प्रसिद्ध लेखक और यायावर। क्रांतिकारी आंदोलन पर अब तक दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। जनपदीय इतिहास और संस्कृति पर भी कई किताबें।

 

देश की स्वतंत्रता के लिए जिन दिनों बंगाल धधक रहा था तब वहां चटगांव की कलेक्टरी-कचहरी के हेडक्लर्क जगबंधु वाद्देदार के घर 5 मई, 1911 को प्रीतिलता का जन्म हुआ। किसे पता था कि प्रतिमा वाद्देदार और उनकी यह पुत्री मात्र 20 वर्ष की आयु में शहीदों की पंक्ति में जा बैठेगी।

प्रीतिलता को घर में सब ‘रानी’ कहते थे। उनके पिता सरकारी नौकरी में रहते हुए भी राष्ट्रीय विचारों में रचे-पगे थे। 1921 के असहयोग आंदोलन की लहर जब हर तरफ आई तो वे इसमें ऐसे बहे कि अपनी सेवा से पृथक हो गए। उन दिनों लड़कियों को शिक्षा देने का रिवाज कम था इसलिए आरंभ में प्रीति को विद्यालय नहीं भेजा गया। जगबंधु बाबू की तीन पुत्रियां थीं। एक पुत्र था जिसे पढ़ाने के लिए एक मास्टर घर आते थे। प्रीति पर्दे की ओट से भाई को पढ़ाए जाने वाले पाठ को सुन लेती और उसे कंठस्थ कर लेती। बाद में वह मास्टर साहब को पूरा याद किया हुआ सुना देती तो वे हैरत में पड़ जाते। इससे प्रभावित होकर उन्होंने प्रीति को स्वेच्छा से पढ़ाना शुरू कर दिया। पिता को यह पता लगा तो उन्होंने भी उत्साह में उसे खास्तगीर गर्ल्स स्कूल में भेजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वह कक्षा 8 तक पहुंच गई और नियमित रूप से अंग्रेजी में अपनी डायरी लिखने लगी जो काव्यमय होती थी। प्रीति अपनी कक्षा में सदैव प्रथम आती। संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला उसके प्रिय विषय थे। उसे नाटकों में हिस्सेदारी करने और उनके संचालन का भी शौक था। मैट्रिक के बाद वह ईडन कॉलेज, ढाका में चली गई जहां उसका संपर्क्र क्रांतिकारी संस्था ‘श्री संघ’ की नेत्री लीला राय (नाग) से हो गया जिनकी एक संस्था ‘दीपाली संघ’ भी थी जिसकी वह सदस्य बन गई। देशभक्ति के बीज भीतर थे ही जो अब प्रस्फुटित होने लगे। प्रीतिलता की एक छोटी बहन कनकलता (चौधरी) कलकत्ता में थीं जिन्होंने बाद में बताया था कि प्रीति का झुकाव बचपन से ही कृष्ण-भक्ति की ओर था। वह सदैव कृष्ण की आराधना और उनके भजन में तल्लीन रहती थी। कृष्ण की पूजा के बाद ही भोजन ग्रहण करती और उन्हें कृष्ण के बांसुरीवाले रूप के स्थान पर उनकी सुदर्शनधारी छवि अधिक प्रिय थी जिसकी अर्चना में उनका मन रमता था।

ढाका विश्वविद्यालय की इंटर की परीक्षा का परिणाम निकला तो प्रीति ने छात्राओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। बंगाल के विख्यात क्रांतिकारी मास्टर दा सूर्यसेन ने 1929 में चटगांव में महिला सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें भाग लेने प्रीति पहुंच गईं। वहां क्रांतिकारी कल्पना दत्त से उनका परिचय हुआ जो आगे चलकर कल्पना दत्त जोशी बनीं। प्रीति ने आगे चलकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के बैथून कॉलेज में प्रवेश लिया जहां से उन्होंने बी.ए. ऑनर्स अंग्रेजी विषय लेकर प्रथम श्रेणी में पास किया। कलकत्ता में कल्याणी दास का का जो ‘छात्रा संघ’ संचालित हो रहा था, प्रीति उसकी सदस्य बन गईं। कलकत्ते के छात्र नेता मनोरंजन राय को बम बनाने के लिए तेजाब की खेप चटगांव भेजनी थी। पुरुषों से इस कार्य को कराना खतरे से खाली नहीं था। खुफिया के लोग उनकी अधिक निगरानी में संलग्न रहते थे। ऐसे में उनकी द़ृष्टि लड़कियों पर गई और उन्होंने इसके लिए प्रीति को चुन लिया जो तेजाब के साथ शस्त्र और समाचार पहुंचाने का भी कार्य करने लगीं।

