
युवा लेखक, कवि और संस्कृति कर्मी। अध्ययनरत।
दुनिया में छोटी-मोटी भाषाओं के मिटने के खतरे के समानांतर इस समय हिंदी जैसी बड़ी भाषाएं आंतरिक विरूपण और सांस्कृतिक विध्वंस के दौर से गुजर रही है। यह मानव भाविष्य पर एक बड़ा खतरा है। इस तरह का संकट सोच और संवेदना को गहराई से प्रभावित करता है।
आम लोगों तक पहुंच वाली भाषा में एक तो छवियों और चिह्नों का प्रयोग बढ़ा है और मूल्यों पर जोर कम दिया जा रहा है। दूसरी तरफ, बड़े-बड़े व्यक्तित्वों के स्तर पर अपशब्दों का प्रयोग बढ़ा है। भाषा अशालीन होती जा रही हैं। इसका असर सबसे ज्यादा नई पीढ़ी पर है। भाषा का उपयोग दूसरों से निकटता कायम करने के लिए होता है, पर इन दिनों यह भिन्नता और दूरी पैदा करने के लिए ज्यादा इस्तेमाल में आ रही है।
सभ्यता के विकास का संबंध भाषा से भी रहा है। यह हमारी अभिव्यक्ति के साथ पहचान का भी मामला है। भाषा के जरिए हम लोगों से जुड़ते हैं और कई बार कटते भी हैं। भाषा के प्रयोग से हमारे व्यक्तित्व का परिचय भी मिलता है। पूरी दुनिया में भाषा के कई रूप हैं -मीठी भाषा, कड़वी भाषा, बदजुबानी भाषा, अश्लील भाषा, शिष्ट भाषा आदि। इन रूपों का प्रयोग हमारी सोच और हमारे व्यवहार पर निर्भर करता है।
इन दिनों भाषा में शिष्टता और नैतिकता का ह्रास हुआ है। यह सच है कि भाषा को लेकर हम अब गंभीर नहीं हैं। सावधानी, सहजता, धैर्य, आत्मीयता और संवेदना से कटे लोग कट्टरता, नफरत और विद्वेष की भाषा का प्रयोग करने लगे हैं। विभाजनकारी लोग तोड़-फोड़ की भाषा और बाजार के लोग मुनाफे की शब्दावली गढ़ रहे हैं।
एक समय भाषा में मूल्यों के लिए काफी जगहें थीं। असहमति और विरोधियों के लिए भी लोगों के मन में आदर था। एक न्यूनतम सामाजिकता थी। आज हम असहिष्णु और संकीर्ण होते जा रहे हैं। यही वजह है कि हम अपने से असहमत और भिन्न के लिए ‘जगह’ नहीं निर्मित कर पा रहे हैं। इन दिनों भाषा में गिरावट की सबसे बड़ी वजह यही है कि हम सांस्कृतिक तौर पर अनुदार और सामाजिक तौर पर मनुष्य की जगह जाति, धर्म, भाषा, लिंग, नस्ल और प्रांतीयता में रिड्यूस हो गए हैं।
इन दिनों देखा जा रहा है कि ऑफिस, कारखाने में काम कर रहे युवक और युवतियां और विद्यार्थी भी गाली सूचक शब्दों को आम प्रचलन में शामिल कर रहे हैं। स्थिति यह है कि असम्मानजनक भाषा में बात करना या संबोधित करना वीरता या धांसू होने का लक्षण माना जा रहा है। ऐसे में आने वाले समय में अपभाषा आम हो जाएगी। फिल्मों में कुछ हद तक सेंसर काम करते हैं, लेकिन वेब सीरीज की खिड़की खोलते ही आपको गाली सुनने का आदि होना पड़ेगा।
स्कूल से लेकर संसद तक भाषाओं की अस्मिता का खोना देश की अस्मिता का हनन है। थर्ड डिग्री भाषा का इस तरह बढ़ना बोलने और सुनने वाले शालीन लोगों के अंदर एक गहरा तनाव पैदा करता है और कोमल हृदय के व्यक्तियों में भावनाओं के लिए जगह नहीं रहने देता। इस बेलगामी को रोका जाना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है।
परिचर्चा में इस बार भाषा प्रदूषण के खतरों पर विद्वान लेखकों के विचार प्रस्तुत हैं, बहस आमंत्रित है।
सवाल
- हिंदी में पिछले 10-15 सालों में अपशब्दों का इस्तेमाल, कुरुचिपूर्ण कथन और हिंसात्मक वक्तव्य बढ़े हैं। इस घटना को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
- भाषा प्रदूषण किस अर्थ में पर्यावरणीय प्रदूषण के समान ही जीवन पर एक गहरा संकट ला सकता है?
- हिंदी में अपभाषा का बढ़ा बेलगाम प्रयोग किस बौद्धिक और सांस्कृतिक ह्रास का द्योतक है? इसमें किस बड़ी विश्व घटना की भूमिका नजर आती है?
- भाषा में न्यूनतम शालीनता का ह्रास और कुवचन क्या सामाजिक ढांचे के विघटन का चिह्न है? खासतौर पर स्त्रियों और पिछड़ों-दलितों को लेकर हिंसात्मक अपभाषा का इस्तेमाल इधर बढ़ा है, यह किस बात का संकेत है?
- भाषा प्रदूषण में सोशल मीडिया की क्या भूमिका है?
- अपभाषा के चलते भाषा में आ रही सिकुड़न और संवेदना में ह्रास को कैसे रोका जा सकता है?
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| रविकांत युवा आलोचक, संपादक, राजनीतिक विश्लेषक। संप्रति हिंदी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर। |
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(1) पिछले 10-15 साल में सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर बुनियादी बदलाव हुए हैं। सूचनातंत्र का जाल घर के भीतर तक दाखिल हो चुका है। मोबाइल क्रांति ने एक नए सामाजिक परिवेश को जन्म दिया है। यह एक आभासी दुनिया है, लेकिन इसके जरिए होने वाले बदलाव केवल आभासी दुनिया तक महदूद नहीं हैं। इसने समूचे समाज की जीवन शैली में एक उथल-पुथल मचाई है। सूचनाओं का अंबार लग गया है। ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के विभिन्न साधनों के जरिए दुनिया को देखने-समझने का एक नया शऊर पैदा हुआ है। इसने हमारे सूचनात्मक ज्ञान को समृद्ध किया है लेकिन सोशल मीडिया के दुरुपयोग ने संस्कृति को बड़े पैमाने पर विकृत किया है। इसका सबसे व्यापक प्रभाव भाषाई संस्कृति पर दिखाई दे रहा है।
सोशल मीडिया ने सृजन और संवाद की संस्कृति को बुनियादी रूप से प्रभावित किया है। स्वभाव में बढ़ती अधीरता ने रचनाधर्मिता और छपने की हड़बड़ी में रचना की बनावट और संवेदना; दोनों पर प्रभाव डाला है। लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव संवादधर्मिता पर हुआ है। ज्यादातर संवाद, विवाद में तब्दील होने लगे। चूंकि सोशल मीडिया पर कोई नैतिक अनुशासन नहीं है, इसलिए विरोध करने के लिए अपशब्दों की सारी सीमाएं लांघी जा चुकी हैं। हिंसा प्रेरक शब्दों और गालियों के जरिए एक ऐसा भाषिक माहौल बना दिया गया, जिस पर कोई प्रतिबंध या आत्मनियंत्रण नहीं है। इसे, एक तरह से भाषिक प्रदूषण की श्रेणी में रखा जा सकता है।
(2) पर्यावरण के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जिस तरह मानव जीवन के लिए शुद्ध पर्यावरण जरूरी है, उसी तरह संवेद्य भाषिक वातावरण भी जरूरी है। मानव जीवन की पहली बड़ी क्रांति भाषा के रूप में हुई। ध्वनि और आंगिक संकेतों से निकलकर जब इंसान ने शब्दों को पैदा किया तो समाज व्यवस्थित हुआ। समाज, मानव जीवन जीने की व्यवस्था है। लेकिन आज भाषा की विकृति मानव जीवन के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। संवादों में गालियां, हिंसा प्रेरक शब्द, अश्लीलता परोसने वाले शब्द, हमेशा से समाज के लिए अनैतिक और अग्राह्य समझे जाते थे। लेकिन आज फिल्मों से लेकर सोशल मीडिया पर बढ़ते हिंसक दृश्य; अश्लील और अनैतिक संबंधों को मनोरंजन के नाम पर परोसा जा रहा है। इन शब्दों और बिंबो का मानव जीवन और मनोमस्तिष्क पर गहरा असर हो रहा है। खासकर, नई पीढ़ी के किशोरवय बच्चों में बढ़ते हिंसा और सेक्स के प्रति रुझान ने समाज को बड़े पैमाने पर दूषित किया है।
भाषा सिर्फ शब्दों और संवादों में नहीं होती, दृश्यों की भी एक भाषा होती है। पोर्नोग्राफी से लेकर वेब सीरीज जैसे फिल्मी दृश्यों ने समाज और नई पीढ़ी पर गहरा असर डाला है। इससे रिश्तों की मर्यादा बिखरी है। सामाजिक संबंध टूटे हैं। आधुनिक मूल्यों और तर्कों के आधार पर विकसित होने वाले संबंध आज स्वार्थ और अहंकार में डूब रहे हैं। इसलिए भाषा के इस बढ़ते असर को प्रदूषण की तरह देखा जा रहा है, जो पर्यावरण प्रदूषण की तरह ही मानव जीवन पर प्रतिकूल असर डाल रहा है।
(3) विश्व प्रसिद्ध भाषाविद जॉर्ज स्टेनर कहते हैं कि ’दुनिया जैसी है, वैसी उसे स्वीकार करने का मनुष्य का मुख्य उपकरण भाषा है।’ दुनिया को अभिव्यक्त करने का माध्यम भाषा है। प्रत्येक भाषा की अपनी एक विश्वदृष्टि है। हिंदी की विश्वदृष्टि बेहद उदार और समावेशी रही है। लंबे समय से हिंदी इस देश की संपर्क भाषा है। लेकिन साहित्यिक भाषा बनने का इसका इतिहास डेढ़ शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है। हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं है बल्कि 46 बोलियों का परिवार है। हिंदी स्थानीय बोलियों और देशी-विदेशी भाषाओं के शब्दों से समृद्ध होती रही है। पिछली एक सदी में हिंदी की जितनी भाषिक समृद्धि हुई है, उसके मुकाबले 21वीं शताब्दी में हिंदी की समृद्धि अधिक गत्यात्मक है। लेकिन भूमंडलीकरण की सांस्कृतिक प्रक्रिया और सूचनाओं के बेतरतीब बढ़ते प्रभाव के कारण हिंदी का स्वभाव दूषित हुआ है। अपसंस्कृति को बढ़ावा मिला है।
भूमंडलीकरण के चलते भौतिकवाद और उपभोक्तावाद बढ़ा है। पश्चिमीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय संस्कृति दूषित हुई है। आध्यात्मिकता की जगह भोगवाद को बढ़ावा मिला है। लेखक हो या सामाजिक कार्यकर्ता इस फेसबुकिया दौर में सबकी प्रदर्शनप्रियता बढ़ी है। काम को प्राथमिकता देने के बजाय आत्म प्रदर्शन और महत्वाकांक्षाओं का असर सीधे तौर पर दिखाई पड़ रहा है। हिंदी की भाषिक संस्कृति पर भी इसका प्रभाव हुआ है। अंग्रेजी शब्दों का बोलबाला बढ़ रहा है। सामाजिक प्रतिबद्धता के बजाय लेखक पुरस्कार पाने और फैन बनाने के लिए बेताब नजर आते हैं। रील्स की दौड़ में नेता, अभिनेता ही नहीं लेखक भी शरीक हो गए हैं। इसलिए उनकी रचनाशीलता प्रभावित हुई है। संवेदना, शिल्प और भाषा पर भी गहरा असर देखा गया है। लोकप्रिय साहित्य के नाम पर चलताऊ कथाएं लिखी जा रही हैं। हास्य के नाम पर फूहड़ता, प्रेम के नाम पर यौनिकता और संघर्ष के नाम पर गैंगवॉर दिखाया जा रहा है। इससे अपभाषा की संस्कृति बेलगाम हुई है। रही सही कसर बॉलीवुड की फिल्मों, विज्ञापनों और रील्स के जरिए परोसी जा रही अश्लीलता ने पूरी कर दी है।
(4) भारतीय समाज मूलतः वर्णवादी और पितृसत्तात्मक रहा है। इसीलिए हिंदू समाज में स्त्रियां और दलित सदियों से पीड़ित हैं। जातिगत ऊंच-नीच वाली मनुवादी व्यवस्था में स्त्रियों और दलितों को शिक्षा, शस्त्र और संपत्ति से वंचित किया गया। शोषण और अन्याय की इस दमनकारी व्यवस्था में स्त्रियां और दलित शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की हिंसा का शिकार होते रहे हैं। शारीरिक हिंसा से ज्यादा भयावह मानसिक हिंसा है। मानसिक हिंसा के जरिए इन वर्गों के मनोबल को तोड़ा गया। भाषिक स्तर पर होने वाली यह मानसिक हिंसा, समाज में प्रचलित गालियों और कहावतों में प्रकट होती है, जो मूलतः स्त्री और दलित विरोधी है। निरंतर इन वर्गों को अश्लील और अपमानजनक गालियों का सामना करना पड़ा। कुछ जातियों और स्त्रियों को अपशकुन तक करार दिया गया। इस व्यवस्था ने सदियों तक दलितों और स्त्रियों को गुलाम बनाकर रखा। नवजागरण के दौर में ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई, फातिमा शेख ने स्त्री और दलित विरोधी धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को खारिज किया। स्वाधीनता आंदोलन में डॉ. अंबेडकर ने दलितों और स्त्रियों की सामाजिक आजादी के लिए संघर्ष किया। स्वतंत्रता के बाद असमानता और अन्याय को समाप्त घोषित करते हुए संविधान में सबको बराबरी का दर्जा दिया गया। लेकिन चूंकि सामाजिक ढांचे में कोई आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ, इसलिए कानून के बावजूद, स्त्रियों और दलितों के प्रति वर्णवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। अलबत्ता, संविधान और आधुनिक मूल्यों के प्रभाव में शहरों के शिक्षित वर्ग में जरूर एक मानवीय चेतना पैदा हुई। शिक्षा और वैज्ञानिक सोच ने इस वर्ग में समतापरक मूल्यों और संस्कारों को पैदा किया। 70 और 80 के दशक में साहित्य के किरदार हों या फिल्म के संवाद उनकी भाषा समावेशी और सौहार्दपरक होती थी। इसका असर शहराती जीवन शैली में दिखाई देने लगा था। लेकिन 21वीं सदी में धर्मांंधता, राजसत्ता और पूंजीवाद के गठजोड़ ने समाज में एक बार फिर से भाषिक विकृति को बढ़ावा दिया है।
एक वर्ग विशेष द्वारा खुलेआम मनुस्मृति का समर्थन किया जा रहा है। सांस्कृतिक वर्चस्व बनाए रखने के लिए मनुवादी और वर्णवादी मानसिकता के लोग दलितों और स्त्रियों के प्रति अभद्र, अश्लील और हिंसात्मक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। यह प्रयोग समाज से लेकर संस्कृति के विभिन्न माध्यमों में दिखाई दे रहा है। फिल्मी संवाद और सोशल मीडिया पर बढ़ती अश्लीलता और गालियां, दरअसल सामाजिक विघटन और दूषित मानसिकता का परिचायक हैं।
(5) इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने सूचनाओं के अपरिमित द्वार खोले हैं। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और अन्य सोशल नेटवर्क साइट के जरिए लोगों का परस्पर जुड़ाव हुआ है। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में बैठकर लोग आपस में चैटिंग कर रहे हैं। इससे एक नई तरह की सामाजिक क्रांति हुई है। टाइम्स नाउ वेबसाइट (30 अगस्त, 2019) की एक खबर के अनुसार अमेरिका की एमिनी ने भारत आकर अमृतसर के रहने वाले पवन से शादी की। कुछ महीने पहले ही दोनों की मुलाकात फेसबुक पर हुई थी। मैसेंजर पर दोनों में चैटिंग शुरू हुई। फिर दोनों में प्यार हुआ और इसके बाद शादी। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की नई खिड़कियां भी खोली हैं।
लोकतांत्रिक मुद्दों पर चलने वाली बहसों ने जानकारी का दायरा बढ़ाया है। दुनिया भर में अनेक आंदोलन सोशल मीडिया के जरिए सफल हुए हैं। लेकिन सोशल मीडिया का यह सिर्फ एक पहलू है। आभासी दुनिया में फैला यह नेटवर्क बेहद अनसोशल भी है, जिसने रिश्तों को विद्रूप बनाकर परिवार और समाज को विघटित किया है।
पिछले एक-डेढ़ दशक में सोशल मीडिया ने पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लिया है। कुछ आंदोलन, कुछ शादियां और कुछ बहसों को छोड़ दें तो सोशल मीडिया ने लोगों के मस्तिष्क पर तीव्र हमला किया है। मोबाइल के जरिए सोशल मीडिया, हमारे बेडरूम से लेकर किचेन और बाथरूम तक घुस गया है। सोशल मीडिया फेक न्यूज से लेकर मनोरंजक और उत्तेजक रील्स से भरा हुआ है। इसने समाज की हर पीढ़ी को प्रभावित किया है। लेकिन बच्चों और नौजवानों को इसका एडिक्ट बना दिया है। सोशल मीडिया के एडिक्शन ने लोगों के मस्तिष्क पर जो हमला किया है, उससे पढ़ाई-लिखाई ही नहीं प्रभावित हुई है बल्कि उनकी भाषा और संस्कार भी विकृत और दूषित हुए हैं। सोशल मीडिया पर भौंडे गाने, अश्लील नृत्य और सेक्स वीडियो की भरमार है। इससे किशोरों और नौजवानों में यौन कुंठा पैदा हुई है। महिलाओं के प्रति उनकी भाषा अश्लील और हिंसक हुई है।
