इन दिनों भारतीय ज्ञान परंपरा चर्चा का प्रमुख विषय है। प्रायः सभी विश्वविद्यालयों में यह एक प्रमुख विषय बना हुआ है। यह कोई एक खास परंपरा या पद्धति है, इसे लेकर संशय है। इसमें निश्चय ही कोई संदेह नहीं कि यह परंपरा सैकड़ों-हजारों सालों से विकसित हुई है। इन दिनों इसपर नए सिरे से बहस शुरू की गई है। आज अलग हटकर क्या कहा जा रहा है, यह जानना जरूरी है। यहां पढ़ें कुछ लेखकों के विचार जिनपर आगे भी बहस चल सकती है।

सवाल

1 भारतीय ज्ञान परंपरा कोई एक परंपरा है या अनेक ज्ञान परंपराएं हैं? भारतीय ज्ञान परंपराओं की विशेषताएं और इनके अध्ययन की समस्याएं क्या हैं?
2 भारतीय ज्ञान परंपराओं के विकास में आधुनिक हिंदी साहित्य का क्या योगदान है? नवजागरण, छायावाद (रोमांटिसिज्म), प्रगतिशील आंदोलन तथा आधुनिकतावाद का उन परंपराओं से संबंध और टकराव के प्रमुख बिंदु क्या रहे हैं?
3 भारतीय ज्ञान परंपरा का विश्व की सभ्यताओं और दर्शनों से क्या संबंध है? कुछ बिंदुओं पर अपने विचारों से अवगत कराएं।

हरीश त्रिवेदी
दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पूर्व-प्रोफेसर। शिकागो और लंदन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर। अंग्रेजी-हिंदी दोनों में लिखते हैं। प्रमुख पुस्तकें :‘द नेशन एक्रास द वर्ल्ड’, ‘पोस्ट-कोलोनियल ट्रांस्लेशन’ आदि।

भारतीय ज्ञान परंपरा : पूर्वग्रह बनाम दुराग्रह

भारतीय ज्ञान परंपरा यह पदावली नई-सी है, कम से कम मेरे लिए तो है ही। संभव है कि इसी प्रकार अंग्रेजी में अब प्रचलित हो रही पदावली ‘द इंडियन नॉलेज सिस्टम’ का यह अनुवाद हो – ‘सिस्टम’ का अनुवाद परंपरा ठीक नहीं है। कुछ वर्षों से हमारे अतीत का जो गुण-गान होना शुरू हुआ है, यह उपक्रम उसका भाग लगता है और अब कार्यान्वित हो रही नई शिक्षा नीति (न्यू एजूकेशन पॉलिसी या एनईपी) का भी यह एक अंग है। सुना जाता है कि आजकल यदि कोई विश्वविद्यालय किसी विषय पर संगोष्ठी आयोजित करने के लिए यूजीसी इत्यादि से अनुदान मांगता है तो अक्सर अपेक्षा होती है कि यह भी बताया जाय कि प्रस्तावित विषय का भारतीय ज्ञान परंपरा से क्या संबंध है।

ऐसा नहीं है कि अपने अतीत पर इस प्रकार का गर्व हमें पहले नहीं था। बीसवीं सदी के हिंदी कवियों में अग्रगण्य जयशंकर प्रसाद ने भारत के स्वर्णिम अतीत के गौरव से ओतप्रोत अनेक कविताएं लिखी थीं, जिनमें एक है ‘भारत-महिमा’। इसकी कई पंक्तियां कुछ पाठकों को कंठस्थ होंगी। उन्होंने कविता में कहा था कि विश्व भर में हम पहले देश थे जहां ज्ञान का सूर्य उदय हुआ, जिसके बाद ‘जगे हम लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक’। अर्थात आज की भाषा में हम ही विश्व-गुरु थे।

बचपन में उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से शहर फतेहपुर में अपने परिवार के एक बुजुर्ग से मैंने इसी प्रकार की दो पंक्तियां सुनी थीं जो शायद आर्य समाज के किसी समारोह में गाई गई थीं:

सिकंदर से कहा सुकरात ने, विजय कर विश्व जब आना

हमारे वास्ते भारत से एक ज्ञानी गुरु लाना।

यह धारणा कि सच्चे ज्ञानी गुरु भारत में ही पाए जाते हैं पश्चिम में भी बहुत वर्षों तक प्रचलित रही और यह उनके प्राच्यवाद का एक विशेष अंग थी। एक ही उदाहरण देना हो तो फ्रांसीसी लेखक अनातोल फ्रांस का 1890 में छपा एक ऐतिहासिक उपन्यास है ‘ताइस’। इसमें लगभग अठारह सौ वर्ष पहले मिस्र देश में एक ईसाई संत कठोर तपस्या कर रहा है और इस संदर्भ में एक पात्र कहता है: आपको भारतवर्ष के योगियों की याद है? वहां के योगीगण इसी भांति बहुत दिनों तक निश्चल रह सकते हैं। वह निर्जल, निराहार सौ-सौ वर्षों तक समाधिस्थ रहते हैं। (इस उपन्यास के मुंशी प्रेमचंद द्वारा किए हिंदी अनुवाद ‘अहंकार’ (1924) से उद्धृत।)

इस प्रकार का अपने अतीत पर अभिमान हमारे बीच तब इसलिए भी प्रचलित था कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को इस आस्था से बल मिलता था कि अंग्रेजों के शासन-कल के बहुत पहले से हम सभ्य और सुसंस्कृत थे, जबकि हमारे अंग्रेज शासक यहां पर अपना राज यह कह कर उचित ठहराते थे कि वे हमें सभ्य बनाने आए हैं। इसे अंग्रेजी में वे अपना ‘सिविलाइजिंग मिशन’ कहते थे।

तो हम अपनी प्राचीन सभ्यता का गुणगान करके उनके इस दावे का खंडन कर रहे थे। इस प्रकार की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का इस्तेमाल ब्रिटिश राज के प्रतिरोध के साधन के रूप में कर रहे थे। इसी प्रकार की भावना बंकिम में पाई जाती है और मोहम्मद इकबाल का ‘कौमी तराना’  साफ-साफ कहता है कि हमारा हिंदुस्तान सारे जहां से अच्छा है, भले 1904 में ही यह लिखने के तुरंत बाद उनकी विचारधारा बदल गई हो और उनके लिए इस्लाम सर्वोपरि हो गया हो: ‘मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा’!

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उस युग के लगभग सौ वर्ष बीत चुके हैं, अब दूसरा ही माहौल है। विचारधाराओं का ऐसा ध्रुवीकरण हो चुका है और विभिन्न राजनैतिक दलों की सत्ता में आने की उठा-पटक इतने बल खा चुकी है कि जैसे कोई व्यक्ति किसी और की बात सुनने को तैयार नहीं है, संवाद स्थापित करने का सवाल ही नहीं।

ऐसे भी कुछ लोग हैं जो ‘भारत’ या ‘भारतीय’ शब्द सुनते ही भड़क जाते हैं, जैसे कि इससे बुरा कुछ हो नहीं सकता। दूसरी ओर, ऐसे भी हैं जिनका दृढ़ विश्वास है कि दुनिया भर का आधुनिकतम ज्ञान वेदों और उपनिषदों में पहले से ही लिखा हुआ है। हम तब एटम बम बनाने की विधि भी जानते थे, पुष्पक विमान बना के उड़ा ही चुके थे, और दुनिया का कौन-सा मर्ज था जिसका हम इलाज न कर पाएं: ‘भेषज सर्वस्य रोगस्य विदेहपति निर्मितम’!

