मैं गलियों से गुजरता हुआ सड़क पर आ गया।हर तरफ रोशनी ही रोशनी थी।मैं टहलता हुआ नदी के तट पर पहुंच गया जिसके दोनों छोर अनगिनत दीयों से जगमगा रहे थे।लोगों के चेहरे दमक रहे थे।तभी मेरी नजर एक बूढ़ी औरत पर पड़ी जो बैठी अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा रखे उन जलते दीयों को एक टक निहार रही थी।मुझे उस पर प्यार आ गया।मैं उसके करीब गया और उसके पास बैठता हुआ बोला, ‘माता जी, कैसा लग रहा है?’

उसने अपना चेहरा, अपने हाथों के कटोरों से हटाया।उसकी आंखों में एक चमक थी, पर कुछ अलग-सी।वह धीरे से बोली, ‘सुंदर’ फिर खयालों में डुबकी लगाती हुई बोली, ‘अच्छी सुगंध है…!’

आख़िरी वाक्य मेरी समझ में न आया।

मैंने पूछा, ‘अम्मा, पूरी रात बैठोगी? देखती रहोगी इन झिलमिलाते दीयों को, थकोगी नहीं?’

उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘मैं इनके बुझने की प्रतीक्षा कर रही हूँ।’

‘ऐसा क्यों?’

‘बचा हुआ तेल इकट्ठा कर के घर ले जाना है।’

‘किसलिए?’

‘दाल में छोंका लगाने के लिए।पतली उबली दाल अब खाई नहीं जाती!’