मशहूर भाषाविद ओलिवर वेंडेल होम्स कहते हैं कि ‘हर भाषा एक मंदिर है, जिसमें उन लोगों की आत्मा प्रतिष्ठित होती है जो उसे बोलते हैं।’ सोशल मीडिया पर दिन-रात विचरने वाली आज की पीढ़ी की भाषा में भी अधीरता, झूठापन, हिंसा, अश्लीलता और भोगवाद झलकता है। दरअसल, हमारी पीढ़ी सोशल मीडिया से बेहद आक्रांत है। इसलिए उसके लिखने और बोलने में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। हिंदी और स्थानीय भाषाओं के शब्दों की उपलब्धता के बावजूद अंग्रेजी भाषा के प्रयुक्त शब्दों पर सोशल मीडिया का सीधा असर दिखाई देता है। इससे हिंदी भाषा दूषित ही नहीं संकीर्ण भी हुई है।
(6) इस समय पूरी दुनिया पूंजीवाद के प्रभाव में दक्षिणपंथी विचार और व्यवस्था से संक्रमित है। अमेरिका और यूरोप जैसे पूंजीवादी साम्राज्य, एशिया और अफ्रीका के विकासशील और गरीब देशों पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। दुनिया की सैकड़ों भाषाएं मरने के कगार पर हैं। एक भाषा के साथ पूरी संस्कृति मर जाती है। बहुलतावादी एशियाई संस्कृति को नष्ट करने के लिए साम्राज्यवादी देश एक भाषा, अंग्रेजी का आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं। संचार साधनों और सोशल मीडिया के जरिए इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। यह एक छद्म युद्ध है। भाषा, इस युद्ध का एक हथियार है। बाजार और भोगवादी संस्कृति के बढ़ते प्रकोप के कारण हमारी भाषा विकृत और संकीर्ण हुई है।
अपभाषा के चलते भाषा में आ रही संकीर्णता और संवेदना के ह्रास से मुक्ति के लिए प्राथमिक स्तर पर मूलगामी वैचारिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। साहित्य और कलाओं के प्रचार- प्रसार के जरिए सोशल मीडिया के हमले का मुकाबला किया जा सकता है। देशी भाषाओं की उन्नति और विकास के लिए सरकारी स्तर पर ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। आत्म-अनुशासन के जरिए मोबाइल और अन्य साधनों के प्रयोग को सीमित करके पारिवारिक संबंधों को समय दिया जाना जरूरी है। सामान्य बैठकी और सभाओं के जरिए बहु-आयामी संवाद आयोजित किए जाने चाहिए। विशेषकर, बच्चों को सोशल नेटवर्किंग साइट से बचाने के उपाय पर विचार किया जाना अपरिहार्य है।
| 24, मिलिनी पार्क, लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर, लखनऊ-226007 मो. 94519 45847 |
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| जवरीमल्ल पारख वरिष्ठ आलोचक। साहित्य, संस्कृति, मीडिया और सिनेमा पर नियमित लेखन। अद्यतन पुस्तक : ‘साझा संस्कृति, सांप्रदायिक आतंकवाद और हिंदी सिनेमा’। |
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(1) भाषा संवाद और संप्रेषण का माध्यम है। लेकिन वह सामाजिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। सामाजिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां एक-सी नहीं होतीं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनको अभिव्यक्त करने वाली भाषा भी एक-सी नहीं होगी।
मनुष्य के सामाजिक और सांस्कृतिक आचरण का स्वरूप परंपरा और परिवेश से तय होता है जिसे वह अपनी शिक्षा, कार्य-क्षेत्र, स्वभाव और मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार सचेत और अचेत रूप में विशिष्ट स्वरूप प्रदान करता है। मनुष्य की भाषा का जो स्वरूप उसके लिखने और बोलने में व्यक्त होता है, वह उसकी विषय-वस्तु से ही तय नहीं होता बल्कि भाषा की उसकी समझ, उसपर उसके अधिकार, उसके मनोभावों, मनःस्थितियों और स्वभावगत प्रवृत्तियों से भी तय होता है।
सार्वजनिक जीवन में भाषाई आचरण के पैमाने बने हुए हैं। हम जब किसी को उसके विपरीत आचरण करते हुए देखते हैं तो उसे अच्छा नहीं मानते। लेकिन कोई दोषपूर्ण और निम्नस्तरीय आचरण यदि व्यापक स्तर पर सामाजिक आचरण बन जाए तो मामला केवल भाषा का नहीं रह जाता। वह उस समाज की नैतिक गिरावट का प्रमाण भी बन जाता है। आज कमोबेश यही स्थिति है। ऐसा क्यों हुआ और क्यों हो रहा है? शायद इसका कारण यह है कि आज ऐसी ताकतें सत्ता में हैं जिनके लिए साध्य ही महत्वपूर्ण है, साधन नहीं। उनके लिए वैज्ञानिक और विवेकशील सोच उनके राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के मार्ग में बाधक नजर आते हैं। वे जनता के सामाजिक और बौद्धिक पिछड़ेपन का लाभ उठाते हुए उसकी चेतना को ऊपर उठाने के बजाय उसकी रूढ़ मान्यताओं का दोहन करते हैं। उन्हें भावनात्मक रूप से उत्तेजित करते हैं और कथित दुश्मनों के प्रति हिंसा के लिए प्रेरित करते हैं।
यह संयोग नहीं है कि देश का नेतृत्व करने वाले अधिकतर राजनेताओं के भाषाई आचरण उनके पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है। अगर उनके सार्वजानिक सभाओं में ही नहीं संसद में भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिसे आम बोलचाल में असामाजिक, अश्लील, हिंसक और अनैतिक माना जाता रहा है तो यह सामाजिक और नैतिक पतन की निशानी है। ऐसे नेताओं के प्रभाव में जनता का जितना बड़ा हिस्सा होता है उसकी भाषा भी अपने नेताओं के अनुकरण में वैसी ही या उससे भी अधिक गिरावट की शिकार हो जाती है। लेकिन जो लोग इस राजनीतिक प्रभाव के दायरे में नहीं होते वे भी प्रतिक्रिया में उसी तरह की भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं।
इसका असर बौद्धिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों में दिखने लगता है। सोशल मीडिया पर कथित लेखकों और बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों में इस गिरावट को देखा जा सकता है। दूसरे लेखकों के बारे में व्यक्तिगत टिप्पणियां, अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल, स्त्री रचनाकारों के बारे में ‘छिनाल’ जैसे शब्दों का प्रयोग बहुत ही शर्मनाक है। ये प्रवृत्तियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।
(2) भाषा को कम जानना उतना बड़ा दोष नहीं है जितना कि अपभाषा का उपयोग करना। किसी को जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, रंग, कद, क्षेत्र, शिक्षा, विचार, व्यवसाय आदि के आधार पर संबोधन करते हुए अपमानजनक शब्दों का उपयोग करना किसी भी सभ्य समाज में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत में दलित, धार्मिक अल्पसंख्यक, स्त्री, काले व्यक्ति, उत्तर-पूर्व प्रांतों के रहने वालों को जिन अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, दरअसल वह गाली देना ही है। अगर इस तरह की प्रवृति बढ़ती है और उसे आमतौर पर स्वीकार्य भी मान लिया जाता है, तो यह समाज की पतनशीलता का द्योतक है।
भारत में यौन संबंधों को आधार बनाकर जिस तरह की गालियां सामान्य रूप से प्रचलित हैं, यह बताता है कि भारतीय समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना का गहरा अभाव है। इसी तरह जाति आधारित गालियों का आम प्रचलन यह बताने के लिए काफी है कि जाति आधारित ऊंच-नीच का भाव किस गहराई तक भारतीयों के मानस में धंसा हुआ है। इसी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों को धर्म आधारित गाली देना पिछले एक दशक में बहुत बढ़ गया है। यह सब कुल मिलाकर यह बताता है कि भारतीय समाज एक पिछड़ा हुआ समाज है जिसमें समानता के भाव की बहुत कमी है। समानता के अभाव में न लोकतंत्र सुरक्षित रहता है और न स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है। समाज का नैतिक और बौद्धिक रूप से रुग्ण होना पर्यावरणीय प्रदूषण से कहीं ज्यादा खतरनाक है।
(3) हिंदी में अपभाषा का बढ़ा बेलगाम प्रयोग निश्चय ही बौद्धिक और सांस्कृतिक ह्रास का द्योतक है। वैसे हर गैरबराबरी वाले समाज में अपभाषा का प्रयोग एक आम बात है। लेकिन एक आधुनिक, सुसभ्य और सुसंस्कृत समाज में लोग अपभाषा के प्रयोग से बचने की कोशिश करते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रतिगामी समाजों में आधुनिकीकरण की जो प्रक्रिया चल रही थी, 1990 के दशक से वह विपरीत दिशा में मुड़ती नजर आने लगी। प्रगतिशील ताकतों और संगठनों का पतन और विघटन होना शुरू हो गया था और पूंजीवाद से प्रेरित ताकतें और संगठन पहले से ज्यादा मजबूत होने लगे थे। इनके लिए लाभ और लोभ ही जीवन की प्रेरणा और लक्ष्य होता है। शोषण और उत्पीड़न को गैर-बराबरी के समाज में वैश्विक विकास के लिए जरूरी समझा जाने लगा था। जब एक बार फिर से गैर-बराबरी और ऊंच-नीच को स्वीकृति मिलने लगी तो इसका असर हमारी भाषा में प्रतिबिंबित होना स्वाभाविक है।
इस दौर में बौद्धिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के कई नए माध्यम सामने आए लेकिन मूल्यों के स्तर पर गिरावट भी नजर आने लगी। खासतौर पर जनसंचार के नए माध्यमों में सक्रिय लोगों के लिए भी सांस्कृतिक उत्पादों का उद्देश्य हल्का, तत्काल असर करने वाला, फूहड़ और अश्लील मनोरंजन प्रदान करना मकसद होता है। ऐसे मनोरंजन का आस्वादन करने के लिए बौद्धिक और नैतिक जागरूकता की जरूरत नहीं होती। ऐसा मनोरंजन पाठकों और दर्शकों की पिछड़ी चेतना को ही सहलाती और मजबूत करती है। ऐसे मनोरंजन का मकसद अधिकाधिक लाभ कमाना होता है न कि समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास में अपनी भूमिका निभाना। वे दर्शकों और पाठकों की पिछड़ी चेतना को ही संबोधित करते हैं और चाहते हैं कि उनकी चेतना पहले की तरह पिछड़ी रहे।
(4) कोई भी समाज कितना सुगठित है, इसका पता इस बात से लगता है कि उस समाज के लोगों और विभिन्न समुदायों के बीच किस तरह के संबंध हैं। अगर कोई समाज धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, भाषा, क्षेत्र के आधार पर आंतरिक रूप से विभाजित है और उनके बीच के संबंध लगभग शत्रुतापूर्ण हैं, और ऐसी ताकतें बहुत कमजोर हैं जो उनके बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को प्रोत्साहित कर सकती हैं तो उस समाज के ढांचे को विघटित होने से नहीं बचाया जा सकता।
अगर हम भारतीय समाज को देखें तो पिछले तीन दशकों में वह आंतरिक रूप से लगातार न केवल विभाजित हो रहा है बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच के संबंध काफी हद तक तनावपूर्ण बनते जा रहे हैं। ऐसे समाज में न लोगों के बीच संबंध सौहार्दपूर्ण हो सकते हैं और न ही शांतिपूर्ण। यह संयोग नहीं है कि धर्म और जाति के आधार पर अपने को शक्तिशाली समझने वाले समुदाय दूसरे समुदायों को हिंसा का शिकार बनाते हैं। और जब वैसा नहीं कर रहे होते हैं तब भी उनके प्रति अपनी भावनाओं को बहुत ही हिंसक रूप में और अपभाषा के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इसे दलितों, स्त्रियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति सवर्णों, पुरुषों और बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय के लोगों के दैनंदिन व्यवहार में व्यक्त होता हुआ देख सकते हैं।
दलितों और अल्पसंख्यकों को जाति और धर्म के आधार पर गाली-गलौज की भाषा में संबोधित करना, उन्हें सामजिक और संवैधानिक अधिकारों से वंचित करना और समय-समय पर हिंसा का शिकार बनाना और ठीक ऐसा ही हर जाति और धर्म के पुरुषों द्वारा स्त्रियों को घर के अंदर और बाहर हिंसा और अपमानजनक भाषा का शिकार बनाना अब भी आमचलन में हैं इस सामाजिक पतन पर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता।
(5) सोशल मीडिया जन अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जो लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग कोई भी अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने के लिए कर सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर भाषा की स्तरीयता और उत्कृष्टता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग इस माध्यम के प्रति जिम्मेदारी का भाव नहीं रखते।
कई बार लोग अपनी आत्मगत और अनियंत्रित भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम सोशल मीडिया को बना लेते हैं और उसी के अनुरूप भाषा भी आत्मगत और अनियंत्रित हो जाती है। सोशल मीडिया में भाषा की गिरावट को कई रूपों में देखा जा सकता है। लिखने और बोलने वालों की व्यक्तिगत कमजोरियां, अश्लीलता, फूहड़ता, अशुद्धि का साम्राज्य सोशल मीडिया पर पसरा हुआ देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर सत्ता अपना राजनीतिक नियंत्रण रखने को ज्यादा उत्सुक होती है। जनसंचार माध्यमों में लगातार भाषा की गिरावट को वे अपने पक्ष में इस्तेमाल भी करती है।
(6) सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरीयता को बनाए रखने की अपेक्षा शासक वर्गों से नहीं की जा सकती। इसके लिए तो जागरूक और प्रबुद्ध लोगों को कोशिश करनी होगी। सबसे पहले तो उन्हें अपने समय में आ रही भाषा की गिरावट के प्रति न केवल सचेत होना होगा, स्वयं उसके प्रभाव से बचना होगा।
चिंता की बात यह है कि लेखकों और बुद्धिजीवियों की भाषा में इस गिरावट को देखा जा सकता हैं। जबकि अपभाषा का शिकार होने के बजाय अपनी भाषा को यह मानते हुए कि दूसरे इससे सीखेंगे और इसका अनुकरण करेंगे उन्हें बहुत सावधानीपूर्वक और जिम्मेदारी के साथ उत्कृष्ट, शुद्ध, संवेदनशील और रचनात्मक भाषा का प्रयोग करना चाहिए। भाषा का सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहतर प्रयोग के लिए थोड़ी अध्ययनशीलता भी जरूरी होती है। इसके अलावा, आधुनिक समाज के लोकतांत्रिक और समतावादी मूल्यों में न केवल सच्ची और गहरी आस्था बल्कि उसे व्यक्त करने के लिए भाषा का सजग उपयोग बहुत जरूरी है।
| 802, टावर-3, पाम टेरेस सेलेक्ट, सेक्टर-66, गोल्फ कोर्स एक्सटेंशन रोड, गुड़गांव-122101 मो. 9810606751 |
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| अवधेश प्रधान प्रसिद्ध समालोचक। पूर्व प्रोफेसर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। अद्यतन पुस्तक ‘परंपरा की पहचान’। |
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(1) किसी समय भारतीय राजनीति में कमंडल-मंडल के प्रश्न पर जबर्दस्त सामाजिक ध्रुवीकरण हुआ था। नीचे से सामाजिक शक्तियां उभरकर ऊपर आईं। वे अपने अधिकार और सम्मान को लेकर मुखर होने लगीं। सवर्ण और अगड़ी जातियां एक ओर, अवर्ण और दलित-पिछड़ी जातियां दूसरी ओर। संवाद की जगह विवाद ने ले ली। बहस की जगह तू-तू मैं-मैं होने लगीं। बहस का उद्देश्य अपनी बात समझाना न रह गया। बोलने वाला समझना नहीं चाहता। सुनने वाला सुनने और समझने को तैयार नहीं। दोनों तरफ हमी-हम!
