मुहम्मद इम्तियाज
युवा लेखक। कहानी संग्रह की दो किताबें। संप्रति आकाशवाणी पटियाला में कार्यरत।
तरसेम
कथाकार और अनुवादक। हिंदी और पंजाबी में लेखन। अद्यतन कविता संग्रह ‘हाशिए पर एक कोना’।

 

 

विश्वविद्यालय का सत्र समाप्त होने पर मैं मलेरकोटला आ गया। चाय-पानी के बाद जब मैं घर से जाने के लिए उठा तो पिता जी ने पूछा, ‘कहां जा रहा है?’

‘हशमत चाचा का हाल-चाल पता कर आऊं!’

मुझे लगा पिता जी आगे से बोलें, ‘जैसा तू बेकार है, वैसे ही लोगों के साथ मित्रता है तेरी।’

मगर वे ऐसा कुछ नहीं बोले। शायद उन्हें चाचा की लगातार गिरती सेहत का पता था। ‘जा-आ। क्या पता होता है आदमी का! … फिर हम लोग बाजार चलें।’

चाचा का घर पिछली गली में था। वह उन दो-चार घरों में से एक था जो नई कॉलोनी बनने से पहले के बने हुए थे। पहले जब कॉलोनी में ज्यादा मकान नहीं बने थे, तब हमारे सबसे करीब घर चाचा का ही था। दोनों परिवारों का एक-दूसरे के घर में आना जाना लगा रहता था। हम खेलते-खेलते उनके घर चले जाते थे।

लेकिन अब हमारे घर के साथ खाली प्लॉटों पर नई कोठियां बन गईं थीं। पिछली गली में जाने के लिए मुझे काफी घूम कर जाना पड़ता। चाचा का घर अब दूर हो गया था। पहले चाचा के पिता और फिर मां की मृत्यु के पश्चात अब उनका हमारे परिवार के साथ रिश्ता भी दूर हो गया था।

चाचा के पिता किसी अरब देश में काम करते थे, जो साल-दो साल बाद घर आते। मैं चाचा की मां को हमेशा बकरियों के पीछे भागते देखता था या घर के कामों में दौड़-धूप करते हुए। दो कमरों और खुले आंगन वाला घर हमेशा साफ-सुथरा होता था। घर का सारा सामान करीने से सजाया होता था।

परंतु आज जब मैं चाचा के घर के भीतर गया तो सबकुछ बिखरा-बिखरा-सा लगा। कमरों के आगे छत वाला बरामदा होने से आंगन छोटा हो गया था। कच्चे आंगन को सीमेंट के फर्श ने खत्म कर दिया था। बकरियां गायब थीं।

चाचा के कमरे में जाते ही पता चलता था कि यहां कई दिनों से झाड़ू बैगरह नहीं लगा। स्पीकरों के साथ पड़ा टू-इन-वन ध्ाूल के साथ भरा हुआ था। दीवार पर तस्वीरें पहले की तरह ही सजी हुई थीं। कई तस्वीरों में चाचा ने काले चश्मे पहने हुए थे। तस्वीरों में लंबे बालों के साथ रंग-बिरंगे पैंट-कमीज पहने वे अस्सी-नब्बे दशक के फिल्मी हीरो की तरह लगते थे।

तस्वीरें देखकर उनकी बातें मेरे जेहन में ताजा हो गईं। वे अक्सर कहा करते थे, ‘आजकल के गायकों को गाना कहां आता है। हर कोई अपने नाम के आगे लगा लेता है ‘लोक-गायक’। इन्हें क्या मालूम लोक-संगीत होता क्या है। यह गुरदीप मान जो आज बड़ा गायक बना फिरता है, ऑडीशन में फेल हो गया था। न इसे फोक म्यूजिक का पता है, न लाइट म्यूजिक का। कहने लगा, मैं लाइट फोक गाता हूँ! बताओ, यह कौन-सी कैटेगरी हो गई संगीत की।’

उस समय वे किसी भी बड़े गायक को नहीं बखशते थे। ‘यह कंत दास जो बाल घुमाता रहता है इधर-उधर, गाने लगा। यह फुकरा था एक नंबर का! …इसका चैक बन कर आ जाता। मगर फिर भी मैं इसे बिठाए रखता शाम तक। इसकी हवा सैट करके फिर इसे भेजता! …घटिया लोग!’

