चर्चित लेखिका। अद्यतन कहानी संग्रह ‘गुलमोहर ग़र तुम्हारा नाम होता’। अन्य कृतियां ‘फिरोजी आंधियां’, ‘विष सुंदरी उर्फ सूरज बाई का तमाशा’, ‘कामनाओं के नशेमन’ (उपन्यास); ‘नीले पंखों वाली लड़कियां’, ‘नरगिस फिर नहीं आएगी’, ‘सुनैना…सुनो ना!’ (कहानी-संग्रह); ‘मौसम भर याद’, ‘चांद-ब-चांद’ (कविता-संग्रह)।

‘अम्मी, मैं शादी करना चाहती हूँ‘

‘क्या कहा, शादी…?’ अलमारी में कपड़े संभालती अम्मी ने चौंकते हुए उसे मुड़ कर देखा, फिर उसी के पास सोफे पर बैठ गईं और उसे घूरती हुई बोलीं-

‘इत्ते दिनों से पढ़ाई के लिए ज़िद किए थी। लड़कों को डांट-डपटकर तुम्हारा दाखिला करवाया। …अभी एक ज़ख्म भरा नहीं है और दूसरे का इंतजाम कर रही हो!’

‘मेरा ज़ख्म भर चुका है अम्मी।’

‘अगर ऐसा है तो अच्छी बात है। खुदा का शुक्र है, अब हमलोग कोई मार्के का लड़का तलाशेंगे। मगर यहां तो एक दाग़ है तलाकशुदा होने का। अब दोहले तेहले ही मिलेंगे कुंवारे तो बिलकुल नहीं’ यह कहकर अम्मी ने एक गहरी सांस खींची।

‘अगर कुंवारा ही मिल जाए तो…?’

‘बहुत मुश्किल है बेटी, बल्कि नामुमकिन है। लौंडे वालों के दिमाग बड़े उरूज़ पर होते हैं। क्या कमी थी तुझमें कि धक्के मार कर निकाल दिया गया था। सिरफ इतनी-सी बात कि वह कहीं और लग-फंस गया। तेरा क्या कसूर था?’

‘उफ! उन सब बातों को भूल जाइए। मैं भी भूल चुकी हूँ। कहा न- ज़ख्म भर चुका है।’

‘ठीक है, मैं लड़कों से बात करती हूँ। देखें कोई लड़का…’ -कहती हुई वह उठने को हुईं कि केसर की अगली खबर ने उन्हें चौंका दिया-

‘उसकी फिक्र न करें, मैंने तलाश लिया है। सिर्फ तुम्हारी मर्जी चाहिए।’

‘क्या मतलब… कहां देखा है, कौन है वह, उसकी जात-बिरादरी मालूम है?’ -अम्मी दोबारा बैठ गईं।

वह दिल को काबू करते हुए बोली- ‘उसका कौशल नाम है अम्मी… ग़ैर-मुस्लिम है और हमारे कॉलेज का प्रोफेसर है…कलकत्ते का है।’

‘कैसर जहां, होश में आओ… जानती हो यह क्या कह रही हो!’

‘मैं होश में आ चुकी हूँ अम्मी। पहले ज़रूर होश में नहीं थी’ -अम्मी झटके से उठीं, पर लहराती हुई गिरने लगीं कि कैसर ने थाम लिया। मगर अम्मी ने हाथ झटक दिया- ‘मत छूना मुझे, नाज़िश हो गई है तू…’

वह चुपचाप उठी और अपने कमरे में चली गईं।

शाम का वक्त था। तीन दिन बाद आज कैसर जहां अम्मी के सामने थी। अम्मी ने उसके लिए कॉलेज ले जाने के लिए कुछ मिठाइयां बनाई थीं। डब्बे में भरकर लाई थीं। कमरे में रखकर जाने लगीं तो कैसर ने पुकार लिया- ‘अम्मी…’

‘बात मत कर मुझसे। तू इतना गिर गई है कि अपने टीचर का भी लिहाज़ नहीं किया। उस्ताद और शगिर्द के बीच मां-बाप और औलाद का रिश्ता होता है।’

‘ये जमाना कुछ और है अम्मी। आप लोगों ने पहले भी मुझे किसी के गले बांधा था। उसने मेरे साथ क्या किया? उसे मैं नहीं, मेरे नाम पर नोट चाहिए थे। देते रहते आपलोग। …क्यूं मुझे छुड़ा लिया। उसने कौन-सी खुशी मुझको दी सिवाए जलालत के?’

‘कुछ भी हो… एक जुआरी, शराबी, बदचलन, मुस्लिम अदमी, एक शरीफ, परहेजगार, कमासुद ग़ैर-मुस्लिम से लाख गुना ज्यादह बेहतर है।’

कैसर चीख़ पड़ी- ‘ये आपका फलसफा है मेरा नहीं। आपका मतलब है मैं एक शरीफ, पढ़े-लिखे, इज्जतदार इंसान को छोड़ कर एक शराबी रिक्शे वाले से शादी कर लूं!’

‘मैं नहीं जानती, जब तेरे भाइयों को पता चलेगा तब कायदे से लेंगे तेरी खबर…। वे लोग तो मना कर ही रहे थे, हमने ही नाहक जबरदस्ती तेरा दाखिला करवाया। अब वे सारे मुझे ही तो कहेंगे!’ -अम्मी की इस मलामत पर वह जैसे भीतर तक चटख गई। आंखें बरबस भींग गईं। चुपचाप टीवी पर आंखें जमा दीं।

दो दिन बाद वह हॉस्टल वापस लौट गई, मगर अम्मी को शॉक लग चुका था। ख्वाबों में वह शौहर का चेहरा तलाशतीं और घंटों बतियातीं- ‘मैं क्या करती मुन्नन के अब्बा, मैंने सोचा कि नहीं पढ़ाऊंगी उसे तो वह दिल पर ले लेगी। सोचेगी बाप नहीं है तो… मैं क्या जानती थी कि वह…’

फिर उनकी कैफियत अक्सर ऐसी ही रहने लगी। अंदर-अंदर घुटती रहतीं। बहुओं से किस मुंह से कहतीं। बात का बतंगड़ बन जाता। खानदान भर में शोर मचातीं सो अलग। बेटों से कहें तो फौरन कैसर की पढ़ाई पर ही आई-गई हो जाए। इसलिए भीतर-भीतर घुटती रहतीं और घुटते-घुटते कुछ ही महीनों में सूख कर कांटा हो गईं। आखिर बहुओं ने बेटों को बुलवा लिया। बेटे अम्मी की बीमारी की खबर सुनकर फौरन घर आ पहुंचे। आए तो अम्मी की हालत बेहद संगीन पाया। तय किया गया कि घर की अंतिम शादी भी लगे हाथ निबटा दी जाए, अम्मा की आंखों के सामने ही। कैसर जहां को फोन पर फौरन घर लौट आने की ताक़ीद कर दी गई।

कैसर जहां का तअल्लुक कानपुर के एक बड़े सम्मानित घराने से था। इस घराने को पूरे शहर के लोग बड़े सम्मान व एहतराम से देखते थे। सूफी घराने के नाम से ख्यातिलब्ध ये घराना अपने आप में मिसाल था। शहर के मुस्लिम घरानों से संबंधित तमाम मसाइल यहीं लाए जाते थे। जब सूफी साहब जीवित थे। किन्हीं-किन्हीं अहम मौकों पर यहां से फतवे तक निकाल दिए जाते थे। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य भी थे वह। इसलिए कानपुर सहित उत्तर प्रदेश के अधिकतर मुस्लिम इलाकों में उनका दबदबा था। किंतु जब से सूफी साहब का इंतकाल हुआ, वह ख्याति स्वतः गायब हो गई। बाहरी इलाकों में ये परिवार शक्तिहीन हो गया। मगर घर में वही दबदबा कायम रहा। बहुओं ने आज तक बाहर की दुनिया देखी ही नहीं। कपड़े, चूड़ी, चप्पल वाले खुद उल्टे ही उनके वहां अपनी दुकान समेट लाते। वे घर में ही सारी खरीदारी कर लेतीं। गरज ये कि बेटों ने बाप की रिवायतें क़ायम रखीं। नया सिर्फ इतना हुआ कि मां के तमाम इसरार पर कैसर जहां को बाहर पढ़ने भेज दिया गया। लेकिन उन लोगों ने अपनी बेटियों को ये छूट न दी। जहां बेटियां बारह साल की हुईं, उन्हें बुर्क़ा पहना दिया गया। खुद कैसर जहां भी बुर्क़ा पहनती थी। यह और बात है, ट्रेन में बैठते ही बुर्क़ा लपेट कर झोले में डाल लेती। यही काम आते वक्त भी करती। वहां से बगैर बुर्क़ा के ही चलती। और कानपुर स्टेशन पर गाड़ी रुकते ही बुर्क़ापोश बन जाती।

