सुपरिचित कथाकार, संपादक और लोकइतिहास के गंभीर अध्येता और लेखक। लोकरंगवार्षिकी का 1998 से निरंतर संपादन। अद्यतन पुस्तक भील विद्रोह’ (संघर्ष के सवा सौ साल), ‘टंट्या भील’ (द ग्रेट इंडियन मून लाइटर)

‘मॉम! आर यू हिअर?’ नूतन की आवाज में तल्खी थी।

सोनिया की आवाज अटक गई थी। जैसे वह अर्द्ध बेहोशी की अवस्था में हो और आंखों की रेटिना पर कुहासा, फरवरी की बर्फ की तरह, जो मॉन्ट्रियल की हरी-भरी घास को ढंक लेती है, छा गया हो या उसके चेहरे की मुलायमियत को बंजर रिश्तों की कहानियों ने खुरच डाला हो और मासूम मन के विकारों की एक खुरदुरी परत बेतरतीब तरीके से चढ़ा दी गई हो। उसने धीरे से बेटी की ओर अपने थके और बेजान चेहरे को घुमाया।

वह वाकई बेहद थकी लग रही थी जैसे शरीर और मन दोनों टूट चुके हों।

नूतन की आंखें उसे घूरने के अंदाज से लगातार पीछा कर रही थीं जैसे वह कोई जवाब मांग रही हो। और सोनिया… आंखें चुराती, जमीन में गड़ी जा रही थी। एकाएक उसे लगा कि नूतन ने कई बार उसका ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की थी लेकिन वह उसे अनसुनी कर गई थी। या जैसे नीमबेहोशी में हो? उसे अपने आप पर ग्लानि महसूस हुई। वर्कशॉप से घर आते ही उसे खुद बेटी से ‘हाय’ कहना चाहिए था या पूछना चाहिए था-‘हाउ वाज योर डे?’ जैसी वह पहले किया करती थी। 

‘यू डोंट केअर अबाउट अस एनीमोर! लिविंग इन योर ओन वर्ल्ड…’ नूतन की आंखों में वही शिकायत थी, जो आज सोनिया ने सोफिया की आंखों में देखी थी, एक टूटा हुआ भरोसा, एक अव्यक्त पीड़ा।

बेटी के शब्दों को सुन, सोनिया को लगा था जैसे वह बेहोश हो रही है या भावनात्मक रूप से शून्य होती जा रही है।

पिछले कई दिनों से उसने यह भी नहीं पूछा-‘ह्वाट वुड यू लाइक इन डिनर?’ जैसा कि वह हमेशा पूछा करती थी। न ही वह बच्चों के कमरे में गई थी, न उनकी पढ़ाई, दिनचर्या या मूड के बारे में कुछ जाना।

सोनिया गुमसुम थी… चुपचाप… अपने भीतर सिमटी हुई। कनाडा से कुशीनगर तक की स्मृतियों के धुंध में खोई हुई। वह किसी और दुनिया में विचरण कर रही थी, जहां कुछ बच्चे थे, कुछ के मां-बाप होते हुए भी नहीं थे। या कुछ के मां-बाप की अपनी अलग-अलग जिंदगी थी और उनके अलगाव के बवंडर से आपसी संबंध, तार-तार बिखर गए थे या फिर मां-बाप के बिखर जाने से, उनके सामने कुछ सुखद स्मृतियों की कराह थी, दर्द था, जो उनके बचपन को दीमक की तरह कुतर रहा था।

 अपने बचपन के दिनों को एक बार फिर याद करती है सोनिया, अपने माई-बाबूजी के साथ, हर पल, बतियाते, फरमाइशों की लिस्ट बढ़ाती, भाइयों के साथ-खेलती-कूदती, मचलती खेतों से लेकर खलिहानों तक भाग-दौड़, बकरी, बछिया से हमजोली। सोनिया ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की गरीबी और धूल-धूसरित दुनिया में कोई और ही बचपन जिया था, जहां अभावों को भी चहकने का मौका था। गंवई संबंधों और समाज की पकड़ से बचपन की डोर मजबूत थी। बेशक वहां कनाडा जैसी हसीन वादियां न थीं। साफ-सफाई, व्यवस्थित सड़कें, गाड़ियों की सजी कतारें, हरी-भरी घास, शीतल हवा, ऊंचे-ऊंचे सुंदर मकान न थे, न वैसे पार्क, वैसी आधुनिकता, न मॉन्ट्रियल ओलंपिक स्टेडियम और न खेल-कूद की वैसी सुविधाएं। मगर थीं तो परती खाली जमींने, बारी-बगीचे, जहां लड़के-लड़कियों का झुंड गाय-बकरी चराते, लड़ते-झगड़ते, सुनते-सुनाते, दुख-सुख बांटने की कला जानते थे। एक वो बचपन था और एक यह, मॉन्ट्रियल का जो उसके, वर्कशाप में दिखाई देता।

