पृथ्वीराज तौर
चर्चित कवि, अनुवादक और कहानीकार। कुल तीस पुस्तकें प्रकाशित। संप्रति नांदेड (महाराष्ट्र) स्थित स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय में मराठी भाषा और साहित्य के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष।
सुनील बाबुराव कुळकर्णी
अब तक पांच संदर्भ पुस्तकें, आठ संपादित, आठ अनूदित पुस्तकें, आठ संपादित पाठ्य पुस्तकें और दो काव्य संकलन। संप्रति केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा तथा राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद, नई दिल्ली के निदेशक।

 

 

कभी-कभी यथार्थ कल्पना से भी अधिक अविश्वसनीय होता है। यदि किसी ने कहा कि युद्ध चल रहा था और अचानक युद्ध को रोककर दोनों पक्ष के सैनिकों ने बंदूकों को नीचे रखकर एक-दूसरे को गले लगाया। एक-दूसरे की पत्नी और बच्चों की खुशहाली के संदर्भ में पूछताछ की। एक साथ लयबद्ध तरीके से समरस होकर गाना गाया। अपने रिश्तेदारों के फोटो की लेन-देन की। कुछ क्षण, कुछ घंटे एक-दूसरे को अत्यधिक विश्वास के साथ अपना सुख-दुख बताया और बाद में पुनः एक-दूसरे पर बंदूकें तानकर एक-दूसरे के कट्टर दुश्मनों की तरह आमने-सामने खड़े हो गए, तो इस बात पर निश्चित ही कोई विश्वास नहीं करेगा।

महाभारत के समय संभवतः ऐसा कुछ घटित होता होगा परंतु आधुनिक कालावधी में ऐसा कुछ घटित होना कदापि संभव नहीं; इस पर सबकी सहमति बनेगी। लेकिन ऐसा सचमुच घटित हो गया। सौ साल पूर्व मतलब निश्चित यदि कहना है तो आने वाले दिसंबर में इस घटना के एक सौ दस साल पूर्ण हुए होंगे। प्रथम महायुद्ध में यह घटना घटित हुई। इंग्लैंड और जर्मनी यह दो राष्ट्र एक-दूसरे के विरुद्ध घमासान लड़ाई लड़ रहे थे। एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे, उसी समय यह घटना घटित हुई। प्रत्यक्ष युद्धभूमि पर दोनों देशों के सैनिक लड़ते-लड़ते अचानक रुक गए और एक-दूसरे से हाथ मिलाकर आनंदोत्सव मनाने लगे।

जिस कैप्टन जैक आर्मस ने इस घटना का उल्लेख किया वे 1948 में इहलोक छोड़कर चले गए। उनके लिखे एक साधारण पत्र में इस घटना का उल्लेख हुआ है। वैसे देखा जाए तो एक पति द्वारा अपनी पत्नी को लिखा यह एक निजी पत्र है। ‘बुक ऑफ नोट्स’ में यह पत्र संग्रहीत है। यह घटना 25 दिसंबर, 1914 में घटित हुई। प्रथम विश्व युद्ध को प्रारंभ हुए पांच महीने बीत चुके थे। विश्व भर की फौजें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी थीं। संपूर्ण यूरोप युद्धस्थल बन गया था। परंतु क्रिसमस की पूर्व संध्या पर युद्धभूमि पर एक-दूसरे के विरुद्ध उतरे ब्रिटिश और जर्मन सैनिकों ने अपने-अपने शस्त्र नीचे रखकर एक दूसरों को शुभकामनाएं दीं। उपहार की वस्तुएं दी। एकत्रित होकर क्रिसमस के गाने गाए और फुटबॉल का मैच भी खेला गया। कैप्टन जैक आर्मस की फर्स्ट बटालियन नॉर्थ स्ट्रेफर्डशायर रेजिमेंट में उस समय नियुक्ति थी। उस रात उन्होंने अपनी पत्नी को पत्र लिखा। इस पत्र में इस घटना का विस्तृत वर्णन किया गया है। पत्र इस प्रकार है-

 

यह 24 दिसंबर की रात है। कल क्रिसमस का त्यौहार है। आज दिनभर यहां गोलाबारी चलती रही। मिशिगन शत्रुओं पर आग उड़ेल रही थी। मैं शाम को दौरा कर खाई में वापस लौट आया और समाचार पढ़ने लगा। अचानक रात में सात बजे गोलाबारी बंद हो गई। मुझे बताया गया कि जर्मन सैनिकों ने अपनी खाइयों में रोशनी की है। मैं बाहर आया। उनकी ओर से आवाज आई ‘नो फायर’ वह एक अद्भुत दृश्य था। हमारे सैनिक भी खाई से बाहर आकर एक संरक्षक चबूतरे पर बैठ गए। जर्मन सैनिक भी अपने बंकर से बाहर आ गए। वे टूटी-फूटी अंग्रेजी भाषा में हमसे संवाद साधने की कोशिश कर रहे थे। फिर बाद में दोनों ओर के सैनिकों ने क्रिसमस के गाने गाए। मन भरकर तालियां बजाईं। हमने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी और भेंट वस्तुएं भी प्रदान कीं।

