नए कथाकार। कोई कारण होगा’ (कहानी संग्रह) और अधूरा सफर’ (उपन्यास) प्रकाशित।

आज पांचवा दिन भी निकल गया…!

शाम के धुंधलके का गहरा शाया पूरे परिवार के चेहरे पर घना हो गया है। सभी बेहद श्रांत और थके हुए हैं। दिन भर मजदूरों के साथ एक पैर पर खड़ा रह कर उन्हें बातों में उलझाए रखना और फिर इस बात का भी पूरा खयाल रखना कि उन्हें पता नहीं चले कि वे निगरानी में हैं, साधारण बात नहीं है। दिन भर मजदूरों के साथ ही परिवार के सभी लोग शाम होते-होते थक कर चूर हो जाते हैं। सुबह में जगी उम्मीद की किरण शाम होते ही निराशा के गहरे अंधकार में डूब जाती है।

दोनों भाई नरेंद्र और विकास आंगन में चौकी पर चुपचाप बैठे हैं। जैसे किसी के पास कुछ भी कहने को नहीं है। नरेंद्र की पत्नी आंगन के पूर्वी हिस्से में छोटकी चपाती बेल कर तवे पर सेंकने में लगी है। आंगन का पश्चिमी हिस्सा घर से निकाली गई मिट्टी के ढेर से भरा है। दोनों भाइयों के सामने थोड़ी देर पहले का बना नींबू के चाय का प्याला चौकी पर रखा हुआ है। उपेक्षित-सा। जैसे चाय पीने की इच्छा किसी को नहीं हो। तेरहवीं तक दूध की चाय भी नहीं मिल सकती, यह सोचते हुए नरेंद्र ने चाय का प्याला उठा लिया।

‘मैंने तो पहले ही कहा था कि घर खुदवाने की कोई जरूरत नहीं।’ विकास ने कहा, ‘अम्मा इतनी बेवकूफ थोड़े ही थी कि जमीन में गाड़कर रख देती…। वह भी इतनी मूल्यवान चीज…’

नरेंद्र की पत्नी और छोटकी ने एक साथ तीखी नजरों से विकास को देखा। जैसे उसने कोई अजीब बात कह दी हो!

‘हर जगह खाक छानने के बाद ही तो खुदाई शुरू हुई न…?’ नरेंद्र ने कहा, ‘हमने ही यह भूल की कि मकान बनाने के बाद फर्श का काम अधूरा छोड़ दिया। यदि उसी समय फर्श का काम पूरा हो गया होता तो आज यह नौबत नहीं आती।’

‘बाबूजी से पूछ लेने में क्या हर्ज है?’ विकास घूम-फिर कर बाबूजी के पास चला आया।

‘पूछना ही होता तो इतना सबकुछ करने की जरूरत ही क्या थी?’ नरेंद्र ने तीखे स्वर में कहा, ‘उनसे पूछने का मतलब तो यही है न कि हमें उन पर भरोसा नहीं…?’ भरोसा होता तो खुदाई की जरूरत ही क्यों पड़ती? यह बात विकास के गले में अटककर रह गई। वह चुप लगा गया। बोलना मुनासिब नहीं समझा। वैसे भी वह बहुत कम बोलता है।

अम्मा को गुजरे सात दिन हो गए हैं। वैसे वह बीमार नहीं थी। बीमार तो बाबूजी चल रहे थे। सो अम्मा का जाना काफी आश्चर्यजनक और तकलीफदेह था। पर मृत्यु का क्या भरोसा? किसे लेकर कब चली जाए। मृत्यु का इंतजार करने वाले ताकते रह जाते हैं और जिसे जाना होता है बिना किसी हवा-फिटकरी के चल देता है। अम्मा के साथ भी यही हुआ। खबर मिली तो भरोसा ही नहीं हुआ। पर बाबूजी की आवाज झुठलाई तो नहीं जा सकती थी न! सो खबर मिलते ही आनन-फानन में दोनों भाई अपने अपने परिवार के साथ घर आ पहुंचे। बाबूजी के साथ ही गांव के लोग भी दोनों भाइयों की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। अम्मा का शव आंगन में पड़ा था। उन सबके आने के बाद लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। रुदन और चित्कार से नरेंद्र की पत्नी और बड़की का बुरा हाल था। लोग सांत्वना दे रहे थे जो होना था वह हो गया। अब रोने-धोने से क्या फायदा?

