कालिंदी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रो़फेसर।

थेरीगाथा प्रथम प्रतिश्रुति के रूप में स्त्री गाथा का जीवित दस्तावेज है।धर्मशास्त्रों का हवाला देकर पितृसत्तात्मक समाज ने बहुत समय तक स्त्रियों को ज्ञान के अधिकार से वंचित रखा था।नारी को माया कहा गया, वासना का केंद्र माना गया।इसके बावजूद स्त्रियों ने धर्म की नई राह पर चलकर अपने लिए मुक्ति के द्वार तलाश लिए।यह बात बुद्धकालीन थेरियों से लेकर अंडाल, मीरा और ताज जैसी स्त्रियों के संदर्भ में देखी जा सकती है।

लंबे समय तक ज्ञान और अध्यात्म पर पुरुषों का एकाधिकार था।सभी शास्त्र और दर्शन ग्रंथों के प्रणेता पुरुष ही हुए।अपवादस्वरूप कुछ विदुषियों के नाम भले गिना दिए जाएं, लेकिन सचाई यह है कि स्त्रियों को पुरुषों के समकक्ष स्थान और अवसर देने के बारें में कभी सोचा ही नहीं गया।स्त्री की भूमिका संततियों को बढ़ाने तक संकुचित कर दी गई थी।उसकी इच्छा-अनिच्छा का कोई अर्थ नहीं था।घर से लेकर धर्म तक के मामले में पुरुष स्वच्छंद था।वह चाहे तो विलासी हो या घर-परिवार त्याग मुक्ति की तलाश में संन्यासी बन जाए, उसपर कोई बंदिश नहीं थी।बुद्ध का उदाहरण हमारे समाने है।इसी प्रकार शंकराचार्य ने आठ वर्ष की आयु में संन्यास धारण कर लिया था।क्या स्त्रियों के लिए ऐसा करना संभव था? पुरुषों के लिए पारिवारिक जिम्मेदारियां कभी बाधक नहीं बनीं।लेकिन स्त्री के लिए गृहस्थ जीवन के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं था।

बौद्ध काल से पहले धर्म में नारियों को संन्यास लेने का अधिकार नहीं था।उनके लिए ज्ञान और भक्ति के सभी रास्ते बंद थे।पहली बार बौद्ध संघ में स्त्रियों को भी धर्म और आध्यात्मिक चिंतन के लिए भिक्षुणी बनने का अधिकार दिया गया।यद्यपि संघ में स्त्रियों को प्रवेश देने के लिए बुद्ध के भीतर भी द्वंद्व था, जिसका समाधान उनके शिष्य आनंद ने निकाला था।बुद्ध जानते थे कि स्त्री होना दुख है।फिर भी वह नहीं चाहते थे कि स्त्रियों को भिक्षुणी बनाया जाए।आनंद ने बुद्ध से कहा, ‘जब स्त्रियां गृहस्थी को छोड़ दें और बौद्ध सिद्धांतों को स्वीकार कर लें तो क्या कारण है कि वह कल्याण मार्ग प्राप्त न कर सकें जिसको पुरुष प्राप्त करते हैं।’ बुद्ध ने स्त्रियों को भिक्षुणी बनने की स्वीकृति दे दी।वे देख रहे थे, संघ के सामने अनेक तरह के खतरे हैं।सबसे बड़ा खतरा यह है कि भिक्षु और भिक्षुणियों के आपसी संबंध वैसे ही न हो जाएं, जैसे समाज में होते हैं।

पुरुषों को स्त्रियों से दूर रहने का निर्देश देने वाले बुद्ध समाज के भीतर स्त्रियों के साथ हो रहे पक्षपात को जानते थे।उन्होंने भी यशोधरा के साथ अन्याय किया था।हो सकता है, अपने अपराधबोध से मुक्त होने के लिए उन्होंने बौद्ध संध में भिक्षुणियों को आने की स्वीकृति प्रदान की हो।

जो हो, स्त्रियों ने संघ में आकर पहली बार स्वाधीन जीवन का स्वाद चखा।उपेक्षा और एकरसता से ऊबकर स्त्रियों द्वारा गृहस्थ जीवन को त्यागने का संकल्प उस युग में आसान नहीं था।परिवार से मोहभंग होने के बाद स्त्रियों ने संन्यासिन होने का साहस दिखाया था, यह उस समय एक क्रांतिकारी घटना थी।गृहस्थ जीवन से ऊबी हुई स्त्रियों को बौद्ध संघ ने आसरा दिया।स्त्री संन्यासियों के लिए भी तब पहली बार मठों की स्थापना हुई।सामाजिक विषमता मिटाने के लिए बुद्ध चाहते थे कि मनुष्य को संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और सांसारिकता का त्याग कर भिक्षावृत्ति के आधार पर संघ में रहकर वह अपनी मुक्ति के लिए साधना करे।