प्रीति की गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों में संलिप्तता और रुचि बढ़ती जा रही थी। खतरे उठाना जैसे उन्होंने सीख लिया था। एक दिन उनका परिचय बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी विनय-बादल-दिनेश गु्रप के दिनेश गुप्ता की मौसी से हुआ जो उन लोगों की बड़ी सहयोगिनी थीं। उन दिनों एक युवक क्रांतिकारी रामकृष्ण विश्वास चांदपुर रेलवे स्टेशन पर इंस्पेक्टर जनरल पुुलिस के धोखे में पुलिस इंस्पेक्टर तारिणी मुखर्जी को गोली से उड़ा देने के अपराध में चटगांव जेल के भीतर बंदी थे। दिनेश की मौसी के कहने पर प्रीतिलता को रामकृष्ण विश्वास की बहन बनाकर अलीपुर सेंट्रल जेल भेजा गया जहां पहुंच गए रामकृष्ण से उनकी भेंट करा दी गई। फिर वे प्राय: क्रांतिकारियों के संदेश लेकर जेल में उनके पास पहुंचने लगीं। उनके मध्य जो बातचीत होती उससे प्रीतिलता ने प्रभावित होकर देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन देने का प्रण ले लिया। एक रोज तड़के वे अलीपुर जेल पहुंचीं तो पता लगा कि पिछली रात को एक बजे रामकृष्ण विश्वास को फांसी दे दी गई। वह 4 अगस्त, 1931 का दिन था। पहले तो प्रीतिलता को भरोसा नहीं हुआ लेकिन जब सत्यता सामने आई तो वे चीख पड़ीं और उन्होंने अपना सिर जेल की दीवार से टकरा दिया। उनके माथे से खून टपकने लगा। वे क्रोध और आवेश में चीखने लगीं। उनका मस्तिष्क इतना असंतुलित हो गया कि कई दिन तक कॉलेज नहीं जा सकीं। उसके बाद जैसे-जैसे पढ़ाई खत्म करके वे चटगांव लौट गईं और फिर वहां नंदनकानन गर्ल्स हाई स्कूल में प्रधान शिक्षिका का पद संभाल लिया।

लेकिन प्रीतिलता का मार्ग तो विप्लव का था। ऐसे मेंं मास्टर दा सूर्यसेन और उनके मध्य संदेशों का आदान-प्रदान होता रहता था। 13 जून, 1932 को वे मास्टर दा से मिलीं। यह संयोग कल्पना दत्त के माध्यम से बना जब वे उन्हें चटगांव से 10 मील दूर थलघाट गांव ले गईं। वहां मास्टर दा एक दुतल्ले पर अपने दो युवा शिष्यों निर्मल सेन और अपूर्व सेन के साथ गुप्त रूप से टिके थे। कल्पना शाम को लौट गईं लेकिन प्रीतिलता वहीं थीं। रात के 9 बज चुके थे। इस घर की मालकिन सावित्री देवी विधवा अपने पुत्र रामकृष्ण चक्रवर्ती के साथ इन लोगों को भोजन करा रही थीं। उसी समय किसी छोटी लड़की ने आकर बताया कि बहुत से अनजान लोग बस्ती में घुसे चले आ रहे हैं। यह किसी मुखबिर की हरकत थी जिसकी सूचना पर पुलिस और गुरखा फौज ने कैप्टन कैमरोन के नेतृत्व में मकान को घेर लिया था। जिस कमरे में चारों क्रांतिकारी थे उस पर थाप पड़ने लगी। ऐसे में वे सभी उस कमरे से निकलकर बांस की सीढ़ी के सहारे दूसरी मंजिल के कमरे में जा पहुंचे। अंग्रेज कप्तान अब तक धक्के से नीचे के कमरे का दरवाजा तोड़ चुका था। वहां किसी के न मिलने पर वह अपना रिवॉल्वर ताने बांस की सीढ़ी से छत पर चढ़ गया। वह कुछ गज की ही दूरी पर था कि निर्मल सेन ने उस पर पिस्तौल चला दी। कैमरोन चीखता हुआ नीचे गिर गया। गोली उसके सीने में जा लगी थी। वह थोड़ी देर तड़पा और फिर ठंडा हो गया। सिपाहियों और फौज की टुकड़ी में हड़बड़ी मच गई। उनकी ओर से कमरे को निशाना बनाकर ताबड़-तोड़ गोलियां बरसाई जाने लगीं। फिर भी कोई ऊपर आने का साहस नहीं कर रहा था।