‘भारत’ या ‘भारतीय’ के नाममात्र से क्रुद्ध होने वाले लोगों में एक बात जरूर है कि ‘इंडिया’ पर वे बड़े शौक से विमर्श कर सकते हैं। इसपर ध्यान नहीं जाता कि हमारे दो सबसे बड़े राजनैतिक दलों में एक के नाम में पहला शब्द है ‘भारतीय’ तो दूसरी पार्टी के नाम में पहला शब्द है ‘इंडियन’। फिर क्या बात है कि सबको ‘इंडिया’ इतना प्रिय है पर भारत या भारतीय इतना अखरता है, यानी गुलगुले खुशी से खा लेंगे पर गुड़ से परहेज बना रहेगा।

स्पष्ट ही इसके पीछे धारणा यह है कि संस्कृत/हिंदी आदि भाषाएं स्वयं ही सांप्रदायिक हैं, जबकि अंग्रेजी सर्वथा धर्मनिरपेक्ष है, दूध की धुली है। हमारे अंग्रेजी भाषी बुद्धिजीवी सरासर यही मानते हैं। हिंदी प्रदेशों के अनेक अंग्रेजीदां इसी मत के हैं। हिंदी में पढ़ने-लिखने वालों को या तो इस पूर्वग्रह का भान नहीं है या फिर वे इसका प्रतिरोध कर सकने में अक्षम हैं।

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प्राचीन भारत में हम क्या-क्या जानते थे और क्या-क्या कर सकते थे या बना सकते थे, इसके अनेक दावे इतने अतिशयोक्ति-पूर्ण और हास्यास्पद हैं कि लगता है कि यह सब मानने और प्रचारित करने वाले लोग हमारे पुराने ग्रंथों के पास भी नहीं गए। पर क्या वे आजकल की शिक्षा से भी बिलकुल अछूते रह गए हैं और बिलकुल ही निरक्षर और मूर्ख हैं क्या? कुछ ऐसे भी लोग हैं- भारत में और विदेश में भी जिनकी विद्वत्ता असंदिग्ध हैं। उन्होंने प्राचीन भारत की उपलब्धियों पर लिखा है, और उनका लिखा न मानना तो उलटे दूसरे सिरे का दुराग्रह या मूर्खता होगी।

शिकागो और कोलंबिया विश्वविद्यालयों में संस्कृत के प्रोफेसर रहे शेल्डन पॉलक को प्रणव मुखर्जी से राष्ट्रपति का संस्कृत पुरस्कार मिला है, फिर 2010 में कांग्रेस सरकार से पद्मश्री भी। उनकी आजीवन विद्वत्ता के निचोड़ के रूप में उनकी लगभग 700 पृष्ठों की पुस्तक आई थी- ‘द लैंग्यूएज ऑफ गॉड इन द वर्ल्ड ऑफ मैन’ (2006; मनुष्य के लोक में देवभाषा)। इसमें उन्होंने कहा कि ईसा के पहले सहस्राब्द में (यानी लगभग सन 1 से सन 1000 तक) संस्कृत कविता और साथ ही संस्कृत भाषी राज प्रणाली का अफगानिस्तान से जावा (यानी तब की जानकारी के हिसाब से लगभग पूरे विश्व में) वर्चस्व था। इसका प्रमाण है इस पूरे इलाके में पाए जाने वाले हिंदू और बौद्ध मंदिर, वहां के शासकों के नाम और कार्य-प्रणाली, उनके सम्मान में लिखी प्रशस्तियों का वही संस्कृत स्वरूप, और साहित्य के नाम पर संस्कृत के ही दो आदि महाकाव्यों अर्थात रामायण और महाभारत, तथा जातक कथाओं जैसे बौद्ध ग्रंथों का सर्वत्र चित्रण और साहित्यिक प्रसार। यहां तक कि संसार के सबसे बड़े हिंदू और बौद्ध मंदिर (अंकोर, बोरोबुदुर और प्रंबनन) भारत में न होकर दक्षिण-पूर्व एशिया के कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में हैं। इनमें अनेक देशों के प्राचीन नाम भी संस्कृत में ही हैं, जैसे कि लंका, द्वारवती और श्याम (थाईलैंड), चंपा (विएतनाम) श्रीविजय (अब अंशतः मलेशिया और इंडोनेशिया), और यवद्वीप (जावा) इत्यादि।

अभी एक और पुस्तक आई है विलियम डेलरिंपल की, जो मुग़लों और अंग्रेज-राज के बारे में अनेक प्रामाणिक और रोचक पुस्तकें लिख चुके हैं। ये देश-विदेश में पुरस्कृत भी हुई हैं और बिकी भी बहुत हैं। इस नई पुस्तक में वे प्राचीन भारत की ओर मुड़े हैं: ‘द गोल्डेन रोड ः हाउ एनसिएंट इंडिया ट्रांस्फॉर्म्ड द वर्ल्ड’ (2024), अर्थात प्राचीन भारत ने कैसे दुनिया भर का कायाकल्प कर दिया। इसका फलक और भी व्यापक है क्योंकि इसमें पहले रोमन साम्राज्य के साथ हमारे संबंधों का ब्यौरा है। फिर दक्षिण-पूर्व एशिया पर हमारे प्रभाव की बात है। इसमें गणित में हमारे मूलभूत आविष्कार- शून्य और दशमलव- कैसे बगदाद पहुंचे, फिर वहां से पश्चिमी जगत में कैसे क्रांतिकारी साबित हुए, इसका भी वृत्तांत है।

दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में हमारी संस्कृत-संस्कृति और प्राकृत-पाली-संस्कृति का ऐसा मिला-जुला प्रभाव दिखता है जो यहां भारत में देखने को नहीं मिलता। इससे हम चकित-से रह जाते हैं। थाईलैंड की पुरानी राजधानी का नाम है- अयुत्थ्या (अयोध्या) और उनके राजवंश में अब तक राम प्रथम, राम द्वितीय होते-होते अब राम दशम राजा हैं, जबकि हैं वे सभी बौद्ध! उनका राष्ट्रीय महाकाव्य है ‘रामाकीन’ (अर्थात रामकीर्ति) जो रामायण की कथा है। इसे वे पूर्णतः अपना ही समझते हैं।

कंबोडिया का अंकोरवाट नाम का विश्व का सबसे बड़ा मंदिर जब 1150 के लगभग वहां के राजा सूर्यवर्मन ने बनवाया था। तब राजा भी हिंदू थे और मंदिर भी हिंदू था। बाद में बौद्ध राजा आए तो मंदिर का भी धर्म-परिवर्तन हो गया।

इंडोनेशिया का मुख्य धर्म इस्लाम है और संस्कृति का आधार हिंदू है। स्वतंत्रता के बाद उनके पहले राष्ट्रपति का नाम था सुकार्णो (सुकर्ण)। उनकी बेटी थीं मेघावती, सुकर्णोपुत्री जो स्वयं बाद में राष्ट्रपति बनीं। उनकी भाषा का नाम है ‘बहासा’ जिसमें साहित्य के लिए उनका शब्द है ‘शास्त्र’, और ‘शुचि शास्त्र’ का अर्थ है धार्मिक साहित्य जिसमें कुरान भी शामिल है। ऐसे जितने उदाहरण दिए जाएं, कम हैं।