कनाडा का खूबसूरत शहर मॉन्ट्रियल।

सोनिया मॉन्ट्रियल में अपने पति रमन और दो बच्चों- नूतन और मनु के साथ विगत पंद्रह सालों से रह रही हैं। मॉन्ट्रियल, कनाडा का एक बहुसांस्कृतिक, द्विभाषी और जीवंत शहर है, जहां फ्रेंच और अंग्रेजी दोनों बोली जाती है।

सोनिया की उम्र लगभग पैंतालीस के आसपास और रमन पचास के करीब होंगे। रमन भारत की एक मल्टीनेशनल कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं, जिसका ऑफिस मॉन्ट्रियल में है। उन्होंने आईआईटी मुंबई से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक  किया है। डिग्री हासिल करने के बाद दस वर्षों तक वह भारत में तैनात रहे।

रमन मूलरूप से सिवान, बिहार के ग्रामीण इलाके से संबंध रखते हैं, सोनिया कुशीनगर के एक गांव के किसान परिवार से संबंध रखती है। सोनिया का पूरबियापन, सादगी और अपनत्व में संवेदना के तार गहनता से गुंथे हैं। गांव उन्हें अब भी खींचता था, जैसे वहां की हवा, बयार और सरेह में बचनप का संगीत हिलोरें मारता हो।

भारत से एकाएक कनाडा तक की यात्रा, कुछ सालों की तमन्ना मानकर शुरू की गई थी मगर जब एक बार कनाडा की खूबसूरत जिंदगी में वे दोनों रमते गए तो फिर वहीं के होकर रह गए। कुशीनगर या सिवान से मॉन्ट्रियल तक की यात्रा असाधारण कही जा सकती है मगर यह कहानी उस यात्रा की कतई नहीं है और न उनकी सफलता या संपन्नता की है।

सोनिया पहले हाउस वाइफ के रूप में वहां गई थी मगर मॉन्ट्रियल जैसे समाज में सिर्फ गृहिणी होना गंवारा न था। पति के ऑफिस और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद, वह अकेली रह जाती। दूसरी औरतों की तरह काम पर जाने के लिए उसके पास कोई नौकरी न थी। वह मैट्रिक से ही पेंटिंग और मूर्ति कला में रुचि रखती थी। मॉन्ट्रियल में अकेलेपन के बीच उसने अपने भीतर के कलाकार को पुनः जगाया। वह स्केचिंग, पेंटिंग और क्ले मॉडलिंग में पहले से ही रुचि रखती थी। अपनी कला और हुनर को नया रंग-रूप देने के लिए, स्वतः कुछ पढ़ना, सीखना शुरू किया। रमन ने उसकी रुचि को प्रोत्साहित किया था। अपने समय को कलात्मक रूप देने और सामाजिक कार्यों से जोड़ने की रुचि से उसने ‘मॉन्ट्रियल आर्ट थेरेपी सेंटर’ से जुड़ना शुरू किया- एक ऐसी संस्था जो कला के माध्यम से मानसिक और सामाजिक रूप से संघर्षरत बच्चों के साथ कार्य करती थी।

यह संस्था स्थानीय स्कूलों, चर्चों और सामुदायिक केंद्रों में वर्कशॉप आयोजित करती थी- जहां चित्रकला, मूर्तिकला, रंग और रूपों के माध्यम से बच्चे अपने भीतर की भावनाओं को अभिव्यक्त कर पाते। ऐसे बच्चे, जो तलाकशुदा माता-पिता के बीच बंटे हुए थे, या जिन्हें कस्टडी लॉ के तहत दोनों घरों में अलग-अलग समय बिताना पड़ता था, अक्सर भावनात्मक खिंचाव और असुरक्षा से जूझते थे।

