
भारतीयता पर चर्चा किसी समय होती हो, वर्तमान में अवरोधों से घिरी है। हम भारत में रहते हैं पर बहुत कम जानते हैं कि भारतीयता क्या है और 21वीं सदी में इसका ‘डायनमिक विजन’ क्या हो सकता है। भारतीयता को अंधों के हाथी के रूप में भी देखा गया है, कई बातें विवादास्पद रही हैं। यह सही है कि भारतीयता की कोई एक पूर्वनिर्धारित धारणा नहीं हो सकती, कोई अंतिम परिभाषा भी नहीं हो सकती। यह एक सतत खोज बनी रहे, इसी में इसकी चरितार्थता है।
भारतीय भाषा परिषद के 2025 के पुरस्कार समारोह में ‘कृतित्व समग्र सम्मान’ तथा ‘युवा पुरस्कार’ से सम्मानित सात भाषाओं के वरिष्ठ साहित्यकारों तथा युवा लेखकों ने विगत 1 मई को ‘भारतीयता की अंतर्दृष्टि’ पर जो वक्तव्य दिया था, ‘वागर्थ’ की परिचर्चा के अंतर्गत वह प्रस्तुत है। इससे एक झलक मिल सकती है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में भारतीयता पर किस तरह सोचा जा रहा है। आशा है, इस महत्वपूर्ण विषय की ओर पाठकों का ध्यान जाएगा और वे इस बहस को आगे बढ़ाएंगे।
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एस. रामकृष्णनजन्म 1966, तमिलनाडु। तमिल भाषा के चर्चित कथाकार, नाटककार, अनुवादक और समीक्षक। बच्चों के साहित्य और विश्व सिनेमा की समीक्षा में गहरी रुचि। जनसमूहों में जाकर ‘स्टोरी टेलिंग’ के लिए चर्चित। उपन्यास ‘संजारम’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार। तमिलनाडु के कई शैक्षिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित। |
मैंने सौ से ज्यादा बार भारत की यात्रा की है
स्कूल के दिनों में मैंने पहली बार भारत का नक्शा देखा था। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि भारत में कितनी नदियां, पहाड़, विविध परिदृश्य और शहर हैं। मैंने अपने शिक्षक से पूछा कि भारत में कितने गांव हैं, क्या कोई ऐसी पुस्तक है जिसमें सभी गांवों के नाम हों? शिक्षक को नहीं पता था। इसलिए मैं जवाब तलाश करने लगा पर अपने गांव के पुस्तकालय में जानकारी नहीं मिली। इससे मैं बहुत चिंतित हो गया। मैंने भारत भर में घूमने और सच्चाई का पता लगाने का फैसला किया। यही मेरे लेखन की शुरुआत थी। मैंने अठारह साल की उम्र में यात्रा करना शुरू किया था। यह आज तक खत्म नहीं हुआ है।
आज के आंकड़े बताते हैं कि भारत में 664,369 गांव हैं। हर गांव में कम से कम सौ कहानियां हैं। उन सभी को कौन लिखेगा? भारत एक ऐसा देश है जहां हजारों-हजारों अनकही कहानियां हैं। मैं कहूंगा कि भारत कहानियों का घर है। भारत में रहने वाले लोगों की तुलना में यहां कहानियां ज्यादा हैं। भारतीय भाषाएं कहानियां सुनाकर चमत्कार कर सकती हैं।
मेरे गांव में कहानियों को उड़ती हुए लालटेन कहा जाता है। यह कल्पना अद्भुत है कि बाती उड़ सकती है। यादों को संजोने का सबसे आसान तरीका है उसे कहानी बनाना। मैं यादों का संग्रहकर्ता हूँ। मैं भूली हुई और अमर यादों को इकट्ठा करके उन्हें लिखकर संजोता हूँ। कहानी रोशनी की किरण होती है। लेखक वह होता है जो प्रेम की रोशनी को थामे रहता है।
नक्शे पर दिखने वाला भारत और वास्तविक भारत बिलकुल अलग-अलग हैं।
भारत का चेहरा बदल रहा है। भारत एक साथ कई सदियों में जी रहा है। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर आप जो भारत देखते हैं वह एक चीज है। जातिगत उत्पीड़न से ग्रस्त भारत दूसरी चीज है। शहर तेजी से बढ़ रहे हैं और गांव चुपचाप गायब हो रहे हैं। एक तरफ आलीशान पेंटहाउस, बड़े शॉपिंग मॉल, गगनचुंबी इमारतें हैं। मेट्रो ट्रेन देर रात तक चलने वाला जश्न है। अल्ट्रा-मॉडर्न इलेक्ट्रिक कारें आ रही हैं। करोड़ों मोबाइल फोन ग्राहक और इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। दूसरी तरफ, किसान की आत्महत्या, भ्रष्टाचार, लैंगिक असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा है। ड्रग्स हैं। साइबर अपराध और सांप्रदायिक हिंसा है।
इनमें से असली भारत कौन-सा है? हमें क्या लिखना चाहिए?
हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं और उपभोक्ता जगत द्वारा बनाई गई पहचान के साथ जी रहे हैं। हमारे खान-पान, पहनावे और सोच में बदलाव आया है। हम किसे भारतीयता कह सकते हैं?
‘भारतीयता क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें देखना होगा कि ‘भारतीयता’ शब्द का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है। ‘भारतीयता’ शब्द को परिभाषित करना कठिन है। यह एक अधिक अकादमिक आकलन है।
एक तमिल लेखक को ऐसा नहीं लगता कि वह भारत के बारे में लिख रहा है, बल्कि वह तमिल लोगों के जीवन, अपनी भूमि की समस्याओं और खुशियों के बारे में लिखता है। वास्तव में, यह भारतीय लेखन है। हम चाहे किसी भी भाषा में लिखें, हम सभी भारतीय लेखक हैं।
भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। हर राज्य की अपनी अलग साहित्यिक परंपरा है। यहां महान लेखक हैं। महान साहित्य लिखा जा रहा है। लेकिन अंग्रेजी प्रेस और मीडिया इसे क्षेत्रीय लेखन कहता है, जो सच नहीं है। भारतीय साहित्य ऐसे सभी लेखन का संयोजन है।
भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा अंग्रेजी पुस्तक प्रकाशक है। यह सिर्फ सूचना नहीं है। यह भारत के मूल भाषाओं और साहित्य के समक्ष पेश की गई चुनौती है। हमारे लिए अंग्रेजी सिर्फ एक पुल है। यह हमारा घर नहीं है। पुल पर कोई घर नहीं होता। हमारे पास तमिल की दो हजार साल पुरानी परंपरा है। वह हमारा घर है।
भारतीयता भारत की विभिन्न सांस्कृतिक विरासतों, विभिन्न परंपराओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक संरचनाओं, विश्वासों और मूल्यों की गहराई में निहित है। इसमें वे विविध धार्मिक प्रथाएं, कलात्मक अभिव्यक्तियां, नैतिकता और ज्ञान शामिल हैं जिन्होंने हमारे देश को आकार दिया है। भारतीयता भारतीय उपमहाद्वीप में विविधता को स्वीकार करती है, उसका जश्न मनाती है। यह कई भाषाओं, धर्मों और सांस्कृतिक प्रथाओं के सह-अस्तित्व को मान्यता देती है, और समावेशिता और सम्मिलित समझ की भावना को बढ़ावा देती है।
मैंने सौ से ज्यादा बार भारत की यात्रा की है। मैंने हिमालय देखा है, गंगा में स्नान किया है, गया में ध्यान किया है, ब्रह्मपुत्र नदी को नाव से पार किया है। मैं राजस्थान के रेगिस्तानों में पैदल घूमा हूँ, सिक्किम के मठ में रहा हूँ और कावेरी नदी के किनारे की रेत पर सोया हूँ। भारत भर में यात्रा करने के मेरे अनुभवों ने मुझे बदल दिया है और मेरे लेखन को आकार दिया है।
महान कवि रवींद्रनाथ से लेकर विभूतिभूषण, ताराशंकर, माणिक बंद्योपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, शीर्षेंदु मुखोपाध्याय, जय गोस्वामी तक मैंने बांग्ला साहित्य के प्रमुख लेखकों को पढ़ा है। उनका प्रशंसक रहा हूँ। उनके लेखन में सत्य, प्रेम और करुणा तमिल साहित्य में गूंजने वाली आवाजों से अलग नहीं है।
जब मैं बाईस साल का था, तब मैं कोलकाता की गलियों में खानाबदोश की तरह घूमता था। आज उसी कोलकाता में पुरस्कार पाकर मैं बहुत खुश हूँ। सभी को मेरा प्यार और आभार!