मुझे देखकर चाचा ने उठने की कोशिश की। मैंने उन्हें रोक दिया, ‘परेशान मत हो चाचा! लेटे रहो।’

मैं पलंग के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया।

‘अब कैसी है तबियत?’

उन्होंने ‘पता नहीं’ के अंदाज में हाथ हिलाया। उनके अंदर शायद बोलने योग्य भी ताकत नहीं थी।

यह वही चाचा थे जो बड़ी-बड़ी बातें सुनाते थे। अब उनके गाल पिचक गए थे। चेहरा लंबा हो गया था, जिस पर कालिमा फैल गई थी। उसके लंबे बाल पहले से विरले लग रहे थे। बिखरे बाल उनके चेहरे को और खौफनाक बना रहे थे।

‘और चाचा! कैसे हो?’

उन्होंने उत्तर देने की बजाए फिर उठकर बैठने की कोशिश की, ‘लेटे रहो, चाचा!’

‘कब आया?’ उनकी आवाज किसी कुएं से आती हुई प्रतीत हुई।

‘बस अभी थोड़ी देर पहले!’

काफी देर तक सन्नाटा छाया रहा।

मैंने चुप्पी तोड़ने की कोशिश की, ‘अब तुम बच्चों के साथ नहीं खेलते?’

उन्होंने छत की ओर झांकते हुए उत्तर दिया, ‘आजकल के बच्चे सुनते कहां हैं?’

यह उनका पुराना शिकवा था।

पिछले पंद्रह-बीस सालों से मैं उन्हें यही कहते हुए सुनता आ रहा था। ‘इन आजकल के मुशटंडों को क्या पता! …ऐसे छत्तीस सौ रोजाना हमारे पास रेडियो स्टेशन पर आ कर मिन्नतें करते थे। लेकिन इन्हें क्या मालूम प्रोड्यूसर की क्या इज्जत होती है?”

‘जब यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, तब वे मुहल्ले वालों को घटिया लोग कहा करते थे। जब एम.ए. बीच में ही छोड़ आए, तब यही सब यूनिवर्सिटी वालों को कहने लग गए।’ उनके बारे में मेरे पिता जी ने बताया था।

यूनिवर्सिटी जाने के बाद पिता जी से ही मुझे पता चला था कि चाचा ने भी यूनिवर्सिटी में एक साल लगाया था। एम.ए. का दूसरा वर्ष शुरू होने से पहले ही वह छोड़ आए थे। इस बात का पता चलने से पहले तो वह हमारे लिए केवल बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने वाले कॉलोनी के एक मात्र बुर्जुग थे। ‘चाचा तुम छोड़ कर वापिस क्यों आ गए?’ मैंने उन्हें एक-दो बार पूछा था।

‘स्टेशन डायरेक्टर से झगड़ा हो गया था मेरा। वह समझता था कि वह मालिक है स्टेशन का। …एक गीतकार एक साधारण मलवई अनपढ़ महिला के बारे में गीत लिख कर गया, जिसमें उसने लिखा, ‘टेशन ते खड़ी उड़ीकदी’। स्टेशन डायरेक्टर मेरे पीछे पड़ गया, कहने लगा ‘स्टेशन’ होता है, ‘टेशन’ नहीं। मैंने फैसला कर लिया-जहां लोगों को मलवई भाषा और टकसाली भाषा का फर्क न मालूम हो, वहां मैंने नहीं काम करना। घटिया लोग…!’