बच्चों की उम्र चौदह साल से ज्यादा न होती क्योंकि कनाडा में चौदह साल के बाद ज्यादातर बच्चे पार्ट टाइम जॉब की ओर अग्रसर हो जाते। थोड़ा पैसा, ‘अपने मन का राजा’ का भाव उनमें पैदा कर देता।

कनाडा में टूटते परिवारों की कठोर मार बच्चों पर ही पड़ती है। मां-बाप के प्यार-दुलार से वंचित बच्चे संवाद, मान-मनुहार, अपनी जिद को पूरा करवा लेने की ख्वाहिश रखते हैं, जो एकाएक अलग हो चुके मां-बाप द्वारा सदा-सदा के लिए रौंद दी जाती हैं।

विकसित देशों में मानवीय संबंधों का विकास, अर्थ और अनर्थ की यात्रा तक गया है। वैसे वहां बहुत-सी खूबसूरत चीजें भी हैं मगर पति-पत्नी के टूटते, बनते संबंधों ने बच्चों के बचपन को बिखेर कर हठ, हिंसा और हताशा में बदल दिया है। अब वैसी स्थिति भारत जैसे गरीब मुल्क में भी देखी जा रही है। पति-पत्नी के टूटते संबंधों की आग, उन बच्चों को झेलनी पड़ती है, जिनकी कोई गलती नहीं होती। ऐसे बच्चों का जीवन किन त्रासदियों से गुजरता है, इसको समझने और उन त्रासदियों से गुजरते बच्चों को कला के माध्यम से समाज में जोड़ने, उनके जीवन की निरवता को पाटने के प्रयास में रत एक संस्था, ‘मॉन्ट्रियल आर्ट थेरेपी सेंटर’ में काम करना सोनिया को अच्छा लगा था।

रमन खुश थे कि सोनिया घर की चहारदीवारी से निकल, अपने हुनर से अपना बजूद बना रही थी। स्वयं को सामाजिक कार्यों से जोड़ना प्रतिष्ठा और परोपकार का काम था। वह अपने हुनर के द्वारा मांबाप के बीच बांट दिए गए बच्चों या अनाथ और बेसहारा हो चुके बच्चों के साथ संवाद करती, उन्हें रंगों से खेलने देती और उनके भावों को कागज पर उतरते देखती। उन्हें बेहतर इंसान बनाने, उनका दुख और गुस्सा बांटने का प्रयास करती। 

कई बार एक पेंटिंग में ऐसा दर्द उभर आता जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता था।

वह वर्कशॉप से लौटने के बाद अपने मोबाइल से खींचे फोटो बच्चों को दिखाती- ‘मनु! देखो! यह एक बच्चे ने आज बनाई है।’ मनु और नूतन दोनों उसकी कला से जुड़ी संवेदनशीलता को समझने लगे थे।

‘यू आर द बेस्ट मॉम! यू ट्रीट देम जस्ट लाइक अस!- मनु ने एक दिन कहा था।

‘यस! माय मॉम इज अ जीनियस!’ नूतन ने मुस्कराते हुए सोनिया के गले में अपनी बांहों का घेरा बना दिया था।

‘मॉन्ट्रियल आर्ट थेरेपी सेंटर’ द्वारा वर्कशॉप के ठिकाने बदलते रहते। कभी चर्च के सामने, तो कभी पार्क, कभी चौड़ेे चैराहों या कभी किसी महत्वपूर्ण स्थान पर।

माउंट रॉयल पार्क की एक वर्कशॉप में सोनिया ने बच्चों को शहर की स्काईलाइन ड्रॉ करने को कहा था।

एक ग्यारह साल की लड़की-सोफिया, ऊंचाई से नीचे झांकती रही, स्केचिंग में रुचि नहीं दिखाई। नीचे की खाई का अंधेरा बहुत डरावना लग रहा था।

