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श्यामल भट्टाचार्य |
कुमार शाश्वत अनुवादक और लेखक। बांग्ला और अंग्रेजी से हिंदी में लगभग चालीस कहानियों सहित तीन उपन्यासों का अनुवाद। |

बाथरूम का शावर चालू करके बहुत देर तक तमाल उसके नीचे खड़ा रहा। दरवाजे के छेद से आती हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी के स्वर और अल्लारखा खां के तबला के बोल के साथ वह भीगता रहा। इस स्वर्गीय जुगलबंदी के ताल से ताल मिलाकर उसके ब्रह्मतालु पर तबला बजता रहा। बंद आंखों में दृश्य बदलता रहा।
कई साल पहले स्कूल के दिनों की बात है, कबड्डी खेलते-खेलते मैदान में पानी भर जाता था। घास डूब जाती थी, शरीर से सब घास-मिट्टी धुल जाती थी, पर मूसलाधार बारिश चलती रहती है। वे सब तब स्कूल के बरामदे में आकर बनियान उतार देते थे। उसके बाद पैंट भी उतार देते थे। बनियान से सिर और बदन पोंछते हैं। वह, डाबूल, प्रदीप, दयामय सभी एक कतार में खड़े होकर पेशाब करते थे। किसकी धार कितनी दूर जाती है, इसकी प्रतियोगिता चलती थी। कभी-कभी वर्षा की बूंदें मोतियों की तरह छलक उठती थीं। इसी तरह की सतरंगी छटा वे एक-दूसरे को दिखाते, कितना मजा आता इस खेल में!
तभी छाता लिए दूर बाजार की तरफ से एक लंबे फ्रॉक वाली लड़की को वापस लौटते देख फटाफट सभी ने पैंट पहन लिया।
उस दिन हाबूल का पैंट उसने पहन लिया है, डांबूल ने उसका या किसी और का पहन कर बारिश में दौड़ लगाया कि तभी बड़े रास्ते पर आकाश फट कर बिजली चमकी। आंखों को चौंधिया देने वाली बिजली की चमक में उनलोगों ने हाबूल को धधकते और भयंकर आर्तनाद के बीच उसको फटकर बिखरते देखा था। फ्रॉक वाली लड़की का चीत्कार और उसके बाद मूसलाधार बारिश में उन काले अवशेषों का धुलते जाना वह आज भी भूल नहीं पाता। हाबूल उसकी कई चोरियों में साझीदार था। कबड्डी का सबसे बड़ा प्रतियोगी था। प्रायः सारा कोर्ट कबड्डी-कबड्डी करके दौड़ सकता था। उसके बाद जीवन में बिजली कितनी ही बार क्यों न गिरे, हर बार वज्रपात के दृश्य या गर्जना में वह मिला रहता। उस लड़की की भयंकर आर्तनाद और मूसलाधार बारिश में घुलता जाता हाबूल का धधकता शरीर! सोचते-सोचते वह भीगता रहा। भीगने के अलावा और कोई उपाय नहीं सूझा। इसी तरह एक नया दर्शन पंख फड़फड़ाता है। यह दर्शन जीवन-मृत्यु की सूक्ष्म सीमा रेखा की तरह सत्य और सर्वव्यापी है।
शांतिपुर रेलवे स्टेशन से माईल भर दूर रेलवे की जमीन पर पनप उठी गंदी बस्ती में एक घर खोजते समय नाक पर रुमाल रखना पड़ता है। कुछ एक दिन पहले हुई बारिश का जमा पानी, कीचड़ और सुअरों के झुंड की दौड़-भाग में बचकर चलना मुश्किल है।
तमाल जब वापस लौटने ही वाला था, तभी एक झुग्गी से निकलकर सुरेंद्र मजुमदार ने हँसते हुए कहा- मैं तितना थौभाग्यवान हूँ थर, आइए आइए! ‘स’ का सारा उच्चारण वे ‘थ’ करते हैं। उनके चेहरे पर नजर पड़ते ही तमाल को कुछ शंका हुई। वह गर्दन झुकाकर छोटे दरवाजे से अंदर आकर चौकी पर बैठा।
पक्षाघात से पीड़ित सुरेंद्र मजुमदार की स्त्री बिस्तर पर पड़ी थी। घर में खटमलों की बदबू फैली थी। इस परिवेश में तमाल ने उनको मिठाई लाने से मना कर दिया। चाय के लिए भी। ‘इंक्वायरी करते समय कुछ भी खाने की मनाही है, बुरा मत मानिएगा! इसके अलावा और भी कई जगह जाना है।’ यह उसका पुराना डायलॉग है, किसी के चेहरे की तरफ देखे बिना पूछताछ करनी होती है।
तमाल ने बिना समय बर्बाद किए रटा-रटाया प्रश्न शुरू कर दिया-
‘मजुमदार क्या आपके बाप-दादाओं की उपाधि है या किसी से प्राप्त है?’