‘अम्मा के हाथ में जादू था…।’ गांव के लोग अम्मा के जाने से दुखी थे। उनकी जुबान पर एक ही बात आ रही थी जैसे इसके अलावा अम्मा में और कोई खासियत ही नहीं रही हो, ‘कैसी भी चोट-मोच हो, अम्मा का हाथ पड़ते ही ठीक हो जाता था। अब तो सीधे डॉक्टर के पास ही जाना पड़ेगा। नाहक में हजारों का खर्चा उठाना पड़ेगा सो अलग से।’

अम्मा छोटी चोट-मोच की बड़ी डॉक्टर थी। उसके वश का नहीं होने के बाद ही किसी को डॉक्टर से दिखाया जाता। सो लोगों के अंदर अम्मा के जाने का गहरा दुख था। यूं ही कोई किसी के लिए रोता नहीं। बिना स्वार्थ के। अम्मा किसी के चोट-मोच को ठीक करने के एवज में एक पैसा नहीं लेती। वहीं तेल मालिश की जरूरत होती तो अपना ही तेल खर्च करती। कहती जब ईश्वर ने हाथों में इल्म दी है तो उसे बेचूं क्यों। किसी को फायदा हो गया तो वह हजार दुआएं देगा और उन दुआओं का फायदा उनके बाल-बच्चों को मिलेगा। इससे ज्यादा भला अम्मा को चाहिए ही क्या? सो बिना फीस के वे एक अच्छी डॉक्टर थीं और यह बात सबके लिए सोने में सुहागा जैसी थी।

गांव में पिता की अच्छी साख और जमीन जायदाद है। पूरा गांव उन्हें सम्मान की नजर से देखता है। आदर-प्रतिष्ठा देता है। सो श्राद्ध कर्म भी पुराने चलन के अनुसार ताम-झाम के साथ होगा। चाचा का कहना था कि अपने घर का कोई भी यज्ञ ऐसा-वैसा नहीं हुआ है। सो श्राद्ध में एक लाख से कम खर्च आने का कोई सवाल ही नहीं है। पूरे गांव को भोज दिया जाएगा। दही-चूड़ा, पूरी-जलेबी और बुनिया के अलावा हर व्यक्ति के लिए दो-दो रसगुल्ले। तीन-चार किस्म की सब्जियां तो होनी ही चाहिए। आलू के अचार और मुरब्बा भी। गांव-जवार के खाने वाले लोग भी दो हजार से कम नहीं होंगे। सभी को खिलाया जाएगा। ऐसा न हो कि कोई बाकी रह जाए और उसकी आत्मा में अम्मा के भोज में न खाने का मलाल रह जाए। मलाल रह गया तो समझो सारा खर्च बेकार हो गया। सो कहीं कोई कमी नहीं होगी। चाहे जितने रुपए लग जाएं? आखिर इज्जत-हुकमत के लिए ही तो आदमी कमाता है। उस पैसे का क्या महत्व जिससे आम लोगों को कोई फायदा न हो?

