सहायक प्राध्यापक। एक कहानी संग्रह दो ध्रुवों के बीच की आस

‘एक फ्रेंच फ्राइज, एक कॉफी’ का आर्डर देकर अधिकारी से नजर आते 60-65 साल के वृद्ध व्यक्ति ने एक उड़ती सी नजर आस-पास डाली।अपने में मगन, युवा जोड़े बेफिक्री से बैठे थे।जो अधेड़ थे, यथासंभव अपने हाव-भाव, परिधान और मेकअप से अपने आपको युवा, स्मार्ट चुस्त-दुरुस्त दिखाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

कॉफी और फ्रेंच फ्राइज़ आ चुके थे।वे धीरे-धीरे उसे चबाने लगे।कॉफी के चम्मच से कॉफी हिलाने लगे।यही टेबल नंबर 12 उनकी पसंदीदा जगह थी जहां से वे बाहर की सड़कें और वहां के क्रिया-कलाप देख सकते थे।उकताने पर अंदर देख लो फिर बाहर।यह सिलसिला चलता रहता।

‘गुड इवनिंग सर, आज मैडम नहीं हैं आपके साथ।’ वहां की पुरानी अधेड़ मैनेजर, जो उन्हें बरसों से जानती थीं, इसी टेबल नंबर 12 पर बैठते देखा है उन्हें, पूछा।उन्होंने सर उठाकर उसकी तरफ देखा, बोले ‘हां, आज नहीं आईं मैडम, कुछ तबीयत नासाज थी, आप कैसी हैं?’

एवरीथिंग इज़ फाइन सर, वुड यु लाइक टू हैव एनीथिंग एल्स’, उसने विनम्रता से पूछा।

‘नो नो, एनफ फ़ॉर टुडे, आप तो जानती हैं, मैं अकेला यहां कहां आता हूँ’, उन्होंने जवाब दिया।

‘ओके सर’ कहकर वह चली गई, तभी जोर से खिलखिला कर किसी के बोलने की आवाज आई ‘वॉव मिसेज़ कपूर! यू लुक सो यंग, आई डोन्ट बिलीव दैट यू हैव बीकेम ग्रैंड मदर, माई गॉड।’ और मिसेज कपूर का कॉम्पलिमेंट पाकर फूल कर कुप्पा हो जाना, अभिमान से भर उठना, हालांकि औरत निश्चित रूप से सुंदर थी, और जवानी में कइयों का चैन चुराती होंगी, लेकिन चेहरे पर उम्र के निशान थे और खूबसूरत होने के बावजूद उम्र दादी नानी जितनी ही लग रही थी।लेकिन तारीफ करनेवाली को कोई काम निकालना होगा जो ऐसी झूठी तारीफ कर रही थी और वह रूपगर्विता अपनी उम्र को छुपाने के चक्कर में कैसी हास्यास्पद लग रही थी।बचकानी हरकतें कर रही थी।देखकर वे मुस्कराए बिना रह नहीं पाए।अपनी बीबी याद आ गई।उसे उन्होंने कभी किसी दौड़ का हिस्सा बनते नहीं देखा।सुंदर, शालीन, सभ्य, पढ़ी-लिखी और आत्मविश्वास इतना कि कुछ भी पहन ले उसकी गरिमा देखते ही बनती थी।बिना दिखावा किए भी, बचकाना, फूहड़ हुए बिना भी स्टार ऑफ द पार्टी कैसे रहा जाए यह उससे सीखा जा सकता था।

