सच, आज स्त्री की दुनिया बहुत बदली है। आज उसके पास विचार भी है और विरोध का साहस भी। सिर्फ जैविक रूप से पुरुष न होने के कारण वो विकास के किसी स्तर से वंचित नहीं होना चाहती। वो सवाल पूछती है, “बराबर श्रम के बाद उसका वेतन सिर्फ इसलिए कम क्यों हो कि वो स्त्री है”? यहाँ तक कि हिंसा और बुराई के ग्राफ में भी उसने अपनी हिस्सेदारी दर्ज़ करायी। ये इस बात का सबूत था कि वो केवल सहनशीलता कि मूर्ति ही नहीं। अब न उसमें अपने स्त्री होने पर हीनता जागती है और न स्त्री होना उनके लिए कोई विशिष्ट उपलब्धि पा लेने का साधन है। अपितु आत्मसम्मान की पराकाष्ठा में वो अपने स्त्री होने को किसी अतिरिक्त लाभ के रूप में भुनाना भी नहीं चाहती है। वो जिस समर में कूद पड़ी है वहाँ वो जानती है कि खुद उसे ही तलाशना है अपना आसमान। तौलना है अपने पंखों को आप ही… ​

आवृत्ति और ध्वनि संयोजन : अनुपमा ऋतु
संयोजन एवं संपादन : उपमा ऋचा
प्रस्तुति : वागर्थ भारतीय भाषा परिषद् कोलकाता