30 साल तक पत्रकारिता के बाद स्वतंत्र लेखन।तीन कहानी संग्रहखाली कॉफी हाउस’, ‘उसके साथ चाय का आख़िरी कपऔर स्माइल प्लीज़प्रकाशित।

घर में मेरे हिस्से एक छोटा-सा टुकड़ा आया है।पांच फिट गुणा छह फिट होगा।मैं दिन भर यहीं बैठा सांस लेता हूँ।इस हिस्से में सामने वाली दीवार के साथ एक कंप्यूटर टेबल लगी है और उसके सामने एक प्लास्टिक की कुर्सी।टेबल पर कंप्यूटर रखा है।मैं दिन भर कंप्यूटर पर काम करता रहता हूँ।कम से कम घरवाले यही समझते हैं कि मैं काम कर रहा है।कंप्यूटर के सामने वाली दीवार पर सटे लोहे के दो रैक्स रखे हैं।ऊंचाई में ये चार-चार फिट के होंगे।कंप्यूटर के दाईं दरफ दीवार में ही लकड़ी की अलमारियां बनी हुई हैं।छोटी-छोटी।उन्हें खोलने के लिए फर्श पर बैठना पड़ता है।कंप्यूटर के बिलकुल साथ इनवर्टर लगा है।यहां लाइट बहुत जाती है।गर्मी में बैठना मुश्किल होता है।इस छोटे-से टुकड़े में, जहां मैं बैठता हूँ, उसके ठीक सामने एक खिड़की है।खिड़की बंद ही रहती है।पत्नी का कहना है कि दिन भर धूल उड़ती रहती है और खिड़की के रास्ते भीतर आ जाती है।खिड़की के निचले हिस्से पर एक छोटी-सी पट्टी है।मैंने यहां किताबें लगा रखी हैं।जब किताबों की पूरी पंक्ति भर गई तो मैंने उनके ऊपर एक और पंक्ति में किताबें लगानी शुरू कर दीं।अब वह भी निचले हिस्से के बराबर आ चुका है।

मैं इसी तरह किताबें लगाता रहा तो एक दिन वह खिड़की दिखनी बंद हो जाएगी।सिर्फ यह अहसास होगा कि यहां कोई खिड़की थी।लेकिन अभी खिड़की दिखती है।दिखती ही नहीं, धूप के कुछ टुकड़े खिड़की से भीतर आते हैं और मेरे कंप्यूटर टेबल पर शरारत करते हैं।कभी वे किताबों पर बैठ जाते हैं और कभी कंप्यूटर के एक कोने में लटक जाते हैं।कभी-कभी तो धूप के टुकड़े चेहरे पर आ जाते हैं।मुझे अच्छा लगता है।मैं उनकी शरारतों का आनन्द लेता हूँ।कंप्यूटर टेबल के चारों कोनों पर भी किताबों का पहाड़ ऊंचा होता जा रहा है।रोज कोई न कोई किताब आती है और मैं पहाड़ के ऊपर रख देता हूँ।मैं इन ऊंचे पहाड़ों को देखकर खुश होता हूँ।कंप्यूटर के सामने रखे रैक्स में भी किताबें ठुंसी पड़ी हैं।मुझे अपने हिस्से में हर तरफ किताबें ही किताबें दिखाई पड़ती हैं।यह मेरा सुख है।निजी सुख।

घर में मुझे मिले इस छोटे से टुकड़े के बाईं तरफ एक कमरे के आकार की जगह है।वहां एक दीवान रखा है।दीवान के साथ भी एक खिड़की है।कंप्यूटर टेबल के ऊपर बनी खिड़की के समानांतर।वह खिड़की भी बंद है।उसमें भी लाइन से किताबें भरी पड़ी हैं।मेरे पास काफी किताबें हैं।लेकिन आश्चर्य की बात है कि मैं कभी किताबों पर जमी धूल साफ नहीं करता।मुझे धूल के साथ ही किताब अच्छी लगती है।पत्नी इसी बात से दुखी रहती है।वह कई बार कहती है, जब किताबों का इतना शौक है तो इन्हें साफ भी कर लिया करो।लेकिन मैं किताबों को कभी साफ नहीं करता।मुझे किताबें पढ़ना अधिक जरूरी लगता है।इसलिए पढ़ता रहता हूँ।मुझे हर नई किताब आने पर उसी तरह खुशी होती है जिस तरह पत्नी घर में नया टीवी, नया फ्रिज़, अवन, लकड़ी की नई अलमारी या अन्य सामान आने से खुश होती है।दोनों की खुशियां अलग-अलग हैं।दोनों साथ हैं।