इस बीच एक हवलदार मिलिट्री कैंप की ओर फौज लेने गया। इधर सिपाहियों ने घर को घेर ही रखा था। जब कुछ और रायफलधारी वहां आ गए तो वे स्थिति को भांपने में लग गए। कुछ देर के लिए उनकी ओर से गोलियों का चलना बंद हो गया तो निर्मल सेन ने कमरे के पीछे की तरफ से नीचे उतरना चाहा लेकिन बरामदे की टिन पर उनका पैर पड़ने से आवाज होते ही गुरखा फौज ने उन पर गोली चला दी। अपने साथियों को बचाने के प्रयत्न में निर्मल सेन को गोली लग गई और वे वहीं शहीद हो गए। लेकिन इस बीच मास्टर दा, अपूर्व सेन और प्रीतिलता खिड़की के रास्ते अंधेरे में निकल भागे। वे पूरब के मैदान से होते हुए उस जंगल में जा पहुंचे जो चटाई बुनने वाले पत्तोंं का था। इसमें चलना और निकलना खतरे से खाली नहीं था। पांव बढ़ाने से पत्ते खड़क रहे थे जिनकी आवाज सुनकर गुरखों ने उधर ही बंदूकें चलानी शुरू कर दीं। अपूर्व इससे घायल हो गए लेकिन मास्टर दा और प्रीतिलता किसी तरह निकलकर ज्येष्ठपुर गांव में अपने साथियों के पास जा पहुंचे। यह बहुत कठिन यात्रा थी। उधर फौज ने सवेरे तक सावित्री देवी और उनके बेटे रामकृष्ण को गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन दोनों को चार साल की सजा दी गई लेकिन रामकृष्ण की उस कष्ट से जेल में ही मृत्यु हो गई।

मास्टर दा चाहते थे कि प्रीतिलता घर लौट जाए। उन्होंने एक आदमी को उनके घर भेज कर स्थिति का पता लगाया। मास्टर दा का मानना था कि अपना काम करके भी क्रांतिकारी कार्य किया जा सकता है। उनके निर्देश पर प्रीति ने अपने घर पहुंचकर फिर से स्कूल में पढ़ना शुरू कर दिया। यद्यपि इसके लिए वह मन से राजी नहीं थी। पुलिस को पता लग गया था कि मास्टर दा के साथ पुरुष वेश में एक लड़की भी थी। उसकी निगाह प्रीति पर थी। घटना के दिन स्कूल से प्रीति की गैरहाजिरी को देखते हुए पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा तो वह घर पर थी और कोई सबूत भी हाथ नहीं आया। इसके बाद पुलिस बार-बार उसके घर पहुंचने लगी तो प्रीति ने मास्टर दा को यह संदेश भिजवाया कि वह कुछ करना चाहती है और पूरे समय क्रांतिकारी दल में रहने की उसकी इच्छा है। इसी मन:स्थिति के बीच 5 जुलाई, 1932 का वह निर्णायक दिन आ गया जब प्रीति नौकरी, घर, परिवार, पिता, मां को छोड़कर सदैव के लिए विप्लव-युद्ध में सम्मिलित हो गई- ‘शंखे-शंखे मंगल गाओ, जननी एशेचे द्वारे’ अर्थात सबलोग शंख बजाओ, द्वार पर मां आई हैं।