आपत्ति की जा सकती है कि धर्ममूलक या आध्यात्मिक ज्ञान तो ज्ञान नहीं है। पर प्राचीन काल में सच्चा ज्ञान तत्त्व-ज्ञान ही था, बाकी सब व्यावहारिक जानकारी थी। ऐसा ही पश्चिम में था, रेनेसांस के बाद भी और अठारहवीं शताब्दी के तार्किक ‘एनलाइटेंमेंट’ के आने तक। तत्त्व-ज्ञान में हमारी एक नहीं अनेक उदात्त धारणाएं थीं, जैसे कि नासदीय सूक्त, तत्त्वमसि, सोऽहम, आत्मानं विद्धि, या शास्त्र-सम्मत नास्तिकता। तब ज्ञान और विज्ञान में कोई भेद न था। स्मरण कीजिए प्रसाद के चरित्र इड़ा का सौंदर्य वर्णन, इसकी पहली पंक्ति है ‘बिखरी अलकें ज्यों तर्क-जाल’ और जिसमें आगे एक अद्भुत रूपक आता है- वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान-ज्ञान!

आवश्यकता है कि प्राचीन काल को यथासंभव हम उस जगत की ही ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, और उसपर अपने आजकल के पूर्वग्रह न आरोपित करें। ईसा बाद के पहले सहस्राब्द को आज के तीसरे सहस्राब्द के चौखटे में मोड़-तोड़ के घुसाने की कोशिशों से हम खुद ही विभ्रांत और विपन्न होंगे।

डी – 203, विदिशा अपार्टमेंट्स, 79, इंद्रप्रस्थ एक्स्टेंशन, दिल्ली-110092 मो.9818355433

अवधेश प्रधान
प्रसिद्ध आलोचक और लेखक। पूर्व प्रोफेसर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। अद्यतन पुस्तक ‘सीता की खोज’।

भारतीय ज्ञान परंपरा में आदान-प्रदान की घटनाएं हैं

(1)भारतीय ज्ञान परंपरा एक है और अनेक भी। शास्त्र की परंपरा है, उसके समानांतर लोक की भी परंपरा है। देश और काल, जाति और धर्म, पेशा और अंचल की विशेषताएं भी ज्ञान की परंपरा को भिन्न-भिन्न रंग-रूप देती रही हैं। आर्य, द्रविड़, निषाद और विभिन्न जातियों की, वैदिक-अवैदिक, बौद्ध, जैन, इस्लाम, सिक्ख, पारसी आदि धर्मों की, आस्तिक और नास्तिक मतों की, ग्राम और नगर, जंगल, पहाड़ और मैदान, नदी-तट, समुद्र-तट और मरुस्थल आदि क्षेत्रीय बसाहटों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इनके कारण ज्ञान और कला की रंग-बिरंगी परंपराएं जन्म लेती रही हैं।

कश्मीर में शैव-दर्शन और काव्यशास्त्र की परंपरा का विशेष रूप से विकास हुआ। बुद्ध की प्रतिमाएं उत्तर भारत की देन हैं और नटराज की मूर्ति शिव दक्षिण भारत की है। भरतनाट्यम, ओडिसी मोहिनीअट्टम, कुचिपुड़ी, कथकली से लेकर कत्थक तक नृत्य की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुई हैं।

विद्वानों का विचार है कि बसंत रस की जन्मभूमि बंगाल है जिसकी अभिव्यक्ति जयदेव के गीत गोविंद में हुई। शरद रास की दक्षिण में झलक भागवत में मिलती है। धर्म, ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, संगीत, स्थापत्य आदि सभी क्षेत्रों में अनेक परंपराएं फलती-फूलती रही हैं, उनमें परस्पर संवाद होता रहा है। दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद, नाट्यशास्त्र आदि सभी विधाओं में खोज, संवाद और परस्पर सहयोग की परंपरा चलती रही है। मतों और मतभेदों के बीच से ज्ञान का विकास हुआ है।

उपनिषदों में ज्ञान का आख्यान प्रश्न और उत्तर की शैली में हुआ है, पर बुद्ध की संवाद शैली भी प्रसिद्ध है। सृष्टि में सभी छोटे-बड़े पदार्थ सूक्ष्म परमाणुओं के योग से बने हैं, यह धारणा वैश्विक दर्शन की है लेकिन व्याकरण, आयुर्वेद सबने यह पद्धति अपनाई। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए, शरीर, इंद्रिय, मन, बुद्धि को पार करते हुए भारतीय प्रज्ञा आत्मा तक पहुंची। इसने पिंड से लेकर ब्रह्मांड तक एक ही ज्योति के दर्शन किए। भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘एक’ और ‘बहु’ के बीच, भिन्न और अभिन्न के बीच संगति की खोज हुई। विविधता के भीतर एकता के सूत्र की तलाश हुई।

ऋग्वेद में अग्नि, वरुण, सोम, इंद्र आदि के मंत्र हैं। ऊपर से बहुदेववाद का भ्रम होता है लेकिन ऋषि जानता है कि सत्य एक है उसे बहुत सारे नाम से पुकारते हैं- ‘एकं सद् विप्रा बहुदा वदंति’। पृथिवी सूक्त के अनुसार पृथिवी बहुत-सी भाषाएं बोलने वाले, बहुत से धर्मों को मानने वाले मनुष्यों को एक ही घर के सदस्यों की तरह धारण करती है। ऋषि कहता है- धरती हमारी मां है, मैं उसका पुत्र हूँ। मनुष्य और वनस्पति-मृग-पक्षी-नदी-पर्वत का परस्पर संबंध हमारे पुराने महाकाव्यों और नाटकों में सुव्यक्त है।

गीता के अनुसार एक खंड को ही सबकुछ मान लेना तामसिक ज्ञान है। सबकुछ में सब जगह केवल पृथकता का विचार करना राजसिक ज्ञान है। सात्विक ज्ञान वह है जिससे सबमें एक ही अविनाशी सत्ता का, पृथक में अपृथक का, भिन्नता में अंतर्निहित अभिन्नता का विचार किया जाता है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने 19वीं सदी में इसी सत्य को नई भाषा दी- जतो मत ततो पथ। सभी धर्म एक ही सत्य तक पहुंचने-पहुंचाने वाले रास्ते हैं, बस। शास्त्रों को लेकर क्या झगड़ना? कोई भी एक रास्ता पकड़ कर सत्य तक पहुंचने का प्रयास करो। सर्वधर्म समन्वय का यही विचार लेकर गांधी जी ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। हमारे संविधान में धर्म-संबंधी नियमों का यही आधार बना।

जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा को लोक के विरुद्ध शास्त्र, लघु परंपरा के विरुद्ध महान परंपरा, ग्राम और जनपद के विरुद्ध नगर जैसी कोटियों में रखकर मनमानी व्याख्या करते हैं और उनकी आपसी संवादशीलता की ओर ध्यान नहीं देते तब सारी बहस, सारी खोज नकारात्मक और निरर्थक शोर में खो जाती है।

