सुपरिचित कवि-आलोचक। ‘बोली बात’ और ‘क्षीरसागर में नींद’ कविता संग्रह चर्चित।हिंदी कविता के प्रतिष्ठित शमशेर सम्मान से सम्मानित।अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘महामारी और कविता’।बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर।

बाढ़ और उसके बाद

पानी लौटा बादल लौटे
लौटे घर परिवार
बीच सड़क पर झाड़ू लौटी
लौटीं आंखें चार

ताल तलैया शांत हुई जब
लौटा दुक्ख अपार
भीतर दहका शोर शराबा
बाहर करता रार

उसी समय ये कच-कच करती
आ पहुंची थीं द्वार
फुदक फुदक कर जश्न मनातीं
आंगन की गुलजार

मस्त मगन इनकी उछाल में
हम सब हुए निहाल
दुखी पेड़ का पल्लव लहरा
लौटी उसकी चाल

विकल भाव का अंत हुआ तब
लौटा सकल समाज
हम लौटे तो ये भी लौटीं
जैसे लौटा राज!

समुज्ज्वल भाषा

तुम्हारे पास जो भी विकृत व बहिष्कृत है
वह मुझसे ही कृत है
तुम्हारी हर पहचान का संकट भी तो
मुझसे ही स्वीकृत है!

तुम्हारी नफरत
तुम्हारी हिंसा
तुम्हारी लिप्सा
सब मुझसे ही तो निकले हैं!

तुम्हारी अकड़
तुम्हारी जकड़
तुम्हारी हकड़
सब मुझसे ही तो शुरू होते हैं!

तुम्हारी तड़प
तुम्हारी झड़प
तुम्हारी हड़प
सब मुझसे ही तो जन्म लेते है!

तुम्हारी चालाकियां
तुम्हारी चालबाजियां
तुम्हारी चमकोइयां
सब मुझसे ही तो लिए गए हैं!

बस नहीं ले सके तो एक समुज्वल भाषा!
काश ले पाए होते
तो तुम्हारे खुद के द्वारा रचा गया लोकतंत्र
महज नारों से बच गया होता

तुम्हारे झूठ के तमाम तहों के बीच
एक रिसता हुआ सच तो गया ही होता!

पेड़

पेड़ बड़े हो रहे हैं
हम छोटे
हमारा छोटा होना नहीं है कोई विफलता
हमारी सफलता का रहस्य
पेड़ के बड़े होने में है
जब हम नहीं होंगे
ये पेड़ ही होंगे
जो अपनी ऊंचाई में
हमारी गहराई का पता देंगे!

झुकना

झुकना
किसी को रोपना है
जो भी आज तना है
किसी के झुकने से बना है
जैसे कि यह पेड़
जिसकी हर शाखा में
किसी न किसी के
झुकने की भाषा दर्ज है|

हरा पपीता

भाव चढ़ा है
ताव चढ़ा है
शांत मगन इस खड़े पेड़ के
पत्तों पर अब
चाव चढ़ा है!

फल आता है
ढल जाता है
छिले बांस की बल्ली जैसा
कोमल मन से
तन जाता है!

सिर पर बादल को रखता है
चिड़िया चुनमुन को पगता है
भादों भरे दबंग डेंग से
पीड़ित जनता का
दुख हरता है!

ऋषियों की महिमा से पूरित
सबके सुख पर छा जाता है
हर मौसम में हरा भरा वह
पीली शाम सा
झड़ जाता है!

देखो जिधर उधर चर्चा है
इसके रस पर कम खर्चा है
गली गली में हरा पपीता
नए समय का
जन पर्चा है!