प्रीति का इस तरह चले जाना पुलिस को पता लग गया। अब मास्टर दा और उसकी खोजबीन शुरू हो गई। उसका पता देने वाले को 500 रुपए और मास्टर दा के ऊपर 10 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया गया। प्रीति के घर की बार-बार तलाशियां और अखबारों में विज्ञापन के साथ सड़कों पर इश्तिहार चिपकाए जाने लगे। ‘आनंद बाजार पत्रिका’ के 13 जुलाई, 1932 के अंक में पुलिस ने प्रीति के गायब होने की खबर छपवाई। इसी महीने मास्टर दा को पता लगा कि यूरोपियन क्लब में कुछ अंग्रेज शराब पीकर नाचते-गाते हैं। यह चटगांव नगर से 4-5 मील की दूरी पर था। यह अंग्रेजों की मस्ती का अड्डा तो था ही लेकिन कभी-कभी इस जगह देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले विप्लवियों के खात्मे की योजनाएं भी बनतीं। क्लब ऊंचाई पर पहाड़ियों से घिरे स्थान पर था जहां हर समय पहरा रहता जिसके चलते वहां किसी का जाना नामुमकिन-सा होता। उधर अंग्रेज चटगांव के आसपास के गांवों पर अत्याचार कर रहे थे, घरों को जला डालते। सब तरफ पुलिस और मिलिट्री की मुस्तैदी। इस पर भी उन्हें क्रांतिकारियों को पकड़ने और दबाने में सफलता नहीं मिल रही थी। मास्टर दा इससे क्षुब्ध थे। उन्होंने उसी समय उस यूरोपियन क्लब पर हमला करके उसे ध्वस्त करने की योजना बना डाली जबकि यह बहुत जोखिम भरा साहसिक अभियान था।

मास्टर दा के एक साथी थे शैलेश्वर दे। बहुत ही विश्वस्त और दल के लिए उपयोगी। वे चटगांव और जलालाबाद में अंग्रेजों से मोर्चा ले चुके थे। शैलेश्वर सात युवकों को लेकर क्लब गए लेकिन कोई उपाय नहीं हो पाने पर लौट आए। इसके बाद सितंबर के दूसरे सप्ताह में फिर योजना बनी। प्रीतिलता के आग्रह पर यह तय हुआ कि वह इस बार मोर्चे का नेतृत्व करेंगी जिसमें शैलेश्वर, प्रीति और कल्पना दत्त भी होंगी, लेकिन हुआ यह कि 17 तारीख को पुरुष के पहनावे में कल्ब के पास टहलते हुए कल्पना गिरफ्तार हो गईं जबकि दूसरे दिन ही घटना को अंजाम देना था। ऐसे में योजना टल गई। लेकिन इसके बाद तय हुआ कि इस बार बिना कोई दिन निश्चित किए ही प्रीतिलता के नेतृत्व में क्लब पर धावा बोला जाएगा। प्रीति अब मोर्चे में अकेली महिला थीं। वहां क्लब में एक कर्मचारी को दल के लोग जयद्रथ कहते थे जबकि उसका असली नाम जोगेश मजूमदार था जो पार्टी का बड़ा मददगार था। उसके घर के भीतरी कमरे में क्रांतिकारी साथी दिन भर छिप कर पड़े रहते और उसकी भाभी सभी के लिए भोजन बनाती थी। अंधेरा होने पर वे लोग क्लब की ओर गहरी निगाहों से देखते रहते। निश्चय किया गया कि जयद्रथ सारी परिस्थिति की जानकारी देगा कि वहां क्लब के भीतर कितने सदस्य हैं। ऐसा करने के लिए उसे बत्ती दिखाकर संकेत करना होगा तभी हमला किया जाएगा।

दिन बीत रहे थे और योजना को मूर्त रूप नहीं मिल पा रहा था। सभी चाहते थे कि कुछ जल्दी हो। जयद्रथ कभी कहता कि आज क्लब में सदस्य कम हैं लेकिन हथियार अधिक हैं। इससे सबके भीतर उत्तेजना थी। ऐसे में शैलेश्वर तो इस मामले में इतना परेशान हो उठा कि उसने एक रोज पोटेशियम साइनायड खाकर आत्महत्या कर ली। यह अत्यंत दुखद था। शैलेश्वर जिस मानसिक स्थिति में उस समय गुजर रहा था उसमें वह तुरंत मारना और मरना चाहता था लेकिन पार्टी उसे आज्ञा नहीं दे रही थी।