जब कैसर जहां घर पहुंची, सारा परिवार इकट्ठा था। सारे भाई-बहन वगैरह। वह देखकर हक से रह गई। हालांकि उसे यह तो पता था कि अम्मी को इस हालत तक उसने ही पहुंचाया है। पर करती क्या? …एक दो दिन बीते कि बड़ी बहन ने उसे खबर दी-

‘अम्मी का कुछ भरोसा नहीं, इसलिए तुम्हारी शादी का इंतजाम किया जा रहा है।’

वह चौंक पड़ी। फिर दन से खड़ी हो गई-

‘ये कैसे हो सकता है, बगैर मेरी मर्जी के…’

‘वह लोग जो भी करेंगे अच्छा ही करेंगे। दुश्मन थोड़े ही हैं।’

‘आपा, पिछली दफा भी शादी इन्हीं मेहरबानों की मर्जी से हुई थी। मैं ये शादी नहीं करूंगी।’

‘हमारे रसूल का फरमान है, किसी औरत या मर्द को तन्हा नहीं रहना चाहिए।’

‘अपने रसूल की तो मत कहिए, उन्होंने ही तो इन मुस्लिम मर्दों के लिए ऐय्याशी करने के दरवाजे खोल दिए हैं। कई मुस्लिम मर्द इन दिनों दो से कम बीबियों पर राजी ही नहीं रह पाता। अगर किसी मर्द को इस काम से रोकना चाहो तो वह फौरन ऐसी ही दलीलें सामने रखता है कि चार बीबी रखना तो हमारे यहां सुन्नत है, वगैरह वगैरह और हम लाजवाब हो जाते हैं। और मैं ये भी नहीं समझती कि चालीस साल की उम्र में सिर्फ सात साल की बच्ची से निकाह करके या ढेरों शादियां करके उन्होंने अपनी उम्मत के सामने कौन-सी नज़ीर पेश की या कौन-सा रश्क का काम कर दिया है! अगर आज के दौर में यही काम कोई आम आदमी कर दे तो उसे क्या कहा जाएगा, बताओ तो जरा। यही वजह है कि लाखों मुस्लिम लड़कियां मेरी तरह तलाकशुदा होने का तमगा गले में लटकाए घूम रही हैं और ऐसी ही लाखों लड़कियां सौतिया डाह में झुलस रही हैं। इसका जिम्मेदार कौन है? आज हमारी कौम की औरतों को किसी पैगंबर की जरूरत नहीं, उसे कोई राजा राममोहन राय सरीखी शख्सियत चाहिए जो हमारे मअशरे की औरतों को तलाक और सौतिया-डाह की दोजख़ से बचा सके…जैसे उन्होंने अपनी औरतों को सती की दोजख़ से बचाया।’

‘या..ल्..ला…ह… माफ़ कर। क्या कुफ्र बोले जा रही है, सुनने वाले को भी गुनहगार बना रही है…!’

‘हुंह…कौन-सा गुनाह…, जब गुनाह नहीं किए थे तब कौन-सी जन्नत भोग रही थी।’

‘तौबा वस्तगफिरूल्लाह… जाने क्या कहे जा रही तुम!’

चारपाई पर बैठी कैसर फैलती हुई बोली-

‘रहने दो… आदमी फरिश्ता अपने अमाल से बनता है। अगर किसी ने अपनी औरतों को जीते जी दोजख़ में भस्म होने की रिवायतों से आजाद किया है तो वह किसी फरिश्ते या पैगंबर से रत्ती भर कम नहीं। मुंह न खुलवाओ। वर्ना फिर कहोगी कि गुनाहगार बना रही हो…!’

आपा को काटो तो खून नहीं। चुपचाप उठीं और अम्मी के कमरे में चली गईं।

धीरे-धीरे यह बात पूरे घर में फैल गई। फिर जब अधिक दबाव बनाया जाने लगा तो उसने वास्तविकता पर से पर्दा उठा दिया- ‘मैं कौशल से शादी करूंगी…’

कहना था कि जैसे बम फट गया। बड़े भाई ने झपट कर उसे जोरदार थप्पड़ जड़ा। वे उसका गला दबाने लगे। दूसरे भाइयों ने मिलकर छुड़ाया। भाभियां मुंह में दुपट्टा दबाए खिसक लीं। बहन सिर पकड़ कर बैठ गई। सभी शॉक्ड हो गए थे।

उस दिन से घर के लोगों का खाना-पीना सब छूट गया। जिन भाभियों की तरफ से वह भाइयों से तकरार तक कर लेती थी, अब वे इकट्ठी बैठकर उसी के कीड़े बीनती रहतीं- ‘हुंह, बहुत पढ़ी-लिखी बनती थी। हम लोगों को कितना भड़काती थी। …तुम लोग दब कर क्यूं रहती हो। …शौहरों की बांदी क्यूं बनी हो..? बाहर निकला करो, अपनी जिंदगी जिया करो …ख्वाहमख्वाह हमलोग इसके कहने में पड़े रहते थे। …और खुद क्या-क्या गुल खिलाती रही…!’

‘और नहीं तो क्या, मैं सोच रही थी ‘इनसे’ ज़िद करके अपनी बेटियों को खूब पढ़ाऊंगी। मगर अब तौबा। मेरे बाप की तौबा। इसी साल से उनका नाम कटवा दूंगी। जमाना बड़ा खराब है।’

‘फिर जब घर में ये माहौल देखेंगी तो और बिगड़ेंगी।’ -इस तरह भाभियां एक निष्कर्ष पर पहुंचीं। मगर कैसर जहां टस से मस नहीं हुई। बहन समझा-समझा के थक गईं। बड़ी भतीजी ने दबी जुबान में कैसर जहां के सामने अपनी बात रखी- ‘फूफी, तुम ऐसा करोगी तो हम सबकी पढ़ाई बंद हो जाएगी…।’

‘क्यूं बंद हो जाएगी, तुम भी हमारी तरह ग़लत चीजों की मुखालफत करना सीखो!’

भतीजी खामोश हो गई।

एक दिन बहन से काफी बहस हो गई- ‘आखिर इत्ती बड़ी दुनिया में तुमने एक हिंदू का ही इंतखाब क्यूं किया?’

‘क्योंकि तलाक… तलाक… तलाक… उनके मअशरे में रचा-बसा नहीं होता। इसके आदी नहीं होते। फिर… मुहब्बत मज़हब कहां देखती है!’

बहन चुप हो गई।

मुआमला खिंचते-खिंचते दूसरे महीने तक चला गया। बड़े भाई ने ताक़ीद कर दी- ‘अब तुम कॉलेज नहीं जाओगी।’

बड़ा भाई बाप के दाखिल। फिलहाल हुक्म मानना ही मानना था। हां, शादी वाली बात आगे नहीं बढ़ रही थी। अम्मा भी उसे समझातीं, पर नहीं। भाई परदेसी थे, अपना कारोबार छोड़कर  आए थे। उन्हें जाना भी था। कैसर अपनी ज़िद पर अड़ी थी। बचपन की जिद्दी कैसर जहां। एक दिन बड़े भाई मुन्नन भाई ने उसे अपने कमरे में बुलाया। वह गई, मुन्नन भाई ने उसे सोफे पर अपने बगल बैठा लिया और बोले- ‘तू क्यों हमारी इज्जत उतारने पर उतारू है, आखिर चाहती क्या है तू?’

‘मैं सिर्फ अपनी जिंदगी अपनी तरह गुजारना चाहती हूँ भाईजान… एक जिंदगी आप लोगों के मुताबिक गुजार ली, नाक़ाम रही। अब दूसरी जिंदगी अपनी तरह गुजारना चाहती हूँ। अगर इस जिंदगी को पार लगाने वाला कोई गैर-मुस्लिम ही मिला है तो मैं क्या करूं! सिर्फ इतनी-सी ख़ामी की वजह से किसी इंसान के पूरे वजूद को तो नहीं नकारा जा सकता। जो खुसूसियात कौशल में हैं, क्या कोई मुस्लिम घराने का इतनी ही खूबियां रखने वाला लड़का मुझ तलाक़शुदा लड़की को अपना सकता है? मुझे आप सबकी इज्जत की परवाह है भाईजान, मगर मुझे अपनी जिंदगी को भी तो किसी ठौर लगाना है। आप यह भी जानते हैं कि किसी बाल-बच्चेदार आदमी के साथ मेरा गुजारा नामुमकिन है। …मैं क्या करूं?’

कुछ देर खामोशी छाई रही। भाईजान खामोश सिगरेट फूंकते रहे। ऐश ट्रे में राख झाड़ते रहे, फिर जैसे किसी फैसले पर पहुंचते हुए बोले- ‘एक काम कर सकती हो?’