‘जी, बाप-दादाओं की उपाधि है!’
‘आप लोग कहां के मूल निवासी हैं? गोत्र क्या है? मामाओं का गोत्र क्या है? उनकी उपाधि क्या है?’
वह अपने गंजे सर को खुजलाते-खुजलाते जवाब देते जाते। जीभ लगभग कटी होने की वजह से उनका उच्चारण ठीक-ठीक समझ नहीं आता। तमाल समझ गया कुछ गोलमाल है। फिर भी उनकी दुर्गति देखकर कोई सुराग पाने के लिए फिर पूछता। ‘विवाह के समय आप लोगों में क्या लड़का-लड़की के चारों तरफ घूमता है या लड़की-लड़के के चारों ओर घूमती है? पीढ़े पर बैठाकर घुमाया जाता है या चलाकर? सिंदूरदान का तरीका क्या है? ललाट से मांग की तरफ जाएगा या मांग से ललाट की तरफ उतर आएगा? लड़का-लड़की की तरफ देखकर सिंदूर डालेगा या पीछे मुड़कर? मरने पर उत्तर की तरफ सर रखकर सुलाया जाता है या दक्षिण की तरफ?’
तभी अचानक झुग्गी के अंधकार से महिला के कराहने की आवाज आई। तमाल हतप्रभ रह गया। अनुरोध भरे स्वर में उस आदमी ने कहा, ‘थार, मरने की बात मत कीजिए, स्त्री को हाबूल की याद आती है! हाबूल बड़े स्नेह से पला था, वज्रपात में….।’ तमाल चौंक उठा, यह परिवार यहां पर कैसे आया? महिला अब भी रो रही थी। कुछ अप्राकृतिक-सा लगा यह रोना! तमाल ने पूछा ‘हाबुल अब कहां है?’
इस बार उस आदमी के चौंकने की बारी थी।
‘आप?’
तमाल ने अपना परिचय दिया। उसके बाद ही पिछले बीस वर्षों में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के सर्वहारा होने की दास्तान सुनी। काम की खातिर त्रिपुरा से शांतिपुर आना और फिर दुर्भाग्य का पंजा… । सुनते-सुनते तमाल की आंखें भर आईं, सिर भारी हो गया।
घर पहुंचकर रिसले साहब की किताब लेकर बैठ गया। पिछली शताब्दी के श्रेष्ठ मानव विज्ञानी एच एच रिसले ने लिखा है- बंगाल और उड़ीसा के धोबी अपने आप को नेता मुनि या नेता धोबी के वंशज होने का दावा करते हैं। नेता शायद सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के कपड़े धोया करते थे जबकि एक और कहानी में धोबामुनि के लड़के नेता की बातें सुनने में आती हैं।
एक दीर्घ ‘कक-कक्को’ की आवाज पर पास बैठकर चित्र बनाती रीया, उसको हिलाकर पूछती है, ‘बाबा! तक्षक नाग क्या डायनासोर के वंशज हैं?’ तमाल क्या जवाब दे, समझ नहीं पाता। पिछले शनिवार को तमाल और श्रीला उसको साइंस सिटी घुमाकर लाए हैं। विभिन्न प्रजाति के डायनासोर के प्रतिरूप की स्मृति अब भी उसके मन में जीवित है। तक्षक या किसी और सरीसृप के चेहरे में समानता होने के बावजूद इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि डायनासोर ही इनके पूर्वज थे। फिर भी मनुष्य-मन किसी जीवाश्म प्राप्त ढांचा, अंडे या परी कथा या किसी पुरानी कहानी से अपना संबंध जोड़ता है। शायद इसलिए धोबी लोग धोबामुनि के लड़के नेता को अपना पूर्वज मानते हैं। एक दिन नेता नदी में अपना कौपीन धोने गया और किसी कारण देर कर बैठा। देवताओं की पूजा का लग्न बीत गया। उस दिन उसी के फूल लेकर आने की बात थी। अन्य भक्तगण इस अक्षम्य अपराध के लिए उसे दंडित करते हैं। नेता समाज से पतित हो जाता है। उस दिन से वह और उसके वंशज सभी का गंदा कपड़ा धोने का काम करते हैं।