‘हाय, सोफिया!’ सोनिया ने हाथ हिलाकर कहा। सोफिया की आंखें भटकी हुईं, सूूनी थीं।

‘एनी प्रॉब्लम!’ सोनिया ने करीब आकर प्यार से पुचकारा था।

‘नो!’ सोफिया ने सिर हिलाते हुए कहा था और मुंह घुमाकर फिर खाई की ओर निहारने लगी थी। उसका चेहरा सख्त था। मकानों की गेरुवा छतों की कतारें कीलों की तरह उभरी दिख रही थीं।

सोनिया चुपचाप उसे निहारती रही। मातृत्व छाया से वंचित चेहरे पर मातृत्व की निगाह ने असर किया था। सोफिया ने आंखें झुका ली थीं। सोनिया को आभास हो गया था कि सोफिया की मनोदशा ठीक नहीं है। उसने तब तक बोर्ड, कागज और पेंसिल को छुआ तक न था।

वह बार-बार अपने पैरों को बेचैनी से झटक रही थी। पेंसिल उठाती और रख देती। इधर-उधर और कभी मुड़ कर बाकी बच्चों को निहारती, जो चित्र बनाने में लगे हुए थे। फिर वह दूर, शहर के बीचो-बीच स्थित चर्च को निहारने लगती।

सोनिया ने सोफिया को अपनी बांहों में लेते हुए किनारे ले जाकर उसकी पीड़ा समझने की कोशिश की। बहुत दिनों बाद बांहों के सहारे से सोफिया के तन-मन को सहारा मिला था।

‘आर यू ओके!’ सोनिया ने पूछा। 

‘नो मैम!’ और उसने अपनी गरदन हिला दी थी।

‘ह्वाट इज प्रॉब्लम डियर!’ सोनिया ने पुचकारा।

‘माय स्टेप मॉम, हाईजैक्ड माय डैड्स मांइड! अब वो मेरी नहीं सुनते। अब मैं उनके लिए मायने नहीं रखती।’ उसकी आवाज में भारीपन था और हिचकियों में खरखराहट। सोफिया बोले जा रही थी। उसके दिमाग के तंतु अपने डैड के भयावह घर पर केंद्रित उसे डरा रहे थे। वह माउंट रॉयल पार्क में होते हुए भी वहां नहीं थी। उसकी आंखें कठोर थीं लेकिन सोनिया की आंखें नम और फैली हुई थीं। सोफिया बता रही थी, ‘मैं डैड के पास नहीं जाना चाहती। …कभी नहीं।’

‘क्यों?’ सोनिया के शब्द बेतुके लगे थे।

‘मैं सिर्फ मां के साथ रहना चाहती हूँ  …मगर?’ सोफिया एकाएक खामोश हो गई थी।

सोनिया जानती थी, कानून ऐसा है कि सोफिया को एक हफ्ते अपने डैड के घर गुजारना ही होगा।

‘आई डोंट हैव एन ऑप्शन मैम… आई हेट वीकेंड्स ऐट डैड्स।’ यह बोलते-बोलते सोफिया की हिचकियां चालू हो गई थीं।

सोनिया हिल गई। कितने ही बच्चे-दिखने में खुश, बोलने में सामान्य-भीतर से बिखरे हुए हैं। और यह टूटन, सबसे गहरी चोट वहां करती है जहां से शब्द लौट जाते हैं। कोई पिता अपनी बेटी से ऐसा बर्ताव कैसे कर सकता है? सोनिया के अंतर्मन में यही बात कचोट रही थी।

हर वर्कशॉप के किस्से बदलते थे, जिंदगी की नई पर्त उधेड़ती दिखती थी। सच से सामना, कितना धिनौना नजर आता। कुछ हैवानियत के धूसर बवंडर बन मन-मस्तिष्क में उतरते। हताशा, टूटन और बिखराव के बीच… कभी-कभी कुछ उम्मीद के घड़ियाल भी बजते सुनाई देते। वर्कशॉप से घर लौटने के बाद, सोनिया यूं ही देर तक बिना कुछ बोले, बतियाए बैठी रहती।

 एक दिन मॉन्ट्रियल वेस्ट यूनाइटेड चर्च परिसर में आयोजित वर्कशॉप से लौटने के बाद सोनिया अंदर से टूटती नजर आई थी। वह भारी कदमों से खुद को घसीटती हुई ड्रॉइंगरूम तक लाई थी।

‘मॉम! क्या हुआ?’ मनु ने पूछा था और पीछे से आकर मां के गले में अपने हाथों को लपेट दिया था।