भाषा में अधिक से अधिक कभी आग – कभी कीचड़, कभी ईंट – कभी पत्थर और कभी-कभी तलवारों और कटारों का भी इस्तेमाल बढ़ गया। उद्देश्य हो गया एक दूसरे को नीचा दिखाना, अपमानित करना, चिढ़ाना, आहत करना। गाली-गलौज और अश्लील, अभद्र भाषा वक्तृत्व-कला की सबसे लोकप्रिय शैली बनती गई। नेताओं में जाति, चरित्र, व्यक्तिगत घर-द्वार की बातों को लेकर भद्दी से भद्दी बातें कहने की होड़ लग गई। यह सब नेताओं तक सीमित नहीं था।
जहां देखिए वहीं- मंच पर, सभाओं में, कक्षाओं में, सड़कों पर, परिसरों में, चाय की दुकानों पर, बसों में, ट्रेनों में लोग धार्मिक या फिर अगड़ा-पिछड़ा के प्रश्न पर बात करते करते लड़ने-झगड़ने लगते। बड़े-बड़े नेताओं ने आग भड़काने वाली भाषा बोलनी शुरू की तो फिर कार्यकर्ताओं ने, समर्थकों ने और आम लोगों ने भी एक से एक जहरीले नारे उछालना शुरू किया- पिछड़ी जाति कहां से आई…। तीन नहीं अब तीन हजार, बचे न एको कब्र-मजार। तिलक तराजू और तलवार- इनको मारो जूते चार। जब दलित राजनीति का पिछड़ी जाति से टकराव हुआ, आरोप और जहरीले नारे ऐसे उछाले जाने लगे जैसे बम फोड़ा जा रहा हो।
2014 के बाद की भारतीय राजनीति ने आरोप-प्रत्यारोप की भाषा में इस उत्तराधिकार का शानदार विकास किया है। देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को- यह नारा किसी कार्यकर्ता ने नहीं, एक बड़े नेता ने लगाया। फिर विश्वविद्यालयों में और सड़कों पर बहादुर कार्यकताओं ने उसे दुहराया। ठोंक दो, घुस कर मारेंगे जैसे महावाक्य बड़ी-बड़ी कुरसियों के मुंह से निकले। यह सब फुटकल प्रसंग नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति और विपत्ति के लक्षण हैं।
(2) पर्यावरणीय प्रदूषण को पहले हम गंभीरता से नहीं लेते थे। कई बार किसी मामले पर तब तक ध्यान नहीं दिया जाता, जब तक वह संकट का रूप न ले ले। पर्यावरणीय प्रदूषण संकट का रूप लेता है बहुत धीरे-धीरे। ठीक इसी तरह भाषा प्रदूषण को भी देखना चाहिए। भवभूति ने अपने ‘उत्तररामचरित’ नाटक में राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में सीता के चरित्र को लेकर जो प्रवाद फैलाया जाता है, उसे ‘कुत्ते के काटे का जहर’ कहा है। पागल कुत्ते का जहर सांप के जहर की तरह तुरंत असर नहीं करता, धीरे-धीरे असर करता है। भाषा का प्रदूषण भी ऐसे ही जहर की तरह धीरे-धीरे सामाजिक संबंधों को विकृत, तनावग्रस्त, उन्मादग्रस्त और हिंसाग्रस्त कर डालेगा।
कोई विचार पहले मन में आता है, फिर शब्दों में व्यक्त होता है और अंत में आचरण को प्रभावित करता है। मन-वचन-कर्म, यही क्रम है। घृणा और हिंसा के विचार पहले नेताओं, चिंतकों, प्रचारकों, संगठनों और संस्थाओं के द्वारा लेखों, किताबों, अखबारों, रेडियो और टीवी या सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित होते हैं फिर नारे आते हैं, कार्यक्रम बनते हैं और अंत में कार्यकर्ता समाज में हिंसक तरीके से लागू करते हैं। जैसे वायु प्रदूषण धीरे-धीरे फेफड़े को गला देता है, उसी प्रकार भाषा-प्रदूषण सदियों से चले आते आदर्शों को नष्ट कर देता है।
शादी-ब्याह से लेकर मेले-ठेले, तीज-त्यौहार तक में हिंदुओं के साथ मुसलमानों के मेल-जोल के अनेक रूप देश भर में प्रचलित रहे हैं। अब हिंदुओं के बीच मुसलमान पहले जैसा सहज नहीं महसूस करते। बनारस में मुस्लिम बस्ती में कोरोना के दौरान कोई हिंदू पड़ोसी मर गया था। उसकी लाश को कांधा देकर मुसलमान श्मशान ले आए तो अखबारों में यह घटना गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सौहार्द के उदाहरण के रूप में छपी, लेकिन कुछ नौजवानों ने इसपर आपत्ति जताई। सामाजिक संबंधों के क्षेत्र में यह एक ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती।
घर-परिवार में, मुहल्ले में, दफ्तरों में किसी संस्था में आपसी सद्भाव के बगैर कोई काम-काज सहज ढंग से नहीं चल सकता। अभी शिक्षण संस्थाओं में जिस तरह की अप्रीतिकर घटनाएं घटती रहती हैं, उससे डर लगता है कि एकेडेमिक खुलेपन की जगह परिसरों में दमघोंटू वातावरण का कड़वा धुआं न भर जाए। संवाद, सहिष्णुता, सौहार्द, सद्भाव, सहयोग और सहानुभूति की भाषा से ही घर-परिवार, स्कूल-कॉलेज, दफ्तर, विधानसभा, लोकसभा या कोई भी संस्था ढंग से चल सकती है।
(3) लगता है, यह समय धौंस, दबंगई और बड़बोलेपन का समय है और इसका सबसे बड़ा केंद्र है ट्रंप कालीन अमेरिका। विश्व घटना के बतौर ट्रंप कालीन अमरीका की धौंस-धमकी भरी भाषा दसों दिशाओं में गूंज रही है। शिकागो के ईसाई धर्माचार्य (फादर) माइकेल फ्लेजर को ट्रंप की अलोकतांत्रिक नीतियों और कार्रवाइयों की कटु आलोचना करनी पड़ी। इधर कुछ समय से अनेक सभ्य देशों का ध्यान अश्वेत जातियों और स्त्रियों के बाद ट्रांसजेंडर्स की ओर भी गया है। कई देशों में उनके आपसी विवाह को लेकर कानून भी बने हैं। लेकिन ट्रंप ने कहा- अमरीका में दो ही लिंग हैं- मर्द और औरत। यहां ट्रांसजेंडर्स के लिए कोई जगह नहीं है।
उसने युक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा को ह्वाइट हाउस में बेइज्जत किया। उसने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों से लेकर अफ्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों के कई राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों को सोशल मीडिया और भाषणों में लताड़ने के बाद अभी अपने सोशल मीडिया ‘ट्रुथ सोशल’ पर अपने ही देश के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा को जेल में बंद दिखलाया है। अपमानित होने के डर से कई मुंहबोले ‘दोस्त’ अमरीका जाने और ट्रंप से मिलने से बचते देखे जाते हैं। उसने चीन, रूस, भारत और यूरोप के कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी और घोषणा भी कर दी। हारवर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रोफेसरों को वैज्ञानिक शोध पर अनुदान में भारी कटौती करके डरा दिया। ट्रंप ने कहा- हम शोध के लिए पैसा इसलिए नहीं देते कि विश्वविद्यालयों के शोधार्थी हमारी नीतियों का विरोध करें। संदेश स्पष्ट है- शोध और विरोध एक साथ नहीं चलेगा। ट्रंप शासन में उपराष्ट्रपति एक हाथ और आगे बढ़कर बोला- हमें युनिवर्सिटियों की जरूरत नहीं है। इसकी अनुगूंज भारत में भी जल्द सुनाई देगी। इधर कुलपति पुलिस और मिलिटरी की भाषा बोलने लगे हैं।
घृणा का विचार ही जब व्यवहार में व्यक्त हुआ तो नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, प्रो. कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या हुई।
(4) भाषा में न्यूनतम शालीनता का ह्रास और कुवचन दुर्भाग्य से ऊंचे पदों पर आसीन व्यक्तियों के स्तर पर सबसे अधिक दिखाई देता है, जबकि भाषा में शालीनता और सुसंस्कार की सबसे अधिक आशा उन्हीं से की जाती है। अभी हाल में एक मंत्री ने सेना की एक स्त्री कर्नल सोफिया कुरैशी को ‘आतंकवादियों की बहन’ कह डाला। उच्च न्यायालय ने उसके खिलाफ एफआईआर करने का आदेश दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
प्रो. चित्तरंजन मिश्र ने 14 मई 2025 की अपनी पोस्ट में सूचित किया कि स्ववित्तपोषित कॉलेजों के अध्यापकों की मांगों के लिए एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वे जब प्रमुख शासनाधिकारी से मिले तो उन्होंने ‘बहुत आक्रामक और आपत्तिजनक भाषा’ का व्यवहार किया। नेताओं और अफसरों द्वारा आम लोगों के साथ तुम-तड़ाक की भाषा का व्यवहार अब रोजमर्रे की चीज है। यह आपसी मर्यादा और सौहार्द-सद्भाव पर आधारित सामाजिक ढांचे के विकृत और विघटित होते जाने का चिह्न है।
दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसात्मक भाषा का व्यवहार पहले से होता रहा है, लेकिन इधर उसकी तीक्ष्णता, भद्दगी और आक्रामकताओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पिछले कुछ सालों में देश का माहौल एक विशेष पुरातनपंथी और सवर्णवादी विचारधारा के अनुकूल होता गया है। इसी के साथ दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ दबंगई की, असभ्यता की और नफरत की भाषा हिंसक और आक्रामक होती गई है। दलितों को मनबढ़ और उपद्रवी, स्त्रियों को बदचलन और चरित्रहीन और मुसलमानों को आतंकवादी और देशद्रोही कह देना अब कितना सहज है।
भवभूति के नाटक ‘उत्तररामचरित’ में एक बारह साल का लड़का इतना सुसंस्कृत और निर्भय है कि वह अयोध्या के सैनिकों की भाषा को ‘राक्षसी भाषा’ कहकर तिरस्कृत करता है।
(5) भाषा के प्रदूषण और अपभाषा के प्रचार में सबसे खतरनाक, भयंकर और वीभत्स भूमिका टीवी और सोशल मीडिया ने निभाई है। अनेक ज्वलंत प्रश्नों पर जो बहसें चलाई जाती हैं उनमें सारी मर्यादा पार कर जाने की होड़ मच जाती है। बहस के नाम पर केवल गाली-गलौज और हिंसात्मक भाषा का चरम प्रदर्शन दिखाई देता है। दोनों-तीनों या सभी पक्ष-प्रतिपक्ष एक साथ चिल्ला-चिल्ला कर बोलते हैं और किसी की नहीं सुनते। मजे की बात यह है कि श्रोता-दर्शक को भी एक शब्द सुनाई नहीं देता। शोर और केवल शोर भाषा का स्थगन है।
आमने-सामने की झड़प अड़ोस-पड़ोस तक सीमित रहती है, लेकिन सोशल मीडिया पर वह हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचती है। उसमें सुनने वाले भी टिप्पणी करते हुए शामिल हो जाते हैं और उसी तरह की भाषा में लिखने-बोलने लगते हैं जिसे खबर का ‘वायरल’ हो जाना कहते हैं! गंदी भाषा बोलने में पहले संकोच होता है- स्वाभाविक रूप से सबको संकोच होता है उसे हजारों लोगों को बोलते सुनकर भटक खुल जाती है। ढंका-छुपा रहता है वह बाहर हो जाता है। सोशल मीडिया की एक और महिमा है कि जो सामने आना नहीं चाहता वह भी गुमनाम रहकर आड़ से जो चाहे कह सकता है, लिख सकता है, जैसे छिपकर बम फोड़ना। किसी को बदनाम करने के लिए या कोई बात फैलाने के लिए गुमनाम चिट्ठियां लिखकर डाल देना। मन में जो गंदा-गंदा आए- वह गुमनाम रहकर लिख दो, यह सुविधा हमारा सोशल मीडिया देता है। कोई जवाबदेही नहीं, कोई डर नहीं।
सोशल मीडिया ऐसा क्यों करता है? क्योंकि यह उसका बिजनेस मॉडल है। आप जितनी देर तक सोशल मीडिया पर रहते हैं, उतनी देर तक सोशल मीडिया की कमाई होती है। आपका ‘अटेंशन’ उसकी कमाई का स्रोत है। इसलिए वह अधिक से अधिक उत्तेजक, चौंकाऊ, भड़काऊ, लार-टपकाऊ, चटकीला और भड़कीला माल परोसता है। धीरे-धीरे सोशल मीडिया का यह माल लोगों की पसंद बन जाता है। वह आपकी आंखें, आपके कान, आपका दिल अपनी ओर खींच कर अपना भंडार भरता है। ‘अटेंशन इकोनॉमी’ का यह जादू पुराने परंपरागत मीडिया में नहीं था।
सोशल मीडिया पर आयोजित डिबेट या डिस्कशन में गाली-गलौज भी हिंसा का, लड़ाई का एक दांव है। अगर आपका प्रतिपक्षी संस्कारशील हुआ तो अपने आप पीछे हट जाएगा। अगर उसे जवाब में कोई जोरदार गाली न सूझी तो वह चुप हो जाएगा। इसलिए इन दिनों के डिबेट वार में कामयाबी का एक ही उपाय है- अधिक से अधिक बेशर्म और हिंसक होना, ईंट का जवाब पत्थर से देना। लोगों में भी इस कुकुर झौंझौं की, इस मुर्ग लड़ैया की मांग बढ़ती जाती है। यह धंधा कभी मंदा नहीं होता।
साहित्य और राजनीति के अतिरिक्त धर्म का भी बाजार गर्म है। विश्व में बुद्धि-विरोधी माहौल है सो बागेश्वर धाम की बम बम है। बाबाओं के पास भी सोशल मीडिया की टीम है। सोशल मीडिया पर विचार की जो थोड़ी बहुत गुंजाइश है उसे ‘ट्रोल’ करके दबा दिया जाता है। इसके लिए बहुतेरे पेड ट्रोल हैं, पेड ऑर्गेनाइज्ड गैंग हैं। किसान आंदोलन, महिला खिलाड़ियों आदि के मामले में ‘खलनायकीकरण’ का अभियान चल पड़ा है। यह मनोरंजन नहीं, हमला है।