डी1, गंगई अपार्टमेंट, 110 अस्सी फीट रोड, सालिगराम, चेन्नई-600093, मो. 94440459447
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ज्ञान प्रकाश विवेकजन्म 1949, हरियाणा। हिंदी के वरिष्ठ और चर्चित ग़ज़लकार, कथाकार और आलोचक। प्रमुख उपन्यास : ‘दिल्ली दरवाज़ा’, ‘नई दिल्ली एक्सप्रेस’, ‘ह्वील चेयर’ आदि। प्रमुख ग़ज़ल संग्रह : ‘धूप के हस्ताक्षर’, ‘आंखों में आसमान’, ‘गुफ़्तगू अवाम से है’, ‘काग़ज़ी कश्तियां बनाता हूँ’ आदि। आलोचना पुस्तकें : ‘हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा’, ‘हिंदी ग़ज़ल : व्यापकता और विस्तार’, ‘हिंदी ग़ज़ल की नई चेतना’, ‘उर्दू शायरी – रिवायत से जदीदियत का सफ़र’। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित। |
भारतीयता है सह-अस्तित्व और सृजनात्मकता एक जुनून है
मैं जब ‘भारतीयता’ शब्द बोलता हूँ तो कुछ गूंजता-सा महसूस होता है। पांच हज़ार साल पुराने आख्यान गूंजते हुए। भजन, श्लोक, प्रार्थनाएं, गीत, दोहे, चौपाइयां गूंजती हुई। किस्से गूंजते हुए और कथाएं गूंजती हुई। गंगा की लहरे गूंजती हुई। मल्लाहों के चप्पू गूंजते हुए। हिमालय का वैभव गूंजता हुआ। डॉ. इकबाल की नज़्म का मिसरा गूंजता हुआ- ‘वो संतरी हमारा… वो पासबां हमारा/हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलसितां हमारा!’
मैं जब भारत देश और इसकी भारतीयता पर सोचता हूँ, विविधता, व्यापकता, विचित्रता और विशालता जैसे तत्व, मेरे ज़ेहन में कौंधने लगते हैं। मैं हैरान रह जाता हूँ। ये देश है या न समाप्त होनेवाली कोई फंतासी कथा। एक सौ चालीस करोड़ लोग अपनी संघर्ष गाथाएं और जीवन लीलाएं रचते हुए!
कितना सुखकारी अनुभव है कि यहां, भजन, कीर्तन, अरदास, अज़ान और प्रार्थनाएं भारत की आत्मा के उस घर में विराजमान हैं, जिस घर का नाम भारतीयता है। आप पूछेंगे भारतीयता क्या है? तो मैं कहूंगा- ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा/तो सुर बने हमारा।’ आप पूछेंगे- भारतीयता क्या है? तो मैं मख्दूम का शेर सुनाऊंगा-
हयात लेके चलो कायनात लेके चलो
चलो तो सोर ज़माने को साथ लेके चलो।
आप पूछेंगे भारतीयता क्या है, तो मैं अपना एक शेर सुनाऊंगा-
घाट हज़ारों इस दरिया के लेकिन इसका पानी एक
अपने-अपने राम सभी के, लेकिन राम कहानी एक।
एक शायर का मिसरा है- ‘हर शख़्स यहां दर्द के धागे से बंधा है।’ यह जो दर्द का धागा है, दरहक़ीकत, यह संवेदना का धागा है-एक अटूट धागा। और इस धागे में एक सौ चालीस करोड़ मनके। और जो हार है, वही हमारी भारतीयता है।
कबीर जब कहते हैं- ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे ख़ैर’, यह जो सबकी ख़ैर मांगने वाला भाव है, यही भारतीयता है।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का जीवन दर्शन हमारी भारतीयता की शिनाख़्त है। सारा विश्व हमारा घर है की प्रबल भावना हमारी संचेतना है। यह वह भूमंडलीकरण नहीं है जहां पूंजी का खेल खेला जाता है, जहां बड़े प्लेयर होते हैं और जो सबसे ताकतवर है वह अदृश्य रैफ़री होता है।
हमारी भारतीयता वह भारतीयता है, जिसमें भारतीय संस्कृति का समावेश है, भारत का वह समृद्ध और प्राचीन विरासत है जो धर्म, दर्शन, कला, साहित्य, संगीत, नृत्य तथा विभिन्न जीवन शैलियों और लोक जीवन की छवियों को अपने भीतर शामिल करने की तौफ़ीक रखती है। भारतीयता की एक विशिष्टता यह भी है कि यह परंपराओं, उत्सवों, मेलों, त्योहारों के लिए जानी जाती है।
भारतीयता यानी देश से जुड़ने का भाव! भारतीयता यानी एक व्यापक नज़रिया और सह-अस्तित्व का भाव। भारतीयता ने जो हमें जिन जीवन मूल्यों का पाठ दिया है, वे हैं- धैर्य, संयम, त्याग, औदात्य, रचनात्मकता, बंधुत्व और सह-अस्तित्व! पांच हजार वर्षों की विशाल समय यात्रा में हम सब इसी जीवन दर्शन के रास्ते पर चल रहे हैं।
भारतीयता एक जीवंत रंगमंच है। पांच हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता के इस रंगमंच पर लाखों किरदार अपनी भूमिका निभाते हुए। खुश होते हुए। उदास होते हुए। नाराज़ होते हुए। ख़ामोश होते हुए। रूठते-मनाते हुए। यह जीवन दर्शन भी हमने भारतीयता से हासिल किया है कि लड़ाई अन्य से नहीं, लड़ाई अपने आपसे होती है। अपने भय से, अपने अहंकार से, अपनी पराजय से। अपने अंधेरे से। लड़ाई अपने आपसे होती है। यह शेर इसी सिलसिले में है-
‘ख़ुद से लड़ने के लिए जिस दिन खड़ा हो जाऊंगा/देखना, उस रोज़ मैं, खुद से बड़ा हो जाऊंगा।’
सारी चेतना ज्ञात-अज्ञात, जानने-न-जानने, होने न होने की है। ग़ालिब कहते हैं- ‘मैं न होता तो क्या होता’। बुल्लेशाह करते हैं- ‘बुल्ला की जाणां में कौण’।
भारतीयता की संवेदन-लय विस्मित करती है। भारतीयता ने प्यासों की तड़प को महसूस किया तो प्याऊ बनवाए। भूखों और फाकाकशों का सोचा तो लंगरों की परंपरा शुरू की। राहगीरों का सोचा तो दरख़्तों के नीचे चबूतरे बनवाए।
हमारे दो माहाकाव्य-रामायण और महाभारत! मैं इन दोनों महाकाव्यों की एक-एक शब्द में व्याख्या करूं तो यही कहूंगा- रामायण में प्रतीक्षा है और महाभारत में प्रतिज्ञा।
रामायण के सभी पात्र प्रतीक्षा कर रहे हैं- सीता अशोक वाटिका में, भरत अयोध्या में, लक्ष्मण मूर्छित हैं और राम संजीवनी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। महाभारत में भीष्म पितामाह अपनी प्रतिज्ञा से बंधे हुए हैं। गांधारी अपनी प्रतिज्ञा से बंधी हुई है, द्रौपदी की अपनी प्रतिज्ञा है तो कृष्ण की अपनी प्रतिज्ञा। हमारी सारी जीवन चेतना इन महाकाव्यों से दबकर आई है। भारतीयता का विराट दर्शन इन महाकाव्यों से प्रभावित है।
फ़िराक़ गोरखपुरी, उर्दू के महान शायर हैं। उन्होंने ‘हिंडोला’ जैसी नज़्म लिखकर, भारतीयता को शायरी में व्यक्त करने की सफल कोशिश की है-
दयारे-हिन्द का गहवारा याद है हमदम?
इसी जमीन पे खेला था राम का बचपन
इसी जमीन पे उन नन्हें-नन्हें हाथों ने
किसी समय में धनुष बान को संभाला था
इसी दयार ने देखी है कृष्ण की लीला
यहीं घरोंदों में सीता, सुलोचना राधा
किसी जमाने में गुड़ियों से खेलती होंगी
इसी हिंडोले में भवभूति-कालीदास कभी
हुमक-हुमक के जो तुतलाए गुनगुनाए थे
इन्ही फ़ज़ाओं में बचपन पला था खुसरो का
इसी ज़मीं से उठे तानसेन और अकबर
रहीमो-नानको, चैतन्य और चिश्ती ने
इन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थे
ऐ लोगो, हम लेखकों-अदीबों को इतना आसान मत समझो। हम ख़ाक के पर्दों से निकलनेवाले रचनाकार हैं और सृजनात्मकता हमारा जुनून है। सृजनात्मक अंतरदृष्टि पर बात करते मीर का एक शेर याद आ रहा है-
मत सहल हमें जानो, फिरता है फलक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं।
लेखक की आवाज़ कितनी मद्धिम और विनम्र क्यों न हो, भीड़ के कोलाहल से ज़्यादा अर्थवान होती है। भीड़ के पास कोई चेहरा नहीं होता। लेखक की आवाज़ का एक चेहरा होता है। लेखक की सृजनात्मकता में नाराज़गी, आक्रोश और प्रतिवाद तो होता ही है। करुणा का तत्व भी शामिल होता है और वही तत्व रचना को ऊंचाई प्रदान करता है।
दुष्यंत का एक शेर है-
न हो कमीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
बेबस, बेकस और वंचिन लोगों के प्रति करुणा का भाव इस शेर में कितनी गहराई से महसूस हो रहा है।
लेखक कभी निर्धन नहीं होता। उसके पास शब्दों का सरमाया होता है और भावनाओं की भरी हुई गुल्लकें!
दोस्तो, प्रसन्न रहने के टोटके बेशक कथावाचक सिखाते हों। उदास रहने की कला लेखक सिखाता है।
मैं अपने बारे में क्या कहूं? मैं एक ज़िद्दी, ग़रीब बालक, पिछले पचास साल से फटे हुए गुबारे को फुलाने की कोशिश कर रहा हूँ।
आखिर, फटे हुए गुब्बारे को फुलाने की ज़िद क्या है? यही तो सृजनात्मकता है। पुराने मुहावरे को तोड़कर नया रचने की ज़िद!