इसी तरह की और भी कई कहानियां हैं। पूर्वी बंगाल के राम का धोबी, सीता का धोबी, मध्य बंगाल में सातिस-आतिस, हाजार समाज और नीतिसीन लोगों को लेकर अलग-अलग कहानी है। हुगली, नौवाखाली व मानभूमि के अलग-अलग संप्रदाय के धोबियों को लेकर अलग-अलग किंवदंतियां प्रचलित हैं, पर हर कहानी में एक अविश्वास नजर आता है। नाइयों की तरह कोई गुप्त बात पूरे समाज के हर स्तर पर एक कान से पांच कान करना और ठीक समय पर कपड़े लत्ते वापस नहीं करने की कहानियां कई रूपों में पाई जाती हैं पर किसी भी कहानी में गधे का जिक्र नहीं है।
सुरेंद्र काकू के जाति-प्रमाण पत्र पर ‘धोबी’ लिखा है। ये ‘धोबी’ लोग बिहार के गधे वाले धोबी होते हैं। हाबुल का सर्टिफिकेट बनवाने के लिए सुरेंद्र काकू 1963 में जारी किए गए अपने सर्टिफिकेट की फोटो कॉपी देते हैं। उसे देख कर तमाल का मन खराब हो गया। सुरेंद्र काकू क्या घूस दे रहे हैं? अन्यथा किसी तरह यह पाना संभव नहीं था।
शायद यह भी हो सकता है कि इंस्पेक्टर बिना ठीक-ठाक समझे…। ‘बाबा, आपने बताया नहीं कि तक्षक डायनासोर का वंशज है कि नहीं?’ फाइल से चेहरा बाहर निकालकर कृत्रिम मुस्कुराहट के साथ तमाल ने कहा, ‘ठीक से पता नहीं बेटे, हो भी सकता है?’
तक्षकों के बारे में विशेष कोई जानकारी तमाल को नहीं है। फिर वह तक्षकों के डायनासोर का वंशज होने का प्रमाणपत्र कैसे दे सकता है। आजकल जैसे-तैसे प्रशिक्षण देकर इंस्पेक्टरों को जाति प्रमाणपत्र के काम में लगाए जाने से सामान्य वर्ग वाले भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित- जनजाति का प्रमाणपत्र प्राप्त कर ले रहे हैं और दूसरों की तुलना में ज्यादा सुविधाएं बटोर रहे हैं। यह सब सोचते-सोचते उसे एक घटना याद आई। पहले अपने आप मुस्कुराया फिर बिस्तर पर पड़े-पड़े अकेले ही हँसी आई। स्वेटर बुनते-बुनते श्रीला ने पूछा ‘क्या हुआ?’
‘पूछो मत, अचानक एस डी ओ साहब की बातें याद आ गईं।’
‘तुम्हारा एस डी ओ क्या खूब रसिक है। अरे, ना ना एकदम गऊ है। पिछले सप्ताह ही ज्वॉइन किया तो इस किताब की जरूरत पड़ी। कहीं और नहीं मिला तो उनके पास जाकर पूछा, सर यहां रिसले है क्या? उन्होंने गंभीर स्वर में जवाब दिया, पता नहीं संभावना कम है, सब जगह हर प्रकार की जाति नहीं पाई जाती…।’
उसकी बात सुनकर श्रीला भी हँस पड़ी, फिर कहा, ‘उसके बीवी-बच्चे हैं, तुम्हारी तरह घर का खाकर जंगल में भैंस चराने का समय नहीं है। क्या फायदा है उसको जाति या गोत्र की विशेष जानकारी जुटाकर! श्रीला के इस बेरुखे जुबान से तमाल तैश में आ गया। वाह! सर्टिफिकेट तुम साईन करोगे और न्यूनतम साधारण जानकारी से भी नदारद रहोगे!’
