई कर रहे हैं। जब तक भोला, मंगल, सोनू आदि बीच-बचाव करने के लिए बढ़ते, आतताई लड़के मोटरसाइकिलें दनदनाते वहां से भाग निकले। उसके बाद दूल्हा वरुण घोड़े पर सवार नहीं हुआ, घोड़े के आगे-आगे पैदल चलता रहा। थाने में रिपोर्ट लिखवाने के सवाल पर जरूर भोला एकदम से गूंगा बन गया, हाथ जोड़ता रहा, पैर पड़ता रहा।
क्या संवरू को बुलाया जाए? मगर मामला लोकल है, वो क्या करेगा? पुजारी जी और वकील साहब सुबह-सुबह आए थे, उनसे कुछ पूछा जाए? लेकिन क्या पता वे यहां कोई खुफियागिरी ही करने आए रहे हों, उनसे उम्मीद रखना बेकार होगा। बांसडीह के थानेदार से तहसील के एक प्रोग्राम में भेंट-मुलाकात हुई थी मगर उन्हें लगा, जैसे आतंकवादी, हत्या आदि से जुड़े मामलों में पुलिस वाले किसी की सिफारिश नहीं सुनते, वैसे ही इसमें भी न सुनेंगे। इसलिए सीधे थानेदार के पास जाने का कोई मतलब न होगा।
उन्हें गनपत अहीर का ध्यान आया, उसका बेटा राजकिशोर कॉन्स्टेबल था, बांसडीह थाने में रह चुका था। गनपत से उनका पुराना संबंध था, गायों के इलाज के बारे में उसे अच्छी जानकारी थी, उसका दूध का अच्छा धंधा चलता था, घर में दूध-घी अधिक निकलने पर वही खरीद ले जाता था, बातचीत में सलीकेदार था। उसे घर पर बुलाने से बेहतर उन्हें लगा कि उसी के दरवाजे पर चले जाएं। बांसडीह थाने वालों से राजकिशोर के संबंध का फायदा मिल सकता है, यह उनकी घर की बात हो जाएगी।
इधर-उधर दौड़-धूप करके जब ससुर जी घर वापस आए तो कजरी ने महसूस किया, वे पस्त हो गए हैं। आंगन में पहुंचकर वहां पड़ी चारपाई पर वह लेटने को थे कि कजरी ने लपककर एक चादर बिछा दी। वह निढाल लेट गए और खाना परोसने के लिए कहा। कजरी उन्हें खाना परोसती रही और सासू मां पंखा झलती रहीं। सुबह से उन्होंने कुछ नहीं खाया था। दो-चार निवाला पेट में गया तब उनकी बोली निकली। कहने लगे, राजकिशोर का कहना है कि किसी तरह गिरफ्तारी से बचें, एक बार गिरफ्तार हो गए तो बचना मुश्किल होगा। यह एससी-एसटी कानून बड़ा सख्त है। इस बीच वह कोशिश करेगा कि शिकायत से उसका नाम हट जाए। सासू मां ने राहत की सांस ली मगर कजरी को यह चालबाजी नागवार गुजरी।
मुद्दा यह था कि गिरफ्तारी से कैसे बचें। घर में रहना खतरे से खाली न था। कजरी ने कहा, ‘अच्छा होगा ईसू बाबू गौरी चाची के घर में छिप जाएं। वह खाना-पीना भी लेती जाएगी, और किसी को शक भी नहीं होगा।’ उसे ध्यान आया कि आज गौरी को चाची कहने पर किसी ने एतराज नहीं किया। सबके सामने वह गौरी को कुछ नहीं कहती थी, अकेले में ही गौरी चाची कहा करती थी।
बात जम गई। गणेश ईसू बाबू के लिए बिस्तर, पानी का जग आदि लेकर निकल गया। आनन-फानन में ईसू बाबू को गौरी के घर में छिपा दिया गया।
कजरी को ईसू बाबू की गिरफ्तारी पर सबसे अधिक खुशी हुई थी। मगर सासू मां के सामने पड़ते ही कह उठती, ‘अम्मा जी, देवर जी क्या गए, घर सूना हो गया। भतीजे के साथ मिलकर दिन भर उछल-कूद करते, तरह-तरह से ऊधम मचाते रहते थे। कभी अपने लिए कुछ बनाने को कहते, कभी भतीजे के लिए खीर बनाने के लिए पीछे पड़ जाते। बाबूजी भी पीले पड़ते जा रहे हैं।’ ऊपर से वह दुखी दिखने का पूरा ढोंग करती पर मन ही मन पुलकती रहती। उसे हँसी इस बात पर आ रही थी कि ऐसे घाघ पुलिस वालोें को, जो दिन-रात चोर-उचक्कों को ही घेरते-पकड़ते हैं, इतना सीधा और बेवकूफ कैसे समझ लिया इतने दुनियादार और समझदार ससुर जी ने और खुद उसके पतिदेव ने। पहले दिन ही जब ईसू बाबू गौरी के घर जाकर टिके, बांसडीह थाने की जीप आई और बड़े प्रेम से पूछताछ करके चली गई। उसमें बैठे सब इंस्पेक्टर को बता दिया गया कि ईसू बाबू तो कई दिन से घर पर हैं ही नहीं, दोस्तों के साथ नेपाल घूमने गए हैं। सब इंस्पेक्टर ने इतना ही कहा कि उनके बाकी सभी साथी तो थाने में धर लिए गए हैं, किसके साथ गए हैं ईसू बाबू लेकिन इसका जवाब किसी के पास तैयार नहीं था। सभी को खुशी थी कि सब इंस्पेक्टर ने बातचीत कितनी आत्मीयता और प्रेम से की थी।