(6) बुरी भाषा, अपशब्दों, हिंसक शब्द से मुक्ति के लिए एक ही रास्ता है लेखन, नाटक – फिल्म, गोष्ठी, सोशल मीडिया मंचों पर तथा सभी लोकप्रिय माध्यमों द्वारा सांस्कृतिक प्रतिवाद का अभियान चलाकर जन साधारण के विवेक को जाग्रत करना। छोटी-छोटी पुस्तिकाएं छाप कर, छोटे-छोटे समूहों में पढ़ना-पढ़वाना-सुनवाना, सवाल-जवाब के जरिए लोगों को बहस में शामिल करना। समाजशास्त्र, जन-राजनीति, इतिहास, साहित्य, पर्यावरण, धर्म-संस्कृति के प्रश्नों पर प्रामाणिक और योग्य जन-बुद्धिजीवियों को लेकर संवाद की शृंखलाएं चलाना। बुद्धिजीवी ऐसे हों जो ज्वलंत प्रश्नों पर जनता की भाषा में लोगों को संबोधित कर सकें और ऐसे कई हैं जो काम कर रहे हैं।
मीडिया पर प्रवक्ताओं को भविष्य के भारत की परिकल्पना पर, किसान प्रश्न पर, लोकतंत्र और संविधान के प्रश्न पर, सामाजिक न्याय के प्रश्न पर अपना ‘नैरेटिव’ या वैकल्पिक सोच प्रस्तुत करना है और ऐसी भाषा में करना है जिससे फर्क दिखे।
सोशल मीडिया पर एक मंच कायम किया जा सकता है जिस पर जन-संगठन या समूह के (किसान, मजदूर, छात्र, शिक्षक, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता आदि) प्रतिनिधि समाज और सरकार के आगे अपने प्रश्न, अनुभव, सुझाव और विचार प्रस्तुत कर सकें। एक व्यापक लोक-शिक्षण के अभियान के बतौर इन चीजों को यदि स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठित-संचालित किया जाय तो विवेकशीलता और संवेदनशीलता का माहौल बनेगा और इसी तरह भाषा का प्रदूषण भी धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
बड़ी-बड़ी कंपनियों की दानवाकार पूंजी के पंजों के मुकाबिल इन मानवीय प्रयासों की एक सीमा है तो भी नैतिक शक्ति, आत्मिक शक्ति की संभावनाओं पर भरोसा करना चाहिए। प्रसाद की पंक्ति है, ‘मेरे जीवन-रथ पर चढ़कर/ प्रलय चल रहा अपने पथ पर/ मैंने निज दुर्बल पद-बल पर/ उससे हारी होड़ लगाई।’ यह ‘हारी होड़’ जीत में भी बदल सकती है। जमीन में गड़कर भी ऊपर उठने की कोशिश करते रहने के सिवा दूसरा उपाय नहीं है।
याद आती है उन दिनों की, जब हॉस्टल-हॉस्टल, मुहल्ले-मुहल्ले में स्टडी सर्किलें चलती थीं। नए-नए रूपों में ही सही, फिर वही दौर जारी हो!
| एन 1/65ई 52, शिव प्रसाद गुप्त कालोनी, सामने घाट, नगवा, वाराणसी-221005 मो.8400925082 |
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| अवधेश प्रसाद सिंह वरिष्ठ लेखक, भाषाविद और अनुवादक। अनुवाद के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य। |
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(1) हिंदी में विगत दो-तीन दशकों से अपशब्दों का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है। यह एक चिंताजनक स्थिति है। अपभाषा परिवारिक, सामाजिक और मानवीय व्यवहार से लेकर राजनीतिक गलियारों तक मौजूद है। सरे राह चलते, बस-ट्रेन में, टीवी-फिल्मों में, अखबारों और मीडिया के अन्य रूपों में, साहित्य संसार तक में अपशब्द सुनाई-दिखाई पड़ते हैं। जिन शब्दों को कभी असंसदीय कहा जाता था और उनके प्रयोग का निषेध था, उन्हीं का संसद-विधानसभाओं में धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है।
भाषा एक सामाजिक-सांस्कृतिक संपदा है। वह मानव जाति के इतिहास की एक श्रेष्ठ उपलब्धि है। वह अपने बोलने वालों की संस्कृति का वहन करती है। वह सिर्फ संवाद का माध्यम ही नहीं, संस्कार और परंपराओं का परिचायक भी है। वह अपने भाषा-क्षेत्र के बाहर व्यक्ति की अस्मिता को भी परिभाषित करती है। किंतु वही भाषा जब जुगुप्सित हो जाती है, अपशब्दों, अभद्र टिप्पणियों और गाली-गलौज से भर जाती है तो उस भाषा-भाषी की सांस्कृतिक अवनति उसकी अस्मिता का मूलोच्छेदन भी कर देती है।
इतिहास गवाह है कि शब्दों ने कैसे-कैसे महाभारत करवाए हैं। हिंसा का तांडव मचाया है। हमें मलयालम के प्रसिद्ध कवि शंकर कुरुप याद आते हैं। एक कविता में वे कहते हैं – हे मानव! जब से मैंने तुम्हारी भाषा सीखी, तब से वह विश्व-विमोहक भाषा भूल गया, जिसमें स्नेह छोड़कर कोई शास्त्र नहीं, आनंद को छोड़कर कोई अर्थ नहीं, रूप को छोड़कर कोई छंद नहीं है। आखिर धीरे-धीरे यह कौन-सी भाषा आ गई जिसने स्नेह, सौहार्द और आनंद को त्यागकर विद्वेष और विकृति को अपना लिया!
वर्तमान समय में अपमानजनक, अश्लील, असंवैधानिक और हिंसक शब्दों का जिस बेतकल्लुफी के साथ प्रयोग हो रहा है, उसने भाषा से उसका आत्मिक सौंदर्य छीन लिया है। अपभाषा बोलने की मानो प्रतिस्पर्धा-सी चल पड़ी है। इसका सबसे भयंकर रूप है सार्वजनिक बहसों में।
इसमें दो मत नहीं कि आदर्श लोकमत के निर्माण में सार्वजनिक बहसों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसीलिए संविधान निर्माताओं ने विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकारों में शामिल किया। आज उस आजादी का दुरुपयोग जिस तरह से हो रहा है, वह शर्मिंदगी की सारी हदें पार करने में लगा है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क) के अधीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो लोग गाली-गलौज के विरुद्ध किसी भी कार्रवाई को अपनी स्वतंत्रता का हनन मानते हैं, वे भूल जाते हैं कि अनुच्छेद 19 (2) में स्पष्ट कर दिया गया है कि जिस अभिव्यक्ति से लोक-व्यवस्था भंग होती है या शालीनता और नैतिकता के स्थापित मानदंडों का उल्लंघन होता है वह अपराध की श्रेणी में आएगी।
इन सांविधानिक व्यवस्थाओं के बावजूद आज सार्वजनिक बहसों में जिस तरह के अपशब्दों, गाली-गलौज और आक्रामक शब्दों का उपयोग किया जा रहा है वह हिंदी भाषा के लिए चिंताजनक स्थिति है। पहले भी बहसें होती थीं, पर उनमें शालीनता और आत्मीयता हुआ करती थी। भाषा के प्रयोग में इतना वाणी-स्खलन और नैतिक पतन नहीं होता था। आज जिस तरह व्यक्तिगत आक्षेप, आक्रमण और उत्तेजक शब्दों का प्रयोग किया जाता है उसने भारतीय सामाजिक-राजनीतिक मर्यादाओं को ध्वस्त कर दिया है।
आज कोई दल असहमति के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता, बल्कि असहमति को समाप्त करने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाने हैं। वे कुटिल जाल रचने से लेकर शब्दों के प्रयोग तक में किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इसका एक परिणाम यह है कि सार्वजनिक बहसों का स्तर निरंतर गिरा है। जिस तरह लोग कुरुचिपूर्ण भाषा बोलने लगे हैं, उससे लगता है कि अपशब्दों का प्रयोग करके ही कोई प्रतिद्वंद्वी को पटखनी दे सकता है।
दिल्ली के एक मंत्री की याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों को कहना पड़ा कि ‘यदि आप सार्वजनिक बहस को इस स्तर तक गिरा देंगे तो आपको अंजाम भुगतने होंगे।’
(2) आज दुनिया जिस तरह वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, खाद्य प्रदूषण जैसे प्रदूषणों की चपेट में है, निश्चय ही उसी तरह भाषा भी प्रदूषण से आक्रांत है। जलवायु की तरह भाषा भी जन-जीवन को विषाक्त करने में लगी हुई है। इस संबंध में रोनाल्ड ग्रॉस की यह टिप्पणी ध्यातव्य है कि हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह उसी तरह लगातार प्रदूषित हो रही है, जिस तरह हमारी सांस लेने वाली हवा, पीने वाला पानी और खाने वाले खाद्य-पदार्थ प्रदूषित हो रहे हैं।
ईसा मसीह ने कहा था, ‘लेटर किल्थ’, यानी ‘शब्द मारते भी हैं।’
भाषा प्रदूषण में हिंदी की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। बास्टर्ड, स्वाइन, डॉग, बिच, मदर फकर, हरामजादी जैसे शब्द विरोधियों के लिए ही नहीं, अब दोस्तों की बातचीत तक में शामिल हैं। ये सारे शब्द असंगत, असंवेदनशील, अनैतिक और अशिष्ट होते हुए भी संवाद के अभिन्न अंग-से बनते जा रहे हैं। इनकी अश्लीलता हमें लज्जित नहीं करती। अपशब्द हमें एक अस्वस्थ जीवन की ओर धकेल रहे हैं।
अपभाषा के प्रयोग से मानव मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभाव के कुछेक अध्ययनों से पता चला है कि गालियों का आदतन प्रयोग भावनाओं और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। आपत्तिजनक भाषा के प्रयोगकर्ता के मस्तिष्क में मिग्डाला और लिंबिक सिस्टम जैसे आवेगात्मक और भावनात्मक क्षेत्र उत्तेजित होते हैं और उसे भावनात्मक प्रतिक्रिया के लिए उकसाते हैं। ये क्रोध, हताशा या तनाव की वृद्धि करते हैं। मस्तिष्क में उत्तेजना उत्पन्न होने से विवेकपूर्ण चिंतन और भावनात्मक आत्म-नियमन का ह्रास होता है, जिसकी अंतिम परिणति हिंसा है।
(3) आज सार्वजनिक बहसों में अपशब्दों पर श्रोताओं की तालियां मिलती हैं। बिहार में लंबे समय तक शासन करने वाले एक नेता अपने कुरुचिपूर्ण वक्तव्यों और बीभत्स मुद्राओं के बल पर ही इतने लोकप्रिय हो गए थे कि बाजार में उनके कैसेट बिकने लगे थे। फिल्मों में उनका अनुकरण किया जाता था।
अपभाषा का व्यवहार करने वाले परवाह नहीं करते कि असंसदीय भाषा या अपशब्दों या गाली-गलौज से यदि सामाजिक-राजनीतिक सुव्यवस्था में संकट की स्थिति पैदा होती है या उससे देश और समाज का सम्मान घटता है और लोक-व्यवस्था पर खतरा उत्पन्न होता है। आज अपशब्दों ने एक तरह से सुंदर शब्दों को चलन से बाहर कर दिया है। शब्द आग के गोले की तरह श्रोताओं पर बरस रहे हैं। आज भाषा का सृजनशील रूप क्षत-विक्षत है। अपनी बात को ऊपर रखने के लिए तथा अपने मत को दूसरों के मत पर हावी करने के लिए भाषा को कुरुचिपूर्ण बनाया जा रहा है। पहले अशालीन भाषा का इस्तेमाल नस्लवाद, लैंगिक भेदभाव के लिए या किसी को ठेस पहुँचाने या उनका मनोबल गिराने के उद्देश्य किया जाता था। अब वे बोलचाल के सहज अंग बन गए हैं।
(4) हमारे बोलने का तरीका न केवल खुद हमारी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है, बल्कि हमारे रिश्तों और सामाजिक परिवेश पर भी गहरा असर डालता है। जब परिवार के वयस्क सदस्य गाली-गलौज का प्रयोग अनायास करते हैं तो किशोर या बच्चे उसका सहज अनुकरण करते हैं। अशिक्षित ही नहीं, शिक्षितों के मुंह से साला, हरामी, कुत्ता, गदहा, उल्लू जैसे अपशब्द सरेआम सुनाई पड़ते हैं। सुनने वालों को भी उसमें कुछ अटपटा नहीं लगता। छोटे बच्चे भी सार्वजनिक रूप से या निजी तौर पर किसी को गाली देना सामान्य मानने लगे हैं।
कुरुचिपूर्ण भाषा का सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं हुई हैं। आपसी या दूसरों के साथ झगड़ों में महिलाओं को गालियां दी ही जाती हैं, खुद पति द्वारा अपनी पत्नी को गालियां दी जाती हैं। ये गालियां इतने खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती हैं और प्रकृति में इतनी अपमानजनक होती हैं कि सुनना कठिन होता है। झगड़े भले ही पुरुषों के बीच हों, पर गालियां मां-बहनों पर उतर आती हैं। भारतीय पैनल कोड 1860 की धारा 498-ए के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने इसे महिलाओं के प्रति क्रूरता तथा मानसिक प्रताड़ना माना है और दंड का विधान किया है।
(5) पिछले 50 सालों में तकनीक ने काफी तरक्की की है। हम डिजिटल युग में जी रहे हैं, जहां तकनीक और सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। इसे अच्छा और बुरा दोनों माना जा रहा है।