‘कुछ नहीं बेटा!’ सोनिया ने संक्षिप्त उत्तर दिया और आंखें बंद कर सोफे पर पसर गई थी।

‘मॉम! चाय बना दूं?’ अपने स्टडी रूम से निकलकर नूतन ने पूछा था। अपनी मम्मी को देख नूतन को समझते देर न लगी कि आज जरूर कोई नई घटना ने मॉम को परेशान कर रखा है।

‘नहीं बेटी!… तुम लोगों ने खाना खाया?’ पूछती हुई सोनिया झटपट उठ गई थी।

‘जी मॉम!’ बच्चों ने उत्तर दिया।

‘गुड’ वह किचन की ओर बढ़ गई और अपने एवं बच्चों के लिए कॉफी बनाकर लाई। बच्चे अब भी मम्मी को गौर से निहार रहे थे। उन्होंने कॉफी का कप उठाया और अपने-अपने कमरे में चले गए थे। सोनिया को थोड़ी आत्मग्लानि हुई। आने के बाद उसने बच्चों को हैलो, हाय भी नहीं कहा था।

सोनिया का मस्तिष्क खाली न था। वह लिआंग, चीनी मूल का लड़का, जिसे अब गोद लिया जा चुका था, और जो बारह-तेरह के करीब होगा, अपने गांव, मां-बाप, छोटे भाई और बहन को भूल न सका था। उसके मां-बाप बेहद गरीब थे। वे अपने बच्चों के लिए कुछ बेहतर नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने कनाडा के एक आदमी को गोद दे दिया था।

एक वर्कशॉप में लिआंग ने सोनिया को बताया था- ‘मुझे अपने भाई-बहनों की याद आती है। वे कहां होंगे? कैसे होंगे? हम कभी मिलेंगे या नहीं?’ उसके चेहरे पर एक तांबई पर्त उतर आती है। गोरा रंग थोड़ा ढुरूक जाता है। सोनिया ने जिस कागज पर उसे एक बच्चे का चित्र बनाने के लिए कहा था, उस पर लिआंग ने अपने पुराने घर और परिवार को उकेर दिया था। कोने में बैठे माँ-बाप, जमीन पर बैठे दोनों भाई और पीछे खड़ी बहन, जो उसे अक्सर तंग किया करती थी। 

सोनिया उसे देखती है, पीठ थपथपाती है और मन ही मन सोचती है- ‘क्या यह बचपन अपने परिवार से कभी जुड़ पाएगा?’ लिआंग की आंखों में आंसू थे! पीठ पर मैम का स्पर्श, मां की याद को सधन कर गया था। जब वह भूखा होता, और पिता मजदूरी कर नहीं लौटे होते, तब तक मां का स्पर्श और प्यार उसे संभाले रहता।

एकाएक उसका मन अतीत से वर्तमान में आ टपका था। उसने आंखों को हथेलियों से ढंक लिया। वह अभी कुछ देर पहले,  अपनी चित्रकारी में अपने पुराने घर, मां-बाप, भाई-बहन से संवाद कर रहा था और घर की जमीन की नर्म दूब उसे सहला रही थीं, वहां से वह दूर निकल आया था।

‘वेरी गुड’, सोनिया ने लिआंग की चित्रकारी को सराहा थी।

‘थैंक्यू मैम!’ उसने गला खंखारते हुए कहा था और अपनी आंखों को फिर पोंछ लिया था। सोनिया की नजरें लिआंग के चेहरे पर टिकी थीं।

‘डोंट वरी! दे वुड बी फाइन देयर! गॉड वुड हेल्प देम।’ सोनिया ने लिआंन के गालों को सहलाया था। वह सोचती रही- गॉड का नाम तो बस भुलावे की चीज है? बचपन का बिखरना, जिंदगी का बिखरना है तो गॉड इसे रोकता क्यों नहीं?

