युवा कवयित्री। कई साझा संकलन। फिलहाल स्वतंत्र लेखन।

पोखर और बारिश

कई दिनों तक भारी बारिश के बाद
मेरे गांव-घर के पोखर में
पानी लबालब भर आया है
जैसे मेरी सफलता पर
मेरी मां का मन भर आता है

पोखर का पानी थिर है
आड़ों में मौजूद वृक्ष पर चढ़ी लताएं
पानी को स्पर्श कर रही हैं
उनका प्रतिबिंब पानी में
हवा के हलके झोंकों के संग लहरा रहा है
जैसे आनंदातिरेक के समय
मानव का मन

साफ पानी दर्पण बन आया है आकाश का
जैसे बच्चों के मन से हम
दुनिया को साफ-साफ देखते हैं
पानी और बच्चे एक जैसे होते हैं

पोखर को बारिश का इंतजार रहता है
बच्चे को प्रेमजल का
बारिश के बिना पोखर हो जाता
बिन मां के बच्चे जैसा।

साझा

बूढ़े बरगद के पास थोड़ा बैठ लेना
सुन लेना उसके दुख-सुख
उसकी आंखों में झाँक आना
सदियों की विरासत
समृद्ध होते उसके इतिहास को पढ़ना
जानना उसके खिलते-विकसित होते दिन को
जमाने भर के इकट्ठे अनुभवों को
जड़ों का फैलाव भी देखना
कि टहनियों और पत्तों के टूटने का दर्द
देखना उसकी बदन पर गौर से

क्या पता
वह जीवन के अंतिम पड़ाव में हो
और तुमसे बतिया कर
अपने एकांत का कुछ क्षण आनंद से जी ले
उसकी हँसी के संग हँस लेना जी भर
कि हँसने के बाद सारे बोझ हलके हो जाएं
दुख में हो तो
अपने कंधे पर उसका सर रख लेना
रो लेना उसके संग इतना
कि रोने के बाद एक बेफिक्र मीठी नींद आए
संतोष से भर जाए मन

कर सको अगर
उस बरगद के साथ कुछ क्षण बैठ कर
उसके जीवन के अनुभव पा लेना।

संपर्क : द्वारा- अनिल कुमार ‘अनल’, कुमार आयुर्वेद भवन, जैनामोड़, बोकारो- 829301 (झारखंड) मो.9580110605