अकसर कहती, ‘चाइल्डिश और चाइल्ड लाइक का अंतर लोग समझ ही नहीं पाते हैं।’ करीब पांच बरस पहले वह छोड़कर चल दी, तबसे अकेले हैं, लेकिन दोस्ती हमेशा रही तनुजा और अनुज के साथ।उसके पति थे तब भी।हालांकि अनुज ज्यादा साथ नहीं दे पाया।बच्चा १० साल का था, तब एक बीमारी में चल बसा।खैर, तनुजा पढ़ी-लिखी थी, उसने बच्चे को संभाल लिया।उन्होंने भी अपनी दोस्त का साथ नहीं छोड़ा।अपनी पत्नी और बच्चों के साथ तनुजा और उसके बच्चे को भी इस टेबल नंबर 12 पर साथ लाते रहे।तनुजा और अमृता में कभी कोई संदेह ने जन्म नहीं लिया।दोनों परिवार एक ही रहे।अमृता के जाने के बाद भी यह दोस्ताना बना रहा।बच्चों की शादियां हो गई थीं।दोनों के बच्चे विदेश में थे, और ये दोनों यहां।कुछ  रिश्तेदार जरूर खुसुर-पुसुर करते थे, लेकिन दोनों के बीच स्नेह बना हुआ था।

बरसों से इस टेबल पर हर सप्ताह के अंत में दोनों साथ आते।

‘चलूं देखूं क्या हाल हैं मैडम के।’ घर पहुंच  डोर बेल बजाई तो राजमा-चावल की तेज महक के साथ दरवाजा खुला। ‘अरे तनुजा जी, आपकी तबीयत  खराब थी, अचानक ठीक हो गईं, आज का प्रोग्राम भी छुड़वा दिया।वे घुसते हुए बोले।

‘अरे अब रुकिए भी, सब एकसाथ पूछ डालेंगे क्या? बताती हूँ, ये जो तनुजा का तन है न, यह मन के हाथों बीमार हो गया था।कब मन तन पर हावी हो गया और आज बीमार महसूस करने लगी।फिर दिन में जैसी कि आदत है अपनी, उतार फेंका मन का लबादा, और तन तंदुरुस्त देखिए’, वे बोलीं।वे मंत्रमुग्ध से उनकी तरफ देखते रह गए।

ऐसी सकारात्मकता कितनों को नसीब होती है, कुछ लोग होते हैं योद्धा की तरह हार नहीं मानने वाले।वे और निश्छल मन के तनुजा उनमें से एक हैं।

वे बोलीं ‘चाय पिएंगे न?’

वे ठहाका मार हँस पड़े और बोले, ‘क्यों नहीं, जरूर पिएंगे, फिर इवनिंग वॉक पर चलेंगे’।उन्हें अपने रोमांटिक अंदाज से तनुजा को छेड़ना अच्छा लगता था।किचेन से ही तनुजा बोली, ‘आदर्श का फोन आया था, बोल रहा था इस बार आप लोग अमेरिका आ जाओ, वह नहीं आ पाएगा।’

‘हां, सौरभ भी यही बोल रहा था।अच्छा है, दोनों अमेरिका में हैं तो दोनों को एक दूसरे का सहारा है और हमें यहां, बोल दीजिए हम आ जाएंगे, लेकिन तीन महीने से ज्यादा नहीं, यहां भी तो…’

बीच में बात काटती सी बोली, ‘हां यहां भी तो रहना जरूरी है।राजा साहब की रियासत न लुट जाएगी’।दोनों खिलखिला कर हँस पड़े।इवनिंग वॉक पर जा रहे थे तो दोस्त भी मिल गए,  ‘क्या बात है, शनिवार की शाम आज टेबल नंबर 12 उदास नहीं होगी तुम दोनों को वहां न पाकर’।सभी ने एक साथ ठहाका लगाया। ‘अच्छा है विनोद तुम दोनों का नज़रिया, कुढ़ते कलपते लोग हर बात में कलपते रहते हैं, सास ससुर के साथ हैं तो प्राइवेसी के लिए रोते हैं, अकेले हों तो सब अकेले ही करना पड़ता है का रोना, बेटा बहू साथ हो तो पटती नहीं, न हो तो अकेलेपन का रोना।तुम्हारा अच्छा है, सबके साथ थे तब भी खुश, अकेले हों तब भी खुश, कितने रह पाते हैं इस तरह।’ बात तो सही कह रहे थे दोस्त।ऐसा नहीं कि कुछ कड़वाहट नहीं आई दोनों परिवारों के बीच, या दोस्तों, रिश्तेदारों ने छींटाकशी न की हो।लेकिन सरल मिलनसार स्वभाव और निर्दोष चित्त के अपने दोस्तों को देख वे धीरे-धीरे खुद ही चुप हो गए।