हवा गर्म देख श्रीला ने बात नहीं बढ़ाई। रिया का खाना निकाला। तक्षक और मनसा की कहानी सुनाने लगी। खाना खाकर, मच्छरदानी लगाकर उसने मनसा, चांद-सौदागर और बिहुला- लखंदर की कहानी शुरू की। इस घोर विज्ञापन के युग में श्रीला को मां की भूमिका में देखकर अपना शैशव याद आता है। मृत लखंदर को लेकर केले की नाव पर बैठी बिहुला कैसे कितने ही नदी नाले को पार करके नेता धोबी के घाट पर पहुंचती है, यह एक रोमहर्षक कहानी है। इसी तरह युगों से जल-जंगलमय इस प्रदेश के शिशु कहानी सुन-सुन कर मंगलकारक चरित्रों का आधुनिक संस्करण बनते रहे हैं।
श्रीला के मुंह से नेता धोबी की कहानी सुनकर तमाल ने फिर धोबी प्रसंग पर सोचना शुरू किया। उसके निर्णय पर एक गरीब परिवार की रोजी-रोटी निर्भर है। शेड्यूल कास्ट का सर्टिफिकेट बाबुल को कुछ वर्षों में नौकरी दिला सकता है। आजकल वह लोकल ट्रेन में हॉकरी करता है। सुरेंद्र काकू का सर्टिफिकेट देखकर आसानी से सर्टिफिकेट जारी किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल के गजट नोटिफिकेशन संख्या 368 (आदिवासी कल्याण) 31 मई 1995 के अनुसार रक्त संबंध वाले किसी के पास प्रमाण पत्र होने पर नए प्रमाण पत्र के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। किंतु तमाल को यह सर्टिफिकेट ठीक-ठाक नहीं लगता।
दीवार घड़ी ग्यारह बजाती है। श्रीला पूछती है, ‘क्या बात है, आज खाना-सोना नहीं है क्या? मैं अब जाग नहीं सकती!’
उसकी बात सुनकर तमाल फटाफट फाइल समेटकर उठा। रिया पास में ही कब की सो चुकी थी। श्रीला ने उठकर खाना लगा दिया, हाथ धोकर तमाल खाना खाने बैठा।
खाते-खाते सोचता है, चांदमोहन को इस तरह बहुतों ने धमकी दी थी। सुरेंद्र काकू या बाबुल इस समय उसके सामने होते तो निर्णय लेने में काफी आसानी होती।
प्रत्येक आदमी के जीवन में कुछ न कुछ समस्या होती है। बार-बार तमाल के जीवन में भी उलझनें आती हैं। वह किसे महत्व दे? न्याय-नीति या मानवता! हमेशा वह नीति को चुनकर सत्य का रास्ता अपनाता है। ऐसे ही अपने आप को तसल्ली देता है, पर विवेक का दंश कांटे की तरह उसके सीने में चुभता रहा।
श्रीला ने कहा – ‘धर्मपुत्र! मां कहती है वंशानुगत चरित्र! पीढ़ियों से वे ऐसे ही हैं, तभी वंश की उन्नति नहीं हो पाई! न्याय-नीति की पराकाष्ठा पर पहुंचने के बाद भी ये लोग वंशानुक्रम में सबके शत्रु हैं।
पर अब माहौल अलग है। हाबूल की मृत्यु की पहली बरसी के अगले दिन हाई वोल्टेज पर काम करते समय सुरेंद्र काकू दुर्भाग्य के दूसरे झपट्टे से झुलस गए। लगातार छह महीना अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। पांच साल के बच्चे बाबुल को लेकर उसकी मां अस्पताल के करीब एक बस्ती में किराए पर कमरा लेकर पति की देखभाल करती रही। पर सुरेंद्र काकू फिर किसी काम के न रहे। एक आंख सहित एक तरफ का चेहरा प्लास्टिक के एक ढक्कन जैसा हो गया। सिर्फ बाईं आंख लेकर ट्रेन में विकृत आवाज में गाना गाकर भीख मांगते हैं। तमाल को बहुत दुख होता है। सुरेंद्र काकू बहुत ही परिश्रमी और दक्ष इलेक्ट्रीशियन थे, पर उनकी नौकरी स्थाई न थी। यही वजह है कि आज पेंशन या अन्य कोई आय नहीं है, केवल चिकित्सा की सुविधा और एकमुश्त 25 हजार रुपए मिले।