वर्कशॉप के किस्से रोज बदलते थे। वह लड़की, जिसका चेहरा बेरंग हो चुका था, वर्कशॉप में तीसरी बार आई थी। उसका नाम चार्लेट था। उस दिन का वर्कशॉप शहर के मुख्य चर्च के सामने था। मई का महीना, सुनहरी धूप और उस धूप में बैठे लगभग 17 बच्चे। अलग-अलग उम्र के बच्चे-छह साल से लेकर चौदह साल तक।

चार्लेट लगभग तेरह-चौदह की होगी। मां-बाप में संबंध-विच्छेद हुए पांच वर्ष हो चुके हैं। चार्लेट को बारी-बारी से मां और बाप के पास जाना होता है। एक हफ्ते मां के पास, एक हफ्ते पिता के पास।

तलाक के समय मां की उम्र मुश्किल से पैंतीस की रही होगी और उन्होंने एक युवा पुरुष से शादी कर ली। पिता ने शादी नहीं की। वे अपने फार्म हाउस में काम करते हैं। गाय पालते हैं और अपनी एक कर्मचारी के साथ ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहते हैं। चार्लेट समझने लगी है कि पिता को किसी न किसी महिला की जरूरत तो होगी ही। चलो अच्छा है कि मॉम से संबंध टूटने के बाद उन्होंने कानूनी तौर पर कोई शादी नहीं की है। वे संबंध तोड़ना नहीं चाहते थे मगर मॉम, उनके फार्म हाउस पर रहना नहीं चाहती थीं। बस इसी बात को लेकर उनमें संबंध टूट गया था। अगर कोई और बात हो तो वह चार्लेट को पता नहीं।

सोनिया उसके साथ बतियाती है। चार्लेट किशोरावस्था से गुजर रही है। यह समय सतर्क रहने और खुद को गलत रास्तों से बचाने का होता है मगर ऐसे समय, उसके मां-बाप एक साथ नहीं हैं। मां के पास जाना उसे सबसे अधिक डरावना लगता है। उसे लगता है कि उसकी मां का पति, उसकी ओर कामुक निगाहों से देखता है। वह उसकी आंखों का सामना नहीं कर सकती। डरी, सहमी बरामदे में आकर बैठ जाती है जैसे डर की काई उसकी सांसों से लिपट गई हो। उसके एक हफ्ते का समय काटना कष्टदायक होता है। वह घर, जहां उसे कानूनी तौर पर रहने को कहा जाता है, असुरक्षित लगता है। उसकी मां शायद उस खतरे से अनजान नहीं है। मगर मां, वह कितनी मां है, कितनी पत्नी और कितनी सिर्फ अपने सुख की परवाह करने वाली- यह समझ पाना कठिन है। उसका मन डरा-डरा रहता है।

सोनिया चार्लेट के माथे पर हाथ फिराती है। बिहार के गांवों में पली सोनिया का दिल भारत के गांवों की ओर लौट आता है, जहां बाप रिश्ते में बच्ची को वासना की नजरों से नहीं देखता। कल के बारे में वह नहीं जानती मगर चार्लेट की कहानी उसे डराती, तोड़ती और चिंतित करती है। सोनिया का एक और दिन उदासी की अंधेरी गुफा में ढकेल दिया जाता है।

 

डेनियल की कहानी भी मां-बाप के अलग हो जाने की कहानी है। उसे भी एक सप्ताह अपनी मां के साथ तो एक सप्ताह  पिता के साथ रहना होता है। डेनियल की उम्र 12 साल के आसपास होगी। वह अपनी मां के साथ खुश नहीं होता क्योंकि मां अब जिस रिलेशन में है वहां दो बच्चे पहले से हैं।

डेनियल शिकायत करता है-‘मेरे स्टेप ब्रदर्स मेरी फीलिंग को हर्ट करते हैं। मां को ‘बिच’ बोलते हैं। मेरे आर्टवर्क फाड़ देते हैं।’

ओलिविया की मां ने तलाक के बाद अकेली रहना चुना। इससे ओलिविया को थोड़ी हिम्मत बंधी। वह अपने डैड से भी मिलना चाहती है मगर वह भी उस प्रश्न का जवाब ढूंढ़ रही है-  ‘जब सबकुछ ठीक चल रहा था तो एकाएक मां और बाप अलग क्यों हो गए? अचानक मेरी दुनिया एकाएक उलट-पलट क्यों हो गई? मेरी मां पर फाइनेंशियल प्रेशर नहीं। वह बहुत नीडी नहीं है, इसलिए उसे डैड की जरूरत नहीं है। मैं सब समझती हूँ, …फिर भी?’ चैदह की उम्र में ओलिविया के दिमाग में हमेशा ऐसे सवाल बनते-बिगड़ते रहते हैं।

……………..