एक प्रतिबद्धता होती है और एक वचनबद्धता होती है। मेरी वचनबद्धता उस निष्ठा से है, जिसे मैं ईमानदारी कहता हूँ। अपने पचास साल के लेखन में, मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि लिखना भी एक तरह की ध्यान यात्रा होती है। निरंतर लिखते हुए हम अपने ‘मैं’ से लड़ते हैं और उसे ‘हम’ में बदल देते हैं। हमें लिखते हुए ‘मैं’ की ़कैद से मुक्ति मिलती है। इक़बाल का एक शेर है-
तू है मुहीते-बेकरां मैं ज़रा-सी आबे-जू
या मुझको हमकिनार कर या मुझको दरकिनार कर
अर्थात ऐ साहित्य के विराट समंदर, तेरी अज़मत विशाल है। मैं तेरे सामने पानी की एक बूंद हूँ। अब तुझ पर है कि मुझे अपने में विलीन कर या दरकिनार कर!
ज़िंदगी भी अजब तरह का स्टीम इंजन है। हम कोयला खुशियों का डालते हैं, धुआं दर्द का निकलता है। मेरे जैसे फक्कड़ लेखक का सरफ़िरायन न पूछो। मैं तो दर्द को भी निमंत्रण पत्र देकर चला आता हूँ। शेर है-
ये तो मैं था कि उसे दावतें देकर आया
दर्द को यूं भी दबे पांव चले आना था।
अब एक नया समाज है जिसके पास लाफ़्टर चैलेंज है। और नकली ठहाके हैं। यह नया समाज ऐसे ‘कैसिनो’ की तरह है, जहां हर शख़्स हारे हुए जुआरी जैसा नज़र आता है।
यह आत्महीन और स्मृतिविहीन नया समाज, आत्मज्ञान से वंचित एक ऐसा समाज है जो अपने छल और अपने पाखंड का स्वयं ब्रांड एंबेस्डर बन चुका है। लेखक ऐसे समाज पर तबसरा करता है। वह इस पतनशीलता पर चिंतित होता है।
इस नए समाज को प्राइवेसी पसंद है। वह किसी अन्य का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पाता। एक शेर है नए समाज के जीवन शिल्प पर-
‘इक दौर था जब सोचता था कोई मेहमान आए तो खाना खाऊं/इस दौर में लानत कि खड़ा सोचता हूँ ये शख़्स चला जाए तो खाना खाऊं’।
रचनाकार समाज की ऐसी निस्संगता पर व्याकुल हो उठता है। वह चाहता है कि ऐसे अंधेर समय में, रोशनी की एक लकीर खींच दे। यही उसकी सृजनात्मक अंतर्दृष्टि है।
मैं जब छोटा था। घर में बिजली नहीं थी। मैं शाम के वक़्त, ज़ंग खाए लैंप की चिमनी चमकाता। लैंप जलता। घर रोशनी से भर उठता। ज़ंग खाए लैंप से आती हुई रोशनी, अंधेरे के बरअक्स, उम्मीद का उत्सव प्रतीत होती। सृजनात्मकता की रोशनी, ऐसे कठिन रास्तों से होकर आती है। शीशमहल से दूर, झोपड़ी का अधबुझा-सा दीया जितना दुर्बल होता है उतना पवित्र! जितना पवित्र होता है उतना कलात्मक! जितना कलात्मक होता है उतना सृजनात्मक!
इस निस्संग, अनात्म और लगभग गुर्राते समय में मनुष्यता के लिए थोड़ी-सी जगह बची रहे, यही मेरी सृजनात्मक चिंता है। ग़ालिब का एक शेर है-
देके ख़त मुंह देखता है नामावर
कुछ तो पैग़ामे-ज़बानी और है
यह जो पैग़ामे-ज़बानी है – यही वह अव्यक्त है, जिसे व्यक्त करने की कोशिश ही सृजनात्मकता का अग्निपथ है। मैंने जिज्ञासाओं की उंगली थामी और भाषा तथा नए मुरावरे की खोज करता रहा। अंग्रेज़ी के एक विद्वान ने कहा है- ‘लेखक की एक ब्रिलिएंट इनसाइट होती है, यानी- आंतरिक मेधा। यानी प्रतिभा। यानी सृजनात्मक अंतर्दृष्टि!
यह सृजनात्मकता है क्या? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि लोहे की नॉफ़ से कस्तूरी पैदा करना ही सृजनात्मकता है।
मैं जानता हूँ कहानी, कविता, उपन्यास लिखने से कोई क्रांति नहीं आएगी। लेकिन, लिखते वक़्त मैं अक्सर क्रांति जैसा कुछ ज़रूर महसूस करता हूँ।
ईश्वर की अपनी सत्ता है। उसकी सृष्टि है। तो एक लेखक, एक अदीब की भी अपनी सृष्टि होती है।
इक़बाल की फ़ारसी की एक छोटी-सी नज़्म पेश है। यह दो सृष्टियों के बीच संवाद जैसा है-
तो शब आफ़रीदी चिराग़ आफ़रीदम
सिफ़ाल आफ़रीदी अयाग़ आफ़रीदम
बयाबानो, कुहसारो, राग़ आफ़रीदी
खियाबानो, गुलज़ारो, बाग आफ़रीदम
अथति- ऐ सृष्टि के निर्माता, तूने अगर रात बनाई है तो मैंने चिराग़ बनाए। तूने मिट्टी बनाई तो मैंने प्याला बना दिया। तूने अगर निर्जन क्षेत्र, दरख़्त और जंगल बनाए, तो मैंने उद्यान, बगीचे और वाटिकाएं बनाईं। सृजनात्मका का गर्व क्या होता है, इक़बाल की उपर्युक्त चार पंक्तियों में मौजूद है।
1875, सेक्टर-6, बहादुर गढ़-124507 (हरियाणा) मो. 9813491654
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वर्षा अडालजाजन्म 1940, गुजरात। गुजराती की स्त्रीवादी कथाकार और नाटककार। 200 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। विशेष रूप से चर्चित उपन्यास ‘अंसार’, ‘बंदीवान’, ‘मृत्युदंड’ आदि। सात खंडों में कहानी संग्रह प्रकाशित। ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’, ‘साहित्य अकादेमी’ पुरस्कार से सम्मानित। ‘सुधा’ और ‘फेमिना’ (गुजराती) पत्रिकाओं का संपादन किया। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित। |
सभी पंथों और संप्रदायों ने भारतीय अस्मिता को गरिमा प्रदान की
भारतीयता की अंतर्दृष्टि की खोज के लिए हमें हजारों साल पीछे लौटना होगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन में वेद-उपनिषद के माध्यम से परम सत्य का साक्षात्कार किया था।
जब मैं बद्रीनाथ की यात्रा पर गई थी तब सरहद के उस आखिरी पर्वतीय गांव में जाना हुआ था। बहुत ऊंचाई पर है वह गांव। पर्वत की टोच पर वहां व्यास गुफा है। अद्भुत दृश्य था वह। गुफा में वेद व्यास की श्याम मनोहर प्रतिमा है और गुफा के ऊपर एक बहुत बड़ी शिला है। प्राकृतिक रूप से ही वह शिला पुस्तक के आकार में है। इतना ही नहीं, उसके ऊपर पुस्तक के पन्ने भी तराशे हुए हैं! जैसे कि महाभारत के ग्रंथ को व्यास ने भारत देश के उच्च पर्वतीय शिखर पर बैठकर समग्र भारत पर सर्वग्राही दृष्टि डालते हुए एक महान महाकाव्य लिखा हो! अपनी दृष्टि से ऋषि-मुनियों ने जाना था कि जगत में सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय जैसे अनेक द्वंद्वों के बीच युद्ध चलता रहेगा क्योंकि अशुभ शक्तियां शुभ पर हमेशा हावी रहने का प्रयास करेंगी यह भविष्यवाणी व्यास ने महाभारत में की है।
मनुष्य के हृदय में शुभ-अशुभ का खेल निरंतर चलता रहता है। रचनाकार अपने दिव्यचक्षु से उसे अपने लेखन में उतारता है। गीता सिर्फ भारत ही नहीं विश्व का एक उत्तम ग्रंथ है। महाभारत का नवनीत गीता है जिसमें श्रीकृष्ण मनुष्य को जीवन की अच्छी-बुरी सभी बातों से अवगत कराते हुए कर्तव्य की एक दिशा की ओर इंगित करते हैं- कर्तव्य में फल की आकांक्षा न हो। यह भारत का विश्व-संदेश है। यह अधर्म के उत्थान के खिलाफ जंग है।
गीता गाने के बाद कृष्ण अर्जुन को बांधते नहीं। अंत में कहते हैं – ‘यथेच्छसि तथा कुरु’। गीता के अठारह अध्यायों में अर्जुन को – मनुष्य को- कोई आदेश नहीं दिया गया है, उसे किसी भी दायरे में बांधा नहीं गया है, पर यथार्थ का दर्शन कराया गया है। अंत में ‘जो ठीक लगे वह कर’ कहकर कृष्ण मनुष्य को विचार स्वातंत्र्य देते हैं। यहां कोई कट्टरता नहीं है, आज्ञा नहीं है।
जब एक युवा भारतीय अन्वेषक आइंस्टीन से मिलने गया, आइंस्टीन ने अंग्रेजी में नहीं बल्कि संस्कृत में उसका अभिवादन किया। वह भारतीय युवा वैज्ञानिक संस्कृत में जवाब नहीं दे पाया, तब आइंस्टीन ने कहा, ‘आप भारत से हैं जो हिंदू तत्वज्ञान का उद्गम है, फिर भी आपने कभी उस भाषा को सीखने की जरूरत महसूस नहीं की! मेरे पास संस्कृत के शास्त्रीय ग्रंथ हैं- गीता और हिंदू तत्वज्ञान के अन्य ग्रंथ भी हैं।’ वे वैज्ञानिक सत्येन बोस थे।
हमारे उपनिषद और वेदों का चिंतन दुनिया के अनेक बुद्धिजीवियों तक पहुंचा है! भारत के धर्म में केंद्रीय स्थान पर जीवन है। इसलिए उसमें कट्टरता नहीं है, अंधभक्ति नहीं है। इसीलिए वह मनुष्य के लिए पथप्रदर्शक है।
भारत की यह अस्मिता भारतीयता की पहचान है। मध्यकाल में अनेक जातियों ने भारत पर आक्रमण किया। भारत ने उन आक्रमणों का प्रतिकार किया। उस वक्त भारत के अलग-अलग प्रदेशों में संत कवियों ने भक्ति आंदोलन किया जिसने भारत को सांस्कृतिक रूप से टूटने नहीं दिया। भारतीय तत्वज्ञान में अनेक पंथ और संप्रदाय का योगदान है। उनका साहित्यिक, सांस्कृतिक और विचारधारा के रूप में महत्व है। उन सब पंथों और संप्रदायों ने भारतीय अस्मिता को गरिमापूर्ण कद दिया, मानव कल्याण की भावनाओं को, संवेदनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान की।
स्वातंत्रता की लड़ाई के दौरान भारत ने विश्व को अहिंसा, सत्य और सत्याग्रह की नई राह दिखाई।
समय तेजी से बदल रहा है। डिजिटल वर्ल्ड ने एक अनजान दुनिया के द्वार खोल दिए हैं। इस छोटे-से मोबाइल में पूरी दुनिया दिख रही है। जैसेे सभी देश उस ब्लैकहोल में खिंचे जा रहे हैं। जितनी तेजी से एक मनुष्य वस्त्र बदलता है उससे भी ज्यादा गति से जीवन के मूल्य बदल रहे हैं। आर्टिफिश्यल इंटेलिजेंस एक भ्रामक सृष्टि खड़ी कर रहा है। भारत एक चौराहे पर खड़ा है तब भारतीयता की अंतर्दृष्टि उसे कहां ले जाएगी?