फिर भी बड़े कष्ट से बाबुल को आठवीं तक पढ़ाया, उसके बाद पढ़ाना संभव न हुआ। रेलवे स्टेशन तक छोड़ने आकर बात-बात में अचानक उनके शर्ट खोल देने पर तमाल ने देखा, दाहिनी तरफ छाती पेट सब सपाट है। कुछ-कुछ प्लास्टिक के ढक्कन की तरह मुड़तुड़ कर वीभत्स हो गया है। देखने की हिम्मत नहीं होती। तमाल को मतली आने लगती है।
बिस्तर पर लेटकर आंख बंद करते ही वह भयंकर चेहरा नजर आता है। मन ही मन कितनी बातें सोचता है, आ जा नींद आ जा! फूल, पक्षी, लताएं, पेड़-पौधे, जीव-जंतु अथवा नारी शरीर श्रीदेवी, माधुरी या हॉट केक ममता एक-एक कर सब दिमाग में आते हैं, पर नींद नहीं आती। सबके ऊपर एक आंख वाले सुरेंद्र काकू का वीभत्स चेहरा छाया रहता है। करवट बदलते-बदलते एक बार इच्छा हुई कि श्रीला को जगाकर प्यार करे पर दिमाग में इस तरह के दृश्य घूमते रहने से वह कुछ भी नहीं कर पाता।
तमाल बिस्तर से बाहर आकर हवा खाने लगा है। उसके बाद स्टोर की बत्ती जलाकर पुराने टिन के बक्से से अपने स्कूल के दिनों की स्मृति में लिपटा एक-एक सामान हटाकर आखिरकार बाहर निकाला नीले रंग का वह हाफ पैंट। नाक के पास ले जाकर उसकी गंध महसूस करने की कोशिश की। नेप्थलीन मिश्रित गंध में वह हाल की महक को पाने की चेष्टा करने लगा। आखिरकार फिर पैंट को तह करके उसने वापस बक्से में रख दिया। उसके बाद बरामदे में निकलकर चहलकदमी करने लगा। फिर सिगरेट जलाया, सिगरेट खत्म होने पर बाथरूम गया। वापस आकर पानी पीया, फिर सिगरेट, फिर चहलकदमी। दीवार घड़ी रात दो बजे का घंटा बजाती है।
उसने एक निशाचर पक्षी के पंखों की फड़फड़ाहट सुनी। न जाने कब से नजदीक के किसी वृक्ष या मकान के मुंडेर से उस पक्षी की करुण पुकार सुनाई पड़ रही है। कहां से पुकार रहा है वह पक्षी? पंखों की फड़फड़ाहट से लगता है बहुत करीब से। उनके कदंब के पेड़ पर या कर्निश पर बैठा है वह! वह पक्षी आधी रात को पंख क्यों फड़फड़ा रहा है? वह अपने घोंसले में जाकर सो क्यों नहीं जाता? उसे कैसी बेचैनी है? सुबह होने पर कर्निश और कदम के पेड़ को ठीक से देखेगा! दीवार घड़ी तीन का घंटा बजाती है।
तमाल को याद आई चांदमोहन दास की बातें। तमाल के पहले यहां पर जाति एवं आदिवासी कल्याण इंस्पेक्टर के पद पर था चांदमोहन। बड़ी जिम्मेदारी से अपना काम करता था। बाप-चाचाओं का एस सी, एस टी का सर्टिफिकेट है ऐसी कई दरख्वास्तों को उसने गलत साबित किया है। पहले धमकी फिर राजनीतिक दबाव इत्यादि कई तरीकों से उसको दबाने की कोशिश की गई। आखिरकार शुरू हुई प्रशासनिक कार्रवाई। एक दिन एस डी ओ ने उसे बुलाकर कहा, ‘क्यों झमेला करते हैं, मैं दस्तखत कर रहा हूँ फिर आपको क्या परेशानी है। आप चुपचाप अपना काम कीजिए!’ चांदमोहन ने हँसकर कहा, ‘आप अथॉरिटी हैं, आप जरूर ऐसा कर सकते हैं, पर मैं अपना रिमार्क्स नहीं बदल सकता!’
इस घटना के बाद, सात दिन के भीतर चांदमोहन का तबादला मयनागुड़ी हो ही गया। उनकी जगह यहां आकर तमाल भी अब रिसले ढूंढ़ रहा है। साहब को यह अच्छा नहीं लगता। वे कहते हैं, ‘आपलोगों को क्या प्राण का भय नहीं है? शांतिपूर्वक जिंदा रहने देंगे कि नहीं? इतने कम वेतन में इतना अधिक सिर दर्द क्यों लेते हैं, समझ में नहीं आता!’