‘जी, बताइए!’

‘उसे इस्लाम अपनाने के लिए राजी कर लो… दोनों काम हो जाए। तुम्हारी भी रह जाए, हमारी भी रह जाए…’

‘मैं कोशिश करूंगी भाईजान’

कैसर ने फौरन कौशल को फोन लगाया और सारी सूरत-ए-हाल कह सुनाई। कौशल एकदम से घबरा ही गया- ‘ये तुम क्या बक रही हो। तुम्हें पता है, मेरी धर्मों में कोई आस्था नहीं। मैं इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता।’

‘मैं तुमसे कब कह रही हूँ कि तुम किसी धर्म-वर्म के पचड़े में पड़ो। बस, हमारा काम आसान हो जाए इसलिए तुम केवल कनवर्ट करने का ढोंग कर लो। लोगों की निगाह में तो इस रूप में आ जाओगे। कौन तुम्हें आलिम बना रहा है?’

‘लेकिन इतना आसान भी नहीं है।’

‘तुम कर रहे हो न… प्लीज मेरे लिए।’

‘उफ्! चलो…जैसी उन सालों की मर्जी।’

‘क्या कहा…?’ -वह चिल्ला पड़ी।

‘अब चीखती क्यूं हो… सालों को साले न कहूं तो क्या कहूं…!’ फिर ठठा पड़ा।

‘ठीक है, अब तुम फटाफट कानपुर आ जाओ।‘

कौशल चौथे दिन दिल्ली से कानपुर आ गया। कैसर के भाइयों से मुलाकात की। उनकी तमाम बातें उसे माननी पड़ीं। तमाम बातें ऐसी थीं जिन्हें मानते हुए उसका जी वितृष्णा और आत्महीनता से भर उठा था। मगर कैसर का मुंह देखकर सारा ज़हर अमृत की तरह पी गया था। तमाम जानकारियां हासिल करने के बाद भाइंयों ने उसका धर्मांतरण करवा के एक सादे से समारोह में कैसर से उसका निकाह करवा दिया।

अब कौशल, कौशल प्रताप सिंह नहीं मोहम्मद क़ादिर हो गए थे। इस अवसर पर कौशल की तरफ से सिर्फ उसकी बड़ी बहन ही शिरकत करने आईं। कौशल करीब एक सप्ताह कानपुर रहा। फिर चला आया। कहते हैं इश्क-मुश्क छुपाए नहीं छुपते। कौशल के आने से पहले कौशल की खबर दिल्ली आ पहुंची थी। कैंपस में अजीब खा जाने वाला माहैाल था। लोग खा जाने वाली निगाहों से उसको देखते। अलबत्ता स्टाफ के ही एक प्रो. इमरान कुरैशी ने बड़े जोशो-खरोश से उसको बांहों में भर लिया- ‘आइए…आइए डॉ क़ादिर शेख़… अब तो आप हमारी जमात में शामिल हो गए!’

कौशल जैसे झेंप गया। इधर-उधर चोर निगाहों से देखा। बाकी सभी उसे लताड़ने वाली निगाहों से देखे जा रहे थे। कौशल ने फिर नज़र उठाई ही नहीं। जल्दी-जल्दी क्लास की। कौशल का जिस्म निचुड़ गया जैसे। धर्मों को धता बताने वाले जो तर्क पहले कौशल रखा करता था और अपने नास्तिक होने का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार किया करता था, आज उसी कौशल की जुबान को ताले लग गए थे। किसी रोज मिश्रा जी ने उसे अकेले में झिड़का था- ‘यार अजीब हो… तुम्हें लड़कियों का काल था क्या?’

वह सकपकाता हुआ तेजी से क्लास की ओर बढ़ गया। एम.ए. फर्स्ट सेमेस्टर के बच्चे उसके क्लास में आते ही एक संदेहपूर्ण निगाह से एक-दूसरे को देख मुस्काने लगे। मुस्कानें कौशल को सूइयों-सी चुभती महसूस हुईं। उसने बेमन से एक चैप्टर पढ़ाया और बाहर निकल आया। अभी वह कॉरीडोर की तरफ बढ़ ही रहा था कि बगल से गुजरते हुए शुक्ला जी ने गुहार लगाई-

‘और मौलाना साहब…! आपने तो हमारे समाज में एक हिंदू कम कर दिया। वहां एक मुसलमान बढ़ा आए…’ 

कौशल जैसे सारे तर्क भूल चुका था। चुप रह गया। कहां वह बात-बात पर तर्क करता था। जोर-शोर से अपना पक्ष रखता था, कहां वह मूक ही हो गया। जब वह कैसर जहां के साथ बाहर निकलता, बहुत सतर्क रहता। कैसर जहां ठहरी ठेठ-कट्टर मुस्लिम परिवेश से। परिवेश का प्रभाव व्यक्ति पर सारी उम्र हावी रहता है। वह कितना भी प्रगतिशील या परिवर्तनशील हो। इस प्रभाव ने न कौशल का पीछा छोड़ा और न ही कैसर का। पर कैसर जहां को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। वह तो अपनी मौलिक फ़जाओं में सांस ले रही थी। फर्क कौशल को पड़ा। वह प्रेम में दोनों जहान हार चुका था। घर के लोगों ने किनारा-कशी कर ली थी। उसके समाज ने भी उसे बहिष्कृत कर दिया। बाहर निकलता तो लोग उसे अजीब नजरों से घूरते। वह सिहर जाता। उसे अपराध-बोध का आभास होता।

एक दिन अंतरंग मित्र रोहिताश्व ने कहा था- ‘क्यूं बे, तू बहुत प्रगतिशील और बड़ा वाला नास्तिक बनता था!’

कौशल को काटो तो खून नहीं। प्रेम में कौशल ने सफलता भले ही पा ली थी, किंतु भीतर उसे कुछ कचोटता रहता था। एक भ्रम- वह सफल हुआ है या विफल? भीतर कोई सवाल उठाता- ‘अपने उसूलों को रेहन रखकर पाया तो क्या पाया?’

और वह सारे तर्क भूल जाता। ऐसे तमाम सवाल उसके भीतर घुमड़ते रहते। ग्लानि से सन उठा था वह। प्रेम की परिणति जिस रूप में हुई थी, वह असह्य थी। अंतस में एक विशाल सन्नाटा भर गया था। जब वह बाहर निकलता,  सड़कों के किनारे बने मंदिरों को देख अनायास उसका सिर झुक जाता था। कभी बड़े आराम से वह मंदिरों को ठेंगा दिखाता निकल जाता। अब… जाने क्यूं एक अपराधबोध घर कर गया था, जिसका प्रायश्चित वह अनजाने ही करने लगा था। उस समय साथ में कैसर होती तो फ़ौरन झिड़क देती- ‘यह क्या पागलपन है, मुर्दों और शिलाओं के सामने झुकते रहते हो। क्यूं भूल जाते हो कि अब तुम मुसलमान हो चुके हो। अब इनसे तुम्हारा कोई वास्ता नहीं।’ कौशल का जी भर आता। अंदर कुछ टूट जाता। कोई हवा में फुसफुसाता- ‘समथिंग इज़ रांग…’

जब कैसर नमाज़ पढ़ रही होती उसके जी पे सांप लोटने लगते। उसे अपने तैंतीस करोड़ भगवान बेहिसाब याद आते। भले ही जब नास्तिक था, देवताओं को पानी पी-पी कर कोसता था। यहां भाव दूसरे थे, ‘स्व’ से छूट जाने का भाव-

 ‘क्या कैसर बगैर उसके धर्म परिवर्तन किए उसे नहीं अपना सकती थी? मैंने तो उसे अपना हंड्रेड परसेंट दिया। उसने क्या दिया? क्या इस प्रेम में सबकुछ एकतरफा था। समर्पण भी एकतरफा। क्या मेरी तरह वह भी न्यूट्रल नहीं हो सकती थी? क्या रक्खा है इन धर्मों के जंगल में? या फिर वह, वह रहती। मैं, मैं ही रहता। जोधाबाई क्या मुसलमान हुई? या अकबर बादशाह हिंदू बना, वे एक-दूसरे को प्रेम करते थे, एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते थे। मैंने तो धर्म नाम की संस्था का ही बहिष्कार किया था और कहां एक धर्म को अपमानित करके एक दूसरे धर्म को महिमामंडित करने बैठ गया हूँ। कहां घुस गई मेरी प्रगतिशीलता! विमूढ़ कैसे हो गया? अगर मैं खुद प्रगतिशीलता जीवियों में शुमार करता हूँ तो मेरी पत्नी को भी उतना ही प्रोग्रेसिव होना चाहिए था। क्या धर्म परिवर्तन करने से हृदय-परिवर्तन भी हो जाता है? नहीं, कभी नहीं। धर्म मिथ्या है, भ्रम है। मैं किसी भी धर्म का पैरोकार नहीं हो सकता। कौशल मेरे माता-पिता का दिया गया एक स्नेहपूर्ण संबोधन है। न कोई हिंदू या मुसलमान। मैं इस स्नेहिल संबोधन को किसी क़ादिर शेख में नहीं विलय कर सकता। मैं अपने माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदारों और मित्रों आदि को कौशल पुकारने से नहीं रोक सकता। उन्हें क़ादिर कहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।’

ऐसे कितने ही सवाल उसे घोंटते रहते। वह प्रायः तन्हा बैठकर आत्मवंचना करता रहता। प्रत्यक्षतः वह जितना गुमसुम, खोया-खोया रहता, भीतर वह उतनी ही गहरी यंत्रणा में उलझा होता। उसका जेहन फटने लगता। कैसा वह अजीब बिखरा-बिखरा, सहमा-सहमा-सा होता जा रहा है। धीरे-घीरे वह कॉलेज जाने से कतराने लगा। अक्सर छुट्टियां ले लेता। कैसर उसपर चिल्लाती रहती- ‘क्या हुआ है तुम्हें, कॉलेज क्यों नहीं जाते। घर में पड़े-पड़े कैसे चलेगा…?’