उनके साथी बाल-बच्चेदार थे। सारे अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते। वह अपनी मां वाली बकरियां खोलते-बांधते रहते या घर के छोटे-मोटे काम कर देते। शाम को हमारे साथ क्रिकेट खेलने लग जाते।

एक बार वह अपने पिता के पास अरब देश भी गए, लेकिन वहां रहने की बजाए वह साल-छह महीने में ही वापिस लौट आए। ‘घटिया लो!’

जब हम छोटे थे तो उन्हें बहुत बड़ी चीज समझते थे। उनके कपड़े व बालों की नकल करने की कोशिश करते। उनकी बात बड़ी गौर से सुनते। ‘तब लड़कियां-लड़के हमें देखने के लिए हमारे स्टूडियो के बाहर जमा हो जाते। गलियों में से गुजरते तो लोग-बाग हमें खिड़कियों से देखते थे और परिचालक हम से टिकट नहीं लेते थे।’

धीरे-धीरे हम सब अपनी-अपनी पढ़ाई में व्यस्त होते चले गए।

कभी कभार कॉलोनी की गलियों में अचानक मिलने पर वे अब भी हमें बातें सुनाने लग जाते। ‘आजकल वाले गायक लाइव सुरीला गा कर दिखाएं। मिक्सिं कर-कर के ही सुर-ताल मिलाना जानते हैं। कंप्यूटर पर कभी फेड-इन और कभी फेड-आउट कर के, कभी ईको देकर बेसिर-पैर की बकवास किए जाते है। गीतों में न इनसे शब्दों की लय बनती है, न मतलब बनता है कोई। बस तुकबंदी किए जा रहे हैं।’

परंतु उनकी बातों के साथ अब हमारा कोई ज्यादा सरोकार नहीं होता था और सुनने की हमारी सहनशीलता भी अब कम हो गई थी। मेरे जैसा पिंड छुड़ाने के लिए कहता, ‘चाचा! अपना रेड़ियो स्टेशन खोल लो।’

‘अब पहले जैसी बातें कहां! अब तो रेडियो वाले भी और ही चक्करों में पड़े रहते हैं। दो-चार बातें कर कर के, दो-चार मिन्टों का ट्रैक ला कर काम खत्म कर देते हैं।’

हमारे बाद वह हमसे भी छोटों के साथ खेलने लग पड़े थे। मगर कॉलोनी बनने के साथ धीरे-धीरे खाली प्लॉटों वाले ग्राउंड भी खत्म होते चले गए।

मैंने उनकी ओर चेहरा झुकाया। ‘चाचा! रोटी-ओटी का कैसे चलता है?’

‘ब्रेड… खा लेता हूँ… चाए-दूध के साथ।’

‘…और दवाई?’

‘डॉक्टर दे जाता है… घर आकर।’

‘मेरा मतलब है- यदि किसी चीज की जरूरत हो तो…’

उन्होंने ‘न’ में हाथ हिलाया।

फिर जैसे कुछ याद आया हो- वे लेटे-लेटे ही बेड के दूसरी ओर झुके।

उन्होंने मेरी ओर देखते हुए एक पत्थर की तख्ती मेरी जांघों पर रख दी। ‘दो दिन पहले…’ उनकी सांस उखड़ी हुई थी,  ‘…बनवा कर लाया हूँ।’

‘इस हालत में गए थे आप?’ मुझे सुन कर झटका-सा लगा।

‘जरूरी था। किसी और ने तो… मेरी कब्र पर… लगा देना।’

मेरी आंखें भर आईं। मैंने तख्ती की ओर देखा। जिस पर खुदा हुआ था : हशमत अली, रेडियो प्रोड्यूसर।

संपर्क :मुहम्मद इम्तियाज, डी-4, ऑल इंडिया रेडियो कॉलोनी, अर्बन एस्टेट फेज-3, पटियाला, पिन-147002 मो.8968062521
तरसेम, बी- दखखख/1561 गली नं. 1-ए, जिम के पास, लक्खी कॉलोनी, बरनाला- 148101 पंजाब मो.9815976485