दोनों के बच्चे अमेरिका में हैं।साल भर में एक बार हो आते हैं वहां।विनोद जी और तनुजा जी दोनो रिटायर्ड हो चुके थे, लेकिन विनोद जी एक कॉउंसलिंग सेंटर में अपनी सेवाएं देते थे और तनुजा जी एक एनजीओ से जुड़ गई थीं, इसलिए अकेलेपन से हैरान नहीं होते।बेटा बहू अपने साथ ही रहने को बोलते रहते, लेकिन जहां जीवन गुजरा वहां से कहीं जाने का मन नहीं करता।

अगले दिन टेबल नंबर 12 पर दोनों अपने चिर परिचित अंदाज में थे, और संगीत का आंनद ले रहे थे।संगीत का समूह उनका परिचित था सो पुराने गानों की फरमाइश का दौर चल पड़ा।एक के बाद एक सुरीले गानों से माहौल रूमानी हो गया।होटल की मैनेजर उदास थी, यह तनुजा जी बड़ी देर से देख रही थीं।उसके पास जाकर बोलीं, ‘क्या बात है आरती, बड़ी देर से देख रहीं हूँ, उदास हो?’

अपनत्व का स्पर्श पा आरती की आंखें भर आईं, बोली, ‘देखिए न तनुजा दी, बच्चे का बड़ी कंपनी में प्लेसमेंट हो गया है।अब वह ऑस्ट्रेलिया  जा रहा है।’

तनुजा खुशी से उछल पड़ी, ‘अरे, यह तो खुशी मनाने की बात है, तुम उदास हो रही हो, मिठाई खिलाओ भाई।’

आरती बोली, ‘लेकिन मैं अकेली हो जाऊंगी।अब इस उम्र में अकेलापन।पति से तलाक के बाद का अकेलापन तो झेल लिया था, लेकिन…’ यह कहते-कहते वह फफक-फफक कर रो पड़ी।

तनुजा जी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते और थोड़ा डांटते हुए कहा, ‘आजकल के मां-बाप न बड़े अजीब से हो गए हैं।बच्चों को लेकर बड़े-बड़े सपने देखते हैं, उन सपनों के पूरा होने की मन्नते मांगते हैं और जब वे सपने पूरे हो जाते हैं और बच्चे दूर देश चले जाते हैं तो अकेलेपन का रोना रोते हैं।

एक बात जान लो, सबकुछ एक साथ नहीं मिलता।अभी कुछ दिन पहले एक रिश्तेदार के बेटे का अमेरिका का वीसा पक्का हो गया था, तो यह तुम ही थी न जो कह रही थी कि पता नहीं कब तक मेरा बेटा यहां सड़ेगा।इसका विदेश जाने के योग कब आएगा और अब…।’

आरती भौचक रह गई।सच ही तो कह रहीं थीं।कितने स्वार्थी हो गए हैं माता-पिता।अपनी महत्वाकांक्षाओं, दोस्तों के बीच अपने बेटे के विदेश में होने का रौब झाड़ते हम ही बच्चों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं।फिर रोते भी हम हैं, बच्चे बेचारे करें भी तो क्या? हर हाल में ठीकरा उनके सर पर।सोचते-सोचते अपने बेटे के रुआंसे चेहरे का ध्यान आ गया।क्या उसे याद नहीं आएगी अपनों की, अपने देश की।तनुजा जी का हाथ पकड़ कर बोली, ‘आदर्श भी अमेरिका में है, क्या आप अकेलापन महसूस नहीं करतीं?

