हमारी कार चौराहे की तरफ बढ़ रही थी। मुझे चौराहे पर न जाने कितने रंगों के गुब्बारे दिखे।  रेड सिग्नल पर कार रुक गई। पास ही काले नंगे हाथों में डोर की अंतिम छोर देखकर मैं स्तब्ध रह गया। ये नन्हे अधनंगे बच्चे थे। कड़ी धूप में गुब्बारे बेच रहे थे।

 तभी एक बच्चा दौड़ता हुआ कार के नजदीक आया और गुब्बारा खरीदने के लिए कहने लगा। मैं फौरन समाजसेवी मूड में आ गया, ‘इस उम्र में स्कूल जाना चाहिए, यहां क्या कर रहे हो।मगर लड़का गिड़गिड़ाने लगा, ‘साहब, सुबह से एक भी नहीं बिका।बोहनी कर दो।’

मैं समाजसेवी मूड छोड़कर व्यवसायी मूड में आ गया, ‘मैं न बच्चा हूँ और न हमारे घर में कोई बच्चा है। मैं गुब्बारे लेकर क्या करूंगा?’

इस पर उसने एक बड़ी बात कह दी, ‘साहब, हम जब मजबूरी में छोटी उम्र में बड़े बन सकते हैं तो क्या आप इस उम्र में कुछ देर के लिए बच्चे नहीं बन सकते?’

कोमल स्वरों में उसकी ऐसी बात सुनकर मैं फिर से समाजसेवी मूड में आ गया। मैंने एक नहीं, चार-चार गुब्बारे खरीद लिए। वह खुश होकर जाने लगा। मैंने उसे वापस बुलाया और उससे एक सवाल पूछ दिया, ‘तुम तो छोटे में ही बड़े हो गए। मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारा बचपन कब आएगा?’ वह मूक-सा हो गया।

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