माइकल बारह वर्ष का है। उसके मां-बाप के बीच अभी तलाक नहीं हुआ है मगर दोनों तलाक के मुहाने पर हैं। माइकल को जेंडर प्रॉब्लम है। वह खुद को लड़का नहीं मानता। वह इन दो आपदाओं से घिरा अपने अस्तित्व के लिए खुद से लड़ रहा है। मां-बाप एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं- ‘सब तुम्हारे कारण हुआ?’

‘…नो …इसके लिए तुम जिम्मेदार हो।’

‘…नो …यू आर रिस्पॉन्सिबल।’

 

एम्मा नौ वर्ष की है, बहुत बच्ची तो नहीं है पर जेनेटिक डिसऑर्डर से ग्रसित है। इसी बीमारी ने मांबाप को अलग कर दिया है। मां को विश्वास नहीं था कि यह प्रॉब्लम उसके खुद के जींस में है। उसने दूसरी शादी की। उससे जो जुड़वा पैदा हुए वे भी जेनेटिक डिसऑर्डर के शिकार हैं। इस प्रकार एम्मा सहित उसकी मां के तीनों बच्चे, जेनेटिक डिसऑर्डर के शिकार!

सोनिया को एम्मा की स्थिति और उसकी मासूमियत अंदर तक हिला देती है। एक दिन वह एम्मा की मां से मिलने भी गई थी। एम्मा की मां ने बताया था कि उसने एम्मा की प्रॉब्लम के लिए अपने पूर्व पति को जिम्मेदार ठहराया था और उससे अलग हो गई थी। शुक्र है कि दूसरे हसबैंड ने एम्मा की मां पर कोई आरोप नहीं लगाया है। वह तीनों विकलांग बच्चों की सेवा में समर्पित है। वह बोलता है- ‘गॉड मस्ट हैव एंट्रस्टेड हिम विथ द रिस्पॉन्सिबिलिटी ऑफ थ्री चिल्ड्रेन फॉर अ रीजन।’

 

आइला तेरह साल की टीनएजर है। वह तलाकशुदा मां-बाप की संतान नहीं है। उसके डिप्रेशन में रहने का दूसरा कारण है। उसके पिता ने बहुत बुढ़ापे में शादी की थी। अब पिता नहीं हैं। मां अभी जवान है। उसके अपने शौक और अरमान हैं। आइला के डैड अकूत संपत्ति छोड़ कर गए हैं इसलिए फाइनेंशियल प्रॉब्लम नहीं है। मां अपने दोस्तों के साथ ज्यादातर बाहर रहती है। आइला के डिप्रेशन का कारण यही है।

 

 और फिर जाद- लेबनानी युवक… वह मॉन्ट्रियल में एक अमीर आदमी का दास, बेटा या घरेलू नौकर जैसा है। सात वर्ष पूर्व जब वह महज छह साल का था, युद्ध में उसके मां-बाप मारे गए थे। उसकी दो वर्ष बड़ी बहन नूर घायल अवस्था में किसी अस्पताल में ले जाई गई थी मगर तलाश करने पर कुछ पता न चला था। पेट पालने के लिए इधर-उधर भटकता जाद एक दिन पानी के जहाज पर बैठकर गैरकानूनी रूप से कनाडा में प्रवेश कर गया था।

उम्र और होशियारी बढ़ने पर उसने अपनी बड़ी बहन की तलाश के लिए सोशल मीडिया पर अपने परिवार के बारे में जानकारी शेयर करना शुरू किया था। उसने सीरिया के तमाम ग्रुपों में मैसेज किए। अपने मालिक के सहयोग से वहां की एंबेसी को पत्र लिखवाया। आखिर संयोग से फेसबुक के माध्यम से नूर से संपर्क हो गया था। नूर सीरिया की एक सामाजिक संस्था में कार्य कर रही थी।

…नूर अपने भाई से मिलने मॉन्ट्रियल आने वाली थी।

जाद के चेहरे पर नूर लौट आया था। वह बेहद खुश था। उसने सोनिया मैम से अनुरोध किया था- ‘मैम! अगर आप इजाजत देंगी तो मैं अपनी बहन को लेकर आपके यहां आऊंगा।’