स्विडिश कहानीकार इझाक ने अपने भाषण में कहा था, ‘जब सभी सामाजिक सिद्धांत व्यर्थ सिद्ध हो जाएंगे, युद्ध और क्रांतियां मानवता को गहन अंधेरे में ठेल देंगी तब कवि ही, जिसे प्लेटो ने अपने गणतंत्र से बहिष्कृत कर दिया था, सभी को बचाएगा।’
आज सृजनात्मकता के लिए आपातकाल का समय है। मनुष्य की एक नई कुंडली लिखी जा रही है। इस वक्त जब हर तरफ युद्ध का माहौल है, तब भारतीय अस्मिता को उजागर करता सर्जक इस आपातकालीन स्थिति में पथप्रदर्शक बने ऐसी मेरी प्रार्थना है। ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’, यह मंत्र हमारी अस्मिता को, अंतर्दृष्टि को उजागर करते हुए शांति का संदेश दे!
एक बार हैदराबाद में हमारी संस्था ‘ऑल इंडिया वीमेंस राइटर्स’ का त्रिदिवसीय सम्मेलन था। बांग्ला लेखिका नवनीता देवसेन उस सम्मेलन की चीफ गेस्ट थीं। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा था कि ‘मैं जब लिखती हूँ तब मुझे ऐसा अहसास होता है कि मेरी मां मेरे पीछे खड़ी है और देख रही है कि मैं क्या लिख रही हूँ?’
‘मैं एक दरवाजा थी, मुझे जितना पीटा गया, मैं उतना ही खुलती गई।’
ए-2, गुल बहार, बी/एच मेट्रो आइनॉक्स थिएटर, बैरक रोड, मुंबई-400020 मो. 9833076673
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नलिनी बेराजन्म 1952, पश्चिम बंगाल। बांग्ला के प्रसिद्ध और चर्चित कथाकार। प्रमुख उपन्यास ’शबर चरित’, ’दुइ भुवन’, ’चोद्दो मादल’, ’एइ एइ लोकगुलो’ इत्यादि। दस कहानी संग्रह। बंकिम पुरस्कार और आनंद पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित। |
मैं उस भारतीयता को जीता हूँ,जो बदलावों के बावजूद अविनाशी है
जिस बांग्ला भाषा में मैं कहानियां और उपन्यास लिखता हूँ, वह एक क्लासिकल भाषा है, और इस भाषा में मैं सच्चे अर्थों में एक भारतीय उपन्यासकार हूँ। हमारी ऐसी शैली है जो पूरी तरह से ‘भारतीय’ है।
बांग्ला ‘उपन्यास’ की शुरुआत 1865 में साहित्य सम्राट बंकिम चंद्र के हाथों उनके उपन्यास ‘दुर्गेशनंदिनी’ से हुई। इसका पैटर्न या मॉडल पूरी तरह से ‘यूरोपीय’ है, क्योंकि उपन्यास यूरोप की देन है। हम कई वर्षों तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। जिन ब्रिटिश आकाओं ने हमें ‘उपन्यास’, ‘त्रासदी’ और ‘हास्य’ लिखना सिखाया उन्होंने ‘पांचाली’, ‘कथकता’, ‘व्रतकथा’, ‘कीर्तन’, ‘अखाड़ा’, ‘अर्ध-अखाड़ा’ और ‘मंगलकाव्य’ की उन प्रचलित प्रवृत्तियों को व्यावहारिक रूप से दबा दिया जो इतने लंबे समय से हमारे साहित्य में मौजूद था। हमने खो दिए, उनमें भी ‘कहानी’, ‘त्रासदी’ और ‘हास्य’ थे। बंगाल के ‘नए डिरोजियो’, कलकत्ता के मध्यवर्ग ने इन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया और अंग्रेजी साहित्य की बारीकियों को सीखते रहे। इससे बहुत दूर, बंगाल और भारत का विविध, जिद्दी और लचीला लोकजीवन बिना सहारे और आवाज के पड़ा था-
जहां मिट्टी खोदकर
कृषक कर रहा है खेती
जहां पत्थर तोड़कर सड़क बना रहा है
मेहनत कर रहा है बारहों महीने
धूप बरसात में है सबके साथ
धूल से भरे हैं दोनों हाथ
यहीं हैं मेरे उपन्यास के पैटर्न, बीज और विषयवस्तु। यह सब विशिष्ट रूप से भारतीय हैं। यहां भारत एक खोज है।
मैं अपने लेखन में अछूत भारत के इतिहास का अध्ययन करता हूँ, अपने लेखन में सभी अछूत जनजातियों के दैनिक आंदोलन का अध्ययन करता हूँ। मैंने खानाबदोश आर्यों को उत्तर-पश्चिमी पहाड़ों को पार करते हुए और एक निरंतर धारा की तरह आदिम आर्य लोगों को प्राचीन भारत में प्रवेश करते देखा है। भारत का बाद का सारा इतिहास – इस आर्य सभ्यता का इतिहास और विजित लोगों का इतिहास इन गुप्त घाटियों-गुफाओं में, जंगल के अंधेरे में, कंकालों की कतारों में कहीं लिखा हुआ है। आज भी विजित अभागी आदिम जातियां उपेक्षित और अपमानित हैं। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के ‘आरण्यक’ की पंक्तियां हैं-
– क्या आप उस देश का नाम जानते हैं जिसमें हम रहते हैं?
-हम गया जिले में रहते हैं।
– क्या आपने भारत का नाम सुना है?
भानुमती ने सिर हिलाकर कहा- ‘नहीं सुना। चमक्कीटोला के अलावा कभी कहीं नहीं गए। भारत कहां है?’