सो उसने यह कदम उठा लिया। उसे भूमिगत रहकर चुपचाप पड़े रहना पसंद नहीं था। लेकिन अब क्या हो और उसके शव को किस तरह, कहां ले जाया जाए। फिर क्रांतिकारी उसे भोर में आधा मील दूर ले जाकर बंगाल की खाड़ी के अथाह सागर में जलसमाधि देकर खामोशी से लौट आए।

लेकिन एक्शन तो करना ही था इसलिए मास्टर दा और तारकेश्वर दस्तीदार सितंबर की 24 तारीख को यहां आ गए। उस दिन क्लब मेंं एक विशेष आयोजन था जिसमें अनेक अंग्रेज दंपत्ति हिस्सा लेने वाले थे। मास्टर दा ने काली की मूर्ति को अपने हाथों से सजाए। जवाकुसुम अर्पित किए। उसके बाद भोग लगाकर पूजा की। सबने ऐसा ही किया और कामना की कि उनका अभियान आज सफल हो। सबने मास्टर दा से आशीर्वाद लिया। फिर एक साथ भोजन हुआ मानो यह अंतिम विदाई की बेला हो। इसके बाद मास्टर दा अपने गांव चले गए।

उस रात सभी क्रांतिकारी तैयार बैठे थे। जोगेश ने टॉर्च जलाकर संकेत किया तो वे सब सधे पांवों यूरोपियन क्लब की ओर बढ़ चले। भीतर तीव्र प्रकाश और संगीत बज रहा था। लोगों के नाचने की ध्वनि बाहर आ रही थी। क्लब के कर्मचारी बाद में बख्शीश की उम्मीद में भोजन और शराब परोस रहे थे। क्रांतिकारियों ने क्लब के दोनों दरवाजों को घेर लिया। उन्होंने जंगले पर भी नाकेबंदी कर दी। प्रीतिलता, कालीकिंकर दे और शांति चक्रवर्ती क्लब के पूर्वी द्वार पर थे जहां से आक्रमण करना था। दक्षिण दरवाजे पर थे सुशील दे और महेंद्र चौधरी। उत्तर की ओर जंगले को पन्ना सेन, वीरेश्वर राय और प्रफुल्लास ने पहरा लगा रखा था। सभी प्रीतिलता के संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे जो आज उनकी नेता थीं। आज उन सबके भीतर रोष था। प्रीतिलता और कालीकिंकर के पास रिवॉल्वर थे और यह तय था कि बाकी के पास जो ग्रेनेड हैं, उन्हें फेंकने के बाद सब रिवॉल्वर से हमला करेंगे। वीरेश्वर के पास पिस्तौल, पन्ना के पास बम तथा तलवार थी। इन हथियारों का ज्यादा भाग चटगांव शस्त्रागार की लूट से क्रांतिकारियों को मिला था। दो छात्रों, शांतिरंजन और दिनेश चक्रवर्ती की ड्यूटी पहाड़ी के नीचे लगाई गई थी जिन्हें यह आदेश दिया गया था कि गोलियों और बमों के चलने की आवाज सुनते ही वे लोग भाग कर चटगांव शहर में जाकर उन पर्चों को चिपका देंगे जिन पर पहले से ही- देश को स्वतंत्र कराने का युवकों को आह्वान, चटगांव और हिजली के निहत्थे क्रांतिकारी कैदियों पर गोली चलाने व अत्याचार करने का बदला लेने, अंग्रेजों को मारने तथा पकड़ने पर क्रांतिकारी पार्टी चटगांव शाखा-हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन द्वारा पुरस्कार तथा प्रीतिलता की व्यक्तिगत विज्ञप्ति लिखी थी।