किताबों के मोह में मैं हर तरह की बेईमानी भी कर सकता हूँ।करता रहा हूँ।यही वजह है कि मेरे पास दुनियाभर के पुस्तकालयों की किताबें हैं।ऐसा नहीं है कि मैंने ये सारी किताबें चुराई हैं।मैंने इन्हें बाकायदा इश्यू कराया और फिर वापस नहीं लौटाई।मैं किसी के भी घर जाता हूँ तो सबसे पहले उसका पुस्तकालय देखता हूँ।एक बार मुझे मेरे एक मित्र ने अपने घर बुलाया।मैं गया।उनका पुस्तकालय देखकर मैं दंग रह गया।मैंने मोपासां की संपूर्ण कहानियां (अंग्रेजी में) निकाली और लालच से उसे देखता रहा।मेरा मित्र मेरी आशंका समझ गया।उसने फौरन कहा, ये सारी किताबें पिता जी की हैं और वे किसी को कोई किताब उधार नहीं देते।मैं कुछ देर किताब हाथ में लिए सोचता रहा।फिर मैंने कहा, लेकिन मैं फोटोकॉपी तो करा सकता हूँ।तुम दो दिन के लिए मुझे दे दो, में फोटोकॉपी करा कर वापस कर दूंगा।और पिता जी को यह बात बताने की जरूरत नहीं है।मैं उनके घर से वह किताब ले आया।मैं जानता था कि मैं इस किताब को कभी वापस नहीं करूंगा।इस बात को तीस साल बीत गए।किताब अब भी मेरे रैक में लगी हुई है।मैं अकसर पीछे मुड़कर रैक्स को देखता हूँ।सोचता हूँ पता नहीं किताबें मुझे क्या देती हैं!

लोहे के रैक्स, कंप्यूटर टेबल और दीवार में बने खानों के बीच थोड़ी-सी खाली जगह छूटी हुई है।इस जगह का यूं तो कोई उपयोग नहीं है, लेकिन जब मैं कंप्यूटर पर काम करते हुए थक-सा जाता हूँ, तो इस जगह पर इस तरह खड़ा हो जाता हूँ मानो यही मेरी धुरी हो।मैं अधिकांश समय अपनी धुरी पर ही रहता हूँ।पता नहीं मैं घूम रहा हूँ या धुरी।

एक दिन मैं कंप्यूटर पर कुछ काम कर रहा था।अचानक मेरी नज़र दाईं तरफ की खाली जगह पर पड़ी।मैंने देखा वहां कुछ सामान रखा हुआ है।एक बाल्टीनुमा ड्रम, उसके ऊपर एक बड़ी-सी टोकरी, जिसमें सब्जियां हैं, आलू और प्याज, उसके पास ही गत्ते के कुछ बॉक्स रखे हैं, इनके भीतर क्या है, मुझे नहीं पता।मुझे सिर्फ ये पता चला कि अब मैं अपनी धुरी पर नहीं रह सकता।इस तरह मेरे हिस्से की जगह पर भी नया या पुराना सामान रखा जाने लगा।एक और दिन मैंने देखा सामने वाली खिड़की पर किताबों के ऊपर खराब मोबाइल, चश्मे के खाली बॉक्स और कुछ खाली डिब्बे रख दिए गए थे।मैंने सोचा की शायद घर छोटा हो रहा है।या शायद सामान तेजी से बढ़ रहा है।अचानक मैंने बाईं तरफ देखा।वहां लकड़ी की एक छोटी-सी अलमारी दिखाई दी।ब्राउन रंग की यह अलमारी एकदम नई थी।अलमारी अकेली नहीं थी।उसके ऊपर अवन भी रखा हुआ था।जाहिर है अलमारी के भीतर भी सामान होगा।उसके बराबर में गत्ते के डिब्बों की कतार ऊपर की ओर जा रही थी।अब उस तरफ भी स्पेस कम होता जा रहा था।घर में स्पेस कम हो जाए तो चलने के लिए अभ्यास की जरूरत होती है।मुझे भी अब लग रहा था कि घर में चलना किसी रस्सी पर चलने जैसा हो गया है।जरा सा चूके और किसी चीज से टकराए।

