नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती

(1924-2018) साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बांग्ला के प्रसिद्ध कवि। ‘नंगा राजा’ विख्यात कविता संग्रह।

 

सुरेश शॉ

कथाकार  और अनुवादक। दो कहानी संग्रह: ‘बाघा’ और ‘बदलते चैनल और अन्य कहानियां।’ संप्रति स्वतंत्र लेखन, पत्रकारिता में रुचि। ‘छपते-छपते’ के उत्सव विशेषांक का संपादन।

 

फिर भी तुम्हारी तरफ

यूं तो उस तरफ ताका करता हूँ
फिर भी नजर लगी रहती है तुम्हारी तरफ

जब कभी आकाश में आंखें गड़ाए रहता हूँ
कभी बगीचे, कभी राह-बाजार की शोभा पर
जो ढक देते हैं कैलेंडर के पन्नों को
देखता चलता हूँ अगणित तस्वीरों को दिनभर,
फिर भी नजर लगी रहती है तुम्हारी तरफ

घूम रहे हैं आंखों के सामने अनगिनत चेहरे
नाना दृश्य, जैसे एक धागे में पिरोए हुए हैं
देखता चलता हूँ दिनभर दूर-पास

गगन में प्रकाश-किरणें फैल जाती हैं
बरगद के पत्ते कांप उठते हैं हवा के झोंकों से
धूप बांहों में जकड़ लेना चाहती है छाया को
नारियल दारुण दुख से हो जाता है आक्रांत

कभी अग्नि-दग्ध हो उठता है राजपथ
और कभी रात यंत्रणा से भर जाती है
आगे-पीछे, दाहिने-बाएं फैले नगर-उपनगरों में
आगे बढ़ चले हैं व्यस्तता में दौड़ते हजारों पांव
दिनभर बदलती रहती है दृश्यावली
मैं देखता चलता हूँ उन दृश्यावलियों को
मेरी आंखें दृश्यों को बटोर लेती हैं
फिर भी तुम्हें बताता हूँ
जनता, जुलूस या पेड़, पखेरू
जिस किसी पर भी
मैं आंख टिकाता हूँ
नजर रहती है तुम्हारी तरफ।

होगा तो होगा

होगा तो होगा, नहीं तो नहीं
नियम-खातिर सभी बाजी लगाते हैं
चलो, मैंने भी एक बार बाजी लगाई
मुहल्ले वाले शोर मचाकर सबको मात देते हैं
चलो, मैं भी एकबार
आसमान सिर पर उठा लेता हूँ
लेकिन इससे तुम यह तय नहीं मान लेना कि
मैं किसी उड़ंत-अश्व के समक्ष झुक गया हूँ
मेरा कहना बिलकुल स्पष्ट है
होगा तो होगा, नहीं तो नहीं

असल में जो कुछ मैं करता हूँ,
वह नियम-रक्षा के सिवा और कुछ नहीं है
कभी दो कदम आगे बढ़कर
हार स्वीकार कर लेता हूँ
और कभी बस यूँ ही
सबके आगे खड़ा हो जाता हूँ
सफलता उसे ही मिलती है
जो सबकुछ कर गुजरता है
अंततः मैं सभी सुख-दुख को
एक-सा ग्रहण करना चाहता हूँ
नियम-पूर्ति खातिर
मैं कभी उच्छ्वसित हो उठता हूँ
नियम-पूर्ति खातिर
कभी बंद दरवाजे पर सिर पटक आता हूँ
नियम-पूर्ति खातिर
अपनी आवाज को मैंने सबसे अलग रखा है
और कभी
दूसरों के साथ मिलकर कलरव किया है
तब भी जल्दी में कोई फैसला मत कर लेना
याद रखना, मेरा कहना एकदम साफ है
होगा तो होगा, नहीं तो नहीं।

तुम देख लेना

एक-एक कर सब बना लूंगा, तुम देख लेना
घर-द्वार, खेत-खलिहान
आंगन के कोने में लौकी के मचान
खिड़की के पार जुही की झाड़ियां
एक-एक कर सब बना लूंगा, तुम देख लेना
तुमने कहा था
दक्षिण दिशा में पोखरे का होना अच्छा होता है
वह भी रहेगा
पोखरे में हंसों को नहाते देखना चाहती हो न
क्या बड़ी बात है!
सफेद-बादामी रंग के हंस उसमें तैरा दूंगा
शायद एक ही साथ सब पूरा न हो सके
पर एक-एक कर तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी करूंगा

प्यार बरकरार रहने से सब होगा
देखना, सब होगा
जो कुछ बनाना हो पाएगा
मैं अपने दोनों हाथों से बनाऊंगा
एक-एक कर सब पूरा कर लूंगा, तुम देख लेना।

कलकत्ते का ईसा

लाल बत्ती का कोई संकेत नहीं था
फिर भी
तूफान के रुक जाने-सा पूरा कलकत्ता थम गया
अडिग हो खड़ी रहीं टैक्सी, कारें,
मालवाहक गाड़ियां और
बाघ मार्का डबल डेकर बसें
‘मरा-मरा’ का आर्तनाद करते
सड़क के आर-पार से दौड़ पड़ थे लोग
झांखा-मुटिया, फेरीवाले, दुकानदार और खरीदार
सब के सब निस्पंद खड़े हैं
कि जैसे कोई स्थिर चित्र आ टंगा हो
हैरान हो सभी देख रहे हैं
अपने लड़खड़ाते कदमों से
सड़क के इस पार से उस पार चला जा रहा है
एक पूर्ण नग्न शिशु

कुछ देर पहले बारिश हुई थी
चौरंगी की इन सड़कों पर
अभी चमचमाती धूप में
कहीं-कहीं मेघ-पिंड उभर आए हैं
पूरा कलकत्ता
जैसे किसी मायावी जाल में फंस चुका है

सरकारी बस की खिड़की पर मुंह रखकर
एक बार आकाश को निहारता हूँ, एक बार तुम्हें
किसी भिखारन की देह का हिस्सा
महानगर कलकत्ते का ईसा!
पूरी आवाजाही तुमने अपने मंत्र से रोक दी है
जनता का शोर
असहिष्णु चालकों का दांत किटकिटाना
कोई रुकावट नहीं, कोई बाधा नहीं
कोई हस्तक्षेप नहीं

दोनों तरफ उद्धत है मृत्यु
और तुम उसके बीच से होकर
अपने लड़खड़ाते पैरों से आगे बढ़ते जाते हो

जैसे मूर्त मानवता के
सद्यः चलने के आनंद से परिपूर्ण संंपूर्ण विश्व को
अपनी मुट्ठी में भींच लेना चाहते हो तुम
धरती के एक छोर से
दूसरे छोर तक चल पड़े हो तुम।