बुद्ध काल की 73 थेरियों में लगभग सभी वर्ण और वर्ग की स्त्रियों का होना इस बात का प्रमाण है कि बौद्ध लोग वर्ण व्यवस्था और पितृसत्तात्मकता से मुक्त थे।कहा जाता है कि स्त्री होने की पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ही बुद्ध की माता महाप्रजापति के साथ 500 स्त्रियों ने सिर मुंडवा कर गृहस्थिन से संन्यासिन बनने का चुनाव किया था।इतनी बड़ी संख्या में स्त्रियों का संन्यासिन होना एक युगांतरकारी घटना थी।स्त्री के लिए गृहस्थ और संन्यस्त जीवन के बीच चुनाव करने में भारी द्वंद्व रहा होगा।समानता और आत्मसम्मान की चाहत  रखने वाली स्त्रियों ने निर्वाण से ऊपर जीवन में विश्वास दिखाया था।उन्होंने प्रतिदिन तिल-तिल मरने से बेहतर अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए घर त्यागने का जोखिम उठाया था।उनके इस निर्णय ने बुद्ध को स्त्रियों के लिए संघ के दरवाजे खोलने के लिए विवश कर दिया।बुद्ध के इस प्रयोग ने बुद्ध को भारतीय समाज में लैंगिक समानता का उदाहरण स्थापित करने वालों की पहली पंक्ति में खड़ा कर दिया और बौद्ध धर्म को जन-जन तक पहुंचा दिया।थेरीगाथा की रोहिणी के मन में धम्म जीवी के प्रति अपनी श्रद्धा इस रूप में प्रकट करतीं है, ‘वे बहुश्रुत हैं, धर्म को जानने वाले हैं, आर्य हैं।धर्माभ्यास ही उनकी उपजीविका है।वह धर्म और परमार्थ का उपदेश करते हैं।इसलिए श्रमण जन मुझे प्रिय हैं।’

चंदा भिक्षुणी कहती है, ‘मैं विधवा और निस्संतान, पहले बड़ी मुसीबतों में पड़ी थी।मेरे मित्र और अपना कहने वाला कोई नही था, जाति वाले कोई नहीं थे।मुझे भोजन और वस्त्र मिलना भी आसान नहीं था।’ दासप्रथा के कारण स्त्रियां शारीरिक तथा मानसिक शोषण का शिकार होती थीं।घर और बाहर के शोषण से मुक्ति का एकमात्र उपाय था गृहत्याग कर बौद्ध संघ में शरण में जाना।दोहरे शोषण में पिस रही स्त्रियों के लिए घरेलू श्रम और उपेक्षा को सहना उनकी नियति थी- ‘अहो! मै मुक्त नारी हूँ।मेरी मुक्ति कितनी धन्य है! पहले मैं मूसल लेकर धान कूटा करती थे।आज मैं उससे मुक्त हो गई हूँ।मेरी दरिद्र अवस्था के छोटे-छोटे भांडे बर्तन के बीच मैं मैली-कुचली बैठती थी।मेरा निर्लज्ज पति मुझे उस छतरी से भी तुच्छ समझता था जिसे वह अपनी जीविका के लिए बनाता था।’

थेरियां घर छोड़ने के बाद कितनी सुखी थीं, यह कहना कठिन है, लेकिन यह तय है कि उस युग में बौद्धों ने अपने संघ में स्त्रियों को प्रवेश का अधिकार न दिया होता तो जीवन की कुंठाएं मनोरोग बनकर उनको जीते जी मार देतीं।इसलिए संधा कहती है, ‘प्रज्ञा लेकर मैंने घर छोड़ा, अपनी प्रिय संतान को छोड़ा, अपने प्रिय पशुओं को छोड़ा, राग और द्वेष को छोड़ा, अविद्या को छोड़कर विरक्त हुई तृष्णा को समूल नष्ट कर अब मैंने निर्वाण की परम शक्ति का अनुभव किया है।निर्वाण का अनुभव करके मैं परम शांत हो गई हूँ।’