(2)ब्रिटिश पराधीनता की चोट खाकर 19वीं सदी में भारत में जो नया जागरण आया उसने हमारी भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला और धर्म सभी क्षेत्रों में नई चेतना का संचार किया। युग की आवश्यकता पहचान कर हिंदी लेखकों ने गद्य को प्रमुखता दी और जीवन संग्राम के ‘अस्त्र’ के रूप में इसे गढ़ना और बरतना शुरू किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमधन’ आदि ने अपने पत्रों के द्वारा पुरातत्व, इतिहास, दर्शन, विज्ञान, भूगोल आदि ज्ञान की विविध सामग्री छापनी शुरू की, तमाम भारतीय भाषाओं और विशेषतः बंगाल के समसामयिक साहित्य का अनुवाद करने के अलावा देश-दशा से भी पाठकों को परिचित कराना शुरू किया।

राममोहन राय से लेकर विवेकानंद तक हमारे मनीषियों ने जो आध्यात्मिक-सामाजिक जागरण का शंख फूंका, वह उस युग के निबंधों और नाटकों में प्रतिध्वनित हुआ। इन सभी ने बाल विवाह, बहु विवाह, जात-पांत, ऊंच-नीच, छुआछूत आदि सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य के कोड़े बरसाए। उन्होंने स्वतंत्रता, समानता, एकता और आत्मनिर्भरता के विचारों का प्रचार किया जिसकी पराकाष्ठा भारतेंदु के ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ और बलिया के ददरी मेले वाले भाषण में दिखाई देती है। भारतीय जीवन में साहित्य के माध्यम से निवृत्ति की जगह प्रवृत्ति को, वैराग्य की जगह कर्मयोग और मानव-सेवा, समाज-सेवा को महत्व मिला।

द्विवेदी युग ने इस सिलसिले को और आगे बढ़ाया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ को हिंदी नवजागरण का मुखपत्र बना दिया। ज्ञान विज्ञान, इतिहास-पुरातत्व, देश-विदेश के स्वतंत्रता संग्राम आदि पर नई-नई सामग्री छापने में ‘सरस्वती’ की तुलना किसी पत्र से नहीं की जा सकती। द्विवेदी जी ने ‘संपत्तिशास्त्र’ और पंडित सुंदरलाल ने ‘भारत में अंग्रेजी राज’ लिखकर ब्रिटिश राज की शोषण नीति का विवेचन किया। इस युग के हिंदी लेखकों ने किसानों और मजदूरों को राजनीतिक रूप से शिक्षित, सचेत और संगठित करने पर जोर दिया। साहित्य जीवन और समाज के निकट से निकटतर होता गया। आधुनिक युग की राम और कृष्ण की कथाओं में लौकिकता के तत्व समाते गए। मैथिली शरण गुप्त की कविता ने सर्वधर्म समभाव और देशभक्ति को हिंदी कविता का मुख्य स्वर बना दिया। हिंदी कविता में बुद्ध और गांधी जैसे नायक आ गए।

प्रेमचंद ने कथा साहित्य में किसानों को, अछूतों को और स्त्रियों को केंद्र में ला दिया। ‘कर्बला’ नाटक लिखकर हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत किया। ‘रंगभूमि’ में उन्होंने ईसाई समाज के भीतर से जॉन सेवक जैसे धूर्त और निर्दयी और मिस सोफिया जैसी दयालु युवती के चित्र दिए। उनके कथा साहित्य में रूढ़ियों की सताई हुई स्त्रियां प्रतिरोध के मंच पर उभरकर आईं।

निराला ने ‘नए पत्ते’ की कविताओं में अपने हक की लड़ाई में उभरते हुए किसानों के चित्र देकर राष्ट्रीय शक्ति के सबसे मजबूत आधार की ओर ध्यान खींचा। जयशंकर प्रसाद ने अपने ऐतिहासिक नाटकों के द्वारा जिस राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष किया वह किसी भी तरह की कूपमंडूकता से मुक्त थी। ‘कामायनी’ में वैदिक युग की कथा के माध्यम से उन्होंने पूंजीवादी सभ्यता के संकट की ओर इशारा किया था।

आचार्य शुक्ल ने हैकेल के ‘रिडिल ऑफ द यूनिवर्स’ का ‘विश्वप्रपंच’ नाम से अनुवाद ही नहीं किया, उसकी लंबी भूमिका लिखकर हिंदी में दार्शनिक चिंतन को एक नया परिप्रेक्ष्य दिया। काशी प्रसाद जायसवाल, डॉ.संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्रदेव, रामविलास शर्मा, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, वासुदेव शरण अग्रवाल, रायकृष्ण दास आदि ने भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन किया। राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत से बौद्धधर्म के मूल ग्रंथों का उद्धार करके समूचे विश्व को चमत्कृत कर दिया। राहुल जी, भदंत आनंद को सत्यायन और जगदीश कश्यप ने त्रिपिटक साहित्य को पालि से हिंदी मिलकर ज्ञान के एक नए भंडार से समृद्ध किया।

मुनि जिन विजय ने अपभ्रंश साहित्य को प्रकाश में लाने का भारी उद्योग किया। पुराण-साहित्य की विवेक संवत आलोचना भारतेंदु युग से ही आरंभ हो गई थी जो क्रमशः और विकसित होती गई।

(3)रवींद्रनाथ ने ‘भारत तीर्थ’ नाम की कविता में भारत को महामानव-सागर कहा है। इस सागर में शक, हूण, मुगल, पठान, तुर्क आदि अनेक जातियां आईं और नदियों की तरह इसमें समा गईं। भारत की इस विशेषता को विश्व के सुप्रसिद्ध विचारकों ने लक्ष्य किया है।

प्राचीन काल में भारत के हित्ती मितन्नी सभ्यताओं के साथ संपर्क के चिह्न मिलते हैं। बोगजकुई मेें वैदिक देवताओं के नामोल्लेख वाली सामग्री महत्वपूर्ण है। यूनान से संपर्क खो जाने के बाद भारत ने यूनान-प्रभावित दुनिया पर अपना सांस्कृतिक प्रभाव डाला। आर्कोसिया की यूनानी बस्तियोेंं को ध्यान में रखकर अशोक ने अपनी राजादेश यूनानी में अनूदित कराए और कांबोज बस्तियों के लिए अरमाइक भाषा में। हिंद-यूनानी शासक मिनांडर (मिलिंद) ने नागसेन से बौद्धधर्म की दीक्षा ली। बौद्ध धर्म के बारे में नागसेन से प्रश्नोत्तर शैली में उसकी बातचीत ‘मिलिंदपश्न्हो’ (मिलिंद प्रश्न) नाम से प्रसिद्ध है।

शक शासक रुद्रदामन ने संस्कृत में एक लंबा अभिलेख जारी किया था। भारतीय पंडित यवनों (ग्रीक) को म्लेच्छ कहता था, लेकिन यह मानताथा कि उनके पास ज्योतिष का ज्ञान है, इसलिए वे ॠषियों की तरहपूज्य हैं। वराह मिहिर से पहले ज्योतिष के जो अनेक आचार्य हुए हैं उनमें मय, यवन और गणित्य को यूनानी बताया जाता है। मुसलमान ज्योतिषियों से हिंदू ज्योतिषियों को ताजिकशास्त्र और हमलशास्त्र मिले। छठी शताब्दी में ‘पंचतंत्र’ का अनुवाद पहलवी और सीरियाई भाषाओं में हुआ। हर्तेल नाम के विद्वान ने 50 भाषाओं में उसके 200 से अधिक अनुवादों की सूची दी है। गणित में अंकन-पद्धति, दशमलव पद्धति और शून्य का प्रयोग विश्व को भारत का योगदान है।