भले ऐसे लोग भारत का नाम न सुनते हों या जानते हों कि भारत कहां है, फिर भी भारत उनके दिलों में बसता है।
भारतीय होने का भाव, जो जन्म या निवास तक सीमित नहीं है, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक जोड़ है।
आदिवासी समुदाय की यह प्राचीन संस्कृति सभी भाषाओं, धर्मों और भारतीय जीवन की विविधता असमुद्र-हिमाचल तक फैली हुई है। मैं उस भारतीयता को जीता हूँ, जो समय के बदलाव के बावजूद अक्षुण्ण और अविनाशी है।
94/3/2 कसुंदिया रोड, हावड़ा-711101 मो.9932220979
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गिन्नारापु आदिनारायणाजन्म : 1987, तेलंगाना। तेलुगु के प्रमुख युवा कवि और लेखक। कविता संग्रह ’नानिला सुगंधम’ और ’तोव्वा नेरपिनापातम’ प्रकाशित। लेखों का संग्रह ’नेलवनका’। उस्मानिया यूनिवर्सिटी के तेलुगु विभाग में सहायक प्रोफेसर। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘युवा पुरस्कार-2025’ से सम्मानित। |
मेरी भारतीयता मेरी दलित पहचान है
एक सच्चा रचनात्मक दिमाग साहित्य के केवल सुप्रचलित रास्तों पर नहीं चलता या अपने पूर्ववर्तियों द्वारा निर्धारित स्थापित मानदंडों का पालन नहीं करता, बल्कि सक्रिय रूप से एक मौलिक शैली की तलाश करता है और उसे विकसित करता है। वह कथा और तकनीक में मुहावरेदार अभिव्यक्ति के नए तरीकों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए, एक कवि हमेशा सही शब्द की तलाश में रहता है, एक ऐसे वाक्यांश की जो उसकी आत्मा का भार वहन करता है। उसे प्रकृति, मानवीय संबंधों और विराट सृष्टि द्वारा आकार मिलता है।
मेरे लिए साहित्य का मतलब सिर्फ परंपरा का पालन करना नहीं है- उसे फिर से गढ़ना है। एक सच्चा कवि प्रेरणा लेता है, लेकिन अतीत की नकल नहीं करता। अपनी आवाज, अपनी लय, अपनी धारणा का तरीका खुद गढ़ता है। एक कवि के लिए शिल्प नियमों से कहीं बढ़कर है- यह शब्दों का रसायन है। हम एक दुर्लभ चिंगारी का पीछा करते हैं- एक अभिव्यक्ति का जो इतनी मौलिक और जीवंत रहती है कि सिर्फ हमारी ही हो सकती है।
एक कवि हमेशा अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए सही तरीके की तलाश में रहता है- कुछ मौलिक, कुछ ऐसा जो अद्वितीय रूप से उसका अपना हो, ऊर्जा और साहस से भरा हो। ऐसा करने के लिए, एक कवि दुनिया को समझना सीखता है। वह प्रकृति, मानवता और सृष्टि के चमत्कारों का अध्ययन करता है।
कविता में मेरी अपनी यात्रा मेरी भारतीयता में, मेरी दलित पहचान में गहराई से निहित है। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पीएचडी के मेरे शोध ने दलित आत्मकथाओं की खोज की जो सात महान लेखकों की रचनाओं से प्रेरित थी।
मैं आगे अपनी दो कविताएं आपसे साझा करना चाहता हूँ-
1.
बारिश रुक गई है
फिर भी सड़कों पर अभी पानी भरा हुआ है
ये झुग्गीवासियों के आंसू हैं
कभी-कभी प्याज आंसू ले आता है
काटने से नहीं, बल्कि खरीदने से।
2.
मेरी दादी
भोर में, धरती को चूमने वाली झाड़ू के साथ
ताजा आयरन की गई कमीज की तरह
चिकने आंगन की सफाई करती है
वह सड़कों से एकत्रित कर भैंसों से
गोबर पाथती है और
धरती माता के लिए रेशमी साड़ी बुनती है
वह आंगन को सावधानी से साफ करती है,
जिसे कट्टा मैसम्मा की कृपा के लिए
तरह-तरह की डिजाइनों से सजाया गया है
वह साफ करती है
जब तक रोशनी की तरह चमक न जाए
टैंक बंड के आलिंगन पर नृत्य करते हुए
जब वह बर्तन साफ करती है
आसमान और भी चमक उठता है
अगर वह अपने दांत साफ करने के लिए
कोयले की राख का इस्तेमाल करती है
तो टूथपेस्ट भी शर्म से भाग जाएगा!
उसके फटकने वाले सूप से
चावल गिरने की आवाज
संगीत से भी ज्यादा मधुर है
हालांकि वह हमें
बिस्तर पर ज्यादा सोने पर
डांटती है
लेकिन उसकी आवाज
हमारी आत्माओं को झकझोरने वाली चेतावनी है
मेरी दादी
अगर मेरे पिता की वापसी में देरी होती है
आंगन में चहलकदमी करती रहती है
जैसे अनसुनी हो उसकी कोई प्रार्थना
काम से थके हुए उसके हाथ
गर्व से हल और कुल्हाड़ी पकड़ते हैं
फिर भी उसके शब्दों में
किसी विद्धान की कलम से अधिक शक्ति है
जब मैं अचानक बीमार पड़ जाता हूँ
वह गीले कपड़े से
मेरी दुखती पीठ पर मालिश करती है
मेरे बिस्तर के चारों ओर चक्कर लगाते हुए
धीरे से गुनगुनाती है
फिर फुसफुसाती है-
‘कैसा लग रहा है, मेरे बच्चे?’
हर रात
जैसे उसके चूल्हे पर रखा मिट्टी का बर्तन
रो-रोकर सूख जाता है
जैसे हो नमक और दुख का एक टीला
अब मैं रवींद्रनाथ टैगोर की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ-
अपने जीवन को करने दो हल्के से नृत्य
समय के किनारों पर
जैस करती है ओस की बूंद
एक पत्ते की नोक पर!
डोर नं. 301, तीसरा तल, हाउस नं. 3-1-23/2, बोदराई, ओल्ड रामानाथपुर, हैदराबाद-500013 मो. 9949532456
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विहाग वैभवजन्म : 1994, उत्तर प्रदेश। नई पीढ़ी के दलित संवेदना और सरोकारों के प्रतिभावान हिंदी कवि। एक काव्य संग्रह ‘मोर्चे पर विदागीत’। कविताएं मराठी, बांग्ला, असमिया, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनूदित। भारत भूषण अग्रवाल और भारतीय भाषा परिषद के युवा पुरस्कार-2025 से सम्मानित। पोस्ट डॉक्टरल फेलो, आईसीएसएसआर, नई दिल्ली। |
भारत के संवैधानिक मूल्य ही भारतीयता के स्रोत हैं
काल्पनिक अवधारणाओं की व्याख्या एक भ्रामक परिस्थिति को जन्म देती है। बार-बार अभ्यास के चलते कई बार कल्पना से सृजित अवधारणाएं भी ठोस वैज्ञानिक वैचारिकी हासिल कर लेती हैं। इसी तरह की एक काल्पनिक अवधारणा है- भारतीयता। हम भारतीयता से क्या समझते हैं, यह कोई प्रश्न नहीं बन सकता है। भारतीयता का प्रश्न हमेशा एकवचन संज्ञा के साथ ही घटित हो सकता है। हममें से प्रत्येक की भारतीयता भिन्न-भिन्न हो सकती है। भारतीयता मूलतः राष्ट्रीयता का प्रश्न है। बतौर एक राष्ट्र, भारत को समझे बगैर भारतीयता को समझना मुश्किल होगा।
प्रसिद्ध आयरिश सामाजिक राजनीतिक अध्येता बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को एक ‘कल्पित समुदाय’ कहा है। यह एक ऐसा समुदाय होता है जो रोज एक-दूसरे से मिलता जुलता नहीं है। एक-दूसरे की भाषा-बोली का व्यवहार नहीं करता है। उसका भूगोल अलग होता है। इसके बावजूद ‘अपनेपन के लिए संघर्ष’ कर रहा होता है। यह संघर्ष साझा होता है। यही राष्ट्र की भावना को विकसित करता है। राष्ट्र की इस अवधारणा से सहमत होने के बाद इससे असहमत होने का अवकाश नहीं बचता कि- भारतीयता भी एक कल्पित अवधारणा है। ऐसा कहकर मैं कोई विवाद नहीं खड़ा करना चाहता या किसी नागरिक की भावना को आहात नहीं करना चाहता, किंतु इस बात को ठीक से समझना होगा कि भारतीयता एक भ्रामक कल्पित-अवधारणा है। यह वैसा ही खतरनाक हो सकता है जैसा रवींद्रनाथ के विचार से राष्ट्रवाद का ‘परभक्षी जानवर’ था।
जैसा कि मैंने शुरुआत में कहा कि भारतीयता की कोई एक अवधारणा नहीं हो सकती है। भारत के हर नागरिक की अपनी विशिष्ट भारतीयता हो सकती है। अमीर भारतीय की भारतीयता गरीब भारतीय की भारतीयता से अलग होगी। दलित भारतीयता सवर्ण की भारतीयता से अलग होगी। मुसलमान की भारतीयता हिंदू की भारतीयता से अलग होगी। कन्नड़ भाषी की भारतीयता हिंदी भाषी की भारतीयता से अलग होगी। मणिपुरवासी की भारतीयता मध्य प्रदेश वासी की भारतीयता से अलग होगी। स्त्री की भारतीयता अलग होगी और पुरुष की भारतीयता अलग। …यह सूची इतनी लंबी हो सकती है कि इसे समूचे भारत के मानचित्र पर लिखा जाए तब भी शायद ही पूरी हो। इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि इस परिस्थिति में भारतीयता पर विचार करना अर्थहीन बात हो जाती है। यही वह जगह है जहां भारतीयता की तलाश सबसे जरूरी विषय के रूप में प्रस्तुत होती है।