सोशल मीडिया में इस समय ह्वाट्सअप, फेसबुक, टेक्स्ट मैसेजिंग, स्नैप चैट, इंस्टाग्राम, प्राइम वीडियो, जी4, हॉटस्टार, टिकटॉक, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर या एक्स आदि बहुत लोकप्रिय प्लेटफार्म हैं। इसके फायदों से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां वैचारिक संप्रेषण के सुंदर अवसर हैं। आज राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भी सोशल मीडिया का उपयोग किया जा रहा है। जैसी आपत्तिजनक और द्विअर्थी भाषा प्रयोग की जा रही है वह हैरान करने वाली है। कृत्रिम मेधा के माध्यम से भाषा सिखाने का काम किया जा रहा है, यदि यहां भी अपशब्द प्रचलन के नाम पर घुस गए तो स्थिति कितनी भयावह होगी, कल्पना की जा सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर होने वाली बहसों में प्रतिभागियों के बीच परस्पर अपशब्द आम हो गए हैं। शब्द और अपशब्द का भेद मिट रहा है। सार्वजनिक विमर्शकर्ताओं में मूल्यों का ह्रास इस कदर है कि वे अपनी वाणी पर संयम लगभग खो चुके हैं। कई बार वे सोच-समझकर ऐसी भदेस भाषा का प्रयोग करते हैं, जिससे प्रतिपक्षी मर्माहत हो। देश के शीर्षस्थ नेता भी अपशब्द बोलने में नहीं हिचकते। उनपर देश के विभिन्न न्यायालयों में मानहानि के मामले लगातार दर्ज होते रहते हैं। सुनवाइयां होती रहती हैं, वे माफी मांग लेते हैं और फिर वैसे ही वक्तव्य देते रहते हैं।
दूसरी ओर अल्ट, उल्लू, बिग शॉट्स एप, देसीफ्लिक्स, बूमेक्स, नवरस लाइट, गुलाब एप, बुल एप जैसे 25 ओटीटी प्लेटफॉर्म मल्टीमीडिया पर हैं, जो अश्लील भाषा तथा कुछ मामलों में पोर्नोग्राफिक सामग्री परोसने का कार्य कर रहे हैं। बालाजी टेलीफिल्म्स के स्वामित्व वाले अल्ट के लगभग 3.5 करोड़ सबस्क्राइबर हैं। उल्लू के 4.2 करोड़ सब्सक्राइबर हैं। हालांकि भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने विभिन्न स्टेक होल्डर मंत्रालयों, कार्यालयों एवं अधिकारियों के परामर्श से अनेक ओटीटी प्लेटफार्मों को बंद करने के निर्देश दिए हैं, पर ये प्लेटफार्म कानून की कमियों का सहारा लेकर अपने व्यवसाय में अभी भी लगे हुए हैं।
फिल्मों में कॉमेडी करते समय अभिनेता संस्कारों एवं संवेदनाओं का ध्यान नहीं रखते, बल्कि शो करते समय अथवा फिल्मों में अपशब्दों का प्रयोग आम तौर पर करते हैं। वे द्विअर्थी बातें कहकर लोगों को हँसाने-गुदगुदाने का कार्य करते हैं। एतराज करने पर वे बेहयाई भरा तर्क देते हैं कि श्रोता-दर्शक ऐसे शब्दों को सुनकर मजे लेते हैं तो वे क्यों पीछे हटें।
(6) लगभग तीन दशक पहले मंगलेश डबराल ने कहा था- ‘हमलोग जिस समय में रह रहे हैं, उसमें उम्मीद और आश्वस्ति देने वाली जगहें या ऐसे काम, या ऐसी भाषा बहुत सिकुड़ती चली गई है। एक कवि या नागरिक के रूप में पिछले कई वर्षों से मुझे चारों ओर, सड़कों पर, बसों में, टीवी सीरियलों और फिल्मों में, अखबारों में और मानवीय व्यवहार तक में एक ऐसी भाषा सुनाई देती है, जिसमें मनुष्यता लगातार कम हो रही है। यह भाषा मार दो, जला दो, बदला ले लो, नीचा दिखा दो, जाने न पाए, बचने न पाए की डरावनी आवाजों से भरी हुई है। इसमें गाली-गलौज, अशिष्टता और मनुष्य के प्रति घृणा और ताकत की जयकार का प्रवेश हो चुका है।… सबसे बड़ा दुर्भाग्य कि साहित्य भी, जो मनुष्य का सबसे नैतिक और सौंदर्यपरक संसार है, इस भाषा से वर्जित नहीं है। … भाषा का यह परिदृश्य हमें डरा दे सकता है।’
मंगलेश डबराल की चिंता की विषयवस्तु आज और व्यापक हो गई है। इसपर बड़ी गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।
भाषा में संवेदना के ह्रास का एक ताजा मिसाल एक सप्ताह पहले ही बिहार के एक अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) के उस वक्तव्य से मिलता है, जिसमें उन्होंने मीडिया को बताया कि बिहार में ज्यादातर हत्याएं अप्रैल, मई और जून में होती हैं क्योंकि इन महीनों में किसानों के पास कोई काम नहीं होता और वे सुपारी हत्याओं में लिप्त रहते हैं। किसानों को परोक्ष रूप से हत्यारा कहना न केवल उनका अपमान है, बल्कि उनके बलिदान और कड़ी मेहनत का अनादर भी है।
यह कोशिश होनी चाहिए कि लोग अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों के प्रति आलोचनात्मक बनें। विरोध में बोलते हुए भी अपनी भाषा में शालीनता लाएं।
| हाउस नं. 222, सी.ए. ब्लॉक, स्ट्रीट नं. 221, एक्शन एरिया-1, न्यू टाउन, कोलकाता-700156 मो. 9903213630 |
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| अजय तिवारी प्रसिद्ध आलोचक।अद्यतन आलोचना पुस्तक ‘इतिहास की रणभूमि और साहित्य’। |
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(1) समाज में अपसंस्कृति बढ़ने से भाषा में कुरुचि और हिंसा बढ़ती है। अपसंस्कृति क्षयशील व्यवस्था की एक खास पहचान है। दरबारी संस्कृति के जो उदाहरण साहित्य के माध्यम से उपलब्ध हैं, वे कुरुचि और हिंसात्मकता के यथेष्ट उदहारण हैं। वर्ड्सवर्थ ने ‘लिरिकल बैलेड्स’ की भूमिका में कुरुचि और उत्तेजना के प्रसार में पूंजीवादी समाज की भूमिका का विश्लेषण किया है। ज्यों-ज्यों ऐसा विकास होता जाता है, त्यों-त्यों कुरुचि, उत्तेजना और अपसंस्कृति का भी विस्तार होता जाता है। पिछले 10-15 साल में कुछ संकीर्ण हित-चेतना और कुछ राजनीतिक स्थितियों के कारण असहिष्णुता बहुत बढ़ गई। भाषा मनुष्य का भावाभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन है, इधर भाषा के दुरुपयोग और हिंसात्मकता में असहिष्णुता परिलक्षित की जा सकती है।
पहले ग्राम्यभाषा को आम व्यवहार और साहित्य में अच्छा नहीं माना जाता था। ग्राम्यभाषा और ग्रामीण भाषा में फर्क था। अनौपचारिकतावश जब भाषा का प्रयोग बेपरवाही के साथ किया जाता था या लिखते समय अधिक जोश में संयम छूट जाता था तो भाषा अमर्यादित हो जाती थी। इधर लोगों के आपसी संबंध शिथिल होने से, अहंवाद और व्यक्तिवाद बढ़ने से और सोशल मिडिया में अभिव्यक्ति पर कोई अंकुश न होने से कुरुचिपूर्ण भाषा और अपशब्दों का प्रयोग बहुत बढ़ गया है। वस्तुतः शिक्षा के अभाव में कानून या स्वतंत्रता का दुरुपयोग बहुत होता है। यह स्थिति गंभीर है लेकिन सच है। इधर आर्थिक उदारीकरण ने समृद्धि बढ़ाई है, पर व्यक्तिवाद निरंकुश हुआ है, बेरोकटोक अभिव्यकि में बढ़ोतरी हुई है और सामाजिक लिहाज तेजी से खत्म हुआ है। परिणामस्वरूप बोलचाल और लिखित व्यवहार में भी शालीनता कम हुई है, अपशब्दों का प्रयोग बढ़ा है।
एक छोटी-सी बात और है। गालियों में संसार की सबसे समृद्ध भाषा रूसी है और उसके बाद हिंदी। लोगों की अभिव्यक्ति में गालियों का होना बताता है कि सामंतवाद यहां अधिक दिन तक और व्यापक रूप में रहा है। गालियों का इतिहास भाषा के वर्तमान पर भी असर डालता है। इससे अगर भाषिक प्रदूषण होता है तो इतिहास कुछ नहीं कर सकता।
(2) अगर हम अपसंस्कृति और व्यक्तिवाद के पूंजीवादी आधार को समझते हैं तो पर्यावरण प्रदूषण से भाषा के प्रदूषण का संबंध समझने में कठिनाई नहीं होगी। मार्क्स ने ‘पूंजी’ में कहा था कि पूंजीवाद केवल मनुष्य (श्रमिक) का शोषण नहीं करता, प्रकृति का भी शोषण करता है। कीटनाशकों से धरती की उर्वरता का जितना क्षय और भूगर्भ का जितना दोहन पिछले पचास सालों में हुआ है, उतना हजार सालों में नहीं हुआ। खुद अनेक पूंजीवादी सरकारें पर्यावारण की रक्षा के लिए उपाय कर रही हैं। कई बड़े घराने सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में अधिक समृद्ध लोगों पर अधिक टैक्स का समर्थन करते हैं। लालच, शोषण और मुनाफा को बाजार व्यवस्था की खूबियां समझाना चाहिए। अगर एक ही समय में भाषा प्रदूषित हो रही है और पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहा है तो इनके बीच संबंध देखना उचित है और सहज भी।
अफसोस इस बात का है कि पूंजीवादी प्रतिष्ठान अखबार और पत्रिकाएं निकालते हैं लेकिन उनमें इन बातों पर जागरूकता नहीं आने देते। ऊपर से भारत में, क्योंकि हिंदी भारत की एक प्रमुख भाषा है, राजनीतिक माहौल इतना उत्तेजनापूर्ण, हिंसक और असहिष्णु हो गया है कि व्यक्तिगत निरंकुशता हावी होती जा रही है। अगर कुछ कानूनों का डर न हो तो समाज रहने लायक बचेगा नहीं।
यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पर्यावरण प्रदूषण एक तरह का संकट लाता है और भाषा प्रदूषण दूसरी तरह का, लेकिन संकट दोनों लाते हैं और स्थिति को दयनीय, असहनीय बनाते हैं। एक तो विकास का मतलब शहरीकरण हो गया है, दूसरे शहर का मतलब गंदगी और बेगानापन। इसका परिणाम यह है कि गांव सिकुड़ रहे हैं, जंगल कटते जा रहे हैं, नदियों का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है, हवा में जहर घुल गया है। जीवन इतना कठिन हो गया है कि उसे साध्य बनाना साधारण लोगों के लिए संभव नहीं है। उसपर इस खीझे हुए आदमी को रोजी, रिहायश और सुरक्षा के लिए घोर अनिश्चय का सामना करना पड़ता है। उसकी भाषा को जीवन-प्रक्रिया के इस पक्ष से काटकर नहीं देखा जा सकता।
साठोत्तरी विक्षोभ ने अपने प्रति समाज (और सत्ता) का ध्यान खींचने के लिए असंयमित और अमर्यादित भाषा चुनी थी। तब से पचास साल बीत गए। जरा कल्पना कीजिए, अगर कभी शहर आनेवाली पहली पीढ़ी इतनी उत्तेजनापूर्ण भाषा का उपयोग कर रही थी तो आज की पीढ़ी किस भौतिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति में होगी! सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि ग्रामीण समाज में, खासकर निम्न-मध्यवर्ग के जीवन में, आपसी संबंधों का जो स्वरूप था, वह भाषा को भी मर्यादित करता था।
यह दोहराकर कहने की जरूरत है कि शहरीकरण के साथ पर्यावरण का संकट और भाषा का संकट दोनों जुड़े हुए हैं। दोनों गंभीर खतरे का संकेत करते हैं। दोनों पूंजीवादी, बल्कि भारत जैसे देश में पूंजीवाद के विकृत विकास की अभिव्यक्तियां हैं। कल्पना कीजिए, एक तरफ जीवन की व्याप्त परिस्थितियां-पर्यावरण, दूसरी तरफ अभिव्यक्ति का आतंरिक माध्यम-भाषा, दोनों गंभीर संकट में है, ऐसे में मनुष्य का जीवन कितनी समस्या में होगा। संक्षेप में, पर्यावरण मनुष्य का जीना दूभर कर रहा है, प्रदूषित भाषा मनुष्य का सामाजिक व्यवहार दूषित कर रही है।
(3) एक ओर साक्षरता बढ़ रही है, दूसरी ओर शिक्षा घट रही है। एक ओर हुनर बढ़ रहा है, दूसरी ओर बौद्धिकता घट रही है। अधिकांश लोगों की रुचि सूचना में है, चिंतन (दर्शन) में नहीं। छिछलापन पूंजीवादी संस्कृति की पहचान है। वह अपसंस्कृति का प्रसार करता है। दरअसल पूंजीवादी अपसंस्कृति के साथ सांस्कृतिक क्षरण तेजी से हो रहा है। सांस्कृतिक क्षरण का एक उदहारण है अपभाषा का बढ़ता प्रयोग। अभी साहित्य में कुछ ‘बोल्ड’ प्रयोग दिखाई देते हैं किंतु पत्रकारिता अपनी सारी चाटुकारिता और व्यावसायिकता के बावजूद अपभाषा का वैसा उपयोग नहीं कर रही है। सोशल मीडिया पर अवश्य अत्यधिक उत्तेजित विचार, ‘ट्रोल’ और अपभाषा का उपयोग दिखाई देता है। कभी-कभी तो गाली-गलौज भी दिखती है। जिन्हें साहित्यिक माफिया कहकर लक्षित किया जाता रहा है, उन्होंने भी कभी ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया है। उसका उपयोग सोशल मीडिया में बहुतायत से हो रहा है।
इधर एक पुराने लेखक और नए साहित्यिक माफिया का साक्षात्कार प्रसारित हुआ है जिसमें बातचीत करनेवाले को कुछ लोगों ने जैसी भाषा में ‘चेतावनी’ दी है, उसे केवल ह्रास नहीं कहा जा सकता, वह गर्हित और निंदनीय है। इसलिए यह साहित्यिक से अधिक सामाजिक समस्या है। शायद यह अकेला रूप है जिसमें साहित्यिक और समाज की प्रतिक्रिया अलग दिखाई देती है।
दूसरी बात यह ध्यान रखने की है कि भाषा मनुष्य की सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया का अंग है, वह स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अगर उसमें अपभाषा का प्रयोग बढ़ रहा है तो वह न सिर्फ सांस्कृतिक और बौद्धिक ह्रास का सूचक है बल्कि सामाजिक जीवन में आए बदलाव का भी सूचक है। सामाजिक जीवन में अगर ह्रास आएगा तो उसका प्रभाव भाषा में परिलक्षित होगा।