जीप रवाना हुई और ससुर जी गनपत के घर की ओर चल दिए। वहां पहुंचे तो उन्हें बेइज्जत होना पड़ा, राजकिशोर कहने लगा, इस तरह लुब्ब-लुब्ब दौड़कर मेरे घर आएंगे चच्चा, तो मेरी नौकरी चली जाएगी, आप समझ नहीं रहे हैं, ये एससी-एसटी ऐक्ट का मामला है। वे सोचने लगे, आज एक अहीर हमें घर से जाने को कह रहा है। पूछने गए थे कि ईसू बाबू का नाम शिकायत से कटा कि नहीं। हारकर उन्होंने बड़े बेटे संवरू को फोन लगाया कि वह किसी तरह अग्रिम जमानत करवा दे। उसने भी दो टूक जवाब दिया तो वे निराश हो गए।
अगले दिन मनौती और पूजा-पाठ की तैयारी की जाने लगी तभी एक बार फिर पुलिस की जीप आई और गणेश और गौरी को थाने उठा ले गई। पूरे परिवार को जैसे सांप सूंघ गया। सबसे नजरेंं चुराकर कजरी पूजा घर में गई और एक दिया जला आई।
दिन ढलने से पहले ही पुलिस की जीप गांव में वापस आई और सीधे गौरी के घर पर पहुंच कर खड़ी हुई। ईसू बाबू वहां से बरामद कर लिए गए। घर में खबर पहुंचते ही ससुर जी, सासू मां और पतिदेव गौरी पर बरसने लगे कि उसी ने डर के मारे सच उगल दिया होगा। चाय चढ़ाने के बहाने से रसोई में जाकर कजरी ने संतोष की गहरी सांस ली थी।
गिरफ्तारी हो जाने के बाद पूरे घर में जो मातम छाया, उसमें कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था। कजरी को अपने लाडले की चिंता होने लगी। जिस बच्चे को हाथों-हाथ लिया जाता था, जो कभी किसी की गोदी में खेलता कभी किसी की, उसे कोई छूता तक न था। वह चिड़चिड़ा होने लगा मगर कजरी को समझ में नहीं आता था, वह करे तो क्या करे। सहदेव के पोते का नाम वरुण था, यह इन लोगों को अस्वीकार था। सहदेव खाने के लिए अपना थाली-लोटा अलग से लेकर आता था और उसे यह सब मंजूर था। उसका पोता ब्याह करने के लिए घोड़े पर चढ़ गया तो उसमें इनका क्या जाता था? भाई वह बास्केट बॉल की टीम का कप्तान था और तुम लट्ठबाजी करते फिरते थे तो यह तुम्हारी च्वॉयस थी। मगर जो भी हुआ हो, अब इन सबका परिणाम उसका अपना बेटा क्यों भुगते? यह कौन-सा न्याय है? वह सोचने लगी, कुछ दिन मायके रहकर आ जाए, कुछ माहौल बदलेगा।
कजरी को अचरज भी होता है और किंचित संतोष भी, मायके गई तो साल भर वहीं रह गई। उसके लिए बुलावा आता, कोई न कोई बहाना फिट बैठ जाता। पतिदेव भी दो बार आए लिवाने के लिए, दोनों बार ऐसा संयोग रहा, उसके अपने बाबूजी बुखार में पड़े थे, वह जाने से बच गई। वहां दिन-रात मुर्दनी छाई रहती है, हमारा लाडला तुनकमिजाज होने लगा था सोचकर वह राहत की सांस लेती। क्या जाऊं वहां और क्यों जाऊं, क्या वही संस्कार अपने लाडले में भी फलने-फूलने दूं, जो ससुराल के लाडले ईसू बाबू में गहरे पैठ चुके हैं? मायके में बैठे हुए तरह-तरह के विचार मन में उठते। विद्रोह तो उसे तब करना था, जब अल्पवयस्क होते हुए भी वह ब्याह की बेड़ी में जकड़ दी गई थी। अम्मा-बाबूजी के सामने वह चिल्लाती रही कि अभी वह सत्रह की है, उसके साथ गलत हो रहा है लेकिन कोई कदम नहीं उठा पाई थी। उसे समझा दिया गया कि संयोग से अच्छा