युवा कवयित्री।हिंदी शिक्षिका, दिल्ली पब्लिक स्कूल, गया।

खलता था खल रहा है खलेगा

मुझे खलता था तुम्हारा हर सुबह
मुझे नींद से जगा देना
तुम्हारी चाय बना देने के लिए
वैसे चाय बनाने से मुझे कोई एतराज़ तो नहीं
पर हफ़्ते में किसी एक दिन
सुबह की चाय हम दोनों के लिए तुम बनाते
तो ‘शायद’ खलना बंद हो जाता!

मुझे खलता था ऑफिस जाने से पहले
मेरे लिए तुम्हारा अपने प्लेट में जूठा छोड़ जाना
वैसे तुम्हारा जूठा खाने से मुझे कोई एतराज़ तो नहीं
पर उसे छोड़ते हुए प्यार से पूछते-
मुझसे खाया नहीं गया, क्या तुम खा लोगी?
तो ‘शायद’ खलना बंद हो जाता!

मुझे खलता था तुम्हारा ऑफिस से लौटते ही
अपने ऑफिस की झंझटों
सफ़र की जद्दोजहद के किस्से सुनाते हुए
मुझपर सारी भड़ास निकाल देना
वैसे तुम्हारे दिन-भर के किस्से सुनने से
मुझे कोई एतराज़ तो नहीं
पर कभी मेरी दिनचर्या भी जानने में रुचि दिखाते
तो ‘शायद’ खलना बंद हो जाता!

मुझे खलता था रात के भोजन के बाद
तुम्हारा टीवी या उपन्यास लेकर बैठ जाना
वैसे तुम्हारे टीवी देखने या उपन्यास पढ़ने से
मुझे कोई एतराज़ तो नहीं
पर कभी बर्तनों की सफाई या बिस्तर तैयार करने में हाथ बटा देते
तो ‘शायद’ खलना बंद हो जाता

मुझे खलता था स़िर्फ रात को ही सोते वक्त तुम्हारा
मुझसे प्यार जताना
वैसे तुम्हारे प्यार जताने से मुझे कोई एतराज़ तो नहीं
पर सुबह निकलते वक्त या दिन में फोन करके
कभी प्यार जता देते
तो ‘शायद’ खलना बंद हो जाता!

मुझे खल रहा है
मेरा इतने सालों से तुम्हारे आगे चुप रहना
आत्मसम्मान से समझौता कर लेना
अन्यायों को अपना भाग्य मान लेना

मुझे खल रहा है
मेरा कभी तुमसे ‘ना’ नहीं कह पाना!

मुझे खल रहा है
अब तक अपने लिए आवाज़ न उठाना
यह जानते हुए भी कि तुम मेरे स्त्री होने को
मेरा कमतर होना समझते हो
अपने अचेतन मन में पत्नीधर्म को
दासता का पर्याय मानते हो

मुझे खल रहा है
मेरा जरा-से प्रेम के बदले
वह सब कुछ स्वीकार कर लेना
मुझे खल रहा है मेरा स्वयं ‘पितृसत्तात्मक’ होना

खुशी इस बात की है कि
खलना कभी बंद नहीं होगा
और अब से
निश्चित रूप से
जितनी बार मुझे खलेगा
उतनी बार मेरा मुंह खुलेगा।

संपर्क :एस. आर. एस. घराना, दो मुहान, गया डोभी रोड, पिन८२४२३१ भारत पेट्रोलियम पेट्रोल पंप के निकट मो.९९०३२७००९३