पिछले तीन दशकों में नवउदारवाद के कारण जीवन में भारी बदलाव हुए हैं। सबसे अधिक तो यह कि आर्थिक और सामाजिक विषमता बहुत अधिक बढ़ गई है। नव-धनाढ्य लोगों में कार्यशील लोगों के प्रति घृणा स्थिर हो गई है। इसका सीधा असर भाषा पर पड़ता है। दूसरे, मध्यवर्ग में समृद्धि बढ़ी है, लेकिन भारत में न आर्थिक प्रणाली का सुधार हुआ है, न सामाजिक जीवन का। जातियां अब भी काम करती हैं, बल्कि जीवन की नई सच्चाई बनकर उभरी हैं। इसलिए ‘मध्यवर्ग’ केवल ब्राह्मणों-क्षत्रियों में नहीं है, जिन्हें ‘पिछड़ी’ जाति कहते हैं, उसमें भी है। श्रमिक अधिकांशतः दलित समुदाय के हैं; विशेषरूप में गांवों के, खेतिहर, श्रमिक मुख्यतः दलित हैं। जातिवाद के संस्कार से मिलकर यह वास्तविकता अपभाषा के रूप में व्यक्त होती है।
‘संपूर्ण क्रांति’ के बाद 1977 में बिहार के बेलछी गांव में तेरह हरिजनों की हत्या करनेवाले ‘मनुपुत्र’ तथाकथित पिछड़ी जाति के कुर्मी थे। गांव के श्रमिक यह स्वीकार करते हैं कि पिछड़ी जाति के लोगों के अत्याचार बहुत बढ़ गए हैं। उनकी भाषा में अमर्यादा, खासकर निम्न जतियों के लिए, बहुत आ गई है। अपभाषा को दबंगई के साधन के रूप में देखना चाहिए जो एक बड़ी सामाजिक बुराई का द्योतक है।
साहित्यकारों की भाषा से दबंगों की भाषा बहुत अलग है। यद्यपि पहले भी कुछ प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं में अशोभनीय और ग्राम्य प्रयोग होते थे। मेरे मित्र कर्मेंदु शिशिर ने एक बार बताया था कि शिवपूजन सहाय को प्रेमचंद ने एक बहुत कड़ा पत्र लिखा था जिसमें ‘मतवाला’ में पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के कुछ प्रयोगों पर सख्त आपत्तियां की गई थीं।
इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि भाषा-प्रदूषण पिछले 10-15 सालों की प्रवृत्ति है। हमारे पुरखों ने ही उन अभिव्यक्तियों का निर्माण किया है जिनके उपयोग को हम अपभाषा में गिनते हैं। सबकुछ वर्तमान ह्रास का लक्षण नहीं है, बहुत कुछ परंपरा से प्राप्त है। आज के पहले भी समाज में तरह-तरह के भेदभाव थे, उन्हें व्यक्त करने वाली अभिव्यक्तियां भी थीं। आज हम अधिक सचेत हैं, अधिक सभ्य हैं। इसलिए अनेक अभिव्यक्तियों को आपत्तिजनक मानते हैं। इस बात को ध्यान में रखकर कह सकते हैं कि आज हिंदी में जो लेखन हो रहा है, उसका संकलन होगा और तब वही शेष रहेगा।
सोवियत संघ के विघटन ने अधिकतर लोगों में न केवल समाजवाद का विश्वास डगमगा दिया है बल्कि भविष्य का सपना भी खत्म कर दिया है। एक स्वप्नहीन मन में लोगों के प्रति अवज्ञा और समाज के संबंधों के प्रति अनादर स्वाभाविक है। सांस्कृतिक ह्रास में इस बात का बहुत बड़ा योगदान है। दुनिया भर में ताकतवर की दबंगई और देश के भीतर बहुसंख्यक के नाम पर विवेकहीन ताकतों की दबंगई ने मिलकर जो विकृति उत्पन्न की है, उसने संबंधों को ही नहीं, संस्कृति और भाषा को भी अविश्वसनीय बनाया है।
(4) इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक ढांचे में विघटन का भाषा के ह्रास पर बुरा असर पड़ा है। इस विघटन के लिए जो कारण जिम्मेदार हैं, उन्हें जनसाधारण ठीक-ठीक नहीं समझता और राजनीति अन्य कारणों को सामने ले आती है। लोगों का गुस्सा सामाजिक जीवन के कारण होता है, जबकि उसकी अभिव्यक्ति गलत लक्ष्य के प्रति होती है। अब बेरोजगारी के लिए आसपास रहने वाले ‘विधर्मी’ और पड़ोसी देश में रहने वाले ‘अवैध’ नागरिक दोषी हैं। परिवार के बिखराव के लिए स्त्रियां दोषी हैं। साधनों से वंचना के लिए ‘दलित’ आरक्षण दोषी है! कारण कुछ है, दोष कहीं और है।
ग्रामीण जीवन में दलित और नागरिक जीवन में स्त्रियां सबसे आसान शिकार हैं। लेकिन स्त्रियां और दलित भी यह नहीं समझते कि उनकी यातना का स्रोत पुरुष से अधिक पितृसत्ता है जिसका आधार संपत्ति-संबंध है। दुनिया ने इक्कीसवीं सदी में बहुत विकास किया है लेकिन आज भी सारे संसार की संपत्ति में केवल 2% पर स्त्री का अधिकार है। यह विषमत दूर नहीं हो रही है लेकिन ‘अवसरों’ के नाम पर उन्हें बाजार लुभा रहा है और व्यर्थ के सपने दे रहा है।
इन सब कारणों से सामजिक संबंध समतामूलक बनने की जगह विकारग्रस्त हो रहे हैं। यही स्थिति दलितों के साथ है। इसका रूप थोड़ा भिन्न है। पूंजीवाद निर्बाध उन्नति कर रहा है और वह अपना सांस्कृतिक प्रभाव छोड़ रहा है। उसका एक रूप अहंवाद है। स्त्रियों और दलितों की प्रगति से जिन्हें नुकसान हो रहा है या ऐसी आशंका हो रही है, वे साधन बढ़ाने का संघर्ष न करके समान अवसर का ही विरोध करते हैं। यह सारी खीझ उनके कुवचनों में व्यक्त होती है।
इतना ही नहीं, स्त्रियों और दलितों पर लगातार बढ़ते हुए हमलों के समांतर उनके प्रति भाषिक हिंसा देखने पर तस्वीर ज्यादा साफ होती है। भाषा केवल अनुभव का नहीं, अभिव्यक्ति का भी माध्यम है। वह सिर्फ निजी माध्यम नहीं है, सामाजिक माध्यम है। इसलिए वह जिन अनुभवों का वाहक है उनमें निजी और सार्वजनीन अभिवृत्तियों की एकता दिखाई देती है। साथ ही, भाषा वर्गीय माध्यम भी है। जिस पतन और ह्रास की बात हम करते हैं, वह अधिकांशतः मध्यवर्ग तक सीमित है। अभिव्यक्ति के माध्यमों का उपयोग भी अधिकांशतः मध्यवर्ग में केंद्रित है। दूसरी तरफ इस पतन से मुक्त करने के लिए जिस जनतांत्रिक चेतना की आवश्यकता है, जिन सामाजिक और वर्गीय आंदोलनों की जरूरत है, उनका घोर अभाव है। दुखद यह है कि निम्नवर्ग के जो लोग पढ़-लिखकर आए हैं, उनमें वर्गीय चेतना नहीं है।
रामविलास शर्मा ने एक बातचीत में बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा था कि अगर हिंदी के बुद्धिजीवी जातीय चेतना से इंकार करते हैं तो उनके सामने केवल सांप्रदायिकता का विकल्प बचता है- हिंदी जाति को झुठलाकर आपके पास हिंदू जाति में शरण ढूंढ़ने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता। इसीलिए वे कहते थे कि हिंदू जाति का विकल्प है हिंदी जाति। यही स्थिति आज है।
अगर जनतांत्रिक और वर्गीय चेतना का प्रसार नहीं होगा तो जातिवादी और सांप्रदायिक चेतना के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यदि सार्थक विवेक नहीं होगा तो निरर्थक बातों के आधार पर सांस्कृतिक ह्रास को, भाषिक पतन को रोका नहीं जा सकता। जातीय और वर्गीय चेतना न होने से निम्नवर्ग के आक्रोश को भटकाना असान होता है। वही हो रहा है।
बेहद जरूरी बात यह है कि गांवों में सामंती-आर्थिक संबंध समाप्त नहीं हुए हैं। जाति के संबंधों को और भाषिक ह्रास को सामंती प्रभुत्व के रूप में देखने की जरूरत है। समाज में जो कुछ नया या पुराना घटित हो रहा है, वह सब भाषा में ही व्यक्त हो रहा है। इस बात को समझने के कारण सास्यूर-रोलां बार्थ-देरिदा जैसे सिद्धांतकारों ने सब कुछ को वृत्तांत कहा और सारी वास्तविकता को वृत्तांत के भीतर आत्मसात कर लिया।
मतलब यह कि भाषा के स्वरूप से समाज के संबंधों को और परिवर्तन की दिशा को जाना जा सकता है। एक तरफ हमारे समाज में सामंती संबंध बने हुए हैं, दूसरी तरफ आधुनिक जनतांत्रिक चेतना का विकास भी हुआ है। हमें यह शिकायत हो सकती है कि जनतांत्रिक और प्रगतिशील चेतना का विकास नहीं हुआ है। लेकिन सामाजिक चेतना जिस हद तक आधुनिक हुई है, उसमें जनतांत्रिक चेतना का विकास हुआ है, उस अनुपात में कानून भी मानवतावादी हुए हैं। समस्या यह है कि इस कानून और सामाजिक विश्वास में द्वैत उत्पन्न हुआ है। यह केवल समाज के संकट का द्योतक नहीं है, भाषा के संकट का भी द्योतक है।
मुश्किल यह है कि हम केवल भाषा पर विचार करते हैं जबकि भाषा सामाजिक ढांचे को नहीं बदलती और भाषा का संकट अंततः सामाजिक ढांचे से निष्पन्न होता है। समाज में यथास्थितिवाद की भाषा अलग होती है और परिवर्तन की अलग। उदारीकरण के बाद जिस तरह यथास्थितिवादी राजनीति व्याप्त हुई है, उसने भाषा के रूप को बहुत बदल डाला है। मनुष्य के बीच असमानता ही नहीं बढ़ी है, असमानता का बोध और उसका औचित्य परिवारों में घर कर गया है।
परिणामस्वरूप विषमता का भाव, उसे उचित ठहरानेवाली भाषा और श्रेष्ठता का दंभ आम नियम जैसे हो गए हैं। यह नया पूंजीवाद है, जिसे मार्क्स ने कम ही रेखांकित किया है। सच यह है कि समाजवाद के विघटन के बाद तीस साल में पूंजीवाद ने जो घालमेल कर दिया है उससे सार्थक और निरर्थक का बोध ही धुंधला हो गया है। इस वैचारिक स्थिति का प्रभाव भाषा पर पड़ा है। नए माध्यमों ने बदली हुई स्थितियों के अनुरूप अच्छे या बुरे ढंग से भाषा को भी निर्धरित किया है।
(5) सोशल मिडिया एक जनतांत्रिक माध्यम है। उसके ‘कंटेंट’ पर नियंत्रण नहीं है, न भाषा पर अंकुश है। सरकारी नीतियों से टकराव होने पर पाबंदियां लगती हैं अन्यथा सोशल मिडिया निर्बंध है। लेखक के अपनी बात कहने में संपादक जैसे मध्यस्थ की भूमिका नहीं होती। सामाजिक सेंसर के आभाव में लेखक पहली बार निरंकुश हुआ है। उसपर अगर कोई रोक-टोक है तो मत-भिन्नता रखने वाले ‘ट्रोल’ से है। लेखक अपनी ‘निरंकुशता’ का जितना फायदा उठता है, ‘ट्रोल’ उससे कहीं ज्यादा उठाता है। अक्सर ट्रोल की भाषा अमर्यादित और आक्रामक हो जाती है। लगभग धमकी वाला अंदाज होता है। इससे भाषा का वर्तमान रूप प्रभावित हुआ है। इसलिए आज के भाषा प्रदूषण को सोशल मीडिया का सीधा प्रभाव माना जा सकता है।
लेकिन सारी बात सोशल मिडिया पर मढ़कर हम गंभीर विचारों से बचते हैं। यह देखने में आसन भी है और विश्वास करने में सहज भी। यद्यपि सोशल मिडिया को हम समाज की एक्सरे रिपोर्ट कह सकते हैं, बीमारी का कारण नहीं। एक्सरे बीमारी को जांचने का साधन है।
सोशल मीडिया नाम से ही जाहिर है कि यह सिर्फ माध्यम है जिसने बीमारी को बढ़ाने-घटाने में सहायता की है लेकिन उसे पैदा नहीं किया है। यदि हमारे समाज का जनतांत्रिक रूपांतरण हुआ होता, लोगों की शिक्षा-दीक्षा ढंग से हुई होती, सांस्कृतिक चेतना का उन्नयन हुआ होता तो सोशल मीडिया का बहुत सार्थक उपयोग हो सकता था। वह अभिव्यक्ति के लोकतंत्रीकरण में काफी सहायता करने की क्षमता रखता है। लेकिन जागरूकता के आभाव में और सामंती-व्यक्तिवादी प्रभाव के चलते माध्यम का रचनात्मक उपयोग कम होता है, नकारात्मक उपयोग ज्यादा होता है। नतीजा यह कि सांस्कृतिक और भाषाई प्रदूषण फैलाने में सोशल मीडिया प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
इस बात को भी देखना चाहिए कि सोशल मीडिया एकीकृत नहीं है। सारा सोशल मीडिया एक जैसा नहीं है। वहां दोनों तरह की प्रवृत्तियां हैं। भाषा के मामले में केवल ह्रास नहीं है, विकास और परिष्कार भी है। चूंकि हमें वर्तमान अधिक चुभता है और अतीत की चुभन बहुत कम रहती है इसलिए लगता है कि सारा सोशल मीडिया एक ही भूमिका अदा कर रहा है।
| बी-30, श्रीराम अपार्टमेंट्स, 32/4, द्वारका, नई दिल्ली-110078 मो.9717170693 |
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| मृत्युंजय श्रीवास्तव प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी। |
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किसी व्यक्ति की ही नहीं, देश की पहचान भी लोगों के भाषाई व्यवहार से बनती है। वर्तमान परिदृश्य यह है कि अपने देश में पल-पल भाषाई दुर्व्यवहार हो रहा है। बात-बात पर भाषा नंगी की जा रही है। जो ऐसा कर रहे हैं उनके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। वे वर्चस्व के दावेदार के रूप में भाषा का इस्तेमाल कर रहे होते हैं।
जिधर देखो, बदबोल सर चढ़कर बोल रहा है। बदबोल गलत इरादे वालों का बल है। यह नागरिकों के बोल को गोल कर देता है। इसकी साधना वे करते हैं जिनकी भुजाओं में सत्ता का नाग लिपटा होता है। वे शक्तिमान होते हैं।
यह नई प्रवृत्ति नहीं है। दुर्योधन के बदबोल की गूंज आज भी बनी हुई है। द्रौपदी के इस कथन से सभी परिचित हैं – अंधा का बेटा अंधा! जिन व्यक्तियों में ‘अतिरिक्त’ की चाह है, वे बदबोल चुनते हैं। वे भाषा को अपनी पिस्टल का बुलेट बना लेते हैं। हालांकि अतिरिक्त की उग्र चाहत रखने वालों की संख्या दुनिया में थोड़ी है, मगर ‘और चाहिए और चाहिए’ वाला यह वह वर्ग है जो हर मर्यादा को मिट्टी में मिलाने पर आमादा रहता है। जबकि लोक समाज और नागर समाज मर्यादा की रचना करते हैं और मर्यादा में रहते हैं।