संपन्न परिवार मिला है, उनका अपना कोल्ड स्टोरेज है, ट्रैक्टर और गाड़ी है, गांव में रुतबा है, किसी चीज की कमी नहीं होगी, फिर ब्याह हो जाएगा लेकिन गौना एक साल बाद होगा। वह मान गई थी। ससुराल में गमी पड़ जाने के कारण गौना दो साल बाद हुआ था और उसने बीए में दाखिला ले लिया था। बीए के बाद उसका इतिहास या दर्शन-शास़्त्र में एमए करने का इरादा था और मन में दबी हुई इच्छा थी कि वह किसी शहर में ब्याही जाएगी, सिटी बस से, टैक्सी से मॉल-बाजार-सिनेमा जाया करेगी। लेकिन उसका बीए भी पूरा नहीं हुआ। बाबूजी इतना घेरकर उसे समझा देते कि वह उनकी बातों में आकर सबकुछ भूल जाती। अब सोचती है, बाबूजी ने अपनी नजर में उसका भला ही सोचा होगा, अब अफसोस करके भी क्या होना है?
साल भर बाद वह लौटी तो पता चला, ईसू बाबू को बारह महीने की जेल की सजा हुई है। इतने दिनों में घर के लोगों को जेल की आदत हो गई थी। महीने में एक बार सभी लोग ईसू बाबू से मिलने के लिए जेल जाते मानो पिकनिक मनाने जा रहे हैं। बाकी दिनों में अपने-अपने धंधों में लिप्त रहते। सासू मां धनिया और मुनिया को साथ लगाए खटाई, अचार बनाने, कूटने-पीसने और लिपाई-पुछाई करवाने में व्यस्त रहतीं और लाडले गुड्डू का भी बुकुआ-मालिस कर देती थीं। कजरी के बेटे को अब बाबू नहीं, गुड्डू बुलाया जाता। उसे स्कूल भेजने की तैयारी भी होने लगी। कजरी को बदला माहौल रास आने लगा और ईसू बाबू की कमी भी खलने लगी। जो भी हो, अपने गुड्डू को ईसू बाबू बहुत प्यार करते थे, उसे लेकर छत पर भाग जाते, कबूतर और मैना दिखाते थे।
इन सबके बावजूद कजरी के मन में अक्सर गुस्सा फूट पड़ता था। ‘ठाकुर का कुआं’ को वह सचाई की कहानी मानती थी। वह सोचने लगती, प्रेमचंद ने किस जमाने में ‘ठाकुर का कुआं’ लिखा था, मगर आज भी वह सोच गई कहां? कब वह समय आएगा कि सहदेव जैसे लोग सदमा झेेलने के बजाय पूरी ताकत से ऐसी सोच के खिलाफ लड़ने के लिए खड़े होंगे? समाज में बहुत सुधार की आवश्यकता है और समाज सुधार के लिए उसे आगे आना चाहिए, घर से भी बाहर निकलना चाहिए। वह आंबेडकर, महात्मा गांधी और परमहंस योगानंद की किताबें पढ़ चुकी थी। उसकी किताबों का चुनाव देखकर उसके बाबूजी डरते थे कि किसी दिन वह पारिवारिक परंपराओं से ही बगावत न कर बैठे। वह सोचती, किसी दिन उत्कंठा जगी तो वह जरूर निकल पड़ेगी इस समाज को सुधारने के लिए।
एक दिन इन्हीं सबके बीच गौरी चाची ने सुखद आश्चर्य वाली सूचना दी कि पूरा परिवार आने वाली छब्बीस जनवरी की तैयारी कर रहा है लेकिन पतिदेव से बात हुई तब खुलासा हुआ कि उस दिन परिवार के सभी लोगों को जेल में कैदी से भेंट करने की छूट मिलेगी, वह भी पांच बजे शाम तक। अपने आप को वह परिवार की इस खुशी में शामिल न कर पाई।
उस दिन के लिए किसिम-किसिम के पकवान बनाने के लिए सब्जी भाजी, दही-मक्खन निकाला गया। तरह-तरह की दालें भिगो कर रखी गईं। उसे यह सब अजीब पाखंड-सा लगा। किसके लिए यह सब, एक कैदी के लिए ही तो? जेल में झंडा वंदन होगा, ससुर जी और पतिदेव नया पीला कुरता पहनेंगे, सासू मां बसंती साड़ी पहनकर जाएंगी। मुझे भी लाल चुनरी पहननी है। हम छब्बीस जनवरी की परेड में जा रहे हैं या किसी कैदी से मिलने? कैदियों को पकवान खिलाने जा रहे हैं, सेना के जवानों को नहीं। मन मसोसकर उसे भी तैयारी में लगना पड़ा।
छब्बीस जनवरी की सुबह गौरी काम पर आई तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। कजरी ने पूछा, ‘क्या हुआ गौरी चाची? तबीयत तो ठीक है?’