वह कुछ नहीं बोलता। खामोश पड़ा रहता।  तीसरे माह गर्मी की छुट्टी हो गई। कौशल की जान में जान आई- ‘अब छुटकारा मिला मानसिक प्रताड़नाओं से!’

वे मई-जून की छुट्टियां बिताने कानपुर चले आए। कैसर के यहां स्थिति सामान्य थी। औरतों के बीच खुसर-पुसर चलती रहती। भावजें कौशल से पर्दा करतीं। इससे उसे कोफ्त होती, पर कहता कुछ नहीं। कभी कोई बुलाता- ‘और क़ादिर साहब, अपनी सुनाएं…!’ वह अनसुना-सा बैठा रहता। दोबारा कोई झिड़कता-

‘अमां… तुमसे ही कह रहे हैं!’ उसके कान ‘कौशल’ सुनने के अभ्यस्त थे। ‘क़ादिर’ ध्यान से उतर जाता। घर में आने-जाने वालों के लिए उसके मुंह से ‘अस्सलामोअलैकुम’ बड़ी मुश्किल से निकल पाता। भावजों ने उसके खाने के बर्तन तक अलग कर रखे थे। कैसर यह बर्ताव देखकर क्षुब्ध होती। कहती- ‘क्या भाभी, आपलोग भी क्या हैं! हमारी आपकी तरह वह भी तो एक इंसान ही हैं। फिर अब हममें शामिल हो गए हैं।’

‘न भई न… विधर्मी तो विधर्मी है। उसके बर्तन में खाते हुए कराहियत होती है।’

अम्मी कहतीं- ‘..इसमें ग़लत क्या है, आखिर हमने एक हिंदू को इस्लाम से जोड़ा है। इससे बढ़कर सवाब का काम क्या हो सकता है!’

हल्की-फुल्की सुनगुनी कौशल पाता तो झुंझला जाता। दिमाग की नसें फटने लगतीं। एक टीस-सी उठती रीढ़ की हड्डियों में।

उस दिन फ़ज्र का वक्त था। अभी मुर्गा बांग ही दे रहा था कि सबसे छोटी भावज को प्रसव का दर्द शुरू हो गया। इतनी सुबह-सुबह भला कहां लिवा जाया जाए। बेपर्दगी होती सो अलग। बड़े भाई साब ने इजाजत ही नहीं दी- ‘जिसको बुलाना हो यहीं बुलवा भेजो।’

आखिर आस-पड़ोस की एक दाई और एन.एम. को बुलवा लिया गया। जच्चा प्रसव-वेदना से तड़प रही थी। चार-पांच औरतें घेरे बैठी थीं। अल्लाह-अल्लाह करके बच्चे ने जन्म ले लिया। जच्चा को निजात मिली। अब वह प्यास से तड़प रही ‘पानी….पानी…’ की रट लगाए थी। एन.एम. ने मना किया- ‘नहीं, पानी बिलकुल नहीं। ज़हर बन जाएगा।’

बाकी बैठी औरतें एक-दूसरे का मुंह तकने लगीं। जच्चा छटपटा रही थी प्यास के मारे। इसी बीच एन.एम. दाई को साथ ले कर कमरे से बाहर चली गई फ्रेश होने। बड़ी भावज से जच्चा की पानी की तड़प देखी नहीं गई। मंझली वाली के कान में धीमे से फुसफुसाईं- ‘जहीर की दुल्हन, इसकी तड़प देखी नहीं जा रही। कहीं कुछ ऐसा वैसा न हो जाए। सुनो… वो जो आब-ए-जमजम का पानी रखा है उसे पिला देते हैं। मुक़द्दस जगह का पानी है, वह तो फायदा ही करेगा।’

मंझली भावज ने सहमति में सिर हिलाया और जाकर आब-ए-जमजम की शीशी उठा लाईं। बड़ी वाली ने झट ढक्कन खोल कर कुछ पानी जच्चा के मुंह में उंडेल दिया और मंझली के हाथ शीशी रखवा दी। तब तक एन.एम. वापस लौट आई और ठीक उसी वक्त छोटी भावज यानी जच्चा को जोर की हिचकी आई। ..और उस हिचकी के साथ ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए। एन.एम. हक् से रह गई। दाई चिल्लाई- ‘आखिर कर ली न आपलोगों ने अपनी मर्जी की!’

बड़ी भावज ने उल्टे ही रद्दा रक्खा- ‘हमें क्या कहती हो… खुद को तो ढंग की डॉक्टरी आती नहीं है।’

संझली बहू से बर्दाश्त नहीं हुआ तो वह तड़ से बोली- ‘झूठ क्यूं बोलती हो भाभी, तुमने ही तो छोटी बहू को पानी पिलाया है।’ एन.एम. सिर पकड़ के बैठ गई। दाई सामान समेटने लगी। कैसर शोर सुन कर कमरे में गई तो उल्टे पांव चीखती हुई भाइयों के कमरों की तरफ भागी। खुशी ग़म में तब्दील हो चुकी थी। अंततः कफन-दफन कर दिया गया। अम्मी सक़ते में थीं। उनके घरौंदे को किसकी नज़र लग गई!

बड़ी बहू समझा रही थीं- ‘कुछ नहीं अम्मा, हमारे घर पे अजाब ए इलाही नाज़िल हुआ है। हमने एक विधर्मी को अपना दामाद जो बना लिया है। …वर्ना आप ही सोचो जो आब का सोता हज़रत इस्माईल अलैह की एड़ियों से फूटा, वह कभी जहरीला हो सकता है… तौबा-तौबा! फिर ये भी तो है, इस हालत में अगर औरत फौत हो जाए तो उसे शहादत का दर्जा मिलता है’ अम्मी ने कुछ सोचते हुए उनकी सहमति में धीमे-धीमे सिर हिलाया ही था कि कमरे में दाखिल होती कैसर चिल्लाई- ‘ये क्या जाहिलों वाली बकवास छेड़ रखी है आपलोगों ने? खुद ग़लतियाँ करोगी और तोहमतें दूसरों के सिर…! एक तो पढ़ी-लिखी हो नहीं, न घर से बाहर निकल कर कोई ढंग की सोसाइटी ज्वाइन करोगी कि थोड़ा जेहन खुले। कुछ सलीका आए। तुम लोग जिस्म-ओ-जेहन से कैद कर ली गई हो। मर्दों ने पिंजड़े की मैना बना के रख दिया है़। वो बेचारी अपनी जान से गई, और तुम उसे शहादत का दर्जा दिलवा रही हो। तुम औरतें इसी दोजख-जन्नत और शहादत के नाम पर अपनी दुर्गति करवाती हो।’

बड़ी भावज सकपका गईं। झट से उठकर बाहर चली गईं। सन्नाटा छा गया। फिर बात आई-गई हो गई।

एक रोज जब कौशल तैयार हो रहा था बाहर जाने के लिए, अचानक बड़े भाईसाहब आ गए। उसने सलाम किया, उन्होंने जवाब दिया फिर बोले- ‘देखो बरखुरदार, अब तुम एक इज्जतदार मुस्लिम घराने के दामाद बन गए हो। इसलिए तुम्हे वैसा ही रहन-सहन अपनाना चाहिए। ये क्या ईसाइयों वाले पहनावे पहना करते हो। जरा सलीके के पहनावे पहनो। हमें देखो।’

कहते हुए उन्होंने अपनी तरफ इशारा किया। कौशल ने उनको नीचे से ऊपर तक देखा और मन ही मन कुढ़-सा गया, बोला कुछ नहीं। भाईजान लंबा-सा कुर्ता और टखने तक का पाजामा पहने खड़े थे। सिर पर साफा। मन ही मन वह बुदबुदाया- ‘साले जाहिल…!’