उसके बाद मैं और पादरी एक ओर चले गए। जर्मन अधिकारियों के साथ हमने वार्तालाप किया। उन्होंने अपने सैनिकों को दफन करने के लिए अनुमति मांगी। हमारे खंदक में स्थित उनके सैनिकों के शवों को वापस उन्हें सौंपने हेतु मैंने अनुमति दी। हमारे बीच अल्प युद्ध विराम की घोषणा हुई। अगले दिन 12 बजे तक दोनों ओर से फायरिंग न करने का निर्णय हुआ। हमने एक–दूसरे को क्रिसमस की शुभकामनाएं देने के लिए निमंत्रण दिया। मैं उनकी सीमा के अंदर चला गया था। उनकी सीमा के एक किलोमीटर अंदर मैं खड़ा था। हमने एक–दूसरे को सलाम किया। शांति और स्थिरता के लिए, सुख और चैन की नींद के लिए प्रार्थना की।

अब मैं अपने बंकर में हूँ। मेरे कानों में जर्मन सैनिकों की आवाजें गूंज रही हैं। वे ‘द वाख्तएम वहगाईन’ यह गीत एक स्वर-ताल में गा रहे हैं। आज की रात एक अभूतपूर्व रात है। जर्मन सैनिकों के खंदकों में मोमबत्तियां जल रही हैं। सैनिक चांदनी रात में सुरक्षा दीवार के ऊपरी किनारे पर बैठे हैं। दूर अंतराल से गोलियां चलने की आवाजें आ रही हैं परंतु हमारे तल पर आनंद से भरा शांतिपूर्ण वातावरण है। सैनिक एक-दूसरे से सिगरेट का आदान-प्रदान कर रहे हैं। सिगरेट पीते हुए एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं। पुरानी सुख से भरी यादों में वे पूरी तरह खोए हुए हैं। मुझे लगा कि सोने के पहले इस चमत्कारी घटना के संदर्भ में तुम्हें बताना चाहिए। मेरे मन में एक विचार आता है। मेरे मन में एक प्रश्न उठता है कि कल सुबह होते ही पुनः हम एक-दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे। एक-दूसरे पर पुनः गोलियां चलाएंगे। कल सुबह होते ही पुन: हम एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाएंगे।

क्रिसमस की यह शाम मुझे सदैव याद रहेगी।

क्रिसमस का दिन। आज सुबह जर्मन फौज ने अपने सैनिकों को शव दफनाने के लिए भेजा। उन्हें हमारे लोगों ने भी मदद की। सुबह का अधिकांश समय हमने एक-दूसरे के साथ दोस्ती करने में और गाना गाने में व्यतीत किया। उनके कैप्टन और उनके अन्य सहयोगियों को मैंने शुभकामनाएं दी। तुम्हें विश्वास नहीं होगा लेकिन सच बता रहा हूँ आज दोनों ओर के सैनिकों ने एक-दूसरे के साथ फोटो निकाले। जर्मन लोग सैक्सन हैं। देखने में अतिव (अति) सुंदर और ऊंचे। उनको भी हमारी तरह ही शांति चाहिए। लेकिन आज रात के बाद उनकी कोई भी सांस अंतिम सांस हो सकती है। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि युद्धभूमि पर दुश्मन कितने प्यार से और कितने सहजता से मिल रहा है। हमारी बहुत अच्छी अनौपचारिक दोस्ती हो गई। 

थोड़ी देर पहले हम दोनों ने रात का भोजन लिया। हम पुनः एक बार उनको मिलने वाले हैं। फिर हम अपनी-अपनी खाइयों में पहुंच जाएंगे। रात नौ बजे तक का समय दिया गया है। उसके बाद पुनः युद्ध आरंभ होगा। मैं सोच रहा हूँ कल पहली गोली कौन चलाएगा? यदि वह कहते होंगे कि ‘फायर इन द एयर एंड वी विल’। लेकिन प्रारंभ तो होगा ही। हम पुनः एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन जाएंगे। पुनः एक-दूसरे पर बंदूकें तानेंगे। गोलियों की बौछार कर एक-दूसरे के शरीर को छलनी करेंगे।

एक दिन की छुट्टी मिलने पर इतना खुश होते हुए हमने कभी किसी को नहीं देखा। उनका ओपेरा गायक गाना गाने वाला है। सोच कर देखिए, दो सैन्य स्थल एक-दूसरे से केवल पचास मीटर के दूरी पर स्थित हैं। लेकिन दोनों ओर के इंसानों ने एक-दूसरे को देखा तक नहीं। उन्होंने केवल एक-दूसरे के ऊपरी सर देखे होंगे। अचानक वह सामने आते हैं। आज कुछ जर्मन सैनिकों ने मुझे उनके परिवार के कुछ फोटो दिए।

अब मुझे पत्र लेखन को रोकना होगा। नहीं तो यह ‘आज’ कभी खत्म नहीं होगा। अभी-अभी खाना खाया है। मुझे आप सबकी बहुत याद आ रही है। खासकर तुम्हारी। अगले दो-तीन दिनों के बाद मैं पुनः कुछ लिखने का प्रयास करूंगा।

जैक का पत्र पढ़कर जब पूरा किया, मैं पहले जैसा था वैसा नहीं रह पाया। लिंकन से लेकर मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक साने गुरुजी द्वारा लिखित ‘श्याम की मां’ (श्यामची आई) तक अनेक के पत्र मैंने पढ़े हैं। चार्ली चैपलिन का पत्र मैंने मराठी भाषा में अनूदित किया है। लेकिन जैक का पत्र इन सबसे बहुत अलग, न्यारा है। दूसरे दिन पहली गोली किसने चलाई होगी? जिस किसी ने भी चलाई होगी उसके हाथ कांपे जरूर होंगे।

संपर्क :पृथ्वीराज तौर, मो.9579136466
सुनील कुलकर्णी, निदेशक आवास, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हिंदी संस्थान मार्ग, आगरा-282004 मो. 9422217600