भारतीयता स्पष्टतः दो हिस्सों में विभाजित है। आजाद भारत की भारतीयता की पहचान संवैधानिक मूल्यों से होती है। भारत के संविधान में निहित श्रेष्ठ नागरिक मूल्य ही आजाद भारत की भारतीयता का निर्धारण करते हैं। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि आजादी के पूर्व भारतीयता का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे सभी मूल्य जिनसे भारत की एक विशिष्ट पहचान बनती थी, भारतीयता कही जा सकती थी। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की गर्वोक्ति भले ही एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्कैम थी, बावजूद इसके बहुत सारी संस्कृतियाँ और भिन्न धार्मिक समूह भारत में रहते आए हैं। इस तरह संघर्षशील धार्मिक सहजीविता भी भारतीयता के प्रमुख मूल्यों में शामिल होती है। ऐसा कहते हुए मुझे धार्मिक हत्याकांडों का भी ख्याल आता है।
इतिहास में कुछ लोग समाज-सत्ता के परिवर्तन में मुख्य भूमिका निभाते आए हैं। अब यह समझना आसान है कि धार्मिक-सहजीविता भारतीयता का एक प्रमुख लक्षण होते हुए भी बार-बार विफल होती गई है। भारतीयता का ऐसा कोई भी सर्वमान्य लक्षण नहीं है जिसकी तरफ इशारा करके कहा जा सके कि यही वह चीज है जो भारतीयता कही जा सकती है।
भारतीय संविधान में वर्णित स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, संप्रभुता ही भारतीयता के लक्षण माने जा सकते हैं। उसमें प्रेम और करुणा जैसे मानवीय गुणों को भी जोड़ा जा सकता है। चूंकि यह संविधान में वर्णित है और संविधान मात्र सात-आठ दशक पहले की बात है। इसलिए सात-आठ दशक पहले के समय में भारतीयता का कोई अस्तित्व नहीं रहा होगा, एक औपनिवेशिक विचार होगा।
भारतीय संविधान के उच्च मूल्य स्वतंत्रता, समानता, संप्रभुता और बंधुत्व दुनिया के अन्य देशों से उधार लिए हुए मूल्य हैं, यह कथन असत्य है। यह ठीक है कि ये मूल्य तमाम राष्ट्रों के संविधान में प्रमुखता से शामिल रहे हैं, किंतु इन मूल्यों का कोई भी भारतीय संस्करण नहीं मिलता, ऐसा सोचना भी गलत है। भारत के स्वतंत्रता-संघर्ष में और लोकतंत्र के स्वप्न में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व इत्यादि मूल्य विन्यस्त थे। आजादी के संघर्ष में सबसे ऊंचा नारा स्वतंत्रता का है।
आजादी के संघर्ष के नारों में जो मूल्य प्रमुखता से अभिव्यक्त हो रहे थे, भारतीय मनीषा में वे एक लंबी यात्रा करके यहां तक पहुंचे थे। यह यात्रा मूलतः मध्यकाल से आरंभ होती है। हिंदुस्तान के संत कवियों ने सबसे पहले ताकतवर ढंग से समानता, स्वतंत्रता, आपसी प्रेम और तार्किकता की बात की। पहली बार इतनी बड़ी जनता के बीच भारतीय असमानता की सबसे बड़ी व्यवस्था जातिवाद का विरोध मुखर हुआ। यूं तो जाति-पांति का खंडन सिद्धों की कविता में भी दिखाई पड़ता है। किंतु उसकी स्वीकृति में सिद्धों की रहस्य-क्रिया अवरोध की तरह दिखाई पड़ती है। संत-कविता के बीच से पहली बार रैदास ने एक वैकल्पिक राज्य की कल्पना की और उसे बेगमपुरा का नाम दिया। यह एक काव्यात्मक लोक अवश्य था किंतु कवि के पास इस लोक के लिए स्पष्ट संविधात्मक मूल्य थे। बेगमपुरा राज्य के उच्च मूल्य स्पष्ट थे-
ऐसा चाहूं राज मैं, मिले सबन को अन्न
छोट बड़ो सब सैम बसे, रैदास रहै प्रसन्न
संत कविता में समानता जैसे आधुनिक मूल्य की ऐसी पक्षधरता रखने वाला कवि रैदास के अलावा दूसरा नहीं हुआ। रैदास की कविता में आधुनिक भारत की निर्मिति के लिए महत्वपूर्ण मूल्यों का आह्वान है। संसाधन का समान वितरण आज भी एक बड़ा प्रश्न है, जिसके लिए संघर्ष जारी है। रैदास जब सभी के लिए अन्न की मांग करते हैं, तब वह सभी के लिए समान संसाधन का स्वप्न बनता है। इसकी परिणति में हमें भारत के संविधान का समानता का अधिकार मिलता है। छोटे-बड़े को सम करने की इच्छा समानता के महास्वप्न को सृजित करती है। यह वही समानता है जिसे भारतीय संविधान के सबसे बड़े मूल्य के रूप में देखा जा सकता है। समानता और संसाधनों का समान बंटवारा, रैदास की कविता का यह मूल्य आधुनिक भारत की निर्मिति में शामिल है। बेगमपुरा की परिकल्पना आधुनिक भारत की परिकल्पना है। इसी संदर्भ में समूची संत कविता में रैदास से आधुनिक स्वप्नद्रष्टा दूसरा नहीं हुआ। समानता, न्याय और बंधुत्व जैसे आधुनिक मूल्यों को यदि महत्वपूर्ण कविता-मूल्य मानें तो रैदास को हिंदी का पहला कवि मानने में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। सदियों पार आकर वैश्विक पहचान रखने वाले कवि पाब्लो नेरुदा ने जब कविता के भीतर से मांग की-
मैं चाहता हूँ
मिट्टी, आग, रोटी, शक्कर, गेंहूं, समुद्र, जमीन
और कविता
सभी मनुष्यों के लिए
तब यह कविता और यह चाहना दोनों रैदास की कविता और चाहना से भिन्न नहीं होते हैं। रैदास और पाब्लो नेरुदा की कविता के मध्य एक वैश्विक नागरिकता का संबंध है। रैदास की कविता में सिर्फ यूटोपिया ही नहीं है, बल्कि वहां जातिगत या सामुदायिक हिंसा का यथार्थ भी है- ‘बेगमपुरा सहर का नाम। फिकर अंदेस नहीं तेहि ग्राम।/नहीं जहं सांसत लानत मार। हैफ न खता न तरस जवाल।’
यह बेगमपुर शहर है। यहां जाने या इसे बनाने की इच्छा है कवि के भीतर। उसकी खूबसूरती यह है कि यहां फिक्र नहीं है, वहां सांसत-लानत नहीं है, संघर्ष और हिंसा नहीं है, वहां अफसोस और धोखा नहीं है। कवि की वर्तमान दुनिया में यह सब है। कवि को अपने दलित होने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। दलित को हिंसा से होकर गुजरना पड़ रहा है, कवि की वर्तमान दुनिया कवि के लिए पीड़ा का समुच्चय है, तभी वह एक दूसरी सुंदर दुनिया की कल्पना करता है।
भारतीयता की पहचान और लक्षण आधुनिक भारत के संवैधानिक मूल्यों से बाहर नहीं हो सकते हैं। इसके बाहर भारतीयता के ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, ‘अस्पष्ट करुणा गान’, समावेशिकता जैसे जो लक्षण बताए जाते रहे हैं, वे सब सत्ता-समाज के वे असत्य हैं जिन्हें सदियों से सत्य की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा है। इन्हीं असत्यों से लड़ते हुए संत कबीर को कहना पड़ा था-
तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे
मैं कहता हौं आखिन देखी,
तू कहता कागद की लेखी
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे
भारतीयता में इन दो पक्षों का संघर्ष स्पष्ट दिखाई पड़ता है। एक है जो अव्यवस्थाओं को, गलत को, उलझे हुए को सुलझा देना चाहता है। दूसरा है जो इन्हें उलझाए रखना चाहता है। दरअसल इस उलझाए रखने में ही दूसरे का परम हित निहित है। कबीर स्पष्ट हैं – यदि एक होना है, एक समान होना है तो चीजों को सुलझाना होगा। कबीर के पास सुलझी हुई दुनिया का एक स्वप्न है। वह है- अमर देसवा। रैदास के ‘बेगमपुरा’ की तरह कबीर का ‘अमर देसवा’ भी समानता का पक्षधर, ऊंच-नीच का विरोधी और धार्मिकता से मुक्त राज्य का स्वप्न है। ‘अमर देसवा’ का संविधान स्पष्ट है-
जहंवा से आयो अमर वह देसवा
ब्राह्मन छत्री न सूद बैसवा
मुगल पठान न सयद सेखवा
आदि जोत नहिं गौर गनेसवा
ब्रह्मा बिस्नु महेस न सेसवा
यह जो जातिविहीन समाज की संकल्पना है, कबीर उसके प्रखर पैरोकार हैं। यह संकल्पना भारतीय मनीषा में छनते हुए भारत के संवैधानिक मूल्यों तक पहुंचती है। यही स्वप्न सफल होता है जब भारत का संविधान जातिगत असमानता को नकारता है। भारतीय संविधान राज्य की धर्मनिरपेक्षता का प्रबंध करता है।