सभी क्रांतिकारी छद्म वेश में थे। प्रीतिलता ने पंजाबी कपड़े पहने थे क्योंकि क्लब के निकट आसाम-बंगाल रेलवे का पहाड़टाली वर्कशॉप था और उसके पंजाबी कर्मचारी वहां रहते थे। कालीकिंकर और शांति चक्रवर्ती ने धोती और शर्ट पहनी थी। बाकी सबलोगों ने लुंगी और मुसलमानी कपड़े पहने थे। क्लब में 20 से अधिक अंग्रेज स्त्री-पुरुष थे। उस समय बरसात हो रही थी। योजना और कप्तान के नाते प्रीतिलता ने पहला ग्रेनेड फेंका। फिर तो हर तरफ से गोलों के धमाके फर्श पर होने लगे। भीतर का जश्न एकाएक थम गया और सब ओर चीख-पुकार और भगदड़ मच गई। एक अंग्रेज अफसर ने अपने पिस्तौल से प्रीति पर फायर किया जिसका एक छर्रा उसकी बाईं तरफ छाती में लगा लेकिन तब तक वह गोली से गिर कर ढेर हो चुका था। यह गोलीबारी लगभग पांच मिनट तक चलती रही। इस समय तक हिंदुस्तानी कर्मचारी वहां से निकल भाग चुके थे। क्रांतिकारियों ने उनपर कोई हमला नहीं किया था लेकिन क्लब में उस समय जितने अंग्रेज थे उनमें से कोई बचा न था। वे सब नीचे पड़े अपना दम तोड़ रहे थे। यह अभियान पूरी तरह कामयाब रहा। उधर शांतिरंजन और दिनेश चक्रवर्ती ने शहर में इस कांड की सूचना के पर्चे चिपका दिए तो सब जगह खबर फैल कर हलचल मच गई।

क्लब से केवल जयद्रथ नहीं भागा था। इसके लिए काफी प्रयास किए गए। वह एक कमरे मेंं बंद हो गया तब क्रांतिकारी दल के लोग वहां से लौट आए। बाद में सिपाहियों ने जयद्रथ को कमरे से बाहर निकाला। उसके बंगाली होने तथा भीतर से कमरा बंद होने के कारण उस पर संदेह हुआ, उसे मारा-पीटा गया लेकिन उसने कोई राज नहीं खोला और न ही उसके पास से तलाशी में कुछ बरामद हुआ। उसकी भाभी जो क्रांतिकारियों को खिलाती-पिलाती थी, उसने भी कोई भेद नहीं खोला। यह बहुत बड़ी बात थी। जयद्रथ को नौकरी से हटा दिया गया लेकिन उसके विरुद्ध साक्ष्य न मिलने के कारण उसे जेल नहीं भेजा गया। सुना कि वह इतना दिलेर था कि इसके बाद भी क्रांतिकारियों की सहायता करने के लिए उसकी संलग्नता पूर्ववत बनी रही।

उधर प्रीतिलता जब यूरोपियन क्लब पर सफल अभियान के बाद अपने साथियों को लेकर भागी तो उसे कोई रास्ता सूझ नहीं रहा था। वह पहाड़ी रास्ते से 200 गज नीचे उतरकर एकाएक रुक गई और बोली- ‘मैं वापस नहीं जाऊंगी। मैं आत्मविसर्जन करके इस शताब्दी की प्रथम महिला शहीद का गौरव प्राप्त करूंगी।’ अजब था उसका यह कथन और प्रण। भूमिगत क्रांतिकारी जीवन से वह उब चुकी थी जिसमें किसी स्त्री को निरंतर भागना और अपने को बचाना नितांत मुश्किल भरा काम था। वह अपने सभी साथियों को सुरक्षित बाहर निकाल लाई थी और ब्रिटिश अधिकारियों को उसने धराशायी कर दिया था। उसे लगा कि उसका कर्त्तव्य पूर्ण हो चुका है। तभी उसने अपने साथी कालीकिंकर से पोटेशियम साइनाइड की पुड़िया मांगी जिसे सभी साथी संग में लेकर चला करते थे। उसे पता था कि 23 दिसंबर को नागरखाना पुलिस संघर्ष के समय मेंं मास्टर दा ने इसी तरह पोटेशियम साइनाइड खाया लेकिन डिकंपोज होने के कारण वे बच गए थे। सो प्रीतिलता ने अपने पास से तथा दूसरी पुड़िया कालीकिंकर से लेकर एक साथ गटक ली। वह तुरंत वहीं गिर पड़ीं और छटपटाने लगीं।

उस दिन प्रीतिलता की शहादत से 1932 के सितंबर की 24 तारीख मुक्ति-युद्ध के इतिहास में अमर हो गई।

