
युवा कवयित्री।

आंकड़ा
धूप से झुलसे हुए हाथ
जब मिट्टी में बीज डालते हैं
तो उम्मीद बोई जाती है-
कि इस बार फसल
सिर्फ कर्ज नहीं उतारेगी
बल्कि भविष्य संवारेगी
पर मौसम
अब आसमान से नहीं
बैंकों की फाइलों से तय होता है
बरसात कम हो या ज्यादा
सूखा खेत में नहीं
किसान के सीने में पड़ता है
सरकारी घोषणाएं
खबरों में हरी-भरी लगती हैं
पर उसकी बही-खाते में
केवल लाल स्याही फैलती है
किसान जानता है-
उसका कर्ज
कभी मिट्टी की तरह ढक नहीं जाता
बल्कि बेल की तरह
उसके घर की दीवारों पर चढ़ता चला जाता है
और जब वह थककर
गांव की बड़ेर पर
रस्सी की गांठ लगाता है-
तो पूरा देश
बस एक आंकड़ा पढ़ता है:
‘एक और आत्महत्या’।
संपर्क :ग्राम – औंका, पोस्ट – सराय हरखू, जनपद – जौनपुर, उत्तर प्रदेश-222141 मो. 8530610163

आपकी कविता वागर्थ के ऑनलाइन संस्करण में पढ़ी।
यह कविता अपने भीतर समकालीन ग्रामीण यथार्थ की गहरी पीड़ा और विडंबना को समेटे हुए है। सबसे पहले जो बात प्रभावित करती है वह इसका सीधा लेकिन बेहद संवेदनशील बिंब-निर्माण है “धूप से झुलसे हुए हाथ” और “मिट्टी में बीज डालते” जैसे दृश्य पाठक को किसान के श्रम और उसकी मौन आशा के बहुत करीब ले आते हैं। यहाँ बीज केवल कृषि का प्रतीक नहीं रह जाता वह उम्मीद और संघर्ष का रूपक बन जाता है। कविता का मध्य भाग विशेष रूप से मार्मिक है जहाँ मौसम का निर्णय आसमान से हटकर “बैंकों की फाइलों” में चला जाता है। यह पंक्ति आज के आर्थिक और सामाजिक ढाँचे पर तीखी टिप्पणी करती है। आपने बिना सीधे आरोप लगाए व्यवस्था की विडंबना को उजागर किया है। सूखा अब खेत से ज्यादा किसान के भीतर पड़ता है। यह आंतरिक सूखे का रूपक कविता को केवल सामाजिक बयान नहीं है उसे मनोवैज्ञानिक अनुभव में बदल देता है। भाषा की सादगी इस रचना की सबसे बड़ी ताकत है। कहीं भी अनावश्यक अलंकरण या जटिलता नहीं है फिर भी हर पंक्ति में एक कसाव है। “सरकारी घोषणाएं… हरी-भरी लगती हैं” और “बही-खाते में लाल स्याही” जैसे रंग-बिंब कविता को दृश्यात्मक बना देते हैं और पाठक के मन में एक तीखा विरोधाभास पैदा करते हैं। यह विरोधाभास ही कविता की वैचारिक धार को मजबूत करता है। अंतिम अंश बेहद प्रभावशाली और झकझोर देने वाला है। किसान की व्यक्तिगत त्रासदी का “आंकड़ा” बन जाना समकालीन मीडिया और समाज की संवेदनहीनता पर गहरी चोट करता है। यहाँ कविता अपनी चरम संवेदना पर पहुँचती है व्यक्ति की पूरी जिंदगी और संघर्ष एक पंक्ति की खबर में सिमट जाता है। यह समापन पाठक को भीतर तक असहज कर देता है जो किसी भी सफल सामाजिक कविता की पहचान है।
समग्र रूप से यह रचना भाव और विचार के संतुलन का अच्छा उदाहरण है। इसमें करुणा है लेकिन करुणाजन्य भावुकता नहीं है। आक्रोश है पर शोर नहीं। यदि कहीं थोड़ा और विस्तार संभव है तो किसान के निजी जीवन या पारिवारिक आयाम के कुछ और बिंब जोड़कर संवेदना को और गहरा किया जा सकता है लेकिन अपनी वर्तमान संरचना में भी यह कविता एक तीखी, ईमानदार और समकालीन हस्तक्षेप की तरह सामने आती है।