क्यों भाई करने को इतने काम हैं और क्या अपने अकेलेपन के लिए बच्चों को घर बिठा दें।वहां चले जाएंगे तो आधा समय यहां, आधा वहां।खुश हो कि दायरे बढ़ रहे हैं, न खुश हो तो स्वीकार तो करो।

तुम भी न कहां पुराने जमाने की बात लेकर बैठी हो।अब कोईं माता-पिता दुखी नहीं होते बच्चों के बाहर रहने से।हम चार छह महीने वहां रहते हैं, बच्चों के साथ बच्चों जैसे हो जाते हैं।मैं और विनोद जी दोनों ही एक योगा सेंटर के लाइफ टाइम मेंबर हैं, जिसकी दुनिया के हर देश में ब्रांच हैं।वहां विजिटिंग योगा टीचर और मेंटर के तौर पर सेवाएं देते हैं।बस हो जाता है, बच्चों का साथ, योगा और नए नए लोगों से मिलना।यहां का तो तुम्हें पता ही है।’

‘बहू से खट-पट नहीं होती’, वह मुस्कुराती-सी बोली।

‘कर दी न वही टिपिकल इंडियन सास वाली बात! होती क्यों नहीं, खूब होती है, बोल चाल के मामला वो भी साफ कर लेती है, मैं भी।लंबा नहीं खींचते।मेरा मां से भी झगड़ा होता था।अब भाई अलग-अलग इनसान हैं, अंतर तो होगा ही न।मेरा काम करने का तरीका मेरी सास से अलग था।बहू का मुझसे अलग है।वक्त के साथ चलो।सबके तरीके अलग होते हैं, तो क्या हमने ऐसा किया, हमने वैसा किया का राग अलापते रहें।मैं नहीं अलापती, बल्कि नया सीख लेती हूँ।बात खत्म, उनके जैसे रह लिए क्या फर्क पड़ता है।’

‘लेकिन अपनी आदतें ऐसे नहीं छूटतीं’ वह बोली।

‘ईगो नहीं छूटता डीयर, आदत-वादत तो फालतू बात है।ईगो छोड़ दोगी तो सब आसान हो जाएगा।चल साथ बैठ कॉफी पीते हैं’ तनुजा जी ने कहा।

‘विनोद जी और मैं भी जा रही हूँ अपने बच्चों के पास।न्यूयॉर्क तक का टिकट साथ में करवा लिया है, फिर वहां से वे अपने घर, मैं अपने घर।दोनों के बेटे लेने आ जाएंगे’, उन्होंने उत्साह से कहा।

‘एक बात पूछूं, कभी आपको इस दोस्ती से परेशानी नहीं हुई? आपके परिवार, रिश्तेदार और विनोद सर के…’ आरती ने झिझकते हुए पूछा।

‘परेशानी, कैसी परेशानी? ओह समझी, हमारा समाज, वह तो किसी भी औरत मर्द को चाहे वे किसी भी उम्र के हों, साथ देख नहीं पाता।क्या आज भी वो औरत मर्द की दोस्ती को पचा नहीं पाते।हां, कुछ परेशानी होती है, लेकिन परवाह किसे, मैंने अनुज के बाद अकेले जीवन जिया है, अपने को संभालना जानती हूँ।और विनोद जी के परिवार ने कितना साथ दिया।दोस्ती कोई आज की है क्या?’

थोड़ा ठहर कर बोली, ‘तुझे पता है शुरू-शुरू में कुछ रिश्तेदारों ने कहा था विनोद जी को विनोद भइया कह दिया करो, क्या जाता है।लेकिन मैं हर आदमी को भइया क्यों कहूँ, क्यों आड़ लूँ इस शब्द की, और अगर इस शब्द की आड़ न लेकर मैं किसी को सम्मान देती हूँ तो क्या उससे मेरा कोई रिश्ता बन जाता है।पता नहीं दुनिया हर समय रिश्ते जोड़ने में क्यों लगी रहती है।सबको भइया कैसे कहें, कुछ व्यावसायिक साथी होते हैं, कुछ दोस्त होते हैं।लेकिन नहीं, औरत और आदमी के बीच दोस्ती, या जी वाला सम्मान भाव समझ ही नहीं आता, किसी को जी लगाकर बुलाने से आप उसके प्रेमी प्रेमिका नहीं हो जाते।औरतें भी समाज के डर से और खुद कुछ अपने ही डर से सबको भइंया बोल देती हैं, क्यों… क्या डर है।मुझे अपने पर भरोसा है, और सामने वाले पर भी, इसलिए कभी उलझन नहीं हुई, न मुझे न विनोद जी को, लोगों को होने दो।’