भारत का ज्ञान-विज्ञान यूरोप में अरबों की माध्यम से पहुंचा। स्थापत्य और मूर्तिकला का प्रसार भारत से दक्षिण पूर्व एशिया में हुआ, अंकोरबाट और बोरोबुदुर उसके प्रमाण हैं। बौद्ध धर्म लंका, वर्मा, थाईलैंड, कंपूचिया, तिब्बत, पश्चिमोत्तर प्रदेश, चीन, जापान तक पहुंचकर समूचे एशिया को आलोकित करता रहा। चीनी शासकों ने भारत से विद्वानों को आमंत्रित किया। उनके साथ संस्कृत भाषा, बौद्धधर्म, ग्रंथ और बुद्ध की प्रतिमाएं चीन गईं। चीनी यात्री ह्वेनसांग अपने साथ भारत से बौद्धधर्म के विभिन्न संप्रदायों के 593 ग्रंथ ले गए थे। योग के ग्रंथ ‘अमृत कुंड’ का फारसी में अनुवाद हुआ था। भारत में आने से पहले ही सूफियों पर योग का प्रभाव और बौद्ध धर्म-दर्शन का प्रभाव लक्षित किया गया है। भारत में जो दर्शन मध्यकाल में सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ, वह है सूफी रहस्यवाद। सूफी संत फरीदुद्दीन के कुछ छंद ‘आदिग्रंथ’ में भी शामिल किए गए। हिंदी में दाऊद, खुसरो, जायसी आदि की सूफी काव्य-धारा भक्ति काव्य का अभिन्न अंग है।

एक समय पांडित्य की भाषा के रूप में एक नई भाषा प्रतिष्ठित हुई- फारसी। महाभारत, राजतरंगिणी के अलावा आयुर्वेद और संगीत की पुस्तकों का फारसी अनुवाद हुआ। मुस्लिम संपर्क से स्थापत्य, चित्रकला और संगीत में कुछ नई विशिष्टताएं पैदा हुईं। अकबर ने अनेक धर्मों के बीच संवाद की संस्कृति को आगे बढ़ाया। रामायण, महाभारत, अथर्ववेद, गीता, कुरान और बाइबिल का अनुवाद करना शुरू किया। दाराशुकोह ने ‘बज्म-उल-बहरैन’ (समुद्र-संगम) में हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच मेल की परिकल्पना प्रस्तुत की और ‘सिर्रे-अकबर’ नाम से उपनिषद का अनुवाद किया। इसी के लैटिन अनुवाद से यूरोप को उपनिषद का प्रकाश मिला।

आधुनिक युग में पश्चिम में भारत विद्या का और भारत में पश्चिम के विचारों और आंदोलनों का अध्ययन शुरू हो गया। भारत के मानस पर लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मानवतावाद, समानता, समाजवाद आदि विचारों और पाश्चात्य आंदालेनों का व्यापक प्रभाव पड़ा।

हिंदी में राहुल और रामविलास शर्मा ने मार्क्सवाद के आलोक में भारत के समाज, इतिहास, भाषा-साहित्य, दर्शन आदि के अध्ययन-विवेचन को लोकप्रिय बनाया। पश्चिम में भारत के वेदांत, योग और बौद्ध दर्शन का अध्ययन लोकप्रिय हुआ।

भारतीय ज्ञान परंपरा की आदान-प्रदान की इन घटनाओं को समझने की जरूरत है। आज भी ऐसे बुद्धिसंगत और विवेकसंगत विचारों का महत्व कम नहीं है। यह अलग बात है कि भारत में पुनरुत्थानवाद और सांप्रदायिक कट्टरता की चुनौतियां बढ़ी हैं।

एन 1/65ई 52, शिव प्रसाद गुप्त कॉलोनी, सामने घाट, नगवा, वाराणसी-221005 मो.8400925082

सदानंद शाही
वरिष्ठ कवि, आलोचक और लोक साहित्य के विद्वान। ‘साखी’ पत्रिका के संपादक। रैदास के पदों का काव्यांतरण। बनारस हिंंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व-प्रोफेसर और अध्यक्ष।

भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ भारतीय अज्ञान परंपरा पर भी चर्चा हो

(1)भारतीय ज्ञान परंपरा कोई एक परंपरा नहीं हो सकती, यहां ज्ञान की अनेक परंपराएं हैं। दर्शन का सामान्य विद्यार्थी भी भारत के आस्तिक और नास्तिक दर्शनों के बारे में जानता है। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत ये छह दर्शन परंपराएं अपने आप में परंपरा की एकरेखीयता का प्रतिकार करती हैं।

हम जिन्हें आस्तिक दर्शनों की श्रेणी में रखते हैं वे भी दो तरह के हैं। आस्तिक माने जाने वाले सभी छह दर्शन वेदों को मानते हैं पर योग, न्याय, वैशेषिक और वेदांत ईश्वरवादी हैं जबकि सांख्य और मीमांसा निरीश्वरवादी हैं। ये दोनों जगत की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका नहीं मानते। सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष के संयोग से जगत की उत्पत्ति मानता है।

इसी तरह नास्तिक या अवैदिक दर्शन हैं। चार्वाक, बौद्ध और जैन दर्शन निरीश्वरवादी हैं। ये वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार नहीं करते।  सवाल उठता है, जिस देश में जगत की मीमांसा के नौ मान्य तरीके हैं वहां ज्ञान की कोई एक परंपरा कैसे हो सकती है? वैदिक, अवैदिक, ईश्वरवादी और निरीश्वरवादी दर्शनों की अपनी-अपनी ज्ञान परंपराएं हैं।

भारत में भौतिकवादी दर्शन लोकायत उतना ही पुराना है जितना ईश्वर को जगत का मूल मानने वाला आध्यात्मिक दर्शन। मजे की बात यह है कि आचार्य वृहस्पति जो भौतिकवादी लोकायत दर्शन के प्रवर्तक माने जाते हैं वे देवताओं के भी गुरु माने जाते हैं। यह बात इसका पता देती है भारत में ज्ञान की विभिन्न परंपराएं हैं और उनके बीच केवल संघर्ष नहीं हुआ है, बल्कि संघर्ष ने संश्रय का भी एक रास्ता निकाला है। यह संघर्ष और संश्रय ईश्वरवादी-निरीश्वरवादी, वैदिक-अवैदिक, भौतिक-अभौतिक सभी प्रणालियों में है।

कहते हैं कि इस देश से बुद्ध गायब हो गए, लेकिन ध्यान से देखें तो पाएंगे कि वैदिक धर्म ने जिसे हम आज हिंदू या सनातन धर्म मानते हैं उसने बुद्ध की बहुतेरी मूल्यवान बातों को, मानवीय सद्गुणों को आत्मसात किया है। और बातों को छोड़ दें, तो भी बुद्ध की करुणा को पूरी तरह अपनाया गया है।

तीन प्रमुख हिंदू देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में दो करुणा में डूबे हुए हैं। विष्णु करुणानिधि भी हैं करुणानिधान भी। विष्णु के अवतार राम और कृष्ण धरती पर करुणानिधान होकर ही आते हैं। राम की करुणा ऐसी है कि वे मंथरा और कैकेयी को क्षमा करने में जरा भी वक्त नहीं लगाते। शिव कर्पूरगौरं ही नही करुणावतारं भी हैं। बहुत संभव है कि यह करुणा बुद्ध के यहां से आई हो!