एक दिन अचानक मुझे पत्नी के चीखने की आवाज सुनाई दी।चिल्लाते हुए वह कह रही थी, ये किताबें हमारी जान लेकर जाएंगी।मुझे समझ नहीं आया कि किताबें भला किसी की जान कैसे ले सकती हैं! मैंने पत्नी की तरफ देखा तो वह पैर पकड़ कर जमीन पर बैठी थी।लोहे का रैक उसके पैर में लग गया था।खून नहीं निकला था, लेकिन चोट लग गई थी।जाहिर है दर्द भी हो रहा होगा।पत्नी ने गुस्से में ही कहा, ‘इन रैक्स को बाहर निकाल दो, अब घर में जगह नहीं बची है।कभी भी किसी को चोट लग जाती है’, कहकर पत्नी भीतर चली गई।

मेरे पास एक डर छोड़ गई।मुझे लगा कि पत्नी एक न एक दिन इन रैक्स को जरूर बेच देगी।रैक्स को ही नहीं इनमें रखी किताबों को भी।इन किताबों का यही अंजाम होना है।मैंने एक बार अपनी किताबों को देखा।कुछ इस तरह जैसे मैं इन्हें आखिरी बार देख रहा हूँ।मैं कंप्यूटर टेबल से उठा और बाएं हिस्से में बिछे दीवान पर लेट गया।मेरे दाईं तरफ की खिड़की पर भी बहुत-सी किताबें लगी हुई हैं।अब ये नहीं रहेंगी।खिड़की एकदम सूनी हो जाएगी।मेरे बिना इन किताबों का कौन वारिस होगा, कौन होगा जो इन्हें पढ़ना चाहेगा।या इन्हें देखकर खुश होगा।ज़ाहिर है पत्नी और बच्चे मेरे अनुपस्थित होते ही इन किताबों को रद्दी के भाव बेच देंगे।वे भला इन किताबों का क्या करेंगे!

मुझे याद है, मेरे एक वरिष्ठ मित्र थे।वरिष्ठ पत्रकार।एक रोज मैं उनके घर गया।उनका पूरा कमरा किताबों से भरा पड़ा था।पता नहीं कहां-कहां की किताबें उन्होंने एकत्रित की थी।साहित्य, अपराध, दर्शन, जासूसी उपन्यास और युद्धों पर उनके पास अपार किताबें थीं।मन में आया कि उनसे कोई किताब मांग लूं।लेकिन साहस नहीं जुटा पाया।लौट आया।खाली हाथ।कुछ समय बाद पता चला कि हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हो गई है।पता नहीं मुझे उनकी मृत्यु से दुख हुआ या नहीं।लेकिन मेरे मन में पहला सवाल यही उठा कि उनकी किताबों का क्या होगा।काश वे सारी किताबें मुझे मिल जातीं।कुछ दिन बाद उनकी पत्नी का मेरे पास फोन आया।उन्होंने पूछा, ‘क्या मैं उनकी किताबें खरीदना चाहूंगा।’ मैंने कहा, ‘निश्चित रूप से खरीदना चाहूंगा।’ उन्होंने कहा, ‘एक लाख रुपये में मैं सारी किताबें दे दूंगी।’ मेरे पास एक लाख रुपये कहां थे।मैं उन किताबों को नहीं खरीद पाया।बाद में पता चला कि सारी किताबें उन्होंने रद्दी के भाव बेच दी हैं।मुझे अफसोस हुआ।मैं सोचने लगा कि क्या सभी लेखकों-पत्रकारों की किताबों का यही हश्र होता है।यही अंजाम।मैंने सोचा कि मैं अपनी किताबों का यह अंजाम नहीं होने दूंगा।मैं जीते जी ही अपनी किताबें रद्दी के भाव बेच जाऊंगा।कम से कम बच्चों के लिए, पत्नी के लिए कुछ तो स्पेस बनेगा।