उस दिन सुबह से सोनिया काफी खुश थी। उसने अपने बच्चों को बता दिया था- ‘आज जाद अपनी बहन नूर के साथ आने वाला है। दोनों सात वर्षों के बाद मिल रहे हैं।’ सोनिया ने उन दोनों के बिछुड़ने और मिलने की कहानी को अपने बच्चों को सुनाया था। वर्कशॉप जीवन की यह पहली घटना थी, जिससे सोनिया के चेहरे पर अपार खुशी दिखाई दे रही थी।

उसने नूर को उपहार देने के लिए एक ड्रेस खरीदा था।

दरवाजे पर जाद और उसकी बहन ने दस्तक दी थी। पंद्रह की जवान होती छोरी अपने भाई के साथ सोनिया मैम के दरवाजे पर थी।

‘मैम, आप के बारे में मेरा भाई इतनी प्यारी बातें करता है कि….’, कहती हुई नूर सोनिया से लिपट गई थी।

‘नो, डियर, इट्स माय हैपीनेस!’  सोनिया के चेहरे पर गुलाबी रौनक उभरी।

ज़ाद के चेहरे पर पारिवारिक मिलन की चमक थी।

सोनिया को अच्छा लगा था। उसका मातृत्व उस दिन सिर्फ जैविक नहीं था। वह हर उस बच्चे की मां थी, जिसने कहीं किसी मोड़ पर अपनों को खोया था। बहन-भाई का मिलन और उनमें प्रगाढ़ प्यार देख वह द्रवित हो गई थी।

चारों बच्चों को डाइनिंग टेबल पर खाना परोसते हुए सोनिया के चेहरे पर एक दुर्लभ शांति थी।

‘नूर! जाद इज वेरी हैपी आफ्टर गेटिंग इन टच विद यू।’ सोनिया ने नूर की तरफ निहारते हुए कहा था।

‘यस मैम! ओह… माय ब्रदर…।’ नूर ने जाद के सिर को अपनी गोद में दबा लिया था। उसकी आंखों में प्रेम के आंसू छलक आए थे।

जाद और नूर एक-दूसरे से बतिया रहे थे-अरबी और टूटी-फूटी अंग्रेजी में तभी मनु ने बीच में पूछा- ‘हाउ डिड यू गेट टू कनाडा जाद?’

जाद ने सिर झुकाकर मुस्कुराते हुए जवाब दिया- ‘आई स्टोल मायसेल्फ ऑन अ शिप…’

‘यु स्टोल योरसेल्फ?’ नूतन चौंकी।

‘हां… जब कोई नहीं होता तुम्हें बचाने के लिए, तो तुम्हें खुद को ही चुराना पड़ता है… अपनी तकदीर से।’

‘दैट्स डार्क… बट ब्रेव’, मनु बुदबुदाया।

नूर ने धीरे से सोनिया का हाथ थामा, ‘मैम, यू रिमाइंड मी ऑफ माय मदर।’

सोनिया ने आंखें झुका ली। उसकी पलकें भीग गई थीं। तभी नूतन पास आकर बोली- ‘मॉम, यू डोंट नो हाउ लकी दे आर टु हैव यू।’

सोनिया ने अपनी बेटी की आंखों में देखा- वही चमक थी जो उसने सोफिया की आंखों में पाई थी। वह सोच रही थी- रिश्तों का कुतरना केवल दूरी नहीं है, यह प्रेम की चुपचाप हत्या है, जो जीते-जी अनाथ बना देती है। पता नहीं मैं ‘तुम्हारी मां जैसी’ हूँ या नहीं, लेकिन एक मां हूँ और सदा रहूंगी, यही काफी है तुम जैसे प्यारे बच्चों के लिए।

बाहर बर्फ गिर रही थी, लेकिन अंदर डाइनिंग टेबल पर गर्म चाय और संवेदना का एक कोमल ताप फैल रहा था। बच्चे तृप्त लग रहे थे, जैसे वे तलाक या बिछुड़ने के जख्म से मुक्ति की चमक सोनिया की आंखों में तलाश रहे थे।