स्त्रियों को घर के दराज में बंद रखने का एक मुख्य शस्त्र है बदबोल। इससे युग-युग तक स्त्रियों की खाल खींची जाती रही है। इस क्षमता से उनके हौसले की हवा निकाली जाती रही है। इसके बावजूद स्त्रियां लोहा ले रही हैं। वे उड़ रही हैं, मगर बदबोल-बहादुरों की कमी नहीं है। पिछड़े वर्ग और दलितों को बदबोल के व्यवहार से उन्हें उनकी औकात याद दिलाई जाती है।
गांधी पर बुरी भाषा के हथियार से वार किया जाता रहा है। वे जब अस्पृश्यता के खिलाफ चेतना फैला रहे थे, उनके लिए खूब अपशब्द बोले गए। यहां तक कि गांधी को ‘सुअर का बच्चा’ कहा गया। आंबेडकर को भी नहीं बख्शा गया। नए दौर में नेहरू बदबोल के महारथियों के हत्थे चढ़े हुए हैं। भाषा के पर्यावरण को बिगाड़ने में बौद्धिकों और लेखकों की भी एक बड़ी भूमिका है। बदबोल जितने भी कौशल से हो, इरादा उजागर हो जाता है।
बदबोल बहादुर छोटे-छोटे परिवार से लेकर विश्वसत्ता के शिखर तक फैले हैं। एक राष्ट्राध्यक्ष दूसरे राष्ट्राध्यक्ष के लिए जिस तरह खराब शब्द इन वर्षों में उछालते देखे गए हैं, ऐसे दृष्टांत पहले नहीं थे और विरोध में भी एक शालीनता थी। सत्ता विपक्ष के लिए और विपक्ष सत्ता के लिए जिस अशालीन भाषा का व्यवहार इधर कर रहा है, वह भाषा के साथ जबरदस्ती है।
भाषा के साथ बदसलूकी केवल भाषा तक सीमित नहीं है। जो भाषा में जबरदस्ती करते हैं, वे जीवन के हर पक्ष पर अपना जोर आजमाते हैं।
सोशल मीडिया बदबोल का एक सुलभ मंच है। हल्की-सी असहमति के बदले बदबोल विमान से फेंके विषाणु की तरह बरसने लगते हैं। ‘लेट अस ऐग्री टू डिसऐग्री’ का जमाना बीत चुका है। स्त्रियों के प्रति हिंदी के बौद्धिकों के बदबोल यहां अधिक बजबजाते हैं। ऐसी स्थिति भाषा में भद्रता-तत्व की कमी से पैदा होती है। बदबोल केवल पुरुष की मिल्कियत नहीं है। वह जाति-निरपेक्ष ही नहीं, लिंग-निरपेक्ष भी है। हर ब्रांडेड पानी में भांग है।
लगता है, राजनेता अपनी-अपनी प्रतिभा और महत्वाकांक्षा से राष्ट्रीय पटल पर हिंदी को बदबोल का पर्याय बना देना चाहते हैं। 1980 के बाद यह बयार जो शुरू हुई, वह अब आम हो गई है। मीडिया इसमें लपक-लपक कर अपना योगदान करता है। हिंदी मीडिया ने हिंदी को प्रेम, संवेदना और ज्ञान की भाषा नहीं रहने दिया। इसने जिस नई हिंदी का विकास किया, वह है बुलडोजर भाषा। अब हिंदी बुलडोजरी भाषा है।
एक जमाने में माना जाता था कि हिंदी सिनेमा हिंदी को बिगाड़ रहा है। अब यह बात किसी को याद नहीं आती। हिंदी सिनेमा से हिंदी बिगड़ी हो या नहीं, मगर यह सत्य है कि राजनेताओं ने हिंदी को शालीन नहीं रहने दिया।
हिंदी सुनने-समझने वालों ने जब यह सुना कि सड़कों की हालत ओमपुरी के गाल जैसी है तो पाया कि हिंदी का सौंदर्य दरक रहा है। बात यहीं तक नहीं रही, जब कहने वाले ने यह कह दिया कि अब सड़कें बनेंगी हेमामालिनी के गाल जैसी, तब हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर अशालीन हुई। यह हिंदी सिनेमा को बहुत पीछे छोड़ देने का दृष्टांत है। ‘चुन-चुन कर मारूंगा’, ‘घर में घुस कर मारूंगा’ या ‘उठवा लो’ जैसे पदबंध अब सिनेमा के डायलॉग नहीं रह गए हैं। यह भारतीय राजनीति की आम भाषा है।
जोे जांबाज जुमले सिनेमा में मनोरंजन के लिए थे, राजनीति ने उन्हें डर पैदा करने के लिए अपनी भाषा बना ली। एक अच्छी और सुंदर भाषा बुलडोजर भाषा बना दी गई।
बुलडोजर भाषा ‘अपडर’ पैदा करती है। ‘अपडर’ शब्द के बारे में विश्वनाथ त्रिपाठी ने बताया है, ‘तुलसी का एक शब्द है- अपडर। डर का कारण नहीं है, फिर भी डर लग रहा है!’
हिंदी इधर लट्ठमार हुई है, आक्रामक हुई है। हिंदी को भय पैदा करने वाली भाषा बना दिया गया है। राजनीति की भभूत लपेटे साधु-साध्वियों ने भी ऐसी ही भाषा को अपना बाना बनाया है। मीडिया के स्क्रीन पर हर चेहरा लट्ठमार है।
राजनेताओं की लट्ठमार भाषा डराती है और अंध भक्त बनाती है। डर नागरिक को संज्ञाहीन कर देता है। धर्म से भिन्न धर्मांधता वह शक्ति है जो थोथे दाने और भरे दाने के अंतर को पहचानने की आंख निकाल लेती है।
मनोरंजन के छोटे पर्दों पर गाली-गलौज चलती रहती है। बहाना है यथार्थ का यथार्थ चित्रण! तर्क है, समाज में जो चल रहा है उससे पर्दे पर परहेज क्यों? यह बौद्धिकता के आवरण में एक बाजारू तर्क है। ऐसे तर्क कलाबोध या विवेकबोध से नहीं बनते हैं, आर्थिक तंदूर पर सेके हुए होते हैं। पर्दे पर गाली-गलौज चलाने वाले बताते हैं कि गाली-गलौज दर्शक से कनेक्ट करती है। यह तर्क नहीं, बाजीगरी है!
गाली-गलौज और बदबोल से अपनी पहचान बनाने का यह नया दौर है। एक समय था जब बदजुबानी बदमाशों और गुंडों की बीच हुआ करती थी। समाज में एक कोशिश बनी रहती थी कि अच्छे शब्दों, शालीन और सुंदर भाषा में बोल-बतिया कर अपनी अच्छी इमेज बनाएं। अब पढ़े-लिखे लोगों की इज्जत अपशब्दों से बढ़ती है, लोगों की वाहवाही मिलती है।
जीवन में अहिंसा के लिए जगह जितनी कम होती जाती है, भाषा में हिंसा की मात्रा उतनी बढ़ती जाती है। जीवन की सादगी से सौंदर्य पनपता है। जब सादगी के सौंदर्य की अवहेलना की जाती है, भाषा से भी सौंदर्य का जनाजा उठ जाता है और भाषा ठूंठ हो जाती है।
सादगी का संबंध केवल अर्थशास्त्र से नहीं है, सादगी का सबंध आदमी के भाषाई चरित्र से भी है। दुनिया में जब से यह हल्ला बोला गया है कि ‘दूसरी दुनिया अब और नहीं’, भाषा मशीनगन हो गई है। यह हत्या-उन्मुखी भाषा उस खाई से पैदा होती है, जो शासक और आम नागरिक के बीच लगातार बढ़ रही है। आज आम नागरिक के दैनिक खर्च और सत्ता-शीर्ष पर बैठे जनता के नुमाइंदों के दैनिक खर्च में जो चौड़ी खाई है, वह वर्चस्ववादियों की बदजुबानी और उनके बदबोल की ताकत है।
लोगों में जब तक यह भरोसा पैदा नहीं किया जाता कि ‘दूसरी दुनिया भी मुमकिन है’, बदबोल को ठिकाने नहीं लगाया जा सकता। सदमा यह है कि जो यह भरोसा पैदा कर सकते हैं, वे ही ‘घंटा’ बने फिर रहे हैं।
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| अच्युतानंद मिश्र चर्चित युवा कवि तथा लेखक। अद्यतन कविता संग्रह ‘चिड़िया की आंख भर रौशनी में’ और लेखों का संग्रह ‘बाजार के अरण्य में’। |
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(1) भाषा का गहरा संबंध समाज से है। समाज जिधर जाएगा, समाज में जैसे परिवर्तन होंगे भाषा भी उसी अनुरूप व्यवहार करेगी। आप जिसे दस-पंद्रह वर्ष कह रहे हैं, दरअसल वह कई वर्षों से दिखाई दे रहा है। यह एक पुराना मर्ज है, जिसके स्पष्ट प्रभाव अब दिखाई दे रहे हैं।
मूल प्रश्न है, किसी भाषा को बरतने वाले समाज के निर्माण का, संस्कृति के विकास का, जीवन स्थितियों का और इतिहासबोध का। जब हम इस प्रश्न से गुजरते हैं तो हमें इसपर विचार करना चाहिए कि हिंदी भाषाई समाज का निर्माण किस तरह हुआ। हिंदी के लोकवृत्त ने आकार किस तरह ग्रहण किया। पिछले डेढ़ सौ वर्षों के वक्फे में, हिंदी भाषा क्षेत्र में सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तनों को हमें देखना होगा। हिंदी भाषा के केंद्रों के निर्माण विघटन और विखंडन पर विचार करना होगा। बिहारी, पंजाबी, हरयाणवी आदि पदों को विश्लेषित करना होगा। उनकी एकात्मकता और अलगाव की खोज करनी होगी। तभी हम समझ पाएंगे कि इस समाज में इतनी आक्रामकता, घृणा, नकार और विद्रूप क्यों हैं।
यह सब अचानक घटित नहीं हुआ। यह धीर-धीरे उस समाज, उस भाषा क्षेत्र के निर्माण और विकास की प्रक्रिया के दौरान हुआ। बुनियादी बात यह है कि हिंदी समाज के भीतर जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसे हिंदी समाज निर्माण की प्रक्रिया और विकास में ही खोजना होगा।
कोई भी समाज अपने मूल स्वरूप में हिंसक या आक्रामक नहीं होता। समाज का तो अर्थ ही है- जीवन की कुरुचिपूर्ण और कठिन स्थितियों का सामूहिक निवारण। इसी निवारण की प्रक्रिया के दौरान समाज अपनी रचनात्मकता, अपना सौंदर्यबोध, अपनी विशिष्टता और निजता की खोज करता है। जहां ऐसा नहीं हो पाता वहां परस्पर घृणा, कुरुचिपूर्ण दृष्टि और हिंसात्मक व्यवहार उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। अतीत के समाजों से, उनके निर्माण एवं विघटन से, भाषाई संबंधों में आए बदलाव से हम सीखते हैं। लेकिन जब किसी समाज का इतिहासबोध ही क्षीण होने लगता है तो वह इस तरह की स्थिति में पहुंच जाता है। वह एक नितांत तात्कालिक समाज में, आत्मग्रस्त समाज में रूपांतरित हो जाता है। हिंदी समाज में ऐसा क्यों हुआ इसकी सूक्ष्म पड़ताल करने की जरूरत है। विविध आयामों से देखने-समझने और विचार करने की जरूरत है।
(2) प्रदूषण चाहे भाषाई हो या पर्यावरणीय उसके मूल में मानवीय व्यवहार है। भाषा, समाज के तापमान को मापने वाला थर्मामीटर है। आज समाज, विशेषकर हिंदी समाज जिस आपा-धापी में, अफरा-तफरी में, विलगाव में मुब्तिला दिखाई देता है, वह उसके भाषाई व्यवहार को स्पष्ट तौर पर इंगित करता है। सवाल यह है कि इस भाषा-संस्कृति का निर्माण किस तरह हुआ? आज अगर व्यापक अर्थों में हिंदी समाज में किसी तरह की परस्परता नहीं दिखाई देती, हिंसा घृणा और विध्वंस जैसी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं तो इसके मूल में व्याप्त भाषा और समाज के अंतर्संबंधों की शिनाख्त की जानी चाहिए।
आए दिन आप ऐसे दृश्यों से नमूदार होते हैं जब बीच सड़क पर कोई किसी को पीट रहा है, गालियां बक रहा है, अपशब्द कह रहा है और लोग उसका विडियो बना रहे हैं। कुछ ही घंटों में उस विडियो का प्रसार बढ़ जाता है। उसे देखने वालों की संख्या तुरंत ही लाखों तक पहुंच जाती है। यह बताता है कि समाज की चेतना कहां पहुंच गई है। घृणा, विद्वेष, हिंसा आदि का समाज में अनुकूलन हो चुका है और इस अनुकूलन के मूल में भाषा है।
जिस तरह प्रदूषण हमारी स्वास नली को, फेफड़ों को धीरे-धीरे नष्ट करता जाता है, उसी तरह भाषाई प्रदूषण भी विवेक को, सामाजिक सौहार्द को नष्ट कर देता है। घृणा का व्यवहार सामाजिक व्यवहार का मूल तत्व बन जाता है। फिर वह समाज सतत विध्वंस, हिंसा और नकार के दलदल में फंसता ही जाता है। समाज असामाजिकता का गठजोड़ बनकर रह जाता है।
(3) इस प्रश्न को मैं दूसरी तरह से देखता हूँ या कह लीजिए कि आपके प्रश्न पर आने से पहले मैं कुछ दूसरे प्रश्नों का उत्तर देना वाजिब समझता हूँ- हिंदी समाज की संस्कृति ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों में क्या स्वरूप ग्रहण किया है? उसने अपने भीतर किस तरह की अंतःप्रवृतियों का निर्माण किया है? क्योंकि आप जिस वैश्विक परिघटना की बात कर रहे जिस भूमंडलीकरण, उदारवाद, और उत्तर-पूंजीवादी स्थितियों की बात कर रहे हैं, वह तो सर्वत्र है। सभी भाषा समाजों के साथ है और उसे किसी भी शर्त पर नकारा नहीं जा सकता। परंतु उस संस्कृति के साथ जो संबंध हिंदी समाज का बना, जो विघटन हिंदी समाज में हुआ, उसे सामान्यीकृत ढंग से नहीं समझा जा सकता।
हम इस प्रश्न से बचकर नहीं निकल सकते कि पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हिंदी समाज की संस्कृति ने, उसकी अंतःप्रवृतियों ने, वैश्विक परिघटनाओं से किस तरह मुकाबला किया? क्या वह किसी समग्र संस्कृति, किसी सामाजिक विवेक, किसी प्रबोधन, किसी प्रगतिशील दृष्टि के अंतर्गत वैश्विक परिस्थितियों से परिघटनाओं से टकरा सकी है? जिस अपभाषा के बढ़ते संकट की ओर इशारा किया जा रहा है, उससे लड़ने के लिए, मुकाबला करने के लिए हमारी संस्कृति किस हद तक तत्पर दिखाई देती है?