श्मशान घाट से लौटने तक दस हजार रुपए निकल गए। पांच गाड़ियों में भर कर सौ से ज्यादा लोग मजल (शवयात्रा) गए थे। बाजा-गाजा अलग से। श्मशान घाट पर कुछ लोगों ने छक कर पूरी-जलेबी के साथ दारू का भी लुत्फ उठाया। नरेंद्र को घीसू-माधव याद आ गए। गरीब तो इसी के लिए जीते हैं न! कभी अच्छा भोजन और दारू मिल जाए तो जनम सवारथ होने जैसा लगने लगता है। गांव-देहात में यह किसी की मरनी-हरनी पर ही मिलता है।

नरेंद्र को यह सब बहुत बुरा लगा किंतु चाचा की इजाजत होने के कारण कुछ बोल नहीं पाया। जो करना है करें। कल होकर यह तो नहीं कहेंगे न कि मैंने रोक दिया? दोनों भाई जी खोलकर श्राद्ध और दान में खर्च करने के लिए तैयार हैं…। किंतु बीच में यह झंझट आन खड़ा हुआ। अब इससे भी तो निपटना ही पड़ेगा न…?

अंत्येष्टि से लौटे तो शाम हो गई। आंगन में क्रिया लगाने की विधि शुरू हुई तो बूंदा-बांदी शुरू हो गई। फिर धीरे-धीरे यह हल्की बारिश के रूप में तब्दील हो गई। लोगों की आवाजाही और बारिश के कारण पूरा घर-आंगन पांक से किच-किच हो आया। इस बारिश को भी अभी होना था। सब कुछ होने के बाद रात में बरसता तो क्या बिगड़ जाता? नरेंद्र ने सोचा। पर मौसम पर किसका वश है? बारिश को जब होना होगा, होगा। बहरहाल किसी तरह क्रिया की विधि पूरी हुई।

‘अम्मा के पास एक लकड़ी का बक्सा था जिसमें वे अपना सारा गहना रखती थीं।’ सबसे पहले छोटकी ने बात उठाई।

‘वह तो मैंने भी देखा था जब मैं ब्याह कर घर लाई गई थी।’ नरेंद्र की पत्नी ने कहा, ‘उसी बक्से के अंदर से अम्मा ने सोने का कंगन निकालकर मुझे दिखाया था। अम्मा का कहना था कि इस बक्से में रखे गहने दादी अम्मा के हैं, जो उन्हें विरासत में मिले हैं और अम्मा के बाद इसपर हमारा अधिकार हो जाएगा…।’

वह दस इंच चौड़ा, बारह इंच लंबा और छह इंच मोटा लकड़ी का एक छोटा बक्सा था जिसे अम्मा सहेज कर रखती थी। बक्से की खासियत यह थी कि उसमें ताला लगाने की कोई जरूरत नहीं थी। बढ़ई ने लकड़ी की कील फंसाकर कुछ इस तरह बनाया था कि जानने वाले ही उसे खोल सकते थे। अनजान व्यक्ति लाख दिमाग लगाकर भी उस बक्से के खुलने का रहस्य नहीं जान सकता था। पता ही नहीं चलता कि वह बक्सा खुलेगा किधर से।

‘बक्से में ढेर सारे गहने थे पुराने जमाने के…?’ छोटकी ने पूछा, ‘कहां है वह बक्सा…?’

‘अम्मा के संदूक में होगा।’ नरेंद्र की पत्नी ने कहा, ‘लाखों रुपए के गहने हैं उसमें!’

‘मैंने कभी वह बक्सा देखा नहीं।’ नरेंद्र सन्न रह गया, ‘देखो तो कहां है?’

रात में ही बक्से की तलाश शुरू हो गई। संदूक पुराने जमाने के साजो-सामान से भरा पड़ा था। कुछ ऐसी भी चीजें थीं जो आज के जमाने के लिए फालतू या बेकार थीं या उनकी कोई आवश्यकता नहीं थी। पर अम्मा ने उन सारी चीजों को सहेज कर रखा था।

हाथ के बुने कपड़े के आसन, कसीदा काढ़े हुए पंखे, चोर बट्टू, मौनी, पौती और न जाने किन-किन फालतू चीजों से भरा था संदूक। यह संदूक भी दादी अम्मा के जमाने का ही था जिसे अम्मा ने अभी तक सहेज कर रखा था। संदूक से एक-एक चीज निकालकर बाहर रख दिया गया। गद्दा-रजाई और तोसक भी। लगभग एक घंटा इसी में निकल गया, पर बक्से का उसमें कहीं अता-पता नहीं चला। इस तरह जहां-जहां अंदेशा था वहां बक्से की तलाश कर ली गई।

वह तो कहीं मिल ही नहीं रहा।छोटकी ने परेशान होकर कहा, ‘जाने कहां छुपाकर रखा है अम्मा ने?’

