कवियत्री। कविता संग्रह ‘पद्म पराग’ प्रकाशित।

उलझन

मैं नहीं सुलझा पाई अपने जीवन को
अपने केशों की तरह
न ही संभाल पाई अपने रिश्तों को
अपने आंचल की तरह
जब-जब आंचल कसकर बांधा है
उसमें दरारें आ गई हैं
और खुला छोड़ा
तो फिसलता ही रहा है
सो बस खोंस लेती हूँ इसका एक सिरा

कि पूरा न छूट पाए
और जब छूटने को होता है
पुनः खोंस लेती हूँ एक सिरा
उलझे केशों को सुलझाना
जीवन सुलझाना-सा है
जब एक-एक सिरा खोलती हूँ
कई उलझनें निकलती हैं
मैं बड़ी सावधानी से
उलझनों को अलग करती हूँ
और बाकी बची जिंदगी को
जूड़े-सा बांध लेती हूँ
ज्यादा कसकर बांधती हूँ
तो केशों की तरह
जीवन भी टूटने लगता है

कितना बांधूं कितना छोड़ूं
जिंदगी इसी चक्कर में
उलझ गई है
क्या करूं कि बेफिक्र हो जाऊं
इसी सवाल में आधी जिंदगी निकल गई।

नॉर्दर्न हाइट्स, फ्लैट नंबर-205सीडी, ब्लॉक-2, पांच तल्ला, 105/2ए, बिधाननगर रोड, कोलकाता – 700067 मो.9830928705