गौरी ने रोनी सूरत बनाए हुए कहा, ‘दो दिन से पेट में अजीब किसिम की ऐंठन हो रही है। लगता है अस्पताल जाकर दवाई लेनी पड़ेगी, तुमही बताओ बबुनी, क्या करूं, कैसे जाऊं? मैं जाऊंगी तो गणेश के साथ ही तो।’
कजरी ने उसे धीरे-धीरे समझाया कि देखो, गणेश तो आज न जा पाएगा लेकिन तुम घर जाकर आराम करो। मैं सब देख लूंगी। उसने अजवाइन की पुड़िया बनाकर उसे दी कि इसे खौलाकर इसका पानी पीती रहना थोड़ी-थोड़ी देर पर। अगले पल उसे अपने ही पेट में मरोड़-सा उठता हुआ लगा। पल भर बाद लगा, न, न! यह पेट का मरोड़ नहीं, मन में उठता हुआ उबाल-सा कुछ है।
काट-छांट करने, छौंकने और तलने-बघारने का काम किसी तरह निपटा कर गौरी अपने घर चली गई और कजरी पक्की गृहस्थिन का चोला पहन खाने की चीजें जमाने लगी। बड़े-बड़े टिफिन कैरियर आ गए थे, गिलास, चम्मच, कटोरियां एक डोलची में सजा दी गई थीं। वह पहले खुद तैयार होने गई और लाल चुनरी पहनकर रसोई में आ गई। सासू मां अपनी कोठरी में मन लगाकर शृंगार कर रही थीं, ससुर जी और पतिदेव गुड्डू को साथ में लिए हुए मारूति कार में दरी-चादर तहा कर रखने में व्यस्त थे।
गणेश टिफिन कैरियर उठाने के लिए आया तो कजरी ने उसे एक डलिया पकड़ाई और ताजा हरी मिर्च और धनिया की पत्ती खोंट लाने के लिए बाहर भेज दिया। उसके बाद उसने बड़े इत्मीनान से नमक का मर्तबान उठाया और बने-बनाए खाने में दो-दो तीन-तीन चम्मच नमक मिलाने लगी। गौरी जब तलने के पहले कचौड़ी का भरावन तैयार कर रही थी, तभी नजर बचाकर कजरी ने उसमें एक मुट्ठा नमक डालकर फेंट दिया था। उसने दहीबड़े के पतीले में नमक भुरभुराया, दाल में नमक मिलाया, सब्जियों के रसे में नमक डालकर अच्छी तरह मिलाया, पुलाव में भी अलग से दो चम्मच नमक बुरक दिया। इतने से संतुष्टि नहीं मिली तो उसने दो बड़े चम्मच नमक खीर में भी मिला कर चला दिया।
गणेश धनिया की पत्ती और हरी मिर्च लेकर आ गया। धनिया की पत्ती बारीक काटी गई, कटे हुए प्याज, गाजर, टमाटर और खीरे पर नमक घुले सिरके का छिड़काव किया गया, पुलाव और सब्जियों पर हरी धनिया और कतरी हुई हरी मिर्च छींट दी गई। अब कैदियों के लिए खाना तैयार था। कजरी ने कठोर मन से गणेश को कहा, ‘अब ले चलो, गाड़ी में रखो, सबकुछ एकदम तैयार है जेल की दावत के लिए।’
संपर्क :फ्लैट नं. 607 ब्लॉक ए-2, शालीमार फोर्टलिजा, आशिमा मॉल के पास, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026 मो.8989792778