आरती एक टक उन्हें देखती रही।

वे फिर बोलीं, ‘अपनी सोच का दायरा बढ़ाओ, अगले महीने हम भी जा रहे हैं।अब छह महीने बाद मुलाकात होगी।’

कहकर वे अपने टेबल की ओर चल दी।आरती ने स्पेशल कॉफी उनके टेबल पर मुस्कराते हुए पहुंचा दी।

अमेरिका जाने की तैयारी होने लगी।कितना वजन ले जा सकते हैं, बच्चों के लिए क्या क्या ले जाना है, उधर से फोन पर फर्माइशें और हिदायतों का दौर जारी था, वीडिओ कॉल करके सभी तरह की तैयारियों का जायजा ले रहे थे बच्चे।बाजार जा-जा कर खरीदारी, वहां के लिए कपड़े और सामान, घर के बने समान ले जाने की अनुमति नहीं, बड़ी मुश्किल से पैक कर हैंड बैग में क्या ले जा  सकते हैं, क्या नहीं, की पूरी लिस्ट बच्चों ने भेज दिए थे ताकि कस्टम चेक में कोई परेशानी न हो।तमाम हिदायतों और कागजों की लिस्ट और सूटकेस पर पहचान चिह्न, नाम और पते का स्लिप चिपका कर समान तैयार कर लिया था।दो तीन दोस्तों ने मदद की और वजन भी तय सीमा में कर वे निश्चित दिन अमेरिका जाने के लिए निकल पड़े।यात्रा की बेचैनी, घबराहट तनुजा जी पर हावी हो जाती है।

‘शुरू से मैं यात्रा पर जाने की तैयारी में इतनी थक जाती हूँ कि जाने की खुशी तनाव में बदल जाती है’, वह बोलीं।

वे अपने बैग में कागज एक बार फिर चेक करते हुए बोली, ‘सब रख लिया न’ चाबियां दोस्तों को देकर, नौकर-चाकरों की तनख्वाह दे, काम समझा वे निकल गए।

विनोद जी बोले, ‘चलो अब शांति।’

‘अभी कहां, जब तक उड़ान न भर ले प्लेन तब तक मेरी हालत ऐसी ही रहेगी’, उन्होंने जवाब दिया।

एयरपोर्ट पर सारी औपचारिकताएं ठीक तरीके से पूरी हुईं तो जान में जान आई।

अब वे बैठ चुके थे और तनुजा जी शांति से जूस पीकर आराम कर रही थीं।जल्द ही उन्हें नींद लग गई।तैयारी की दौड़ भाग की थकान वे यात्रा में ही पूरी करती हैं हर बार।बीच-बीच में उठकर आसमान और उसकी खूबसूरती देख लेतीं।कब कहां पहुंचे, पता करती हैं।वे जानते हैं, दो चार घंटे की नींद में दोनों तरोताजा हो जाएंगे।

चाय कॉफी, खाने का दौर शुरू हो चुका था।वे अब निश्चिंत थे।खाना खाकर अपनी पसंद की किताबें निकाल लीं और पढ़ने लगे।बीच-बीच में डिस्कस कर लेते।यात्रा पूरी हुई और वे लोग न्यूयॉर्क के हवाई अड्डे पर थे।दोनों के बेटे, आदर्श और सौरभ लेने आ गए थे।दोनों परिवार एक ही रहे हमेशा तो कोई औपचारिकता तो थी नहीं, सो मिलेजुले और विनोद जी न्यूयॉर्क में अपने बेटे के यहां और तनुजा जी बाल्टीमोर अपने बेटे के यहां चले गए।