वह वापस चले गए। वह भी तैयार होकर बाहर चला गया।

 कौशल शाम को वापस लौटा। कैसर बरस पड़ी- ‘कहां चले गए थे, दिन भर गुम रहे। मैं यहां परेशान होती रही।’

‘कहीं नहीं, एक इंटरव्यू देने गया था प्रोफेसर की वैकेंसी है।’

‘मतलब, तुम तो दिल्ली में ऑलरेडी परमानेंट हो…।’

‘मैं रिजाइन कर आया।’

‘क्यों भला?’

‘मैं वहां अब और नहीं रह सकता था। लोगों ने जीना दूभर कर दिया था। वहां मेरी इमेज बेहद खराब हो चुकी है।’

‘ओह नो…’

तभी बाजू में रखा बैग कौशल ने उठाया- ‘ये क्या है?’

‘भईजान तुम्हारे लिए कुछ कपड़े लाए हैं।’

‘कैसे कपड़े… देखें जरा’ कहते हुए उसने बैग खोला तो उसमें से कई सफेद कुर्ते और पाजामे बाहर निकले। उसने गुस्से से दूर फेंक दिया- ‘ये तेरे भाई सारे मुझे मुल्ला बना कर ही छोड़ेंगे।’ वह पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर चला गया। कैसर सहम गई। कुछ देर बाद कैसर उसे तलाशती हुई छत पर गई। देखा, एक ओर कौशल चुपचाप रेलिंग के सहारे खड़ा है। उसने उसके करीब जाकर उसकी कमर में हाथ डाल दिया और बोली, ‘कौशल क्या हुआ है तुम्हें?’

‘अब भी बताना पड़ेगा कि क्या हुआ है मुझे…तुम लोगों ने मेरा जीना दुश्वार कर दिया है। काश मौत आ जाए मुझे।’

‘प्लीज कौशल।’

‘क्या प्लीज… कपड़े मैं पहनूंगा, तुमको लगता है?’

‘सिर्फ कुछ दिन की बात है…। पहन लेना फिर हम चले जाएंगे तो सब खत्म। बवाल करने से अच्छा है उनकी बातें मान ली जाएं, उनका मन रखने के लिए।’

‘मन रखने के इस चक्कर में मैं क्या-क्या हो गया हूँ। बस सबका मन ही रखता रह गया, मेरा मन किसने देखा। किसी ने पूछा कि मेरा मन क्या चाहता है? मैं यहां तिल-तिल मर रहा हूँ। ओके…!’  कहते-कहते उसका गला भर आया।

कैसर ने उसको गले से लगा लिया- ‘प्लीज कौशल… आंसू नहीं। कुछ दिन की बात है बस। मैं समझती हूँ तुम्हारी तकलीफ। चलो खाना खाने चलते हैं।’

वे आकर दस्तरख्वान पर बैठ गए। खाना लग चुका था। कौशल ने अपनी प्लेट में कुछ खाना निकाला। तभी मंझले भैया बोल उठे- ‘भई क़दीर, तुमने सब तो सीख लिया। कैसर ने तुम्हें यह नहीं बताया कि खाने से पहले क्या पढ़ते हैं!’ कौशल के हाथ थम गए। कैसर सिहर-सी गई। संभलते हुए बोली- ‘जी, भाईजान सब सिखा दिया है। यह मन ही मन में बिस्मिल्लह पढ़ लेते हैं।’

‘अच्छा…जरा हम भी तो सुनें तुमने क्या सिखाया है क़ादिर साहब को। जरा जोर से बोल कर बताइए तो क़ादिर साहब।’

‘जी….जी बिस्मिल्लाह!’ वह झिझकते हुए बोला।

‘अरे भई पूरा बोलो… यही सिखाया है तुमने?‘

‘न…नहीं भाईजान, पूरा याद है… कौशल… सॉरी… क़ादिर… वो तुमको सिखाया था न बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम… बोलो न…!’

सबकी निगाहें कौशल के चेहरे पर थीं। कौशल पसीने-पसीने था। उससे बोला नहीं जा रहा था। लड़खड़ाया-सा बोला- ‘बिस्स…अर्रह मा…।’ बच्चे हँसने लगे। कैसर ने कस कर डांटा- ‘चोप्प’ बच्चे सहम गए। कौशल शर्म से पानी-पानी हो गया। वह प्लेट खिसका के दस्तरख्वान से उठ गया। माहौल संगीन हो गया था। पीछे-पीछे कैसर भी चली आई। कमरे में आते ही उस पर बरस पड़ी- ‘यह क्या बदतमीजी है? दस्तरख्वान से ऐसे नहीं उठा जाता समझे… खाने की बेइज्जती होती है।’

‘और जो मेरी बेइज्जती हो रही थी?’

‘क्या बेइज्जती हो रही थी? सिखा ही तो रहे थे। मैं दो दिन में तुमको सिखा दूंगी।’

‘मुझे नहीं सीखना समझी। तुम्हीं करो ये नाटक, बहुत हो चुका।’

कुछ देर बाद भतीजी आकर दोनों का खाना कमरे में ही दे गई।

 

कौशल सुबह-सुबह ही उठा और नहाने चला गया। वापस आकर कैसर से कपड़े देने को कहा। कैसर ने वही पाजामा कुर्ता लाकर दे दिया।

कौशल- ‘यह क्या है?’

कैसर- ‘यह भी तो कपड़ा है?’

सोचा, कुछ बहस करने से बेहतर है चुपचाप मान लो। उसने बेमन से लिया और पहन लिया। जब पहन कर कमरे से बाहर निकला तो छोटे भाईजान देख कर निहाल हो गए और पुलकते हुए बोले- ‘माशाल्लाह क्या नूरानी चेहरा लग रहा है! इसपर अगर अल्लाह का नूर एक दाढ़ी होती तो मजा आ जाता…!’

‘लै…एक और फरमाईश!’ वह मन ही मन बुदबुदाया।

कैसर खुश हो रही थी। उसने अब दाढ़ी भी बढ़ानी शुरू कर दी थी। एक छोटा-सा लड़का हाफिज आता था और उसे अरबी पढ़ाता और नमाज पढ़ना सिखाता। यह तीन महीने कौशल के लिए तीन सदी जैसे हो गए थे। एक दिन वह छत पर गुमसुम बैठा था। वही मुसलमानी लिबास में। सिर पर टोपी भी थी। चेहरे पर दाढ़ी थी। चेहरे की हड्डियां निकल आई थीं। होंठ सूखे-सूखे थे। कैसर दूर खड़ी उसे देख रही थी। उसे झटका-सा लगा था एकबारगी- ‘क्या मैंने अपनी जिंदगी में ऐसे ही कौशल की कल्पना की थी! क्या मैंने इसी कौशल को चाहा था! कहां चला गया वह खुशमिजाज और हंसोड़ कौशल। मेरी मोहब्बत में इसने खुद को क्या-क्या बना डाला! ये तो बिलकुल वैसा ही लगता है, मेरे पहले शौहर एजाज जैसा। इसमें तो सबकुछ वैसा ही होता जा रहा है। या अल्लाह… रहम कर।’

एक चीख के साथ वह गिरकर बेहोश हो गई। आवाज सुन कर कौशल ने उधर देखा और दौड़ कर उठाया, फिर कमरे में लाकर लिटाया। उसे पानी के छींटे देकर होश में लाया। भाभी ने डॉक्टर को फोन कर दिया। डॉक्टर आया। कुछ दवाएं दीं और बताया कि कैसर मां बनने वाली है। लेकिन जाने क्या था कि इस खबर पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। न कैसर के चेहरे पर कोई भाव था, न कौशल के और न ही घर वालों के।

 

कौशल तैयार हो रहा था बाहर जाने के लिए। कैसर पास आकर पूछ रही थी- ‘एक बात पूछूं…तुम्हें खुशी नहीं है कि तुम बाप बनने वाले हो?’

‘बिलकुल नहीं, क्योंकि मैं नहीं जानता कि मैं किसी हिंदू बच्चे का बाप बनने जा रहा हूँ या मुसलमान बच्चे का। मैं नहीं चाहता कि फिर किसी को इस घर में आकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़े, जैसे मैं कर रहा हूँ। उससे कहो लौट जाए…।’

‘कौशल…पागल हो गए हो तुम?’