उधर यूरोपियन क्लब पर गोलियां और बम विस्फोट की आवाजें सुनकर पुलिस और मिलिट्री के ट्रकों ने उस ओर दौड़ लगा दी। सब ओर शोर मच गया। विप्लवी रेलवे लाइन के सहारे नीचे तक उतर गए। वहां तारिणी मांझी नाव सहित तैयार था। उसने तुरंत उन्हें पार उतार दिया। कालीकिंकर, शांति, महेंद्र तथा सुशील सभी मास्टर दा के पास पहुंचे। बाकी लोग अपने गांव निकल गए। जयद्रथ का अनुमान था कि वहां 10-12 अंग्रेज मारे गए और लगभग इतने ही घायल हुए थे। मास्टर दा को अभियान की सफलता की सूचना मिली तो प्रसन्न हुए लेकिन प्रीतिलता की शहादत उन्हें भीतर तक खामोश कर गई। घटनास्थल से कुछ दूर अंग्रेजों को प्रीतिलता का सिर्फ शव मिला। पहले उन्हें लगा कि उसके छाती के निकट लगे छर्रे के घाव से उसकी मृत्यु हुई है लेकिन पोस्टमॉर्टम से ज्ञात हुआ कि इसका कारण विषपान था।

प्रीतिलता की बहन कनकलता बताती थीं, ‘उनके पिता जी की दौड़धूप से बाद में शव को उन्हें दे दिया गया, तब उनके शरीर से भी उनके हृदयपटल से लगा कृष्ण का चित्र बरामद हुआ था। दीदी कृष्ण की बड़ी भक्त थीं। सदैव कृष्ण का जाप और पूजा करती थीं।’ नहीं पता कि बेटी की इस तरह मौत पर पिता कितना रोए लेकिन मां तो आजीवन विलाप ही करती रहीं। अपने क्रांतिकारी अभियान पर विदा होने से पूर्व प्रीति ने अपनी मां को एक पत्र में लिखा था:

मां, मुझे ऐसा लगा कि तू मेरे सिरहाने बैठकर मुझे बार-बार पुकार रही है और तेरे आंसुओं से मेरी छाती भीगी जा रही है, मां मुझे क्षमा कर देना। तुझे दुख की खाई में छोड़कर चली जा रही हूँ। तुझे दुख देने की क्या मेरी इच्छा थी? मैं तो भारत मां की आंखों के आंसू अपने हृदय का रक्त देकर पोंछने चली आई र्हूं। तू मुझे आशीर्वाद देना, नहीं तो मेरी मनोवांछा अधूरी रह जाएगी। तुझे देखने (घर छोड़ने के बाद) एक बार भी न आ सकी। मैं जानती र्हूं मेरी मृत्यु तुझे वेदना से पागल कर देगी। हमारा जन्म ही सत्य और स्वाधीनता के लिए मर मिटने को हुआ है। भारत मां का यह अपमान क्या तू बिना कुछ कहे सहन करेगी? मां, अपनी इस संतान को क्या तू देश की मुक्ति के लिए नहीं दे सकती? तेरा रोना मुझे ध्येय से जरा भी विचलित न कर सकेगा। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि मां तेरी ‘रानी’ इतनी निष्ठुर हो गई है। क्षमा कर मां मुझे! क्षमा कर!! – रानी

प्रीतिलता की मां के नाम लिखी यह पाती उसके हृदय के उद्गार हैं जिसमें देश के लिए उसके बलिदान की तीव्र भावना उद्घाटित हुई है। हमें नहीं पता कि शहीद प्रीति के पिता और मां का बाद में क्या हुआ अथवा वे कहां और कैसे मरे। कनकलता और कल्पना दत्त के पास उसकी यादों के अनेक चित्र थे। उस मामले में कालीकिंकर दा को काला पानी की सजा भुगतनी पड़ी। सुशील दे अगरतल्ला (त्रिपुरा) में, महेंद्र कलकत्ता में, वीरेश्वर राय चौबीस परगना में, प्रफुल्ल दास पुरुलिया में तथा पन्ना सेन आसाम में रहते थे। जयद्रथ आसाम चले गए थे जिनका फिर कुछ पता नहीं लगा। शांति चक्रवर्ती तो नहीं रहे। इनमें तो अब कोई नहीं बचा होगा। देश की आजादी के लिए क्रांति के उद्यम कितना हौसला देने वाले और दर्दनाक भी थे। प्रीति सहित उन सभी को मेरा प्रणाम!

 

 

 

6, फेज–5 विस्तार, पवन विहार पो. रुहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली–243006मो. 9760875491

 

 

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