कथाकार और अनुवादक। हिंदी और पंजाबी में लेखन। अद्यतन कविता संग्रह हाशिए पर एक कोना

लोहा

नहीं, यह किसी युद्ध की तैयारी नहीं
न ही किसी व्यूह की रचना
देश की सीमा है
अपने देश… भारत की

अचरज है
जिसकी सड़कों पर
लोहा छलावे की भांति पड़ा है
कभी यह कंकरीट की दीवार बन जाता है
कभी कंटीली तारें
कभी लोहा कीलों में बदल जाता है
कीलें तीखी सूली में
हक के लिए जूझते
न्याय मांगते

किसान के लिए बनी है सूली
किसान इस देश का है
देश उसकी दीर्घायु के लिए
कर रहा है दुआ
किसान जानता है
लोहा पहली बार तो नहीं
ढला बेड़ियों में
हथकड़ियों में
क्या हुआ अगर लोहे ने
कीलों का रूप धारण कर लिया
हाथ-पैर, आंख-जीभ
और बोलों पर ठुकने को तैयार
फ़सलों-नस्लों को भेदने के लिए व्याकुल
बस सिर्फ इक फोन कॉल की देर है

भले ही अन्याय-अत्याचार का रोह
लहू में लावा बन कर दौड़ रहा है
लेकिन बाबा नानक ने बताया है
रोह1 को रहाओ2 में कैसे बदलना है

राह में ही रोक लिए
अन्न-जल-रोशनी
लेकिन हवा के पैरों को
कौन रोक पाया?
लोहा छातियों को भेद सकता है
पर किसी भी तरह
आंसुओं से ताकतवर नहीं होता
एक दरवेश ने करके दिखाया
दुनिया ने देखा

पैर पैदल यात्रा की ओर चलते
तो आहट सुन कर लोहा जाता
‘ठहरो’
पैरों के चलने की ध्वनि सुनती
हम तो ठहरे ही हुए हैं
मगर तुम कब ठहरोगे
लोहा आगबबूला होकर
बुद्ध को ढूंढ रहा है!

1. रोह – क्रोध 2. रहाओ – ठहराव

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