‘क्यों, क़ादिर कहो न तुम। आज तक कौशल को क़ादिर कहने की आदत नहीं डाल सकीं और मुझे जाने क्या-क्या कहने की आदत डलवाई जा रही है… अस्सलावालेकुम… अस्सलावालेकुम… अस्सलावालेकुम…’ वह बार-बार हाथ उठा कर कैसर को सलाम करने लगा। वह चिढ़ गई।

‘यह क्या बदतमीजी है’ और पैर पटकती बाहर चली गई।

शाम को कौशल आया। कमरे में एक ओर अपनी फाइल रख दी और बेड पर पसर गया। तभी कैसर पानी ले आई और बैठती हुई पूछा- ‘क्या हुआ, कहीं कुछ काम बना?‘

‘हां…हो जाएगा। एक तारीख को ज्वाइनिंग है।’ उसने हाथ बढ़ा कर फाइल उठाई और एक लिफाफा निकाला- ‘ये देखो ज्वाइनिंग लेटर!’ कैसर ने निकाल कर देखा और उसका माथा चूम लिया। तभी कौशल ने धीरे से कहा- ‘लेकिन एक मसला है।’

‘क्या’ कैसर की भंवें सिकुड़ गईं। कौशल ने थेाड़ा झिझकते हुए कहा- ‘यह कॉलेज जैन लोगों का है। हमें क्वार्टर वगैरह सब मिलेगा, मेन लखनऊ में है। तुम्हें पता है आजकल नौकरी कितनी रेअर है। बहुत मुश्किल से मिली है, एक दोस्त की सिफारिश से।’

‘ठीक है, अल्लाह का शुक्र है। मसला क्या है?’

‘तुम जैन का मतलब समझती हो न?’

‘मतलब?’

‘तुम्हें वहां हिंदू पत्नी बनकर रहना पड़ेगा। अपनी असल पहचान छुपानी होगी। नहीं तो वो हमें नौकरी से निकाल देंगे। और मैं यह नौकरी खोना नहीं चाहता।’

कैसर के पांव तले से जमीन निकल गई। वह कांपती-सी बोली- ‘तुम्हारा दिमाग खराब है? यह कैसे हो सकता है, मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ।’

‘जैसे मैं कर सकता हूं तुम्हारी मोहब्बत में, तो तुम मेरी मोहब्बत में ऐसा क्यों नहीं कर सकती। यहां तो रोजी-रोटी का सवाल है।’

‘एक्चुअली… मैं ऐसा नहीं कर सकती। तुम कहीं और अप्लाई करो।’

‘नहीं कर सकता। बहुत जगह इंटरव्यू देने के बाद यह मिली है। या कहो तो नाकारा बनकर यहीं बैठा रहूं, तुम्हारे भाइयों की रोटियां तोड़ता रहूँ।’

कैसर बिना कुछ कहे झल्ल से उठी और पैर पटकती हुई कमरे से बाहर हो गई। कौशल चुपचाप बेड पर पसर गया और बड़बड़ाया- ‘अजीब औरत है!’

शाम के सात बजे थे। मग़रिब का वक्त। कौशल बाहर निकला था पास के ढाबे की तरफ कि रास्ते में मौलाना साहब मिल गए। देखते ही उसने सलाम किया। वह जवाब देते हुए बोले- ‘भई वाह… माशाअल्लाह… सुबहानअल्लाह… कौन कहेगा तुम पहले किसी ग़ैरमज़हब में थे। जबसे ईमान लाए हो चेहरे पर नूर ही नूर है। नमाज़ वग़ैरह भी पढ़ते हो?’

‘जी बिलकुल हुज़ूर, लेकिन…’ कहते-कहते जैसे अंदर सूइयां-सी चुभी थीं। मौलाना आगे बढ़ गए थे और वह वहीं खड़ा देर तक अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरता रह गया था। फिर वापस लौट आया। कमरे में जाकर देर तक खुद को निहारता रहा और पहचानने की कोशिश करता रहा कि सामने वाला कौन है। कौशल पूरी तरह से खो चुका था। सामने जो था वह निखालिस क़ादिर था। ऊपर से नीचे तक। उसे अच्छा नहीं लगा।

 

कैसर झुकी हुई क्यारियों में पानी डाल रही थी कि बाहर से भाई दाख़िल हुए और उसे देखते ही बोले- ‘कैसर बेटे… तुझे आराम करना चाहिए… यहां कहां खप रही है।’

‘भाईजान…!’ अभी वह कुछ बोलती कि भाभी बोल दीं- ‘हुंहह…रहने दो यह लाड़…’ कैसर कहां कम। झपट पड़ी- ‘क्या बात है भाभी… बड़ी गरम हो रही हो। मिजाज ठीक हैं न…।’

‘ज्यादा मत उड़ा कर… रौब अपने भाइयों को ही दिखाना… हमारे घर का माहौल ही बिगाड़ के रखा है।’

‘भाभी ज़ुबान संभालो अपनी।’

‘क्या बात हो गई…’ कहते हुए भाई बाहर निकल आए।

‘इनको समझाओ भाईजान।’

‘क्या समझाना… पूरा घर नापाक करके रखा है। अब विधर्मी की औलाद भी यहां पैदा हागी। हम कितना बर्दाश्त करें!’

इस दिन कैसर को बड़ा झटका लगा था। जब तक पति तक बात थी, तब तक ठीक था लेकिन आज उसके बच्चे पर सवाल करने लगी थी यह दुनिया। वह यह कैसे बर्दाश्त कर सकती थी। उसको रात नींद नहीं आई। कौशल ने कई बार पूछा, लेकिन वह छुपा ले गई। उसे ताने मारने का मौका मिल जाता। आखिर वही बोला- ‘मैं जानता हूँ… तुम भी खुश नहीं हो। जब प्यार शर्तों पर होता है तो ऐसे ही होता है।’ कैसर करवट लेकर सो गई।

बकरीद का चांद निकल आया था। अब बकरीद की तैयारियां शुरू हो गई थीं। एक दिन  सुबह-सुबह आंगन में बहुत चहल-पहल थी। एक नई आवाज़ आंगन में गूंज रही थी। ‘में-में’ की आवाज़ आ रही थी। कौशल उठ बैठा। आंखें मलते हुए बोला- ‘ये कैसी आवाज़ है?’ तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने उठकर कमरे का दरवाज़ा खोला। सामने भतीजी खड़ी थी। बोली- ‘फूफा जी, आइए आपके लिए बकरा आया है।’ वह चौंका- ‘मेरे लिए?’

कहते हुए वह बहार आ गया। देखा, बाहर एक लंबी दाढ़ी वाला भारी भरकम बकरा खड़ा है। वह आंगन में आया और बेसिन में मुंह-हाथ धो रहा था कि तभी छोटे भाईजान बोले- ‘लो भाई क़ादिर, मुबारक हो… आपके नाम पर इस बार कुर्बानी होगी।’

कौशल हैरत से बोला- ‘मतलब मैं समझा नहीं भाईजान!’

बड़े भाईजान हँसते हुए बोले- ‘अरे भाई, कुर्बानी हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है।’

कौशल ने झुंझलाते हुए कहा- ‘भाईजान, ये मेरी समझ में नहीं आ रहा।’

मंझले भाईजान बोले- ‘अभी तुम नए-नए हो न, जब इस्लाम की रूह में उतरोगे तब समझ जाओगे…। पूरे बीस हज़ार का बकरा है।’ कौशल की आंखें फैल गईं- ‘क्या कहा… बीस हज़ार..?’ उसने सर पकड़ लिया। तीनों भाई हँसने लगे। वह झल्ला कर चला आया।

कैसर बैठी बिस्तर तह कर रही थी। वह कमरे में घुसते ही बोला- ‘ये तेरे भाइयों को हुआ क्या है? बीस हज़ार का बकरा ले कर आए हैं। पैसों की बर्बादी।’ कैसर ने पीछे मुड़कर देखा और मुंह पर उंगली रखती हुई बोली- ‘ऐसा बाहर मत बोलना, भाईजान नाराज होंगे…। ये हर मुसलमान का फ़र्ज़ है, अब ये सारी बातें तुमको अपनानी पड़ेंगी।’

वह तड़प उठा- ‘बिलकुल नहीं, मैं तो सोच कर ही कांप जाता हूँ।’

कैसर ने समझाते हुए कहा- ‘कोई बात नहीं पहली बार है न… जब उस दिन तुम बकरे के गले पर छुरी चलाओगे तो सारा दर्द निकल जाएगा।’

कौशल पागलों की तरह चीख उठा- ‘खामोश…।’ वह गुस्से से कांप रहा था- ‘मैं ब्राह्मण हूँ, मैं जीव हत्या कभी नहीं कर सकता। जाने कहां मैं फंस गया हूँ राक्षसों के बीच।’

कैसर पास बैठती हुई बोली- ‘अब तुम ब्राह्मण नहीं रहे, ओके! तुम मुसलमान हो!’ कौशल ने दो-तीन थप्पड़ उसके चेहरे पर जड़ दिए। कैसर हक्का-बक्का रह गई।

वह लेट गया और बुदबुदाने लगा- ‘तुमलोग मुझे पागल कर दोगे।’

