तमिल की महत्वपूर्ण कवयित्री।पिछले बीस वर्षों में आठ काव्य संकलन प्रकाशित।औरतों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा पर मुखर, सामाजिक विषयों पर कई लेख।फिलहाल न्यूयॉर्क में एसोशिएट प्रोफेसर हैं और अपना समय न्यूयॉर्क और चेन्नई में बिताती हैं।

(मूल तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद एन. कल्याण रामन)
हिंदी अनुवाद- राजेश कुमार झा
अनुवाद, लेखन तथा संपादन का लंबा अनुभव।आकाशवाणी में निदेशक के पद पर।

दृश्य

कमरे के अंदर अपनी छाती हौले हौले थपकाता
एक व्यक्ति खांस रहा है
बाहर कहीं दो लोग
बिना आवाज किए सिसक रहे हैं
चुप्पी भरे पार्क में अपने घुटनों को सटाए
एक आदमी बैठा है सड़क पर
और शहर में हर जगह
दिखाई दे रहे हैं लोग
जो खो चुके हैं अपनी नौकरियां
सड़कों पर चल रहे लोगों की अनंत कतारें देखकर
हैरान हो रही हैं चीटियां
दूसरी घोषणा होने के बाद
अनंत पंक्तियां बना कर
वे भी विपरीत दिशाओं में चल पड़ेंगी
डॉक्टर अपना कोट खोलकर
धोती है हाथ
दुबारा धोती है हाथ
अपनी उंगलियों को घूरती है डॉक्टर
फिर धोती है दुबारा
शहर के मोबाइल फोन टावरों में आग लगी है
किसी दूसरे शहर में
बेंच पर बैठा इंसान
उन अनजान कबूतरों को खिला रहा है दाना
जो ले आई हैं
किसी के जिंदा होने की खबर
बंद सुपर-मार्केट के आगे खड़े हैं
कुछ बूढ़े लोग
हवा का झोंका ताकता है
खाली आलमारियों के बीच
इधर उधर, हर तरफ
गुजर जाता है उनके पार
बड़े से गड्ढे के पास
जमा लाशों की भीड़ इंतजार कर रही है
जल्दी से गड्ढे के अंदर डाल दी जाती हैं लाशें
गाड़ियों में बैठ जाते हैं लोग
बाहर छूट गई लाश गुर्राती है
गाड़ी के अंदर से पीछे मुड़कर देखता है एक व्यक्ति
उसकी आंख में घुस जाती है लाश।

चेन्नई से जाते हुए

शहर से बाहर निकलने के रास्तों पर
बेचैन-उच्छृंखल सड़कों पर
धक्कामुक्की कर रही हैं गाड़ियां
उन्हें इजाजत नहीं मिल पाई है
मैं उन गाड़ियों में नहीं हूँ
और न चाहती हूँ उनमें बैठना
शहर की हड्डियों से लटकी
इस वक्त मैं चाहती हूँ
बस थोड़ा सा जादू
काश मुझे कोई बदल दे चमचमाते नमक में
फिर से मैं घुल जाऊंगी बंगाल की खाड़ी में
माइलापुर के संत थामस को छूकर
पहुंच जाऊंगी तट पर
अग्निपुंज सूरज के चरणों को छू लूंगी उचक कर
कहीं भी खड़ी होकर
खाली पड़े बेचैन समंदर के तट पर
सूनी नजरों से देखती
बैठ जाऊंगी
मेरी हड्डियों के नमक में मिल जाएगी
मई महीने की नमक
इस क्षण मेरी का मतलब है
तुम, वह, वे, वे सभी
यहां मौजूद हरेक।

कुछ महीनों के बाद शहर

सत्तर साल की बूढ़ी औरत
जिसे कभी घर से बाहर
निकलने की इजाजत नहीं थी
शहर के बीच बने पार्क में जाती है
सुबह की गुनगुनी धूप का आनंद उठाती
वह लकड़ी के टूटे बेंच पर बैठी है
पार्क के चारों तरफ
पास पड़ोस के लोग
तेज कदमों से चल रहे हैं
वे सावधान हैं
कि उनके बीच बनी रहे छह फीट की दूरी
वे एक दूसरे की ओर देखने से कतरा रहे हैं
औरत नजरें उठाती है
आसमान में कुछ जाने पहचाने कौए उड़ रहे हैं
उनसे वह शिकायत करती है
कि कुछ दिनों से उसकी बहू
उसे आधा पेट खाना देती है
वह कहती है
आजकल उसकी बहू दफ्तर नहीं जाती
बातें करते करते
वह बुदबुदाती है
‘मेरा बेटा अहमक है’
कौए तेजी से जमीन पर झपट्टा मारते हैं
वे उसके हाथों को घूर रहे हैं
जिनमें कुछ भी नहीं है
वह अब भी शिकायत कर रही है
वे जल्दबाजी में हैं
एक कौआ उछलकर गाल पर बैठ जाता है
चोंच मारता है
बहुत जल्द वहां एक और आ जाता है
कौओं को भगाने की कोशिश करते
दो कौओं ने फाड़ डाले हैं उसके हाथ
पार्क में लोग अब भी सैर कर रहे हैं
सभी ने बना रखी है एक दूसरे से
छह फीट की दूरी
छह फीट दूर
कौए तैयारी कर रहे हैं
अपने भोजन के लिए।

कल्पना में कुछ भी अति नहीं

कब्रिस्तान में अनाथों की तरह दफन मुर्दे
जिंदा होकर अपने जाने-पहचाने शहर की ओर
एक साथ दौड़े आते हैं
शरीर के तापमान पर नजर रख रहे ड्रोन की तरफ
हाथी नजरें उठाकर देख रहे हैं, बेतकल्लुफ़
शहर की मुख्य सड़क से
गुजर रहा है एक झुंड
फूला हुआ चांद
देख रहा है कभी दाएं, कभी बाएं
उसके गले में लटक रही है अर्थी
गुफा से बाहर निकलते हैं
दो लोग
रूखे बेतरतीब बालों से ढंका है उनका पूरा शरीर
उन्हें दिन के लिए करनी होगी आग की तलाश
‘कल्पना में कुछ भी अति नहीं’
जिस गुलाब की फुलबाड़ी ने
कभी बीमारी नहीं जानी
झूमझूम कर
गाने लगता है गाना
कर्तव्य पालन को दृढ़ संकल्प तितली
उसके परागों को चूस लेती है
जैसे कभी भगवान होते थे मनुष्यों के लिए
तितलियां भी गुलाब के लिए हैं वही।