धर्म की सनातनता की ओर पहली बार बुद्ध ने ही ध्यान आकृष्ट किया-

नहिं वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचन/अवेरेन हि सम्मन्ती एष धम्मों सनंतनों।

वैर से वैर नहीं खत्म होता, अवैर यानी मैत्री से वैर खत्म होता है, यही सनातन धर्म है। धर्म के लिए ‘सनातन’ विशेषण पहली बार बुद्ध प्रयुक्त करते हैं। तो भारत की विभिन्न परंपराएं आपस में संवाद करती रही हैं। यह संवादधर्मिता भारतीय परंपरा की प्राणधारा है।

भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन की सबसे बड़ी समस्या- परंपरा के प्रति संकीर्ण नजरिया है। भारतीय ज्ञान परंपरा पर विचार करते हुए मुझे बराबर ख्याल आता है कि ज्ञान के साथ-साथ अज्ञान की भी परंपरा या परंपराएं रही होंगी। मुझे ऐसा लगता है कि अज्ञान की परंपरा को समझे बिना ज्ञान की परंपरा को ठीक से नहीं समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए शल्य क्रिया संबंधी ज्ञान को ही लें। इस क्षेत्र में भारत ने बहुत उन्नति की थी। इस उन्नति का श्रेय आचार्य सुश्रुत को है। सुश्रुत (जिन्हें शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है) ने प्राचीन भारत में शवों (मृत शरीरों) पर विच्छेदन और शल्यक्रिया के अभ्यास को बढ़ावा दिया। यह उस समय की संस्कृति में एक क्रांतिकारी कदम था। इसका विरोध हुआ। विरोध के मुख्य रूप सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक थे। यह जानना जरूरी है कि आचार्य सुश्रुत शल्य क्रिया के अध्ययन के लिए जब शव की परीक्षा करते थे तब उन्हें  बाधा पहुंचाने वाले कौन लोग थे। सुश्रुत भारत की ज्ञान परंपरा में कुछ जोड़ रहे थे या अज्ञान परंपरा का संवहन कर रहे थे? ऐसे द्वैत हर जगह मिल जाएंगे। मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि जब हम भारत की ज्ञान परंपरा की बात करें तो अज्ञान की परंपरा पर भी बात करें।

(2)नवजागरण काल में एक और समुद्र मंथन हुआ। विचार जब कर्मकांड में बदल जाते हैं, वे समाज की गति को अवरुद्ध कर देते हैं। नवजागरण ने वैचारिक समुद्र मंथन से ऐसी ही जड़ताओं को तोड़कर ताजगी की हवा बहाई। ताजा हवा के ऐसे झोंके पहले भी आते रहे हैं।

भारत में ज्ञान के संदर्भ में लोक और शास्त्र के बीच आवाजाही की परंपरा है। नाट्यशास्त्र इसका सबसे सटीक उदाहरण है। भरतमुनि जब नाट्य शास्त्र तैयार कर रहे थे, उन्होंने घूम-घूम कर लोक में परिमार्जन के लिए श्रमपूर्वक होने वाले नाटकों को देखा, उनका अध्ययन किया और नाट्यशास्त्र के सूत्र विकसित किए। लोक और शास्त्र की आवाजाही का यह एक आरंभिक प्रमाण है।

परंपरा, चाहे वह ज्ञान की ही क्यों न हो, वह एकरेखीय या एकवचनात्मक नहीं हो सकती। वह हर हाल में बहुवचनात्मक होती है। हिंदी साहित्य के संदर्भ में ज्ञान परंपरा की बात करते हुए यह बात और साफ समझ में आती है। हम जिसे हिंदी साहित्य कहते हैं, उसका विकास ही उन भाषाओं में हुआ है जिन्हें लोक भाषा कहा गया है। शास्त्र और शास्त्रवादियों ने इन लोक भाषाओं को हेय दृष्टि से देखा। वे इन्हें हीन समझते रहे। केशवदास ने जब यह कहा- ‘भाखा बोल न जानहीं, जिनके कुल के दास/तिन भाषा कविता करी, जड़मति केशवदास’। केशव परंपरा में लोक भाषा के प्रति मौजूद हेय दृष्टि का पता देते हैं। इस दृष्टि के बावज़ूद लोक भाषाओं को नीची निगाह से देखने की परंपरा को लोक ने ध्वस्त किया।

हजार से ज्यादा साल हो गए, हिंदी साहित्य लोकभाषा कहिए या जनभाषा, उसी में लिखा जा रहा है। हिंदी साहित्य ने इस मामले में यह क्रांतिकारी काम किया कि उसने भाषाई आभिजात्य को ध्वस्त कर दिया। गोरखनाथ के साथ शुरू हुई हिंदी कविता में यह पहल दिखाई पड़ती है। यद्यपि गोरखनाथ संस्कृत के प्रकांड पंडित थे, लेकिन उन्होंने कविता उसी भाखा में लिखी जिसमें लिखते हुए केशव दास शर्मसार हो रहे थे।

एक बार गोरखनाथ ने कविता के लिए भाखा का जो रास्ता खोला, वही कविता का राजमार्ग बन गया। हिंदी प्रदेश में पिछले हजार वर्षों में जो मौलिक सृजन हुआ वह इन्हीं लोक भाषाओं के माध्यम से हुआ। कबीरदास जिसे ज्ञान की आंधी कहते हैं, वह लोक भाषाओं में ही संभव हुई। भक्तिकाल के कवियों ने सामाजिक बदलाव की जो चेतना पैदा की, जो आधारशिला रखी, सामाजिक जड़ता पर जो चोट की वह सब लोक भाषा में संभव हुआ।

आधुनिक हिंदी साहित्य ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्नीसवीं शताब्दी में स्वाधीन चेतना के विकास में हिंदी गद्य ने विशेष भूमिका निभाई। खास तौर से स्वाधीनता आंदोलन के दौर में आधुनिक हिंदी कविता और हिंदी गद्य की जुगलबंदी ने ‘स्वत्व निज भारत गहै’ के वातावरण की रचना की। प्रेमचंद जैसे लेखक ने जीवन के साधारण से लेकर अत्यंत गहन अनुभवों की ऐसी दुनिया रची जिसमें ‘गुल्ली-डंडा’ खेल में गुल्ली के विविध प्रकारों से लेकर ‘दो बैलों की कथा’ में पशुलोक के अनुभवों का साक्षात्कार होता है। इसके समानांतर छायावाद और प्रगतिशील परंपरा ने स्वाधीन चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(3)विश्व की अन्य सभ्यताओं और दर्शनों से तुलना का यहां न अवकाश है और न ही मैं स्वयं को इसके लिए सक्षम पाता हूँ। लेकिन ‘लाइट आफ एशिया’ के लेखक एडविन आर्नोल्ड के हवाले से एक बात दर्ज करना चाहता हूँ। अकेले बुद्ध धर्म ने अपनी परवर्ती दुनिया के सभी धर्मों को प्रभावित किया है। आर्नोल्ड यहां तक कहते हैं कि ईसाइयत में गिरिजाघर के विचार के मूल में बुद्ध विहारों की उपस्थिति है। दुनिया के भौतिकवादी दर्शनों के पीछे प्रतीत्यसमुत्पाद की उपस्थिति महसूस कर सकते हैं। इकबाल याद आ रहे हैं, ‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा सब मिट गये जहां से/अब तक मगर है बाकी नाम- ओ- निशां हमारा’। ऐसा इसलिए है कि भारत समय- समय पर वैचारिक समुद्र मंथन करता रहता है। वह रूढ़ियों और जड़ताओं के चंगुल से निकलता रहा है।