दो तीन दिन मैं इसी उधेड़बुन में रहा।अपनी किताबों को दूर से ही देखता रहा।सोचता रहा कि कितनी मुश्किल से ये किताबें जुटाई हैं।किसी से मांग कर, किसी की चोरी करके और कभी धोखे से ये खजाना जमा किया है।अब यह सारा खजाना लुटने वाला है।मन में एक विचार यह भी आया कि क्यों न किसी पुस्तकालय को सारी किताबें दान दे दी जाएं।पुस्तकालयों से मारी गई किताबों का प्रायश्चित भी हो जाएगा।लेकिन किताबें पुस्तकालय में देने के लिए मन राजी नहीं हुआ।उन तक किताबें पहुंचाना अपने आपमें एक बड़ा संकट था।अंत में मैंने यही तय किया कि सारी किताबें रद्दी में बेच दी जाएं।आखिर अब इन किताबों का करना भी क्या है।जीवनभर मां पिता को किताबों के लिए कोंचती रही।पिता हमेशा कहते थे, ये किताबें तुझे बहुत कुछ देंगी।लेकिन यही कहते-कहते पिता किताबों को छोड़कर चले गए।मां मौका निकालकर जब तब किताबें बेचती रहीं।

पता नहीं कैसे जब मैंने अलग घर लिया तो पिता का यह शौक मुझे लग गया।धीरे-धीरे मेरे पास किताबें जमा होने लगीं।किताबों से प्रेम भी मुझे विरासत में पिता से ही मिला।लेकिन अपने अनुभवों से मैंने जाना और सीखा कि किताबें कुछ नहीं देतीं।दिन रात कंप्यूटर पर लिखने के बावजूद मैं पांच हजार रुपये महीना नहीं कमा सकता।पहले मां जब तब पूछती कि अरे इतना काम कर रहा है, कुछ पैसे भी आते हैं? मैं मां से झूठ बोल देता कि पैसे के बिना मैं कोई काम नहीं करता।लेकिन पत्नी सब समझ चुकी है।उसे पता है कि लिखने-पढ़ने से कोई कमाई नहीं होती।बावजूद इसके वह सामने से कुछ नहीं कहती।लेकिन किताबों को अपने दुश्मन की तरह देखती है।मैं ख़ुद जानता हॅूं कि लिखने पढ़ने से कुछ कमाया नहीं जा सकता।लेकिन मेरी मजबूरी यह है कि मुझे इसके अलावा कुछ और आता ही नहीं।

धीरे-धीरे मैंने कंप्यूटर पर बैठना कम कर दिया।मैं बैठता भी तो चोरों की तरह।सोचता, मुझे काम करते हुए कोई न देखे।लेकिन घर में ऐसा कहां संभव हो पाता है।मैं काम करता रहा और मेरा मन धीरे-धीरे मरता रहा।किताबें, जिन्हें देखकर मेरी सांसें चला करती थीं, अब उन्हें देखकर मुझे हमेशा यही लगता कि इन किताबों को मेरे बाद किस तरह रद्दी में बेचा जाएगा।मन में यह खयाल भी पक्का होता जा रहा था कि क्यों न जाने से पहले ख़ुद ही इन किताबों को रद्दी में बेच डालूं!

हमारे घर पर महीने दो महीने बाद रद्दी वाला आता है।वह पुराने अखबार, प्लास्टिक और लोहा खरीद कर ले जाता है।अकसर दस रुपये किलो।मैंने अंदाजा लगाया कि कुल किताबों का वजन तीन सौ किलो तो होगा ही।यानी ३००० रुपये मिल सकते हैं।फिर मुझे लगा कि रद्दीवाला पहले किताबों की जिल्द फाड़ेगा।जिल्द वह नहीं खरीदता।तब तो सारी किताबों का वजन मुश्किल से डेढ़ दो सौ किलो ही होगा।यानी डेढ़ दो हजार रुपये।पेपरबैक में किताबें सही रहती हैं।अच्छे दाम बिक जाती हैं।जिल्द नहीं उतारनी पड़ती।भीतर से मुझे लगा कि किताबें बेचने का मेरा ़फैसला पक्का हो चुका है।पत्नी को इस बारे में मैंने कुछ भी नहीं बताया।

