कवि और संस्कृतिकर्मी। पेशे से अध्यापक।

एकदम खाली हो चुके गिलास को
मेज पर अतिरिक्त एहतियात से रखते हुए
बार-बार सोच रहा हूँ मैं
कि क्या कर्जे का बोझ
दुख के बोझ से बड़ा होता है

मरूंगा तो
नहीं चुका पाए कर्जों का बोझ
साथ-साथ जाएगा
इतने भारी बोझ के साथ
श्मशान घाट तक पहुंचने की यात्रा
क्या यातनाओं से भरी नहीं होगी

क्या मरी हुई देह से निकलती आत्मा
इतनी बेशर्मी सहन कर पाएगी

बेचैनी और पसीने से लथपथ
सोच रहा हूँ दिन-रात
क्या नहीं ही चुका पाऊंगा मैं?

कोशिशें कितनी की
कहां कहां नहीं भागा दौड़ा
मगर कोशिशें चींटी थीं और कर्जे पहाड़
या वो नाव, जो समुंदर में जब पहुंची
तब तक वो घिर चुकी थी तूफानों से
हालांकि जिन्होंने दिए थे कर्जे
वे बार-बार सामने आते रहे
भले और उदार थे वे
जिक्र तक नहीं किया उन्होंने कभी
उनका देखना ही बस
खुद को बार बार कठघरे में खड़े करने जैसा लगा

जन्म लेते हुए कभी न सोचा
कि, क्या इस तरह बीतेगी जिंदगी और मौत!

रात के दो बज रहे हैं
चांद की रोशनी बेदम है
बुखार से तपतपाया सन्नाटा
पी रहा है पूरी देह को धीरे-धीरे
लाचारी शोर नहीं कर रही है
बह रही है नदी-सी चुपचाप भीतर
आसमान से झांक रहा है एलबम चित्रों भरा
कई चेहरे
और पेड़ फूल पर्वत चिड़ियां धरती और शब्द भी

आसमान लाल होता जा रहा है सुर्ख लाल
रात कुर्सी छोड़कर/बिस्तर पर जा रही है थके कदमों से
सब कुछ यथावत घटते जा रहा है
लेकिन इस विशाल ब्रह्मांड में
कहीं कुछ ऐसा है बहुत सूक्ष्म सा
जो अघटित रह जा रहा है
हमेशा की तरह नहीं

‘कर्जे उतारना जरूरी है बहुत जरूरी
मरकर भी’ बोलते हुए
याद आ रही है धरती
उसके विराट कंधों पर टिका पूरा संसार
और…. और…. बहुत कुछ
अघटित में
कर्जे का बोझ दुखों के बोझ से हमेशा बड़ा होता है शायद…।

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