तमाल ने हँसकर कहा, ‘सर टी एन शेषन ने कहा है कि अनेक राज्यों की जनसंख्या से मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। हमलोग अगर मुकी-मुलकी की तरह सर्टिफिकेट देने लगेंगे तो…।’
उसकी बातें खत्म होने के पहले ही एस डी ओ साहब ने झल्लाकर कहा, ‘जाइए, अपना काम कीजिए, मुझे भाषण सुनने की आदत नहीं। देख रहा हूँ, आप भी चांदमोहन के ही चेला हैं। जाकर जल्दी-जल्दी फाइलें निबटाइए!’ तमाल आहत मन से लौट आया।
पर चांदमोहन की सीख को किसी भी तरह वह भूल नहीं पाता। कोशिश करके भी वह चालीस से ज्यादा दरख्वास्त क्लियर नहीं कर पाता, उल्टे कलकत्ता स्थित कल्चरल एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर शेड्यूल कास्ट एंड सिड्यूल ट्राईब के दफ्तर में गाइडलाइन व निर्देश के लिए उसने लिख भेजा। इंस्पेक्टरों द्वारा निर्देश के लिए कलकत्ता भेजने का मतलब है दरख्वास्त की अंतिम यात्रा तय है। उसके बाद छह महीने गुजर जाते हैं, तमाल हर एक केस की पूरी पड़ताल करता है, अब तक कोई भी जाली केश नहीं मिला और जब मिला उसकी आंखों की नींद उड़ गई। सारी रात चहलकदमी कर के गुजारनी पड़ी। कुछ घंटों के बीच फेफड़े में सिगरेट का निकोटीन भर गया।
सिर भारी हो गया। कंधे पीठ और सारे बदन में एक बेचैनी पैठ गई, कमरे में आकर उसने पानी पिया। डायनिंग टेबल पर रखे फ्लावर वेसिल में रखे बासी रजनीगंधा से मृत्यु की गंध आ रही है। उसके पेट में हलचल-सी हुई। जल्दी से टूथ ब्रश में पेस्ट लगाकर बाथरूम में घुस गया। सुबह एक बोतल पानी पीने से तमाल का पेट एकदम साफ हो जाता है। यह भी चांदमोहन की सीख है। हॉस्टल में रहकर एम ए करते समय तमाल कब्जियत से परेशान था। अक्सर पेडू में दर्द रहता। एक दिन चांदमोहन ने उसको पानी पीने की आदत बदल कर देखने की सलाह दी।
नींद से उठकर चाय न पीकर पानी पीना, दोपहर का खाना खाने के पहले पानी पीना, खाते समय या खाने के बाद आधा घंटा तक पानी नहीं पीना। उसके कहे मुताबिक पानी पीने की आदत बदलने में बहुत परेशानी हुई पर बाद में उसको अभ्यास हो गया। चमत्कार की तरह कब्ज भी जाता रहा। फिर पेडू के दर्द ने उसे कभी कष्ट नहीं दिया।
चांदमोहन के परिवार में सभी की उपाधि ‘दास’ थी और उनका एस.सी. सर्टिफिकेट भी था। एम. ए. करते समय ही उसने एक दिन यह ढूंढ़ निकाला कि असल में वे लोग एस. सी. नहीं हैं। नतीजतन कोर्ट में उनलोगों ने ‘एफिडेविट करके अपना एस. सी. सर्टिफिकेट चेंज करवाकर अपनी उपाधि ‘दास’ से ‘दाश’ करवा ली। पश्चिम बंगाल सिविल सर्विस की यह नौकरी भी उसने जनरल कैटगरी से प्रतियोगिता परीक्षा पास करके ली है। एस. सी. होने पर इतने दिनों में प्रमोशन पाकर कहां पहुंच गया होता। पर उसके अनुसार सिर उठाकर जीने के लिए जरूरी आत्मसम्मान को शुरुआत में ही ठोकर मारकर चूर-चूर कर देता है यह आरक्षण! यह मनुष्य को किसी जाति विशेष या उपजाति के रूप में विकसित नहीं होने देता। चांदमोहन मनुष्य द्वारा यह सुविधा ग्रहण करने से घृणा करता है। कलकत्ता के रास्तों पर भीड़ के साथ चलते-चलते ऐसे ही कई विषयों पर बातें होती रहतीं। इसी तरह मन ही मन एक आदर्श बन जाता है। तमाल के मन में यह बैठ गया है।
दफ्तर में फाइल खोलकर बैठने पर भी चांदमोहन की बातें याद आतीं। सोचते-सोचते उसके साथ वह गहरी एकात्मकता महसूस करता है। स्नान के बाद सुबह दो घंटा सोकर तमाल दफ्तर आया। पिछले चार-पांच घंटे में चालीस के करीब केस पर रिमार्क लिख चुका था। प्रत्येक चौदह-पंद्रह दिन के बाद एक दिन बैठकर उसने चौदह-पंद्रह दिन की जांच-पड़ताल पर रिमार्क लिखा है। बाबुल के केस का भी आज ही निर्णय लेना है, सोचकर उसने फाइल टेबल पर रखी। बाकी दूसरे केस पर सर्टिफिकेट इश्यू करने के लिए फाड़कर फाइल उसने बंद कर दी।
उसके बाद बचा केवल बाबुल का केस। एक मधुर घूघू का स्वर सुन, सर उठाकर उसने देखा, दरवाजे के सामने बरामदे के बाहर कोलतार की सड़क पर हाथ जोड़कर देवता के मंदिर के सामने खड़े हैं सुरेंद्र काकू। एकटक उसकी तरफ देख रहे हैं। क्या वह जादू टोना जानते हैं, ठीक इसी वक्त यहां पर आकर खड़े होने का मतलब! तमाल ने घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया। ‘बिजू, एक कप चाय और सुनो, वह आदमी वहां क्यों खड़ा है?’ तमाल को सिर दर्द महसूस हआ, उसकी झल्लाहट उसके आवाज में उतर आई।
‘सर, वे आपसे मिलना चाहते थे, पर आप तो केस लिखते समय किसी से नहीं मिलते, इसलिए आने नहीं दिया। तब से ऐसे ही वहां खड़े हैं।’
तमाल कहता है, ‘उसे अभी जाने को कहो, बाद में आकर पता करे!’