यहां एक बात स्पष्ट कर देना जरूरी समझता हूँ। भारतीयता की पहचान में जो कुछ सुंदर हो सकता था वह संत कविता की देन है न कि भक्ति कविता की। इस संदर्भ में मीरा अपवाद हैं। भक्ति कविता मूलतः यथास्थितिवादी कविता रही है। इससे बढ़कर भक्ति कविता कई बार असमानता के वर्णवादी व्यवस्था का स्पष्ट पैरोकार बनकर सामने आती है। रैदास अपनी कविता में जिस वर्णवादी, जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करते हैं, तुलसीदास उसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी एक कर देते हैं।
जरा ध्यान से देखा जाए तो तुलसी अपनी कविता में कबीर से अधिक रैदास से संघर्ष कर रहे हैं। तुलसी का ‘राम राज्य’ रैदास के ‘बेगमपुरा’ से जूझ रहा है। हालांकि कबीर और कबीर का ‘अमर देसवा’ भी तुलसी के ‘राम राज्य’ के लिए पर्याप्त बड़ी बाधा बनते हैं। भारतीयता की तलाश करते हुए रैदास और कबीर जैसे संत कवियों की वाणी जहां भारतीयता की पहचान बनती है, वहीं तुलसी जैसे प्रमुख भक्त कवियों की कविता आधुनिक भारत के स्वप्न में सबसे बेहूदी बाधा बनकर सामने आती है।
मैं समझता हूँ कि ऊपर कही गई बातों के बाद भारतीयता के संदर्भ में मेरी सर्जनात्मक अंतर्दृष्टि को बहुत व्याख्यायित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैंने पहले भी कहा है – कवियों का कोई देश नहीं होता,कवियों की दुनिया होती है। फिर भी बतौर नागरिक कवि एक राज्य में रहता है और राज्य की एक राष्ट्रीयता होती है।
भारतीयता ही मेरी राष्ट्रीयता है। बतौर राज्य-राष्ट्र भारत के लिए जो कुछ भी हितकर हुआ या होगा, जो कुछ भी बेहतर हुआ या होगा उसके बाहर मेरी सर्जनात्मक उर्जा प्रवाहित नहीं हो सकती है।
संत कविता से लेकर इस संविधान-युग तक भारतीय मनीषा लंबे संघर्ष के बाद पहले से बेहतर नागरिक बना सकने में सफल हुई है। बावजूद इसके अब भी बहुत सारी शक्तियां सक्रिय हैं जो भारतीय समाज और नागरिक-सभ्यता के लिए बेहद खतरनाक हैं। वे अब भी समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, सहयोग, सौहार्द, संप्रभुता जैसे उच्च नागरिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। कई बार ये शक्तियां भी अपनी पहचान को भारतीयता की पहचान से संपृक्त करती हैं। किंतु जैसे अन्याय, असमानता, वैमनस्य, परतंत्रता आदि से सहमत नहीं हुआ जा सकता है, ठीक वैसे ही ये शक्तियां भी भारतीयता की पहचान कभी नहीं बन सकती हैं।
इन्हीं मनुष्यद्रोही शक्तियों से संघर्ष करते हुए, अपने मूल्यों को अधिक ताकतवर बनाते हुए मेरी सर्जनात्मक मेधा का विकास होता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि मैं बतौर कवि कविता की अपनी भारतीय पारंपरा की तलाश करता हूँ तो मुझे रैदास, कबीर, मीरा आदि ही दिखाई पड़ते हैं। ऐसे कवि जिन्होंने मिली हुई दुनिया की अव्यवस्था को खत्म करने के लिए अपनी कविता में और कई बार कविता के बाहर भी संघर्ष किया। इसी के समानांतर कविता की एक दूसरी परंपरा भी चली आ रही है जो मनुष्यद्रोही परंपरा है। जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद करने की पैरोकार है। इसके सबसे मजबूत स्तंभ भक्त कवि तुलसीदास हैं। यह परंपरा मेरी कविता में खलनायक है। तुलसीदास के कविता-मूल्यों का व्यवहार करने वाला नागरिक स्वतंत्र भारत में अपराधी है। उसके अपराध के लिए मुकम्मल सजा का प्रावधान है। मेरी कविता की भारतीयता मिले हुए से या पहले से बेहतर भारतीय समाज के लिए संघर्ष में निहित है। मेरी सभी सर्जनात्मक गतियों की दिशा समय में आगे की ओर है।
प्रथम तल, बुद्ध एसोसिएट, लेन नं. बी, हैदराबाद गेट, बी एच यू, वाराणसी-221005 मो.8858356891
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पापरी बर्मनजन्म : 1986, असम। युवा पीढ़ी की चर्चित असमिया कहानी लेखिका। एक संग्रह ‘परुआ पोहनिया’ प्रकाशित। मुनिन बरकोटकी अवार्ड और भारतीय भाषा परिषद के युवा पुरस्कार-2025 से सम्मानित। |
भारतीय साहित्य का भविष्य मतभेदों को मिटाने में नहीं, उनका जश्न मनाने में है
मैं नलबाड़ी, असम से आती हूँ- एक ऐसी जगह से जहां कहानियां केवल किताबों में नहीं होतीं, बल्कि हवा में घूमती रहती हैं, नदियों में बहती रहती हैं और किसानों, बुनकरों, क्रांतिकारियों तथा माताओं और बच्चों की बातचीत में गूंजती रहती हैं। असम की धरती न केवल अनाज में समृद्ध है, बल्कि स्मृति, संघर्ष और विरासत में भी समृद्ध है। इसी मिट्टी से मेरी कहानियां निकलती हैं।
भारतीयता क्या है? यह ऐसा प्रश्न है जिसपर मैंने अक्सर सोचा है, अकादमिक जांच-पड़ताल के तौर पर नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव के तौर पर। मेरे लिए भारतीयता राष्ट्रीय प्रतीकों या नारों तक सीमित नहीं है। यह रोजमर्रा का लचीलापन है, शांतिपूर्ण जीवन की गरिमा है। यह प्रतिपक्ष की कविता है, और सादगी के साथ ज्ञान है। यह पितृसत्ता के आगे झुकने से इनकार करने वाली है। यह स्त्री की आवाज है, जो टपकती छत के नीचे सपने देखने वाले बच्चे की भावनाओं में है, कर्ज से लदे होने के बावजूद बीज बोने वाले किसान में है, और एक जलती हुई दुनिया में भी पेंटिंग करने वाले कलाकार में है।
एक लेखक के तौर पर मेरी रचनात्मक अंतर्दृष्टि की जड़ें विरोधाभासों और निरंतरताओं की मिट्टी में हैं। मैं अशांति के दौर में बड़ी हुई-जब डर घरों में धुएं की तरह घुसा हुआ था, जब खुले आसमान के नीचे राष्ट्रगान एक अवज्ञा हो सकती थी। वह अनुभव, हालांकि दर्दनाक था, उसने मुझे अभिव्यक्ति का मूल्य और सत्य कहने की जरूरत का अहसास कराया।
मेरी कहानियां क्षेत्रीय वास्तविकताओं की गहराई मेें निहित हैं। समृद्ध लोक संस्कृति की प्रेरणा से मैंने ‘मोरोग’ शीर्षक से कहानी तैयार की – एक ऐसी कहानी जो पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की दुनिया में सामने आती है और ग्रामीण शिल्प कौशल की आत्मा को दर्शाती है। मैंने कुछ रचनाओं में बोडो आंदोलन की भावनात्मक और सामाजिक अंतर्धाराओं को पकड़ने की कोशिश की है।
जब मैं 2012 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में शामिल हुई, तो कहानी की मेरी यात्रा को एक उद्देश्य मिला। यहां मानवीय पीड़ा और अस्तित्व के संघर्ष को समझने के लिए मुझे ऐसे धागे मिले जो मेरी कहानियों में बुने जाते हैं, और ये केवल कल्पना से नहीं बल्कि यथार्थों से पैदा हुए हैं।
मेरे लिए साहित्य पलायनवाद नहीं है, यह टकराव है। यह दुनिया का सामना करने का मेरा तरीका है। जब चुप्पी थोपी जाती है तो यह मेरे सवाल पूछने का तरीका है। अपने लेखन में मैं जीवन को उसके कच्चेपन, खामियों, अनकहे दुख और शांत उत्सवों में कैद करने की कोशिश करती हूँ। असम की ग्रामीण दुनिया अपनी जीवंत बोलियों, लोककथाओं और अपेक्षित श्रम के साथ मेरे लेंस को आकार देती है। मैं खुद को जीवन के राजनीतिक, सामाजिक या भावनात्मक आयामों से अलग नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे लिए लेखन साक्षी बनने का एक दायित्व है।
अपनी लेखन यात्रा में मैंने भारतीय कलाओं और विचार के कई दिग्गजों से प्रेरणा ली। मैं सत्यजीत रे का जिक्र किए बिना भारतीयता पर बात नहीं कर सकती। उनके सिनेमाई लेंस ने एक राष्ट्र की आत्मा में घटित संक्रमण को कैद कर लिया। उनके पात्र केवल लोग नहीं थे, वे कई पीढ़ियों के रूपक थे, सत्यजित रे की ‘पथेर पांचाली’ केवल अपू की कहानी नहीं है। यह स्थानीय क्षय, गरीबी और सपनों की एक गीतात्मक स्तुति है, जो करुणा से भरी है। उन्होंने हमें सिखाया कि स्थानीय भी सार्वभौमिक हो सकता है। मुझपर ऋत्विक घटक का गहरा राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही गहरा रहा है। उनकी ‘मेघे ढाका तारा’ जैसी फिल्मों ने विभाजन, पलायन और पहचान के मर्म को उद्घाटित कर दिया। घटक का सिनेमा मौन में एक चीख है। उन्होंने पौराणिक कथाओं और इतिहास का इस्तेमाल आभूषणों के रूप में नहीं बल्कि आलोचना के हथियार के रूप में किया। उनके लेंस ने हमें दिखाया कि आघात की भी एक भाषा होती है और कला उसकी शब्दावली हो सकती है। मैं अपने लेखन में स्मृति की इस खंडित निरंतरता को पकड़ने का प्रयास करती हूँ, जिस तरह अतीत वर्तमान को हांट करता है।