अगले दिन मैं सुबह लगभग दस बजे ही रद्दी वाले को बुला लाया।रद्दीवाले की दुकान दस बजे खुलती है।मैं चाहता था कि बारह बजे तक सारा काम खत्म कर दूं।मैं बच्चों के लिए, पत्नी के लिए घर में ‘स्पेस’ चाहता था।पत्नी के हाथ में भी डेढ़ दो हजार रुपये आएंगे तो वह कुछ सामान खरीद सकेगी।रद्दीवाला अपनी बड़ी-सी बोरी का मुंह खोलकर बैठ गया।जैसे बोरी में मैं कोई खजाना डालने वाला हूँ।मैं लोहे के रैक्स वाली किताबों से शुरू करना चाहता था।मैंने बेस के तौर पर रखी गई मोटी किताबों को निकालना शुरू किया।ड्रॉल स्टोरीज आफ बालजाक मेरे हाथ आई।मैंने खोलकर देखा।पहले पन्ने पर तारीख डली थी- 11.7.1985 ।उस समय मैं दिल्ली प्रेस में काम करता था।छह सौ रुपये तनख्वाह मिलती थी।मैं हर महीने किताबें जरूर खरीदता था।मोटी किताबों में ही मुझे कल्हण की राजतंरगिणी मिली।मैंने दोनों किताबों को बोरी में डाल दिया।मोपासां की कंप्लीट स्टोरी भी मुझे दिखाई दी।इस किताब के पहले पन्ने पर झा साहब के हस्ताक्षर थे।मेरे दोस्त के पिता के।मुझे याद आया मैं यह किताब अपने दोस्त के पिता के पुस्तकालय से लाया था।मैंने किताब के पन्नों को देखा, पन्ने पीले पड़ चुके थे।मैं कुछ देर किताब के पन्नों पर हाथ फेरता रहा।पन्ने बहुत कमजोर हो गए थे।कई पन्ने निकल भी गए थे।मुझे पुरानी किताबों की खुशबू बहुत आकर्षित करती है।हमेशा से ही।

दरियागंज के फुटपाथ से भी मैं वही किताबें खरीदता था, जिनके पन्ने पीले पड़ जाते थे।मुझे पुरानी किताबों में से खुशबू क्यों आती है, मैं नहीं जानता।लेकिन मैंने सुना है कि फ्रांस में एक ऐसा परफ्यूम लोकप्रिय है, जिसमें से पुरानी किताबों की खुश्बू आती है।काश मैं अपनी सारी किताबें फ्रांस की उस परफ्यूम कंपनी को बेच सकता! लेकिन अब मुझे खुशबू से क्या लेना देना।अब तो मैं किताबें बेच ही रहा हूँ।रद्दी में।मैं रैक्स में से किताबें निकाल-निकाल कर नीचे रद्दीवाले को पकड़ा रहा हूँ और वह उन्हें बोरी में डालता जा रहा है।अचानक मेरे हाथ नक्सलवाद पर एक किताब लगी।नक्सलवाद पर मेरे पास काफी किताबें हैं।पता नहीं क्यों मुझे डर सा लगा।आजकल इस तरह की किताबों को आतंकवादी साहित्य घोषित किया जा रहा है।जिसके घर से ऐसा साहित्य बरामद हो उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है।भगवान का शुक्र है पत्नी को इस बारे में कुछ नहीं पता।मैंने फौरन नक्सलवाद पर, मार्क्सवाद पर सारी किताबें रद्दीवाले को पकड़ा दी।मैं नहीं चाहता, किताबों की वजह से बच्चे या पत्नी किसी संकट में पड़ें।लिहाजा मैंने कार्ल मार्क्स, लेनिन से संबंधित सभी किताबें निकाल कर रद्दीवाले को दे दी।मुझे लग रहा था कि नक्सलवाद का अभी विस्तार होगा।हो सकता है कम्युनिस्ट देशों के लेखकों की किताबों को भी आतंकी साहित्य घोषित कर दिया जाए।मैंने खोजकर चे ग्वारा, मार्शल टीटो, और इस तरह की सभी किताबें बाहर निकाल दीं।इसके साथ ही गोर्की, तालस्तॉय, कुप्रिन, दोस्तोव्स्की, लु शुन, पर्ल एस बक, जॉन ऑस्टन, सीमोन दि बोउआर, डीएच लॉरेंस, ब्लादीमीर नाबाकोफ, ईएल जेम्स और अन्य विदेशी लेखकों की महत्वपूर्ण किताबें बाहर निकाल दीं।रद्दीवाला बोरी में किताबें डालता जा रहा था।

इसके बाद मेरी नजर हिंदी की किताबों पर गई।प्रेमचंद, बंकिम, रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, भीष्म साहनी, अज्ञेय, जैनेंद्र कुमार, कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की किताबें भी बाहर निकाल कर रद्दीवाले को दे दी।और बहुत से दूसरे लेखकों की किताबें निकालनी शुरू कीं और उन्हें जमीन पर पटकने लगा।

भीतर पत्नी को भी इस बात का अहसास हो गया था कि मैं कोई ‘ऊटपटांग’ काम कर रहा हूँ।पत्नी भीतर आई और पूछा, ‘ये क्या कर रहे हो?’