बिजू सर हिलाकर निकल गया। तमाल ले पानी पिया, लगता है घूघू का स्वर उसके टेबल के करीब से या खिड़की के पीछे से आ रहा है। टेबल पर जोर का एक मुक्का मारते ही पाउडर की तरह का कुछ नीचे भरभराकर गिरा। क्षण भर के लिए भी घूघू का स्वर बंद नहीं हुआ। वह बेफ्रिक है। इस दफ्तर और साथ लगे महकमे के भवन के सभी फर्नीचर, खिड़की और दरवाजे का यही हाल है। कुछ-कुछ दिन बाद कीटनाशक का स्प्रे किया जाता है, पर नोनी लगे दीवार और आर्द्र जलवायु में कीटनाशक की गंध से कर्मचारियों का सिर भारी होने के अलावा कोई विशेष लाभ नहीं होता। दीवार पर सीलन से बना अलग-अलग देश का मानचित्र, कई तरह के नदी-नाले उकेर देने वाले मच्छर, खटमल और घुन की वंशगति पर कीटनाशकों का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता।
कभी-कभी उसे लगता, कीटनाशकों के प्रयोग से ये कीट खतरनाक और जहरीले हो गए हैं। कुछ सौ कीटों के तत्क्षण मृत्यु से आनंदित होना मूर्खता है, कुछ दिन बाद ही कई करोड़ नए कीटों का आविर्भाव होगा। अपने संविधान की संरक्षण पद्धति की तरह इन सब कीट-पतंगों के साथ मनुष्य के सह-अस्तित्व के विषय पर विचार-विमर्श की जरूरत है, कोई जैव पद्धति ही एकमात्र इसका समाधान हो सकती है। जिन नालों और गड्ढों में मच्छर अंडे देते हैं और जहां उनका जीवन चक्र संपूर्ण होता है, उन सब जगहों पर मछली या कोई सरीसृप पाला जाना चाहिए, जो इनको खा जाए। इसी तरह घुन, खटमल और जूं के विनाश के लिए भी सोच विचार किया जाना चाहिए।
चाय पीकर कपाल, गर्दन और दोनों बाहों का पसीना पोंछता है तमाल। कितनी असहनीय उमस है! बहुत देर से बिजली गुल है। सर पर विशाल सीलिंग फैन रुका पड़ा है। अनायास ही तमाल को याद आया रेलवे लाइन के किनारे की झोपड़पट्टी। नीची जमीन पर फैला गंदा पानी, कीचड़ और एक झुंड सुअरों की भाग-दौड़। बिना खिड़की के बांस के बेड़े से बनी झोपड़ी में बिस्तर की दुर्गंध व पक्षाघात ग्रस्त महिला की कराह। उसका छटपटाना!
उफ ! तमाल पागल हो जाएगा। प्रचंड सिर दर्द हो रहा है। चाय पीकर भी आराम नहीं मिला। वह बाबुल के केस को पेंडिंग में डालकर बैग लेकर चल पड़ा। रात को मयनागुड़ी में टेलीफोन करके चांदमोहन से एक बार ठीक से बात करनी होगी।
आज लोकल ट्रेन में स्नायु तंत्र के साथ-साथ पेशी तंत्र का इस्तेमाल करके यात्रा करना ज्यादा असहज मालूम पड़ता है, लगभग रोबोट की तरह चलकर घर लौटा। बरामदे में खड़ी श्रीला ने पूछा, ‘तलवे का चमड़ा निकल गया क्या?’