साखी, एच 1/2 वी.डी.ए. फ्लैट, नरिया, बी.एच.यू. वाराणसी-221005 मो. 9450091420

अच्युतानंद मिश्र
चर्चित युवा कवि तथा लेखक। अद्यतन कविता संग्रह ‘चिड़िया की आंख भर रौशनी में’ और लेखों का संग्रह ‘बाजार के अरण्य में’।

ज्ञान कभी किसी राष्ट्र, भाषा और संस्कृति का उपनिवेश नहीं होता

(1)जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा कहते हैं, सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ज्ञान परंपरा में भारत या भारतीयता क्या है। भारतीय ज्ञान परंपरा का संबंध भारतीयता की अवधारणा से है जो दो-ढाई हजार वर्षों के भारतीय इतिहास में गतिशील रही है। जाहिर-सी बात है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को अतीत में खोजने की इस कोशिश का संबंध जहां एक तरफ वर्तमान भारत से है, वहीं दूसरी ओर भारत की निर्मिति और उसके अंतर्विरोधों से भी है। जब हम अंतर्विरोधों को दरकिनार कर भारतीय ज्ञान परंपरा की स्थायी और काल-निरपेक्ष अवधारणा निर्मित करते हैं तो भारतीय जीवन और समाज से यह परंपरा अलग-थलग पड़ने लगती है।

भारतीय ज्ञान परंपरा पर बात करते हुए भारत या भारतीयता के वर्तमान और ऐतिहासिकता पर बात करना जरूरी है। इस संदर्भ में अगर हम देखें तो भारत का एक वह दौर दिखाई देता है जो आर्यों के आगमन से पूर्व शैव परंपरा से जुड़ा है, दूसरी तरफ आर्यों के आगमन के पश्चात भारतीय समाज के नए अंतर्विरोध दिखाई देते हैं। आर्य-द्रविड़ परंपराओं में जहां एक तरफ तीखा अंतर्विरोध दिखाई देता है, वहीं दोनों के समन्वय की एक साझा कोशिश भी है।

वेदों के लिखे जाने और उनकी व्याख्याओं को संदर्भित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा की श्रेष्ठता और महत्ता की बात अक्सर कही जाती है लेकिन वेदों के सामाजिक प्रभाव और सामाजिक विभाजन में उनकी भूमिका को महत्व नहीं दिया जाता। आज जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा पर बात करते हैं तो हमें न सिर्फ वेदों के सामाजिक प्रभाव पर बात करनी चाहिए बल्कि उनसे संबद्ध ब्राह्मणवाद पर भी बात करनी चाहिए। हमें यह कठिन प्रश्न पूछना चाहिए कि आखिर वेदों में मौजूद ज्ञान का एक रास्ता ब्राह्मणवाद की तरफ क्यों गया?

भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़ियों का, आडंबरों का, कर्मकांड और सामाजिक स्तरीकरण का वेदों से क्या संबंध है। वेदों में व्याप्त ज्ञान का ‘ताकत’ और उत्तरोत्तर सामाजिक ‘सत्ता’ में रूपांतरण क्योंकर हुआ? सामाजिक उत्पीड़न के नए रूपों को विकसित करने में वेदों की क्या भूमिका है? ‘ब्राह्मण शतपथ’ और ‘मनुस्मृति’ का भारतीय ज्ञान परंपरा से क्या संबंध है? वे वेदों से क्या संबंध रखते है? उत्तरवैदिक काल के सामाजिक पतन और बढ़ते वर्चस्व को भारतीय परंपरा में किस तरह देखा जाना चाहिए?

उत्तर वैदिक युग की सामाजिक परिस्थितियों के फलस्वरूप गैरवैदिक परंपराओं का आगमन हुआ- अर्थात बौद्ध, जैन और उन भौतिकवादी परंपराओं का जो अपने मूल स्वरूप में इहलौकिकता को ही स्वीकार करती थीं। उनका आना व्यापक अर्थ में वैदिक परंपरा की सीमाओं को और उससे उत्पन्न  उन सामाजिक अंतर्विरोधों को दिखाती है जिनसे भारतीय ज्ञान परंपरा का अविच्छिन्न संबंध है।

लब्बोलुबाब यह कि भारतीय ज्ञान परंपरा का सही अर्थ उन परंपराओं में नहीं बल्कि परंपराओं की टकराहट और उस टकराहट से उत्पन्न चेतना में मौजूद है। वैदिक और अवैदिक परंपराओं का अंतर्संघर्ष भारतीय समाज का एक निर्णायक पक्ष रहा है। इस संघर्ष की क्रमिकता को हम तकरीबन ढाई-तीन हजार वर्षों के भारतीय इतिहास में देख सकते हैं।

इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा वस्तुतः इन परंपराओं के आपसी टकराहट और टकराहट से उत्पन्न जीवन दृष्टि में व्याप्त है। इसलिए यह कोई एक परंपरा नहीं बल्कि ढाई हजार वर्षों में भारतीय मनुष्य की व्यापक समझ और समाज की उपस्थिति का अन्यतम दस्तावेज है। भारतीय ज्ञान परंपरा दरअसल उसी दस्तावेज का समय-सापेक्ष पाठ है। वह किसी विशेष समय या दृष्टि तक महदूद नहीं है, बल्कि समग्र भारतीय चेतना तक प्रसारित है। इसलिए वह बहुलतावादी है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अक्सर वर्चस्व को एकता का नाम दे दिया जाता है। बार-बार उसे एकायामी बनाने की कोशिश होती है, होती रही है। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा इस तरह की संकीर्णताओं से संघर्ष करके ही आगे बढ़ी है। कहना न होगा कि यह संघर्ष उस परंपरा का अनिवार्य और जीवित पक्ष है। आज हमारे लिए यह संघर्ष और इस संघर्ष की वर्तमान प्रासंगिकता ही भारतीय ज्ञान परंपरा है।