उस युग में एक स्त्री के लिए घर-परिवार छोड़कर संघ में जाना वास्तव में पुंसवादी व्यवस्था के विद्रोह में खड़ा होना था।थेरियों के रूप में स्त्रियां सामूहिक रूप से पुरुष वर्चस्व के एकाधिकार को चुनौती देती दिखाई देती हैं।मानसिक और दैहिक प्रताड़ना की पीड़ा में वे वर्षों से घुट रही थीं।उससे निजात पाने के लिए यह उनका संगठित आंदोलन था।उनकी अभिव्यक्तियों से इस बात की पुष्टि होती है कि बौद्ध संघ में जाने के बाद घुट-घुट कर जीते जी मर रही स्त्रियों को पुनर्जीवन मिला था।कहा जा सकता है कि बौद्ध संघ ने पुंसवादी व्यवस्था से त्रस्त होकर आत्महत्या करने वाली स्त्रियों को एक उद्देश्य के साथ जीने के लिए प्रेरित किया।इसलिए थेरियां बार-बार इस बात का उल्लेख करती हैं, ‘मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्कर में मुझे अब और घूमना नहीं है, मैंने तीनों विद्याओं का साक्षात्कार कर लिया है।’

बौद्ध धर्माश्रय को ढाल बनाकर थेरियां अपने जीवन की यंत्रणाओं की बेबाक अभिव्यक्ति करने में सफल थीं।इतिहास साक्षी है कि जब-जब स्त्रियों को ज्ञान के अवसर प्राप्त हुए, तब-तब वे शिक्षित और सशक्त होकर पुरुषों के समकक्ष खड़े होने का साहस कर पाईं।शायद इसी कारण सदियों तक स्त्रियों को  शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया था।

ध्यान देने की बात है कि धर्म, दर्शन, शास्त्र और पुराण के रचनाकार पुरुष ही क्यों हुए? क्या स्त्रियों में क्षमता का अभाव था या इसके पीछे कोई और वजह थी? राजशेखर के अनुसार, ‘पुरुषों के समान ही स्त्रियां भी कवि हो सकती हैं।ज्ञान का संस्कार आत्मा से संबंध रखता है।उसमें स्त्री या पुरुष का भेद नही है।सुनते और देखते हैं कि अनेक राजकुमारियां, मंत्रियों की पुत्रियां, वेश्याएं एवं नाट्यकारों की स्त्रियां प्रकांड विदुषियां और कवयित्रियां हुई हैं।

दिलचस्प बात है कि जिस समय संस्कृत का शिष्ट साहित्य पुरुषों द्वारा रचा जा रहा था, उसके समानांतर थेरियों को आध्यात्मिक और सांसारिक अनुभवों को जनमानस में शब्दबद्ध करने की स्वतंत्रता बौद्ध धर्म के माध्यम से मिली थी।शिष्ट जगत ने साधारण स्त्रियों से हमेशा दूरी बनाई।इसके लिए उन्होंने उन्हें अपनी भाषा से वंचित रखा, लेकिन लोक इस मामले में हमेशा उदार रहा है।स्त्रियां अपनी सामूहिक अभिव्यक्ति लोक साहित्य के माध्यम से करती थीं।शिष्ट साहित्य की तुलना में लोक साहित्य हाशिये के लोगों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रहा है।

आध्यात्म या ‘धम्म’ के सहारे स्वभाषा के हथियार को अपनी शक्ति बनाकर स्त्रियों ने अभिव्यक्ति की सभी बाधाओं और दीवारों को ढाह दिया था।इसलिए बाद में स्त्रियों ने थेरियों को अपनी पुरखिन की तरह अपने अवचेतन में जिलाए रखा।आंडाल, मीरा आदि स्त्री भक्त उसी इतिहास की चिनगारियां हैं।

73 थेरियों के उदगार हों, आंडाल की कथाएं या मीरा और ताज की भक्ति हो, सब अपने युग के वे साक्ष्य हैं जिन्होंने पुंसवादी अभेद्य किलों में घुट रही आवाजों को जन-जन में पहुंचाने का दुस्साहिक कार्य किया है।

थेरीगाथा सभ्यता और संस्कृति के तले दबी हुई स्त्री  मुक्ति की प्रथम आवाज है जिसकी गूंज आज तक सुनाई पड़ रही है।बौद्ध युग की थेरियां आत्मचेतस स्त्री का प्रतीक है जो अपने युग की  तमाम वर्जनाओं और बंधनों को तोड़कर मुक्त होने की आकांक्षा में यह धोषणा करती हैं, ‘स्त्री मात्र देह नही, मनुष्य है।इसलिए उन्हें जीते जी मुक्ति का स्वाद चखना है, मरने के बाद मुक्ति किसने देखी है!’