‘वह तो कल ही निकल गया था। अभी खूब तेज सिरदर्द हो रहा है।’ शर्ट खोलकर तमाल फर्श पर चित लेट गया। श्रीला ने सीलिंग फैन चला दिया, उसने आंखें मूंद लीं, उसके बाद ही अतल गहराइयों में डूबता चला गया। मछली या सरीसृप की तरह कुछ देर तैरता रहा, पानी के हिलोर से शैवाल हिला। गाल या हाथ के तलवे में किसी की छुअन या कोई रंग लग गया। छोटे-बड़े सीप या घोंघेनजर आए, कुछ और रंगहीन प्राणी तैरते रहते हैं। एकदम जेलि फिश की तरह असंख्य रंगहीन उद्भिज मिट्टी को जकड़े हुए हैं। तमाल के करीब पहुंचते ही पानी में उठने वाली लहर से वे हिल गईं। उस लहर के ऊपर से तैर कर आया अद्भुत प्राणी! भय से तमाल और नीचे उतरकर एकदम जमीन के साथ सटकर हल्के घास की तरह दिखा। जबकि विशालकाय तक्षक की तरह का प्राणी नीचे उतरा। यह क्या किसी प्रागैतिहासिक तक्षक या डायनासोर का वंशज है! वह कितना करीब लगता है जबकि कितने करोड़ वर्ष दूर है। दूर, फिर भी स्पष्ट दिखता है, उस प्राणी की एक आंख नहीं है, आधा शरीर झुलसकर विकृत हो गया है। तमाल के पेडू में दर्द हुआ, लगा अब जिंदा नहीं बचेगा! तभी कहीं से एक झुंड कीड़े-मकोड़े तैरकर चारों तरफ से उस विशालकाय तक्षक के शरीर पर टूट पड़ते हैं। तक्षक इधर-उधर छटपटाता रहता है। विशाल जबड़ा खोलकर उनको निगलना चाहता है, पर जहरीले कीड़े उसके खुले मुंह, नाक और आंख से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उसके बाद ही इन कीड़ों या विशालकाय तक्षक के शरीर से एक तरह का गाढ़ा रंग निकलकर छा जाता है। कुछ भी दिखाई नहीं देता। हवा में बदबू भर गई। बिल्कुल उस झोपड़पट्टी के कीचड़ में सुअरों का लोटना और बिना खिड़की के बांस के बेड़े की झोपड़ी में खटमलों की बदबूदार महक की तरह।
दुर्गंध और अंधकार! वह दिशाहीन होकर जिस तरफ शरीर जाए दौड़ने लगा। उसके बाद किसी ने उसे छूकर जगाया। उसके बहने की गति कम हो गई। दृश्य बदला। एक जलपरी ने आकर उसका कपाल छूआ। वह तमाल की आत्मजा है, करीब बैठकर उसने सर दबाया। श्रीला ने टेपरिकॉर्डर चालू किया है, उस्ताद अल्लारखा खां और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया की जुगलबंदी! इस क्षण के लिए वह पत्नी श्रीला का ऋणी हो गया। उसने उठकर रिया को गोद में बिठा लिया, फिर जूते उतारकर, कपड़े खोलकर स्नान करने चला गया।
तबले और बांसुरी की स्वर्गीय जुगलबंदी ने शावर के पानी के फुहारे में मिलकर तमाल को तरोताजा कर दिया। वह सोचने लगा, अब जाति आधारित आरक्षण समाप्त करके आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए सुविधा उपलब्ध कराना उचित होगा। नहीं तो सुरेंद्र काकू की तरह के लोगों का जिंदा रहना संभव नहीं है। ऐसे ही न्याय-नीति और विवेक के मेलजोल से एक नए दर्शन ने मूर्त रूप लिया है। यह जीवन दर्शन जिंदा रहने और मर जाने के बीचों-बीच एक सूक्ष्म सीमा रेखा की तरह अमोघ है। अब से उसका हर एक निर्णय अपेक्षित है। आस्तित्व के लिए संघर्ष के महत्व को समझना होगा।
अब चांदमोहन से बात करने का कोई प्रयोजन वह महसूस नहीं करता। शरीर पोंछकर स्थिर कदमों से वह कमरे में लौटा। कैसेट खत्म हो गया है, पलटना होगा। अचानक निस्तब्ध हो गए समय को चीरकर एक तक्षक बोल पड़ा। कर्कस पर बहुत ही करुण और कातर स्वर में तमाल ने बेटी को बुलाकर कहा, ‘बेटी, तक्षक डायनासोर का ही वंशज है।’ थोड़ा रुककर गहरे उच्छवास के साथ उसने कहा, ‘कुछ दिन बाद शायद यह भी पृथ्वी पर जिंदा न बचे। मनुष्य के संविधान में उनके संरक्षण का कोई उपाय नहीं है।’
पिता के मुंह से अजीब-सी बातें सुनकर रिया अपनी आंखें बड़ी-बड़ी करके उसका अर्थ समझने की कोशिश करने लगी।
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