(2)किसी भी देश के साहित्य में उस देश की भाषा और समाज की विभिन्न अंतरधाराएं मौजूद रहती हैं। साहित्य सिर्फ वहीं तक महदूद नहीं रहता। उसमें वैश्विकता की चेतना और समस्त मनुष्य के कल्याण की भावना भी मौजूद रहती है। वह समय और समाज विशेष को इंगित होता है और वह उसके पार जाकर भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है। उपर्युक्त प्रश्न में जितने साहित्यिक आंदोलनों का जिक्र किया गया है, सबमें भारतीयता और वैश्विकता की धाराएं देखी जा सकती हैं इसलिए सिर्फ भारतीयता की खोज करना या भारतीय परंपरा को ही महत्व देना उसे संकुचित करना है। यदा-कदा इन साहित्यिक धारणाओं पर बात करते हुए हम एकांगी हो जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर अगर भारतीय नवजागरण को लें तो उसमें मौजूद भारतीयता को राष्ट्रवाद से जोड़ने की अतिरिक्त कोशिश दिखाई देती है। हम उसके संदर्भ में अक्सर भारतीय आधुनिकता या समानांतर आधुनिकता की बात करते हैं। इसके मूल में उद्देश्य यह है कि यूरोपीय आधुनिकता से भिन्न कोई दूसरी आधुनिकता है जो भारतीय नवजागरण में दिखाई देती है। लेकिन दिलचस्प है कि इस विशिष्ट भारतीय आधुनिकता के विकासक्रम का मॉडल वही है जो यूरोपीय आधुनिकता का है। वहां पुनर्जागरण, नवजागरण और उसके पश्चात आधुनिकता है। हमारे यहां भी वही है लोक जागरण, नवजागरण और आधुनिकता।

मनुष्य और समाज एक साथ स्थानिकता और सार्वभौमिकता दोनों स्थितियों से गुजरता है। दोनों को विभाजित कर हम किसी विषय में कोई संकीर्ण और अपूर्ण धारणा ही बनाएंगे।

(3) ज्ञान परंपराओं को जब हम राष्ट्र विशेष के संदर्भ में देखने पर बल देते हैं तो हम उसकी भूमिका को सीमित कर रहे होते हैं।

इधर हिंदी में भारतीय ज्ञान बनाम यूरोपीय ज्ञान की बात अक्सर सुनाई देती है। यदा-कदा लोग यह कहते हुए नजर आते हैं कि हमें भारतीय समाज और संस्कृति के संदर्भ में विचार करना चाहिए।

भारतीय समाज और संस्कृति की ध्वनि ऐसे सुनाई पड़ती है गोया वह कोई मानवरहित टापू हो। कोई भी सभ्यता या संस्कृति, परस्परता और सामूहिकता में ही अर्थ पाती है।

ज्ञान का अर्थ, उसकी स्थानिकता में नहीं, अपितु उसकी सार्वभौमिकता में है। ज्ञान को तर्क से पाया जा सकता है, यह आत्मसंघर्ष और आत्म आलोचना से पाया जा सकता है। यह समाज संस्कृति के सापेक्षिक अध्ययन से पाया जा सकता है।

हालांकि हमारे यहां ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम्’ की भी परंपरा रही है। यह भारतीय संस्कृति का एक ऐसा चित्र खींचती है कि यह संस्कृति अद्वितीय अपूर्व और आलोचना से परे है। इसलिए लोग नतमाथ होकर उसे स्वीकार कर लें। यह पुनरुत्थानवादी दृष्टिकोण इधर बढ़ा है।

बात-बात पर भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले इसी दृष्टि से अपनी ऊर्जा पाते हैं।

अगर पीछे मुड़कर भारतीय नवजागरण की तरफ देखें तो हम पाएंगे कि हमारे आलोचकों, साहित्यकारों चिंतकों ने ऐसा नहीं किया। भारतेंदु ऐसा नहीं कर रहे थे। रामचंद्र शुक्ल, निराला, प्रेमचंद, रामविलास शर्मा ऐसा नहीं कर रहे थे।

रामचंद्र शुक्ल के इतिहास की पूरी अवधारणा ही पश्चिम से ली गई है। आदि काल, मध्य काल और आधुनिक काल (एंसिएंट, मेडिवल, मॉडर्न) तो पश्चिम से लिया गया दृष्टिकोण ही है। हमारे यहां इतिहास के क्रमिक दृष्टिकोण की बात केंद्र में कभी नहीं रही। रामविलास शर्मा के यहां भी क्रमिक दृष्टिकोण हम देखते हैं। शुक्ल जी ने पश्चिम की आलोचना को कितना डूबकर पढ़ा था और अपने चिंतन में विन्यस्त किया था, यह उनके निबंधों को पढ़कर स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। प्रेमचंद ने रूसी उपन्यासकारों सहित पर्लबक के उपन्यास का भी अनुवाद किया था। कहना न होगा कि यह सिलसिला पिछली सदी के अंतिम दशकों तक जारी रहा। उसका निषेध आलोचना में भी नहीं दिखता। लेकिन आज यह गतिरोध दिखाई देता है।

हमारे नवजागरण के चिंतकों ने नीर-क्षीर विवेक के साथ पश्चिमी चिंतन और ज्ञानकांड को पढ़ा था और आत्मसात किया था। वे भारतीय ज्ञानकांड की सीमाओं को भी देखने का साहस कर रहे थे। लेकिन इधर के वर्षों में एक तरह के रेजीमेंटेशन का स्वर कई बार सुनाई देता है। कहा जाता है कि फूको और देरिदा को पढ़ने के बजाय भारतीय ज्ञान परंपरा को ही पढ़ा जाए। फर्ज कीजिए रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य लिखते हुए काल सापेक्ष इतिहास के दृष्टिकोण का विकास न किया होता, क्रोचे की जगह वेदों से ही सौंदर्यशास्त्र के निर्माण का प्रयत्न किया गया होता तो आज क्या स्थिति होती।

वे लोग तमाम सीमाओं के बावजूद औद्योगिक क्रांति वाले यूरोप और फ्रेंच क्रांति वाले यूरोप में फर्क करते थे।

ज्ञान कहीं का भी हो, विस्तार में ही उसकी अर्थवत्ता मुखर होती है। वह किसी एक देश या भाषा की जागीर नहीं है। वह हमेशा अधिक मुक्त एवं स्वतंत्र चेतना के निर्माण की दिशा में बढ़ता है। अगर ऐसा नहीं है तो वह ज्ञान ही नहीं है। ज्ञान पर कभी किसी भाषा या जाति का कॉपीराइट नहीं होता।

हम न्यूटन, आइंस्टीन, डी-ब्रोगली और  हाइजेनबर्ग के सिद्धांतों का भारतीयकरण कैसे करेंगे? अब्दुस सलाम और फेनमैन का क्या करेंगे! क्या सईद को छोड़ देना चाहिए। प्राच्यवाद (ओरिएंटलिज्म) के तो मूल में फूको के ज्ञान ताकत (पावर नॉलेज) की अवधारणा है। इसे उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है। इसलिए आलोचनात्मक विवेक के साथ ज्ञान पर विचार करना चाहिए। ज्ञान परंपराओं को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उसे राष्ट्र, भाषा और संस्कृति के उपनिवेश के तौर पर देखना उसकी भूमिका को सीमित करना होगा।

हिंदी विभाग, श्री शंकराचार्य संस्कृत यूनिवर्सिटी, कलाडी-683574, जिला : अर्नाकुलम, केरल  मो.9213166256

संपर्क प्रस्तुतिकर्ता :​ भारतीय भाषा परिषद, 36ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता-700017 मो.9748891717