बकरीद के अभी कई दिन थे। बकरा ‘में-में’ कर पूरा घर सर पे उठाता रहता। बच्चे उसे बहुत प्यार करते। घर के सभी लोग उसे हाथों हाथ लेते। कौशल किनारे बैठा सोचता रहता- ‘ये लोग इससे इतना प्यार करते हैं तो इसकी हत्या कैसे करेंगे!’ यही बात उसने कैसर से कही तो वह समझाती हुई बोली थी- ‘यही तो असल बात है… खुदा हमको अपनी सबसे प्यारी चीज़ कुर्बान करने को कहता है।’

कौशल ने बुरा-सा मुंह बना कर कहा था, ‘हूँ…ह..तुमलोग और तुम्हारा ख़ुदा…।’ वह जब भी बकरे को देखता, सोचने लगता कि एक दिन इसकी गर्दन कटेगी वह भी मेरे नाम पर। यानी इसकी हत्या का पाप मुझे लगेगा।’ ये सोच-सोच कर उसका दिमाग पागल होने लगता।

एक दिन कैसर जहां अपने कमरे में लेटी कोई मैगजीन पलट रही थी कि 20 साल की भतीजी कमरे में आई और उसके बाजू में लेटती हुई बोली- ‘फुफी, फूफा कहां गए?’

‘जाएंगे कहां, ऊपर टीवी हॉल में होंगे।’

‘बेचारे कितने अच्छे हैं न।’

‘हम्म’

‘ओह…! फुफी एक बात कहूं, ख़फ़ा तो नहीं होंगी?‘

‘नहीं, बोल…।’ कैसर ने पत्रिका पर निगाह टिकाए हुए कहा।

‘अम्मी कह रही थीं, फूफा मुसलमान हुए ही कहां, बच्चा तब तक मुसलमान नहीं होता जब तक उसका ख़तना नहीं हो जाता.. फिर फूफा कैसे मुसलमान माने जा सकते हैं… यह बात वह अब्बू से कह रही थीं।’

‘अब्बू ने क्या कहा…?’

‘बोले हैं, बकरीद के चांद में फूफाजान का ख़तना करवा दिया जाएगा। ठीक है न फुफी, तब तो ये लोग फुफा को मुसलमान मान लेंगे न…?’

‘उफ्… तू चुप कर अब…।’ कैसर ने पत्रिका पटकी और उठ बैठी। मगर उठते ही चौंक पड़ी। ठीक पीछे सिरहाने कौशल खड़ा था। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था जिससे जाहिर होता था कि वह सबकुछ सुन चुका है। शरीर जैसे पूरी तरह प्राणहीन हो गया था। कैसर ने भतीजी को डपटा ‘अब तू जाती है यहां से या…!’

‘जा रही हूँ न…।’ और गहरी तल्ख निगाहों से कौशल को घूरती हुई बाहर चली गई। जाने क्या था उसकी कंटीली निगाहों में कि वह भीतर तक कांप गया। उसके जाते ही वह बिस्तर पर निढाल-सा गिर गया। कैसर उसकी मनःस्थिति भांप गई। वह उसे संभालती-सी बोली- ‘क्या हुआ तुम्हें, तुम टेंशन मत लो…। सबको बकने दो, ऐसा कुछ नहीं होगा। वह मजाक कर रही थी।’

‘इतने दिनों से मजाक ही तो कर रहे हो तुम लोग मेरे साथ!’ वह कांपता हुआ बोला।

कौशल के हाथ के तोते उड़ चुके थे। कैसर के लाख मान-मनुहार करने के बाद भी वह सामान्य नहीं हो पा रहा था। उसका खोया हुआ आत्मविश्वास लौट नहीं रहा था। बिस्तर पर जाने कब तक यूं ही पड़ा रहा कि नींद आ गई। किंतु जल्दी ही किसी दुःस्वप्न से आंख खुल गई। इसी मनःस्थिति में कितने ही दिन बीत गए। कैसर समझा-समझा के हार गई, पर सब व्यर्थ। अब उसे बाहर निकलते हुए भी भय लगता। कमरे में ही घुसा रहता।

‘इत्ते सारे दंश..ओह..माई गॉड..!’

अगर परिवार के दो-तीन जन इकट्ठा बैठकर धीरे-धीरे आपस में बात कर रहे होते तो उसे लगता कि उसके खिलाफ़ कोई साजिश रची जा रही है। मन ही मन प्लान करता- ‘अगर ऐसी स्थिति दर-पेश आई तो क्या करना है। वह चुपके से भाग खड़ा होगा। मगर कैसर को क्या जवाब देगा? …नहीं कैसर को भी लेता जाएगा। तो क्या कैसर चलने को तैयार हो जाएगी? रूढ़ता में वह अपने भाइयों से कम है क्या?’ जेहन पथरा-सा जाता। ‘हे ईश्वर… नहीं… नहीं… हे… अल्लाह… क्या करूं…!’ फिर स्वयं पर क्षुब्ध हो जाता। कहां-कहां भ्रम है! मैं कब तक ईश्वर की जगह अल्लाह कहने का अभ्यास करता रहूंगा। रात को सोता तो अजीब स्वप्न आते। कोई सफेद बुर्राक परछांईं पैंताने छुरा निकाले बैठी है। वह चीख़कर उठ बैठता। पसीने-पसीने हो जाता। जल्दी से उठकर सब खिड़की-दरवाज़े चैक करता, सब लॉक तो है न! कैसर उसकी अजीबोगरीब हरकतें देखती रह जाती और गुहारती- ‘या अल्लाह रहम कर।’

एक रात वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई- ‘कैसर दरवाजा खोलो जल्दी’ कैसर के भाई थे। कौशल अभी लेटा था कि उचककर खड़ा हो गया और कैसर को बांहों में भींच लिया- ‘नहीं कैसर मत खोलना… वह लोग साजिशन आए हैं।’

‘उफ! छोड़ो भी… भाईजान हैं।’

‘नहीं, कोई भी हो…।’ मगर कैसर ने एक झटका मारा, खुद को आजाद किया और जाकर दरवाज़ा खोल दिया- ‘ये लो… तुम्हारा मसूरी जाने का टिकट करवा दिया है। तुम दोनों का है।’ क़ादिर को क्या हो गया है?’

उन्होंने भीतर देखते हुए कहा। कैसर ने भी पीछे मुड़ कर देखा, वह दोनों घुटनों को सिकोड़े बाहों में भरे उकड़ू बैठा हुआ था। वह कुछ नहीं बोली। भाईजान चले गए तो वह दरवाज़ा बंद करके आई और उसे जोर का झटका दिया-

‘ये क्या बदतमीजी है, कैसे बैठे हो। क्या सोचा होगा भाईजान ने… छीः’

वह कुछ न बोला। चुपचाप लेट रहा। कौशल की इस तरह की विक्षिप्त मनोदशा देख वह बेहद सहम गई। कौशल उधर मानसिक संत्रास से इस कदर जूझ रहा था कि दिन ब दिन उसकी मानसिक अवस्था तथा दिनचर्या गड़बड़ाती जा रही थी। देर रात तक जागना और सुबह देर से उठना फिर गुमसुम यहां-वहां घुसे पड़े रहना, यही हो गया था उसका रूटीन। दीन-दुनिया सबसे मोहभंग हो चुका था। कैसर से जिस्मानी-राबता भी लगभग खत्म हो चुका था। एक रोज गई रात को सोते समय नींद में ही कैसर का हाथ उसके पेट पर पड़ गया तो वह चीख़ कर उठ बैठा-

‘नहीं… नहीं… नहीं…!’ वह उठ बैठा। कैसर ने उठकर लाइट ऑन कर दी। उसे पानी पिलाया। वह कुछ सामान्य हुआ। अचेत निगाहों से हर तरफ देखता रहा। हर ओर दीवारों पर भयभीत कर देने वाले दृश्य चिपके हुए थे।

अभी सुबह का झुटपुटा था कि कौशल का फोन बज उठा। उधर रोहिताश्व था। छूटते ही बोला- ‘क्यों बे क़ादिर, हमको भी भूल गया।’

‘खामोश… खबरदार… मैं… कौशल हूँ… कौशल…!’

इस तरह चीख़ते देख कैसर दौड़कर समीप आई- ‘क्या बात है, क्यों चिल्लाए जा रहे हो। तुम्हें हो क्या गया है? पागल हो गए हो क्या… अभी भाईजान सुन लेंगे तो?’