केवल युद्ध

क्रुद्ध शासक लड़ रहे हैं युद्ध
क्षुब्ध हैं संबुद्ध
आसमान से बरस रहे हैं गोले
और बुद्ध हैं कि बंकर में छुप गए हैं
रुद्ध कंठ से निकलते हैं शब्द
कि आदमी को नहीं हारना है
कि महामारी अभी गई नहीं है
कि जमीन को अभी नहीं दरकना है
कि आते हुए शिशु की किलकारी से
लिखे जाने हैं अभी कई सूत्र

कि दनदनाता हुआ दगता है एक गोला
घर के एक कोने को दग्ध करता हुआ

नागरिक सुन रहे हैं विलखती हुई आवाजें
इतिहास में बनी हुई है आवाजाही
मीडिया से उठ रही हैं खबरें
कि दहशत में है हरियाली

बारूद के ढेर में जल रहे हैं दरख़्त
आकाश के फेफड़े को भर रहा है धुआं
समुद्र सोख रहा है दुख
और ज्वालामुखी के मुंह पर दहक रही है करुणा

सरहदें उदास हैं
पक्षी दुबक गए हैं कोटर में
चारागाहों में लग गई है आग
खेत बदल रहे हैं मरुथल में
जहां सूरज लगातार बंजर हो रहा है

यह एक सभ्य समाज की पशुता है
जहां अपनी भूमिका से अनजान
हर कोई दूसरे की भूमिका पर उठा रहा है सवाल
और उत्तर में चीखता है बस एक ही शब्द-

केवल युद्ध!
केवल युद्ध!
केवल युद्ध!

बहुत मृत्यु बहुत जीवन की शुरुआत है

जीवन कठिन था
लोग काठ हो रहे थे
धरती का ठाठ बिगड़ रहा था
वह प्रेम के मार्ग से भटक गई थी
जहां पूरने से ज्यादे एक घूरना था!

नजर थी कि बजर हो रही थी
आहटों में भय था
घर से निकलने के पहले
स्पर्श एक तय था
उम्मीद का सूरज जहां
त्रासदी में लय था

हाट तो थे मगर वीरान थे
शमशाम शवों से पटे थे
घाट खाली सिरों से झुके थे
जहां महापात्र का सुर बदला हुआ था

पीपल के पेड़ पर अचानक
ढेर सारे घंट उग आते थे
लोग नए पेड़ की तलाश में
अक्सर निकलते थे
जैसे भीड़ जब बहुत होगी
तब बड़ी आसानी से अपनों की स्मृति को
इसमें लटकाया जा सके
कुछ ही दिन बाद जिसका टूटना तय था

रस्ते सुनसान थे
खाली सड़कों पर लोग महज गुजर रहे थे
मरण का वरण करती भाषा अब
आंकड़ों से बहुत आगे निकल चुकी थी

यह एक नए जीवन का आरंभ था
बहुत मृत्यु बहुत जीवन की शुरुआत है!

आदमी जहां टैग है

इस पीड़ा को किससे कहें
आदमी जहां टैग है
प्लास्टिक का एक बैग है!

कोरोना ने संबंधों को तार तार कर दिया है
बीमार कहता है आओ आओ

तीमार कहता है जाओ जाओ
जिसे आप भगवान कहते हैं
वह एक ऐसा दयावान है

जो केवल संदेश दे सकता है समाधान नहीं
जो कल तक आला लगाए घूमता था
वह अब ताला लगाए झूमता है

इतना रौताई रोग नहीं देखा कि
हर इंसान एक जिंदा लाश है
जहां कुशल क्षेम के नाम पर
इंसानियत अब
महज एक काश है!

उतरना

मैदान से पहाड़ की ओर जाना
जाना भर नहीं होता

असल में यह एक ऐसा चढ़ना है
जिसमें आप उतरते हुए चले जाते हैं

चढ़ना एक उतरना ही है
अपने भीतर कहीं गहरे डूबते जाना है!

पहाड़ चढ़ने के लिए नहीं
उतरने के लिए होते हैं

चढ़ने में तो आप खुद को देखते हैं
उन्हें तो तभी देखते हैं

जब आप उतर रहे होते हैं
इसकी जड़ों में लिपटे सन्नाटे को
कतर रहे होते हैं!

संपर्क : सुमेधस, 909, काशीपुरम कालोनी, सीरगोवर्धन, वाराणसी-221011 मो.9415890513