वरिष्ठ कवि-गद्यकार एवं ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक। दो कविता संग्रह ‘सलीब पर सच’ और ‘मूर्तियों के जंगल में’, एक निबंध संग्रह ‘जाग मछंदर जाग’ और संस्मरण एवं आलोचनात्मक लेखों का एक संग्रह ‘अंधेरे के पार’।

 

दो कविताएं

1.
जब सीमाओं पर खून बह रहा होता है
सीमाओं से दूर भी चल रहा होता है युद्ध
सैनिकों के घरों में

बच्चे सुन रहे होते हैं मां से अपने पिता के
प्रेम और बहादुरी की कहानियां

वे नहीं जानते, पिता कब आएंगे
आएंगे भी या नहीं, बचेंगे या मार दिए जाएंगे

पत्नियां पूजा-प्रार्थना में लगी रहती हैं
भगवान से मांगती हैं
पति को बचा लेने की दुआ

बूढ़े दिन भर आसमान में ताकते रहते हैं
कोई जहाज गुजरता है तो उसकी आवाज
तब तक सुनते रहते हैं, जब तक वह
ओझल नहीं हो जाता

युवा दिन-रात युद्ध की खबरें सुनते रहते हैं
जानना चाहते हैं, कहां, कौन मारा गया
मृतकों की अगली सूची की
प्रतीक्षा में गुजरता रहता है एक-एक दिन
बिना युद्ध लड़े ही सैनिक के घर में लोग
मरते रहते हैं पल छिन।

2.
राजा अपनी कुर्सी बचाने
के लिए छेड़ता है युद्ध
सैकड़ों लोगों को मरवाकर
विजय की घोषणा करता है
जुलूस निकालता है
ढोल, डमरू और शंख बजवाता है

मृतकों के परिवारों को ढाढस बंधाता है
बच्चों को पिता के नक्शे कदम पर
चलने की शपथ दिलाता है

वह जानता है कि उसकी कुर्सी
बचाए रखने के लिए
आगे भी कुछ लोगों को मरना पड़ेगा।

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