‘हां… हां… सुन लेने दो… साला कायरों की तरह जी रहा हूँ। तुम सब हत्यारे हो। तुमलागों ने हत्या की है मेरी। कभी माफ नहीं करूंगा मैं तुमलोगों को…।’

तेज आवाज़ें सुनकर घर के दूसरे लोग भी कमरे के बाहर इकट्ठा हो गए। भाभियों की खुसर-फुसर शुरू हो गई। भाई नहीं आए। बच्चे भीड़ जमाए अलग खड़े हो गए। कैसर ने कौशल से मोबाइल लेकर डिस्कनेक्ट कर दिया। वह कुछ नॉर्मल हुआ और सोफे पर ढह गया। कैसर का जी बुरी तरह से हौल रहा था- ‘…या अल्लाह… ये क्या हो रहा है। बाज़ आई ऐसी मुहब्बत करके।’ करीब एक घंटा बाद उसने कुछ सोच कर अपनी सखी सुमैया को फोन किया- घर चली आ… बहुत उलझन में हूँ।’

दोपहर करीब एक बजे सुमैया आई। कौशल खा-पी कर अपने कमरे में आराम करने चला गया था। कैसर सुमैया को ले कर टीवी रूम में चली गई। दोनों दीवान पर आमने-सामने लेट गईं।

‘बता कैसर, क्या चल रहा है?’ कैसर ठंडी सांस लेकर रह गई।

‘कुछ बता न… कोई प्रॉब्लेम है?’ फिर कैसर ने सारी सूरत-ए-हाल कह सुनाई। सब सुन कर सुमैया ने गहरी सांस खींची। कुछ देर खमोश सोचती रही फिर बोली- ‘देख कैसर, इन हालात की जिम्मेदार तू खुद है। …ये रिश्ते मरने वाले रिश्ते होते हैं। मरने वाले रिश्ते बड़े ही कांप्लीकेटेड होते हैं। इन्हें नजा़क़त से संभाल कर रखना पड़ता है। बाकी, ये धर्म, संस्कृति और सभ्यता ऐसी चीजें हैं जो किसी पर थोपी नहीं जा सकतीं। जब तक आदमी राजी-खुशी से इसे न अपनाए। या अपने दिल पर न कुबूल करे। कौशल ने मुहब्बत तुझसे की थी तेरे धर्म से नहीं। अपना मज़हब तो तूने उसपर जबरन थेापा है। उसने कितनी जद्दोजहद करते हुए खुद को भीड़ से अलग किया होगा। उसने धर्म की परिकल्पना को ही रिजेक्ट कर दिया था। और कहां तूने उसे उसी बंधन में जकड़ दिया। उसके सिद्धांतों को तेरे प्रेम का ग्रहण लग गया है। ऐसे में वह कहां जी पाएगा। वह कोई कुंद-बुद्वि का इंसान तो है नहीं। उसकी अपनी पहचान थी। मेरी बात पर ध्यान दो, ‘थी’… ‘है’ नहीं। इस ‘थी’ और ‘है’ के बीच में वह पिस रहा है। अपनी आइडेंटिटी खोकर जी पाना बहुत कठिन होता है कैसर…। मैं नहीं जी सकती, तुम भी नहीं जी सकती। इसलिए हमें किसी की आइडेंटिटी छीनने का कोई हक नहीं। हमसे हमारा परिवेश कभी नहीं छूटता। फिर, इस मुहब्बत के इम्तिहान में सिर्फ उसी की आजमाईश क्यूं हुई? उसने सबकुछ खो दिया, पर तुमने क्या खोया है? तुम्हें तुम्हारा धर्म प्यारा था, तुम उसे ले के रहती। उसे उसकी तरह जीने देती। मगर यहां तो सबकुछ एकतरफा ही रहा। तुमने सबकुछ पा लिया, उसने सबकुछ खो दिया। तुम इतनी सेल्फिश कैसे हो सकती हो? कभी उसका दर्द खुद जीने की कोशिश की तुमने…?’

इतनी देर में कैसर का चेहरा आंसुओं से सन गया था। जुबां पे ताले लग गए थे। अब उसे अपनी ज्यादतियों का ख़्याल आ रहा था। सच है, उसके दंभ और ज़िद के आगे वह हमेशा झुकता ही रहा है। अज़ीम है तभी तो। कुछ देर सन्नाटा छाया रहा फिर सुमैया ने ही सन्नाटा तोड़ा-

‘कैसर, ये ज़हीन लोग जज़्बाती भले ही हो जाएं, मगर कोई भी बात बगैर किसी दलील के कुबूल नहीं करते। कभी ख़ुदा न ख़्वास्ता दिल के हाथों मजबूर हो के ऐसा कर भी लिया तो भी इनकी बौद्धिक और तार्किक चेतना उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। यही हादसा हुआ है बेचारे कौशल के साथ। जज़्बात में आकर उसने ये क़दम उठा तो लिया पर इसे दिल से कुबूल न कर सका। कैसे कुबूल कर सकता है, जबकि वह धर्म की संस्था को ही नकार चुका है। उसके संग नाइंसाफी हुई है इसे कोई भी नहीं सह सकता। एक ही रास्ता है, उसे इन झूठी रिवायतों की बेड़ियों से मुक्त कर दो।’

कैसर को अपने किए पर बड़ा पछतावा हो रहा था। बोली- ‘तू सही कह रही है, मैंने फैसला कर लिया है कि आज ही कौशल को ‘क़ादिर’ के पिंजड़े से पूरी तरह मुक्त कर किसी कबूतर की तरह आकाश में उछाल दूंगी।’

इन्हीं बातों में शाम के छह बज चुके थे। सुमैया को अब लौटना था। कैसर का मन काफी हल्का हो चुका था। दोनों टीवी रूम से नीचे आईं। कैसर उसको बाहरी गेट तक छोड़ कर वापस लौट आई। वह सोचती हुई कमरे की तरफ जा रही थी कि आज वह कौशल को सारी शर्तों और रूढ़ रिवायतों से मुक्त कर देगी। और कल ही दिल्ली वापस लौट जाएगी। अपने वास्तविक वजूद में रहकर ही हम एक-दूसरे को प्यार करेंगे। कौशल, कौशल ही रहेगा। कैसर, कैसर ही रहेगी।’

और कमरे में दाखिल हुई। कौशल था नहीं। वह उसी के बेड पर लेट गई और कौशल के तकिए को उठा के सीने से लगा लिया। तभी देखा उसी जगह पर एक कागज़ फोल्ड किया हुआ रक्खा है। फौरन उठा कर पढ़ने लगी-

‘कैसर, बहुत प्रयास करने के बाद भी कौशल, क़ादिर बनने में नाकाम रहा। मैं क़ादिर नहीं बन सका। तुमने प्रेम कौशल से किया था क़ादिर से नहीं। पर आज तुम्हें कौशल नहीं क़ादिर चाहिए। इसलिए कौशल को तुम्हारे जीवन से दूर लिए जा रहा हूँ। हमेशा के लिए। मुझे ढूंढ़ने का प्रयास मत करना… बस्स… दुआ में याद रखना….!’ कौशल

इतना पढ़ते ही कैसर बाहर की तरफ भागी। भतीजी से पूछा- ‘तूने फुफा को बाहर जाते देखा क्या?’

‘जी फुफी, आधे घंटे पहले ही वे निकले हैं। उनके हाथ में बैग भी था। वह फोन पर किसी से ट्रेन का वक्त पूछ रहे थे।’

वह पागलों की तरह स्टेशन की ओर भागी। रिक्शा करके स्टेशन पहुंची। अभी वह रिक्शा से उतर कर इधर-उधर देख ही रही थी कि पीछे घूमी तो सैलून दिखा और उसके बड़े से आईने में कौशल का सुंदर बिना दाढ़ी मूछ वाला चेहरा। पल भर को वह शॉक्ड रह गई। लगा, उसकी मनाःस्थिति ठीक नहीं है और वहां उसे कौशल नजर आ रहा है। लेकिन तभी किसी ने आकर उसे बांहों में भर लिया। वह कांप रही थी- ‘त…तुम कौशल हो न…मेरे कौशल…!’ वह कौशल के चेहरे पर हाथ फेरती बोली।

‘हां कैसर… लेकिन मुझे कौशल या क़ादिर समझ कर नहीं एक मोहब्बत से भरा हुआ इंसान मान कर प्यार करो तो अच्छा होगा…।’

‘कौशल… उन दाढ़ियों, मूछों और शेरवानी पाजामे में तुम जाने कहां खो गए थे। मुझे तो एजाज जैसा डर लगने लगा था तुमसे। यकीन मानो मैं क़ादिर को कभी कुबूल न कर पाई। तुम कौशल ही हो मेरे लिए।’

‘जानता हूँ…।’

‘कौशल… मैंने तुम्हें सारी शर्तों और रिवायतों से आज़ाद किया। चलो, अपने घर चलते हैं दिल्ली चलते हैं।’

संपर्क :मोहल्ला रानी बाग़, पोस्ट नानपारा, जिला बहराइच -271865  (उत्तर प्रदेश) मो.9415778595