मैंने थोड़ी तल्खी में कहा, ‘किताबें बेच रहा हूँ।’ इस वाक्य में यह निहितार्थ छिपा था कि तुम लोगों की वजह से ही किताबें बेच रहा हूँ।

पत्नी ने भी गुस्से से कहा, ‘पागल हो गए हो क्या? दस हजार रुपये दे दो तो लकड़ी की एक  अलमारी ला दूंगी।उसमें सारी किताबें आ जाएंगी।’

पहली बार मुझे लगा कि पत्नी का भी किताबों से, थोड़ा बहुत सही, प्रेम है।मैंने फिर भी पत्नी को जवाब देने के लिए जवाब दिया, ‘करना क्या है इतनी किताबों का! मैं यही सोचता रहता हूं कि मेरे बाद क्या होगा इनका, आख़िर तो ये रद्दी के भाव ही बिकेंगी।जब बाद में रद्दी के भाव बिकनी है तो आज क्यों नहीं?’ 

पत्नी अब भी आश्वस्त थी।उसने फिर कहा, ‘देख लो, मैंने बता दिया है, दस हजार रुपये दे दो तो सारी किताबों के लिए एक अलमारी आ जाएगी।बाकी तुम्हारी मर्जी है।’

कहकर पत्नी अंदर चली गई।

किताबें निकालते हुए मेरे हाथ धीमे पड़ गए।रद्दी वाला भी मेरी तरफ इस तरह देखने लगा कि मैं क्या निर्णय लेता हूँ।किताबें बेचता हूँ या नहीं।उसे लग रहा था कि कहीं उसका नुकसान न हो जाए।रैक्स में से किताबें मैं अब भी निकाल रहा था, लेकिन बहुत धीरे-धीरे।मेरे भीतर कहीं इस बात की खुशी भी थी कि शायद किताबें बच जाएंगी।अचानक मेरे हाथ तालस्तॉय का उपन्यास ‘पुनरुत्थान’ आ गया।मैंने उसे बाहर निकाला।पहला पन्ना खोल कर देखा तो उस पर लिखा था, ‘टू…विद डीप सेंस ऑफ लव एंड एफेक्शन।’ तारीख डली थी-12 मार्च 1984।यह किताब मैं किसी को भेंट करने वाला था।किसी लड़की को।लड़की का नाम मैंने जानबूझकर नहीं लिखा था।12 मार्च को उसका जन्मदिन था।लेकिन मैं किताब उसे नहीं दे पाया था।मैं किताब के पन्ने पलटता रहा।किताब के बीच में ही टाइप किए कुछ पन्ने मिले।पन्ने पीले पड़ गए थे।लेकिन उन पर टाइप किया मैटर पढ़ा जा सकता था।यह अफ़जल अहमद सैयद की एक नज़्म थीः

जिससे मोहब्बत हो

उसे निकाल ले जाना चाहिए

आख़िरी कश्ती पर

एक मादूम होते हुए शहर से

बाहर

उसके साथ

पार करना चाहिए

गिराए जाने की सज़ा पाया हुआ

एक पुल…

मन ही मन मैंने पूरी नज़्म पढ़ी।मैं सोचने लगा शायर कह रहा है कि जिससे मोहब्बत हो, उसे डूबते हुए शहर से बाहर निकाल ले जाना चाहिए।और मुझे इन किताबों से बेपनाह मोहब्बत है और मैं इन किताबों को ख़ुद ही डुबो रहा हूँ।नहीं…नहीं मुझे इन किताबों को बचाना ही होगा।मैंने एक बार रद्दीवाले के चेहरे की तरफ देखा।वह बेहद मायूसी में बैठा हुआ था।उसे अब भी उम्मीद थी कि शायद मैं किताबें बेच दूंगा।लेकिन मैं निर्णय ले चुका था।

मैंने रद्दीवाले को अपना निर्णय नहीं बताया।लेकिन पता नहीं उसे अचानक क्या हुआ।उसने बोरी के पिछले सिरों को पकड़कर सारी किताबें जमीन पर उलट दीं।थोड़ा गुस्से से।खाली बोरी उठाई और बाहर की ओर चल दिया।मैं जमीन पर पड़ी किताबों को देखने लगा।किताबों के बीच मुझे पत्नी का चेहरा दिखाई दिया।मुझे उसका चेहरा अच्छा लगा।

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