
एक चिड़िया पेड़ की एक सुंदर डाल पर आकर बैठ गई।
-यह पेड़ अच्छा रहेगा मेरे घोंसले के लिए, छायादार और फलदार है।वह खुद से बातें करने लगी।कुछ देर बाद वह उड़ी और चुन-चुन कर तिनके लाकर घोंसला बनाने में जुट गई।उसके साथ दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे।
यह देखकर पेड़ ने कहा- अरी चिड़िया! क्या कर रही है..? यहां घोंसला मत बना।
-क्यों.. क्या बात है? मुझसे कोई गुस्ताखी हुई है?
-नहीं री चिड़िया, तू तो बहुत प्यारी है।तुझसे कोई शिकायत नहीं, मगर मेरी बात मान, कहीं और जाकर घोंसला बना ले।दुखी मन से पेड़ ने आग्रह किया।
ऐसा क्यों कह रहे हो? आप ही मना करेंगे, फिर हम कहां जाएंगे?
-समझने की कोशिश कर, कहीं और घोंसला बना ले।
-मैं यहीं बनाऊंगी।चिड़िया जिद पर अड़ गई।
पेड़ दुखी हो गया और उसकी आंखों से आंसू झरने लगे।चिड़िया यह देख कर दंग रह गई।उसने सोचा, जरूर कोई बात है।
जब चिड़िया पेड़ छोड़कर जाने लगी, पेड़ सिसकते हुए बोला- मेरी बात का बुरा मत मानना।यह सड़क चौड़ी होने वाली है!
एमएसए २०१, टाइप ३, बहुखंडी सचिवालय कॉलोनी, महानगर लखनऊ–२२६००६ मो. ९४५४४११५८२

पेड़ का मानवीकरण। एक शिक्षा – प्रद कहानी। सरल और सहज भाषा। बच्चों को भी बहुत पसंद आएगी। कहानी समाप्ति के बाद , बच्चों से पूछा भी जा सकता है , कि इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है।