‘घर में ही होना चाहिए, जाएगा कहां?’ नरेंद्र ने कहा, ‘अम्मा और बाबूजी के सिवा इस घर में रहता ही कौन है जिस पर शक किया जा सके? हम लोग बाहर ही रहते हैं।’

‘क्या पता बाबूजी ने रखा हो!’ विकास ने अपनी शंका व्यक्त की।

‘उनके कमरे में चौकी और बिस्तर के सिवा है ही क्या?’ नरेंद्र ने कहा, ‘आलमारी भी तो नहीं है वहां। अपने कपड़े भी वे दीवाल में लगी कील पर टांगते हैं।’

‘उन्हीं के पास होगा बक्सा!’ विकास ने जोर देकर कहा, ‘कल सुबह पूछ लेंगे।’

‘उनसे पूछोगे बक्से के बारे में?’ नरेंद्र खीझ पड़ा, ‘वे क्या जानते होंगे? क्या तुम्हें पता है कि छोटकी अपने गहने कहां रखती है? यह हर औरत का निजी मामला होता है और पति को इससे कोई मतलब नहीं होता। यदि बक्से के बारे में उनसे पूछ ही लिया तो क्या सोचेंगे वे? यही न कि इधर अम्मा मरी है और हमें गहने की फिक्र पड़ी है। गहने के लिए लालची हो गए हैं हम…? जबकि उसपर हमारा ही हक है।’

विकास चुप था। उसने मुंह खोला, ‘तर्क करने से क्या फायदा। मिलना होगा तो मिल ही जाएगा। अब उसके लिए कहां तक जान खपाई जाए…?’

घर में जहां भी बक्सा होने की संभावना थी, तलाशी कर ली गई। एक बार नहीं, दो-दो, तीन-तीन बार। पर कुछ भी पता नहीं चला। सारे लोगों के लिए बक्सा रहस्यमयी चीज बन कर रह गया था। थक-हार कर सभी एक जगह बैठ गए। बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। विकास दो पल के लिए बरामदे तक गया और बाबूजी को अपने कमरे में चौकी पर चित्त पड़े देख कर लौट आया। कमरे में लालटेन की हल्की रोशनी फैली थी। उनके सिरहाने रखा लंबी डोरी से बंधा पीतल का लोटा चमक रहा था। वे इसी लोटे को लेकर हर सुबह दिशा फराकत को जाते थे और ब्रह्म बाबा के पास स्थित कुएं पर आकर हाथ- मुंह धोते थे। चौकी पर चित्त पड़े, जाने वे गहरी नींद में थे या अम्मा के जाने के अवसाद में। कुछ भी पता नहीं चल पाया।

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि अम्मा ने चोरी के डर से वह बक्सा जमीन के अंदर गाड़ कर छुपा दिया हो?’ नरेंद्र की पत्नी ने जैसे ही कहा सबके सामने एक विकल्प खुल गया। गांव-देहात में चोरी की घटनाएं आम बात हैं और प्रायः औरतें अपना गहना जमीन के अंदर छुपा देती हैं ताकि चोरों को भी इसका सुराग नहीं लग सके। जब बक्सा घर में कहीं मिल ही नहीं रहा, तो जरूर वह जमीन के अंदर ही कहीं गड़ा होगा।

‘लेकिन यह कैसे पता चलेगा कि किस घर के किस कोने या जमीन के किस हिस्से में हो सकता है?’ विकास ने सहज-सा सवाल किया तो सभी असहज हो गए। चेहरे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं।

‘हां, यह बात तो ठीक है।’ नरेंद्र ने कहा, ‘यह तो अम्मा को ही पता होगा और अम्मा अब रही नहीं बताने के लिए।’

‘होगा तो किसी न किसी घर के अंदर ही?’ छोटकी ने कहा, ‘मिट्टी खोदने के बाद ही पता चलेगा कि कहां है?’

