प्रसिद्ध कथाकार और कवि।प्रमुख रचनाएँ : कोशी का घटवार’, ‘मेरा पहाड़’, ‘एक पेड़ की याद

प्रकृति का सौंदर्य देखने के लिए ट्यूलिप गार्डन, कश्मीर जाने की आवश्यकता नहीं।न ही, उत्तराखंड में फूलों की घाटी जाने की।बस, देखने वाली आंख चाहिए।सौंदर्य हर कहीं बिखरा पड़ा है।

राजस्थान की मरुभूमि में रहने वाले एक विद्वान हिंदी लेखक ने बीकानेर से मेरे लिए अपना कविता संग्रह ‘रेत राग’ भिजवाया।मैं नहीं जानता था कि श्री नंदकिशोर आचार्य इतने संवेदनशील कवि भी हैं।पूरी पुस्तक उस रेतीली भूमि के सौंदर्य-चित्रण से भरी है।कैसी अद्भुत दृष्टि और कैसा अपनी माटी के लिए लगाव है कि रेत के टीलों में भी उन्हें सौंदर्य दिखाई दे गया!

हमारे ग्रामीण पहाड़ी कवि को भी बुरांश के पेड़ को फूलों की लाल ओढ़नी ओढ़े देखकर कैसा भ्रम हो गया कि वह गाने लगा-

पारा भिड़ा बुरूंशी फुली रै छ।
मी जै कूनूं मेरि हीरू ऐ रै छ।
(सामने पहाड़ी पर बुरुंशी फूल रही है।मुझे भ्रम हुआ कि मेरी हीरू आई है!)

मेरी बहू मीनू को बाग-बगीचे का शौक है।अब दिल्ली के चौमंजिला फ्लैट में यह कहां संभव है! लेकिन उसने हार नहीं मानी।बीसियों छोटे-बड़े-चौड़े-गहरे गमले मंगाकर छत में, ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के कोनों में और बाल्कनी में अपनी बगिया सजा दी।वहां केवल फूलों के पौधे नहीं, बल्कि धनिया, मेथी, टमाटर और सेम की लतर भी फैल गई।इन्हीं के बीच एक बड़े गमले में चंपा फूल का एक पौधा इतना बड़ा हो गया कि उसकी पांच बाहें ऊपर को उठ आईं।पांचों डालों में लंबे-लंबे पत्तों से पेड़ भर गया।पूस-माघ आते-आते सब पत्ते पीले पड़कर झड़ जाते।उन ठूंठ बाहों को देखकर मुझे नरेंद्र शर्मा जी की कविता का स्मरण हो आता-

सेमल की डालों से ये बाहुपाश
सब दिन हताश, सब दिन निराश।

परंतु फागुन आते-आते एक दिन मैंने पाया कि उन पांचों ठूंठों के सिर पर कुछ हरा-हरा दिख रहा है।नजदीक जाकर देखा तो सब में एक नन्ही पत्ती सिर उठा रही है।दो दिन बाद वह कुछ और बड़ी हो गई तो ऐसा लगा कि कोई नवजात बच्चा अपनी मुट्ठी बंदकर छोटी अंगुली उठा रहा हो! फिर तो हफ्ते भर में हर शाखा पर कई पत्ते आ गए।लेकिन उस पहली अकेली पत्ती को देखने का सुख अनोखा था।

लखनऊ में मेरा एक आत्मीय परिवार है।बड़ा बेटा और बहू विदेश में हैं।छोटे बेटे ने अपने लिए दुल्हन खोज ली- सुंदर, सुशील बंगाली कन्या।उदार माता-पिता भी सहमत हो गए।धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ।सुंदर, प्यारी-सी बहू घर में आ गई।दो बेटों की मां की एक बेटी की इच्छा भी पूरी हो गई।इस विवाह के अवसर पर मैं अन्यत्र अस्वस्थ था।विवाह के बाद लखनऊ पहुंचा तो मैंने पूछा- ‘हमारी बहू का क्या नाम है?’

बहू के ससुर जी ने बताया- ‘यह हमारी श्रीपर्णा है।’

मैंने जिज्ञासा की- ‘श्रीपर्णा का क्या अर्थ हुआ?

वह बोले- ‘इसका शाब्दिक अर्थ पहली, सुंदर पत्तियां है।’

मुझे विश्वास हो गया कि बहू के मायके, कोलकाता के घर में भी चंपा फूल का गाछ होगा और कन्या के माता-पिता ने भी कभी चंपा के नवजात पत्तों को देखने का सुख प्राप्त किया होगा।इसीलिए बेटी का नाम श्रीपर्णा रखा है।

मैंने अच्छे पेड़ की सुंदर पत्ती को अपना आशीर्वाद दिया।

लखनऊ, 06 मई, 2022