साहित्य के क्षेत्र में आशापूर्णा देवी की साहसी कलम ने अनगिनत महिलाओं के लिए दरवाजे खोले। उनकी त्रयी-खासकर ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ ने दिखाया कि कैसे एक महिला का जीवन, जो अक्सर चहारदीवारी में सीमित रहता है, किस तरह अपने भीतर क्रांति का तूफान समेटे रहता है। उनके शब्द कोमल लेकिन उग्र थे। उन्होंने मुझे दिखाया कि कैसे व्यक्तिगत राजनीतिक है, और स्त्रीत्व अपनी गरिमा और दर्द के साथ कहानी कहने के केंद्र में जगह पाने का हकदार है।
दूसरी ओर, महाश्वेता देवी अग्नि का अवतार थीं। उनकी कहानियां सिर्फ बोलती नहीं थीं, वे दहाड़ती थीं। उन्होंने आदिवासी समुदायों, बंधुआ मजदूरों और उन भूले-बिसरे विद्रोहियों के लेखन को आवाज दी, जिनमें न्याय की तीव्र भूख थी। सत्य के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता मेरे लिए एक प्रकाशस्तंभ रही है। उनसे मैंने सीखा कि साहित्य का लक्ष्य विचलित करना है, उकसाना है, पाठक को वह देखने के लिए मजबूर करना है जिसे लंबे समय से अनदेखा किया गया है। उनके जीवन और काम हमें याद दिलाते हैं कि कला हमेशा सुंदरता के बारे में नहीं होती है, वह कभी-कभी तीखी ईमानदारी के बारे में होती है।
भारतीयता पर कोई भी चिंतन डी.डी. कोसंबी के गहन कार्यों को स्वीकार किए बिना पूरा नहीं होगा। उनके काम ने इतिहास और संस्कृति की हमारी समझ को नया रूप दिया। अपनी पुस्तक ‘एन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में कोसंबी ने हमें इतिहास को केवल शासकों और योद्धाओं द्वारा संचालित घटनाओं की एक शृंखला के रूप में नहीं बल्कि वर्ग संघर्ष, अर्थशास्त्र और सांस्कृतिक शक्तियों के एक जटिल अंतर्संबंध के रूप में देखने की चुनौती दी। मार्क्सवादी विचारों और अंतर-अनुशासनिक दृष्टिकोण के उनके अनूठे मिश्रण ने हमें भारत के अतीत को आम लोगों के जीवन, उनके श्रम, उनकी कला और उनके लचीलेपन के माध्यम से देखने के लिए आमंत्रित किया। मेरे लिए, कोसंबी का काम एक अनुस्मारक है कि कहानी को छिपी हुई सच्चाइयों से दूर नहीं भागना चाहिए। इसे उन ताकतों पर सवाल उठाना, जांचना और उजागर करना चाहिए जो हमारी दुनिया को आकार देती हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम अपने अतीत और वर्तमान के बारे में कहानियां सुनाते हैं।
मैं जीवन के सबसे स्वाभाविक और सबसे ईमानदार रूपों के बारे में लिखना पसंद करती हूँ। जब कोई कहानी सामाजिक या राजनीतिक यथार्थों से आकार लेती है, तो वह स्वाभाविक रूप से अधिक शक्तिशाली और विचारोत्तेजक बन जाती है। जिस तरह मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसी तरह साहित्य भी समाज का चेहरा दर्शाता है। कहानी का कोई पात्र तब तक पूरी तरह वास्तविक नहीं हो सकता, जब तक हम उसकी आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को न समझ लें। क्या कोई पात्र जीवन की कई परतों को उजागर किए बिना अस्तित्व में रह सकता है?
जिस तरह परीक्षाओं में प्रतियोगिता सफलता को अधिक अर्थपूर्ण बनाती है, उसी तरह मेरा मानना है कि साहित्य में ईमानदार आलोचना और विचारशील चर्चा समाज को आगे बढ़ने में मदद करती है। मुझे आज भी प्रसिद्ध असमिया लघु कथाकार अपूर्वा सरमा की कहानी ‘शोइचोर बोटर’ पढ़ना याद है। इसने मुझे गहराई से छुआ। भूख और दर्द का सामना करते हुए भी, कहानी की छोटी बच्ची एक जादुई दुनिया का सपना देखती है। जो चीज मेरे साथ सबसे ज्यादा रही है, वह बच्ची के आसपास की दुनिया नहीं, बल्कि उसके अपने विचार और शब्द थे- ‘अगर वह लड़का होती, तो अपने दुश्मनों से निपट लेती।’ यह पंक्ति आज भी मेरे दिमाग में गूंजती है। ‘शोइचोर बोटर’ का मतलब है ‘भूसी बटोरने का मौसम’। यह कहानी एक दिल दहला देने वाली सच्चाई बताती है कि लोग कैसे बेकार भूसी के लिए भी लड़ते थे। यह लगभग अविश्वसनीय है। इसने मुझे एहसास कराया कि गरीबी हमारे समाज का कितना बड़ा हिस्सा है।
अपूर्वा सरमा की कहानियों ने मुझे अपने चारों ओर सत्ता और वर्ग की परतों को देखने में मदद की। आज भी जब मैं कसी काम के लिए यात्रा पर निकलती हूँ, तो मैं वही संघर्ष देखती हूँ जिसके बारे में उन्होंने लिखा था और जो आज भी हमारे आसपास हो रहा है। शायद इसीलिए कवि नवकांत बरुआ ने एक बार कहा था कि जब तक हम अतीत को नहीं जानते, हम वर्तमान को नहीं समझ सकते। अपूर्वा सरमा की कहानियों ने मुझे हिम्मत दी और एक कहानीकार के रूप में मेरी आवाज को आकार देने में मदद की। जहां उनकी कहानियों ने मुझे वर्ग और असमानता को समझने में मदद की, वहीं मामोनी रईसम गोस्वामी (इंदिरा गोस्वामी) की कहानियों ने महिलाओं की ताकत और दर्द को समझने में मेरी आंखें खोल दीं। उनकी कहानी ‘संस्कार’ ने दिखाया कि महिलाओं पर कितना गहरा अत्याचार किया जाता है। एक युवा पाठक के रूप में इसने मुझपर गहरा प्रभाव डाला। इसने विरोध की भावना को भी प्रेरित किया और मुझे महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता के बारे में अधिक जागरूक बनाया।
इसी तरह, अरूपा पतंगिया कलिता की ‘दोइवोकिर दिन’, प्रणबज्योति डेका की ‘अनिरगामा पथ’ और बिपुल खाटोनियार, बोंटी सेंचोवा और मनोरमा दास मेधी की कालातीत रचनाओं ने न केवल असमिया साहित्य को समृद्ध किया है, बल्कि एक लेखक और विचारक के रूप में मुझे विकसित होने में भी मदद की है।
आज, जब हम भारतीयता की बात करते हैं, तो हमें किसी इकहरी परिभाषा का विरोध करना चाहिए। भारत एक भाषा, एक धर्म, एक पहचान नहीं है। यह एक मोजेक है, जो हमेशा अस्थिर रहता है, हमेशा फैलता रहता है। भारतीयता हमारे बहुभाषिक सपनों, साझी खामोशियों और हमारे अंतर्विरोधपूर्ण आत्म में है। मेरे लिए भारतीयता का अर्थ है अपनी माताओं की कहानियों और अपने पिताओं के घावों को समेटने की क्षमता। यह लोरियों और युद्ध की चीखों में है।
युवा लेखक के रूप में हमें यह महसूस करना चाहिए कि हमारी कलम इस भारतीय विरासत का भार उठाने के लिए तैयार है। युवा पुरस्कार सम्मान सिर्फ एक पुरस्कार नहीं है, यह लिखने, प्रतिरोध करने, याद रखने और नवीनीकरण करने का आह्वान है। यह याद दिलाता है कि शोर के इस युग में भी, सत्य अभी भी मायने रखता है, और कहानी सुनाना अभी भी घाव भरता है।
मैं क्षेत्रीय भाषाओं की शक्ति में विश्वास करने के लिए भारतीय भाषा परिषद की आभारी हूँ, यह पहचानने के लिए कि भारतीय साहित्य का भविष्य मतभेदों को मिटाने में नहीं, बल्कि उनका जश्न मनाने में है। यह सम्मान सिर्फ मेरा नहीं है, बल्कि हाशिए से आने वाली हर आवाज का है जिसने बोलने की हिम्मत की, हर भूली हुई भाषा का है जो अभी भी गाती है, और हर युवा लेखक का है जो अनुरूपता के बजाय साहस को चुनता है।
आज जब मैं यहां खड़ी हूँ, तो मैं अपने लोगों की आवाज, अपनी जमीन की खुशबू और हर अनसुनी कहानी के सपने अपने साथ लेकर हूँ, जिसे सुने जाने का इंतजार है। यह पुरस्कार सिर्फ एक पहचान नहीं है, यह एक वादा है। साहस, ईमानदारी और उस जमीन के प्रति प्यार के साथ लिखना जारी रखने का वादा जिसने मुझे बड़ा किया। लेखक और विचारक के तौर पर हम यह कभी न भूलें कि हमारे शब्दों में घाव भरने, प्रतिरोध करने और बदलाव लाने की शक्ति है। हम अपने देश की आत्मा को पोषित करते रहें- भाषा के जरिए, स्मृति के जरिए और अटूट रचनात्मक भावना के जरिए।
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