चार महीने में भी घूमते-फिरते दोनों परिवारों का मिलना-जुलना जारी रहा।व्यस्त दिनचर्या, लेकिन सप्ताहांत में भरपूर मस्ती में गुजरता।हफ्ते भर की छुट्टी ले बच्चे दोनों को घुमा भी लाते।दोनों अपने परिवारों की दुनिया में खुश।वीडियो कॉल पर दोनों परिवार हर हफ्ते बात भी करते।कई बार साथ भी घूमने गए।एक ही जगह जाना हो और छुट्टी एक समय पर हो, तो साथ जाने का प्रयास दोनों तरफ से हो जाता।कुल मिलाकर खुशनुमा ज़िंदगी, क्योंकि सामंजस्य सब तरफ से होता।एक दूसरे की प्राथमिकताओं को ऊपर रखने की आदत में बरतन खड़कने की नौबत कम ही आती।आती भी तो ज्यादा लंबा कोई नहीं खींचता।

लेकिन पिछले दिनों तनुजा जी के बेटे-बहू अजीब सी कशमकश में थे।बहू, नमिता ने कहा, ‘विनोद अंकल और माँ के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है।’

‘क्या ख्याल है मतलब, दोनों दोस्त हैं, अच्छा है’ आदर्श ने जवाब दिया।

‘दोस्त से ज्यादा होना चाहें तो?’ नमिता ने पूछा।

आदर्श ने तमक कर कहा, ‘क्या मतलब है तुम्हारा, माँ क्या इस उम्र में किसी का हाथ थामेंगी, वह बहुत मजबूत हैं।पापा के जाने के बाद कितने लोगों ने उन्हें शादी के लिए कहा, लेकिन… मुझे अकेले पाला है उन्होंने, उन्हें कोई सहारा…’

‘सहारे की बात नहीं कर रही मैं, साथ की बात कर रही हूँ।तुम जब तक उनके पास थे, साथ था, अब तुम्हारी शादी हो गई, तुम यहां हो, वो वहां।कल को बच्चे होंगे तो हम अपने में व्यस्त।ऐसे में कोई साथ तो चाहिए।विनोद अंकल का साथ क्या बुरा।उनके अकेलेपन की बात सोचो।दोनों की ही’, नमिता ने हाथ पर क्रीम लगाते हुआ कहा।

आदर्श सोच में पड़ गया, ‘सच है।यूं तो मां अपने को व्यस्त रखती हैं, लेकिन अकेलेपन का कोई तो साथी हो।सदा से अकेली ही थीं’।सोचते-सोचते मां पर प्यार आ गया।बोला, ‘यहां भी पूरे समय नहीं आतीं।पता है, उन्हें वहां अच्छा लगता है, फिर भी कोई तो हो।विनोद अंकल हैं तो, उनके होते आज तक कभी सोचना ही नहीं पड़ा कि वो अकेली हैं, उनकी तरफ से भी कभी कोई इशारा नहीं हुआ।’

‘अब वो खुद कहेंगी क्या, कैसी बात करते हो, हमें ही समझना होगा’, नमिता ने कहा।

‘बात तो ठीक है, लेकिन क्या पता वो ऐसा कुछ सोचते ही न हों, दोस्ती में ही खुश हों, हम कहीं जबरन कोई बात मन में डाल दोस्ती में संकोच न बढ़ा दें’, आदर्श ने कहा।

‘हाँ, यह भी है।ऐसा करते हैं, कल सौरभ से बात करते हैं।उनकी क्या सोच है।इस दोस्ती को लेकर।अगर मां और अंकल जी दोस्ती में खुश हैं तो कोई दबाव नहीं, लेकिन अगर हल्का सा भी ऐसा कुछ लगे तो उनको साथ लाना हमारी जिम्मेदारी होगी, क्यों…’ नमिता  ने आदर्श का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।

‘हां, मां कितनी भी दबंग क्यों न हों, यह बात खुद तो कहेंगी नहीं’, आदर्श ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

अगले दिन आदर्श ने सौरभ को फोन किया, ‘कैसे हो सौरभ।’

‘ठीक हूं, तू बता, क्या हाल है।’ सौरभ ने जवाब दिया।

‘अच्छा हूँ, एक बात करनी थी’ वह कुछ झिझकते हुए बोला।

‘पापा और आंटी जी के बारे में’, सौरभ ने तुरंत कहा।

‘वह चौंका, तुझे कैसे पता?’

