अंजन कुमार

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं एवं समीक्षाएं प्रकाशित। शिक्षण से जुड़े।

 

1-स्वप्न और यथार्थ के बीच

कुत्तों के रूदन में

गहरी हो चुकी रात

गूंज रही है सूखे पत्तों पर

 

चांद

अटका हुआ है पेड़ की शाख पर

किसी उदास गेंद की तरह

और तारे धुंध में कहीं

दूर निकल गए हैं भटककर

 

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच

चुक गए समय की सर्द रात है

जहाँ सारे जरूरी मूल्य

पेड़ पर चमगादड़ की तरह

उल्टे लटके चीख रहे हैं

और सारा शहर

चादर से बाहर निकाले पांव

एक कभी न खत्म होने वाले

स्वप्न में डूबा हुआ है

 

एक ऐसा रहस्यमय स्वप्न

जो जितना विराट है

उतना ही जटिल भी

जो जितना सुंदर है

उतना ही भयावह भी

नहीं है तो सिर्फ

तर्क करने की जगह

संदेह करने की वजह

आश्चर्य है कि इसमें नहीं है

कोई विराम चिह्न भी

जहाँ थोड़ी देर ठहरकर

यह देखा जा सके

कि घंटे को पकड़ने के चक्कर में

मिनट के कांटे से गिरकर

सेकंड के हाथों

कैसे मारे जा रहे हैं

हम लगातार

 

घड़ी हाथ में बंधी है

या हाथ बंधा है घड़ी से

कि सारे जरूरी प्रश्न

छूटते जा रहें हैं यक-ब-यक

समय के अभाव में

हर चेहरा होता जा रहा है विद्रूप

दिन-ब-दिन एक भाव के अभाव में

 

मनुष्यता जैसे कोई पिछले जमाने की

बात हो गई हो

और अपराधबोध

दिल की कोई पुरानी बीमारी

यथार्थ से कोसों दूर

एक स्वप्न में डूबा यह शहर

बिल्कुल उस चिड़िया की तरह है

जिसे दाना तो दिखाई देता है

पर अफसोस है जाल नहीं

 

जो एक रात भटककर

जा पहुंचती है किसी कमरे में

ढूंढते हुए एक सुरक्षित कोना

और अगले दिन मिलती है मरी हुई

 

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच

चुक गए समय की सर्द रात है

जहाँ रात के ब्लैकबोर्ड पर

खींचते हुए आड़ी-तिरछी लकीरें

उस नदी से बेखबर हैं सभी

जो खतरे की निशान से

ऊपर बह रही है।

 

 

 

2- नाटकबाज

कोई भी नाटक

बहुत देर तक नहीं चलता

पर्दा गिर ही जाता है

एक समय के बाद

 

तमाम बने-बनाए जुमले

जब तालियों में पिट जाते हैं

तब नाटकबाज

अपनी सत्ता बचाने के लिए

बुनता है नए जुमले

मन ही मन

मकड़ी के जालों की तरह

 

नाटकबाज

मदारी तो होता नहीं

लेकिन मदारी की तरह

बजाता रहता है सिर्फ

शब्दों की डुगडुगी

 

क्योंकि नाटकबाज जानता है

बंदरों के बिना

उसका गुजारा नहीं।

 

3- वे हमें

वे हमें

ले जाएंगे वापस

उन्हीं अंधेरों में

जिनसे लड़कर

हम यहाँ तक पहुँचे थे

इतनी सदियों में।

 

4-जन

हर कविता

जन के लिए नहीं होती

जैसे नहीं होता हर कवि

जन के लिए

लेकिन

जन के बिना

अधूरी होती है हर कविता

 

मि़त्रो!

मैं लिखना चाहता हूँ सचमुच

एक अधूरी कविता

अधूरेपन की बैचनी से भरी हुई

इतनी बैचेन

कि उसके बैचेन शब्द

निकल भागें

छोड़कर किताबों के पन्ने

और चली जाएं कहीं

शहर, नगर, महानगर,

गली, कस्बे, चौक, चौराहे,

खेत, खलिहान, जंगल, मैदान

या फिर मिल, मकान कहीं भी

जहाँ

मिल सके उन्हें

उनकी तरह के बैचेन जन

और उन्हें पाकर

एक अधूरी कविता

पूरी हो सके जन की

जन के संघर्ष की।

 

5- मसखरे

मसखरों का

कोई इतिहास नहीं होता

लेकिन हर इतिहास में होते हैं मसखरें

राजा, रानी, मंत्री

हर किसी को

हँसाते, गुदगुदाते, खुश रखते मसखरे

 

मसखरों की मसखरी ही

उनका रोजगार है

उनका दाना-पानी

उसी के सहारे बने रहते हैं

हर दरबार में

यहाँ तक कि अंतःपुरों में भी

कब, किसे, कैसे खुश रखना है

यह अच्छे से जानते हैं मसखरें

 

अपनी स्वार्थ-सिद्धि में लीन

आत्ममुग्ध मसखरे

सामाजिक सरोकारों से परे

केवल मसखरे होते हैं

न वे गंभीर होते हैं किसी के लिए

न कोई गंभीरता से लेता है उन्हें

 

नए-नए किस्से

नए-नए जुमले

नए-नए झूठ

ही इनकी संपत्ति

या यूँ कहे कला होती है

 

ऐसे मसखरों से

भरा पड़ा है इतिहास

मगर इतिहास कभी भी

मसखरों का रहा नहीं।

 

6-आम

मैं धूप में जलना नहीं

बल्कि पकना चाहता हूँ

आम की तरह

आम की तरह

अपने कच्चेपन की खटास को

बदलना चाहता हूँ

मिठास में

और दूर तक

महकना चाहता हूँ

आम की तरह

पर बिकना नहीं चाहता

बाजार में आम की तरह

आम लोगों की पहुँच से बाहर

बल्कि चाहता हूँ

कि पक कर गिरने से पहले ही

मुझे तोड़ लें आकर बच्चे

और

मैं उनकी जीभ पर

स्वाद की तरह रहूँ

उनके आम हो जाने तक।

 

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