‘घर में श्राद्ध है। ऐसे में मिट्टी खोद कर बक्सा तलाश करना वाजिब नहीं।’ विकास ने कहा, ‘फिर यह कम झंझट का भी काम नहीं है। पता होता कि कहां है तो काम चल भी सकता था। यह तो हवा में तीर चलाने की कवायद से कम न होगा।’

‘तुम्हें तो हर काम में मीन-मेख निकालने से ही फुर्सत नहीं मिलती।’ नरेंद्र ने विकास को आड़े हाथों लिया, ‘यह नहीं सोचते कि बक्सा गया कहां और कैसे हासिल किया जा सकता है। उलटे बनती राह पर रोड़े डाल रहे हो। पता भी है कुछ तुम्हे? पुराने जमाने के बहुत सारे गहने होंगे उस बक्से में। दो लाख से ऊपर के ही होंगे आज की तारीख में। पर तुम्हें उसमें कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा। मिल जाए तो समझो जिंदगी की गाढ़ी कमाई मिल गई। लाख रुपए से ज्यादा श्राद्ध में खर्च है…।’

‘जो करना है, करें। मुझे क्या?’ विकास चुप हो गया।

मामला पेचीदगी भरा था। नरेंद्र इस बात से घबरा रहा था कि उस बक्से के बारे में बाबूजी से कैसे पूछा जाए? इधर बक्सा था कि मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। जादुई बक्से की तरह सबके लिए रहस्यमयी बना हुआ था। पर कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही है। वह भी ऐसा कि बाबूजी को भी इस संबंध में कुछ पता नहीं चले। हां, मिल जाने के बाद उन्हें बताने में किसी तरह की दिक्कत नहीं है। आखिर तो वे गहने हमलोगों के लिए ही हैं न? सोचते-सोचते सहसा नरेंद्र को विकल्प मिल ही गया, ‘क्यों न घर के आंगन एवं कमरे के फर्श का काम करा दिया जाए। काम कराने के लिए मिट्टी की खुदाई जरूरी ही है। इस तरह वह बक्सा भी मिल जाएगा और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा।’

‘श्राद्ध में कोई घर का काम कराता है!’ विकास फिर टपक पड़ा, ‘लोग क्या कहेंगे! और ‘फिर भी यदि बक्सा नहीं मिला तब…? तब तो हजारों का खर्च बेकार ही जाएगा।’

‘नहीं मिलना होगा तो नहीं मिलेगा। पर हम पहले ही हार क्यों मान लें?’ नरेंद्र ने तिक्त भाव से कहा, ‘कौन उसके बिना रोजी-रोटी के लाले पड़े हैं? फिर घर का काम भी तो किसी न किसी दिन कराना ही है। इसी बहाने काम भी पूरा हो जाएगा।’

‘लेकिन बाबूजी काम कराने की अनुमति देंगे तब न?’ नरेंद्र की पत्नी ने शंका व्यक्त की, ‘यदि मना कर दिया तो…?’