‘अरे यार, बचपन से एक दूसरे को जानते हैं।क्या एक-दूसरे के भाव नहीं समझेंगे’ सौरभ ने आराम से कहा।दो दिन से मैं भी तुझसे बात करने की सोच रहा था।बता क्या बात है?

‘यार, मम्मी और अंकल जी की दोस्ती तो मिसाल है।मैं यह सोच रहा था कभी वे दोस्ती से आगे कुछ सोचें तो…’ आदर्श ने कहा।

‘तो क्या, तू लड़कीवाला बनकरदुल्हन को विदा कर देना और हम लड़केवाले बनकरदिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, गाते आ जाएंगे और क्या’, एक जोर का ठहाका लगाते हुए सौरभ ने कहा।

वह भी जोर से हँस दिया।

फिर सौरभ थोड़ा गंभीर हुआ, बोला, ‘उनकी दोस्ती की जो निश्छलता है या दोस्ती के अलावा वो किसी और रिश्ते में वे सहज हैं, ऐसे में लगता नहीं कि अपनी स्वतंत्रता में वे किसी को भी शामिल करेंगे।लेकिन बुढ़ापा, अकेलेपन के कारण कभी वे ऐसा कुछ सोचते हैं तो हमें क्या आपत्ति होगी भला।न मुझे न वीणा को, न तुम्हें, न नमिता  को।अब दुनिया बदल गई है यार और नहीं बदलेगी तो हम बदल देंगे।’

‘तो क्या बात करें’, आदर्श ने कहा।

‘नहीं नहीं, अभी नहीं, कहीं ऐसा न हो कि उन्हें लगे कि बच्चे शक कर रहे हैं और संकोच में उनकी दोस्ती पर असर पड़े।करते हैं इंतज़ार एक दो साल और, फिर बात करेंगे, तब तक दोस्ती तो बदस्तूर जारी है।क्यों, क्या बोलता है?’ सौरभ ने पूछा।

‘हाँ बिलकुल ठीक।चल, तुझसे बात कर उलझन सुलझ गई’, आदर्श ने जवाब दिया।

दोनों पति-पत्नी मुस्करा दिए।

भारत से आए पांच महीने हो गए थे।वीसा की अवधि समाप्त होने वाली थी।इन पांच महीनों में तनुजा जी ने भारत की तरह तमाम खाने-पीने का समान न सिर्फ खिलाया-पिलाया, बल्कि बना-बना कर रख भी दिया।भारतीय मां जो ठहरीं, जो भी समान बनता, दोनों घर पहुंचा दिया जाता।विनोद जी भी जो करते, दोनों परिवारों के लिए बराबर।यह रिश्ता बिना किसी स्वार्थ के बस एक-दूसरे से दोस्ती का था।

एक दिन विनोद जी से बात करने के बाद तनुजा जी ने कहा, ‘बेटू, विनोद अंकल सत्ताईस  तारीख के टिकट की उपलब्धता बता रहे हैं, साथ में ही टिकट करवा दे।’ बेटे-बहू ने मुस्कराते हुए उन्हें देखा, और गले में बाहें डाल शरारत से बोले, ‘मां, आपको आपकी टेबल नंबर 12 याद आ रही है न।लेकिन छह महीने बाद वापस लौटना है, यह ध्यान रखना।’ आदर्श ने नाटकीय भंगिमा बनाते हुए कहा, ‘जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी।’

तनुजा जी ने मुस्कराते हुए दोनों के सिर पर हल्की सी चपत लगा दी और बोलीं ‘शैतान कहीं के!’

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All Images : Pankaj Tiwari