उदाहरण के तौर पर अगर आप केरल के मलयालम भाषी समाज को देखें तो आप पाएंगे कि यह समाज अपनी आंतरिक शक्ति और संगठन की वजह से सहज रूप में वैश्विक अप-संस्कृति का प्रतिरोध करने में सक्षम है। यह बात हम किसी हद तक मराठी या बांगला या उड़िया भाषी समाज के विषय में भी कह सकते हैं। केरल में लेखकों को राजनेताओं से अधिक महत्व मिलता है। यह बात हम हिंदी भाषी समाज को लेकर नहीं कह सकते। हिंदी भाषी समाज ने अपने आत्म-गौरव को, अपनी सांस्कृतिक विरासत को, अपनी सामूहिकता को, सौहार्द को गंवा दिया है। यह क्योंकर हुआ?
हमें हिंदी क्षेत्र में घटित और उद्घाटित नवजागरण को लेकर भी प्रश्न उठाने चाहिए, सवाल पूछने चाहिए। आलोचनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए कि उसने समाज के भीतर किस तरह की संस्कृति का निर्माण किया। जाति का सवाल यथावत क्यों बना हुआ है? जातिगत हिंसा, घृणा समाज में नए रूपाकारों में ढल रही है। नवजागरण के मूल्य समाज को किसी भी तरह प्रभावित नहीं कर रहे हैं। लिंग भेद का सवाल, धार्मिक असहिष्णुता का प्रश्न अगर डेढ़ सौ वर्ष पूर्व जैसा ही है कमोबेश बना हुआ है, तो नवजागरण का समाज पर किस तरह का प्रभाव पड़ा? क्या कोई क्रम था जो टूट गया, क्या कोई कड़ी थी जो छूट गई? नवजागरण के नायकों का समाज पर, लोगों पर इतना कम प्रभाव है तो ऐसा क्यों है? केरल में रहते हुए आप उससे भिन्न स्थिति देखते हैं। केरल के समाज पर श्री नारायण गुरु का स्पष्ट और गहरा प्रभाव आप देख सकते हैं। यह प्रभाव सिर्फ वहां के बौद्धिक समाज पर ही नहीं बल्कि सामान्य लोगों पर है। तकरीबन 150 सौ वर्षों से यह क्रम वहां बना हुआ है, लेकिन इस तरह का प्रभाव हिंदी समाज में नहीं दिखाई देता।
क्या हिंदी समाज में, इस टूट गए क्रम को या छूट गई कड़ी को फिर से जोड़ा जा सकता है? इन विषयों पर बगैर किसी पूर्वग्रह के खुले मन से बात होनी चाहिए।
(4) निश्चित तौर पर यह सामाजिक विघटन है, लेकिन यह एक दिन में नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे घटित हुआ। इसमें हमारा अतीत और वर्तमान दोनों शामिल हैं। हम उस पुराने प्रश्न पर लौटें कि आखिर हिंदी समाज का गठन किस तरह हुआ? उसने अपनी स्थानीय भाषाओं, बोलियों के साथ, उन समाजों से आने वाले व्यक्तियों और समूहों के साथ, किस प्रकार व्यवहार किया?
अगर गौर किया जाए तो हिंदी भाषी समाज में पिछले डेढ़ सौ वर्षों में जिस तरह का विस्थापन एवं पलायन हुआ है- वह अभूतपूर्व है। इस तरह का विस्थापन हिंदी समाज के अतिरिक्त कहीं और इतने बड़े पैमाने पर और इतने बड़े कालखंड में नहीं हुआ। भिखारी ठाकुर द्वारा बिदेसिया को लिखे हुए एक सदी से अधिक का समय बीत चुका है। लेकिन विस्थापन और पलायन की गति उतरोत्तर तीव्र होती गई। इस पूरी प्रक्रिया ने हिंदी भाषी समाज को आत्म-विहीन बना दिया।
कहना न होगा कि हिंसा और घृणा के विचारों का प्रतिरोध आप जिस आत्म सत्ता के द्वारा करते हैं, अगर वह अनुपस्थित है तो आप धीरे-धीरे उन विचारों को ही आत्मबोध में बदल देंगे। हिंदी भाषी समाज में व्याप्त जातिगत विद्वेष, लैंगिक हिंसा, इन सबमें प्रयुक्त भाषा और इस भाषा तथा व्यवहार के मूल में लिप्त आत्मबोध को समझना जरुरी है। यह आत्महीन समाज का आत्मबोध है। यह मैथिली, भोजपुरी, मगही, राजस्थानी, बघेली, कन्नौजी, छत्तीसगढ़ी, नागपुरी आदि भाषाओं/ बोलियों की बलात विस्मृति के बाद निर्मित समाज की चेतना है। जब एक समाज भाषा/ बोली से रहित होता है, तो वह अपने भीतर उस समाज की हत्या में भी शामिल होता है। यह हत्या उसे आत्महीन बना देती है। वह मूक होता जाता है। वह अन्याय को, अत्याचार को, बगैर प्रतिक्रिया के, प्रतिरोध के देखता है और स्वीकार करता है। उसके प्रति सहज होता जाता है।
(5) सोशल मीडिया में सोशल क्या है? वह एक हद तक अ-मानवीय माध्यम है। क्या वह सचमुच किसी सामाजिक संवाद, सौहार्द, विवेकसम्मत विश्लेषण, तर्कपूर्ण व्याख्या की जगह है? क्या वहां हो रहे संवाद को मनुष्य की भाषा में हो रहे संवाद की तरह देखा जा सकता है?
देखिए, जब एक आदमी बोलता है तो उसकी ध्वनि कुछ दूर तक सुनाई देती है। जब वह चीखता है तो वह उस दायरे के बाहर एक और बड़ा दायरा बना सकता है। उस दायरे को उसकी निगाह उसके कान, उसके पैर छू सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के संवाद की प्रक्रिया उसमें ऐंद्रिक उद्बोधन, स्फुरण और उद्दीपन आदि की संवेदना प्रसारित करती है। ऐसा करते हुए ही वाणी को, शब्द को, भाषा को जीवित सत्ता की संज्ञा के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर जो संवाद है, वह मानवीय प्रक्रियाओं का निषेध करता है। वह चीख के दायरे के पार तमाम मानवीय हदों का अतिक्रमण करता है। मानवीय हदों का अतिक्रमण ही उसे अमानवीय बनाता है। यह किसी भी अर्थ में उसमें ऐंद्रिक उद्बोधन, स्फुरण और उद्दीपन आदि की संवेदना को प्रसारित नहीं करता।
फिर प्रश्न है कि वह हमें इस कदर आकर्षित क्यों करता है? हम उससे बच के निकल क्यों नहीं पाते? उसे गैर जरूरी क्यों नहीं मान पाते? मनुष्य का हृदय ज्यों-ज्यों कला-शून्य, भाव-शून्य होता जाता है, उसकी आत्मचेतना कुंठित होती जाती है। इस कुंठित आत्मचेतना में गति का प्रवेश एक तेज नश्तर की तरह होता है। सोशल मीडिया में जो गति है- उसी में उसकी आत्मा है। वह गति एक मानवेतर दायरे का निर्माण करती है। हमारा कलाविहीन आत्म, कुंठित और दमित आत्म उस गति को ही सबकुछ मान बैठता है।
आप जैसे ही उस गति, उस तीव्रता के दायरे में आते हैं आप मानवीय चेतना से प्रसूत तर्क के दायरे से निकलकर तकनीकी तर्क के दायरे में चले जाते हैं जहां सिर्फ अमानवीय चीख, अकल्पनीय उल्लास, पाशविक हिंसा ही अंतर्वस्तु की तरह है। आप जब वहां किसी को ब्लॉक करते हैं, तो उस वक्त आप महसूस कर सकते हैं कि आपके भीतर हिंसा, घृणा ने स्थायी भाव ग्रहण कर लिया है।
यह देखना कितना कष्टपूर्ण है कि आज हिंदी के बड़े और महत्वपूर्ण लेखक इस सोशल मीडिया के जाल में उलझ गए हैं। वे इसे वास्तविक मान बैठे हैं। वे इस माध्यम में बहस कर रहे हैं। कभी कनाडाई दार्शनिक मार्शल मैक्लुहान ने कहा था- माध्यम ही संदेश है। सोशल मीडिया जिस गति के रथ पर सवार है, वही उसकी अंतर्वस्तु है जिसमें हमारे कहे का, लिखे का, कोई वास्तविक अर्थ या मंतव्य नहीं है। उस छद्म से जब हम लगातार रूबरू होते हैं तो वह छद्म भीतर भी उग आता है। हम अवास्तविक के, झूठ के, प्रस्तोता बन जाते हैं।
सोशल मीडिया दरअसल हमारी भाषा को, हमारे भाषिक अभिप्रायों को, हमारी वेदना और संवेदना को अर्थहीनता में रूपांतरित करता है। यह सवाल हमें खुद से पूछना चाहिए कि किसी की आंख में देखकर झूठ बोलना, अब भी कठिन है, लेकिन सोशल मीडिया पर हजारों लाखों लोगों के बीच झूठ बोलना अपशब्द कहना आसान है।
अभी हाल ही में एक इस्तीफा ट्विटर पर लिखकर भेजा गया- क्यों? भेजने वाले के तर्क झूठे थे। सोशल मीडिया झूठ की, फरेब की, हिंसा की, अमानवीयता की भाषा को प्रसारित करने का माध्यम है। सोशल मीडिया हमारे मानवीय बोध का, नैतिक दृष्टि का पटाक्षेप करता है। वह कला और कविता के विरुद्ध एक ऐसा माध्यम है, जो हमारी अंतःचेतना को धीरे-धीरे सुन्न करता है। वह स्वयं के ही विरोध में जीने का हुनर विकसित करता है।
(6) आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि मनुष्य सामाजिक कैसे बना रह सकता है। सामाजिक संवेदना के इस सतत ह्रास के विरुद्ध, वह किस तरह अपनी चेतना के संकुचन से, अपने भीतर पनप रही घृणा से, हिंसा से पार पा सकता है? मनुष्य ने सामाजिक होने के अर्थ में भाषा की खोज की। भाषा के बगैर मनुष्य मनुष्य नहीं रह सकता। भाषा ही उसके भीतर सौंदर्यबोध विकसित करती है।
भाषा के संकुचन के विरुद्ध संघर्ष एक सभ्यतामूलक संघर्ष है। यह महज कुछ व्यक्तियों या बौद्धिकों का बौद्धिक शगल मात्र नहीं है। यह मनुष्य के मनुष्य बने रहने की लड़ाई है।
अपभाषा को कैसे रोका जा सकता है, इस प्रश्न का उत्तर उस समाज को ही खोजना होगा लेकिन सबसे जरुरी है कि यह प्रश्न समाज का प्रश्न बने, लोगों की सुन्न पड़ी चेतना जागृत हो और वे जान सकें कि उनसे सिर्फ उनकी भाषा नहीं छीनी जा रही उनकी देह से उनकी आत्मा को निकला जा रहा है।
भाषा और भाषिक चेतना से विहीन मनुष्य होने का अभिप्राय है- आत्मा-हीन देह! यह प्रश्न उठाने की, इस प्रश्न को केंद्रीय प्रश्न बनाने की जिम्मेदारी बौद्धिक समाज की है।
हमें उन रास्तों की तरफ मुड़ना होगा जहां हमारे सामाजिक बने रहने की संभावना अधिक है। परस्पर संवाद के, छोटे-बड़े सभी स्थगित हो चुके विकल्पों को फिर से सक्रिय करने की जरूरत है। मानवीय संवाद के हर प्रारूप में मुब्तिला होने की आवश्यकता है। पहले के किसी अन्य समय की अपेक्षा आज अधिक सामाजिक, अधिक मानवीय होने की जरूरत है। कविता की ओर, कला की ओर, संगीत की ओर जाने की जरूरत है। मनुष्य होने के आर्थिक अभिप्रायों से इतर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक होने के अभिप्रायों की तरफ, प्रयत्नपूर्वक एवं योजनाबद्ध ढंग से बढ़ने की जरूरत है। आज एक सच्चे और वास्तविक प्रबोधन की जरूरत है.
| हिंदी विभाग, श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी, कलाडी-683574, जिला – अर्नाकुलम, केरल मो.9213166256 |
संपर्क : 5, गली नं 12, कांकीनाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल–743126 मो.9007428337