‘या तुमलोग उस बक्से की तलाश कर लो या मैं जो करता हूँ, उसे करने दो।’ नरेंद्र खीझ पड़ा, ज्यादा चकर-पकर मत करो।’

सभी चुप हो गए। जो कुछ करना है नरेंद्र के जिम्मे… उन्हें इस संबंध में कुछ नहीं बोलना है…। क्या पता कब सिर पर आसमान उठा लें।

श्राद्ध कर्म बीतने के बाद नरेंद्र ने कहा, ‘बाबूजी, हम चाहते हैं कि घर के सभी कमरे का फर्श बना दिया जाए। घर में जहां-जहां मरम्मत की जरूरत है, उसे भी ठीक करा दिया जाए ताकि घर रहने लायक हो सके।’

बाबूजी काफी देर तक गुमसुम बैठे रहे। जैसे काफी कुछ सोच-विचार कर रहे हों। फिर बोले, ‘अब घर ठीक करा कर क्या करोगे। तुम सबको तो बाहर ही रहना है। रह गया मैं, तो मैं बरामदे में भी रह लूंगा। फिर श्राद्ध में जाने कितने रुपए खर्च हुए। काम लगाओगे तो उसमें भी लाख डेढ़ लाख का खर्चा आएगा। मेरी समझ से तो ऐसे ही रहने देना ठीक होगा। आगे तुम लोगों की मर्जी…!’

बाबूजी ने एक तरह से अनुमति दे दी। इसके बाद कमरे का फर्श बनाने के लिए कमरे से मिट्टी निकालने का काम शुरू हुआ था और एक-एक दिन करके दस दिन निकल गए। इस क्रम में तीन कमरे का फर्श भी तैयार हो गया। शेष बचे दो कमरोें में से भी मिट्टी निकाल ली गई थी और फर्श बनाने का काम चल रहा था। लेकिन बक्सा कहीं नहीं मिल पाया था।

 ‘अब काम भी समाप्त होने वाला है, लेकिन बक्सा नहीं मिला।’ नरेंद्र ने गहरी उदासी के साथ कहा, ‘सारा खर्च भी बेकार ही गया…।’

‘मैं पहले ही कह रहा था, पर आप माने नहीं…।’ विकास ने खीझते हुए कहा। 

बात बढ़ाने से कुछ नहीं होगा, यह सोचकर नरेंद्र चुप हो गया। फिर बात बढ़ती तो बाबूजी तक भी पहुंचती।

शाम के करीब सात बजे बाबूजी अपने कमरे में पहुंचे। कुछ देर तक इत्मीनान से बैठे जाने क्या सोचते रहे! फिर नरेंद्र को आवाज दी। नरेंद्र के आने के बाद बाबूजी ने सभी को अपने कमरे में बुलाने के लिए कहा। सबके आने के बाद एक एक के चेहरे को कुछ क्षण तक निर्विकार रूप से देखते रहे। फिर गहरी सांस लेते हुए बोले, ‘तुम लोगों को जिस चीज की तलाश है, वह मेरे पास है… मेरे कमरे में…। लेकिन तुम लोगों को पहले ही मुझसे बताना चाहिए था। फर्श बनाने में नाहक इतना बड़ा खर्च नहीं होता…। आखिर फर्श बनाने या घर मरम्मत कराने की कोई जरूरत नहीं थी…।’

सभी एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। बाबूजी को कैसे पता चला, यह किसी की समझ में नहीं आया। बाबूजी ने आहिस्ता से अपने सिरहाने से तकिया और कपड़ा हटाया। फिर बोले, ‘बक्सा यहां है। मैंने काफी पहले इसे चौकी के अंदर मिस्त्री बुला कर फिट करा दिया था ताकि चोरों से सुरक्षित रहे।’

फिर वे धीरे से उठे और खूंटी पर टंगी कमीज से चाबी निकाल कर नरेंद्र को दिया, ‘देख लो कि बक्से में क्या-क्या है और दोनों भाई बांट लो ताकि…।’ बाबूजी ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया। एकाएक सभी को लगा कि पैरों तले से जमीन खिसक गई हो। सभी सन्न रह गए।

बाबूजी शून्य में नजरें टिकाए जाने क्या सोच रहे थे…।

संपर्क सूत्र :ग्राम+पोस्ट नवादा, वाया जलालपुर बाजार, जिला छपरा (सारण) बिहार-841412 मो.9430011504