सुपरिचित कहानीकार। किसानों और आदिवासियों पर विशेष शोधपरक कार्य। अद्यतन प्रकाशित कहानी संग्रह, लाला हरपाल और अन्य कहानियां।

यह कहानी सुल्तानपुर गांव के तूफानी मास्टर और परमेश्वरपुर के पुराने तालुकेदार, भरत सेठ की अनूठी दोस्ती वृत्तांत से शुरू की जा रही है। तूफानी मास्टर को कुछ लोग तूफानी मियां भी कहते थे यानी वह समय के साथ, मास्टर और मियां के बीच आवाजाही करते रहे।

कृष्ण-सुदामा की दोस्ती कब और कहां हुई, किसी को नहीं पता, मगर तूफानी मास्टर और भरत सेठ की दोस्ती, नौटंकी के दरम्यान हुई। गाते, गवाते और अभिनय करते हुए। इस दोस्ती को अंखुवाने से लेकर फलने-फूलने तक की कहानी, इलाके के बुजुर्गों ने देखी है। उन्होंने इस प्रेम कहानी में कई मजेदार प्रसंगों को जोड़ा और घटाया है। इसलिए कहानी कुछ साबुत है, कुछ बदल भी गई है। सुनने और सुनाने में कौतूहल बनाने के लिए कुछ कतरब्योंत की गई है।

कहानी दो कलाप्रेमियों से शुरू होती है। दोनों की उम्र में सात-आठ साल का अंतर था। तूफानी, उम्र और कद में थोड़े छोटे थे। इकहरे शरीर वाले, आपदा के मारे। रईसी में पले भरत सेठ, भारी भरकम और उम्र में बड़े थे। तूफानी के आगे के लंबे बाल, कुछ बड़े और हवा में लहराने वाले थे तो भरत सेठ के सफाचट। एक का शरीर बामुश्किल सत्तर किलो का था तो दूसरे का भुइर्ं भारभूता! एक लुंगी, कुर्ते या कुर्ते-पैजामे में टंगे दिखता तो दूसरा, झकाझक धोती-कुर्ते के अलावा, कपार पर लाल रोल़ी का लंबा टीका चमकाते, अघाए। हैसियत में जमीन-आसमान का फर्क था। एक फकीर, भूमिहीन कलाकार तो दूसरा धन्ना सेठ। एक को कमा कर खाना था, तो दूसरे को बैठे-बिठाए, खानदानी धन-दौलत पर ऐश करना था।

इस कहानी का भावपक्ष कलाहीन है। इस कलाहीनता में एक इतिहास दफन हो जाता है जो प्रेम प्रधानता से नफरत की पराकाष्ठा तक जाता है। यही कल और आज की विडंबना है। यह समय और सत्ता की कोख से इंसानियत से हैवानियत की पैदाइश है। इंसानियत और दोस्ती को दिल में बसाए, रामधुन और अली-अली एक साथ गाने वालों का देशद्रोही बन जाना है, जो कभी जीवन की पतवार आहिस्ता-आहिस्ता चलाते, चलते रहे।

यह दफना दिए गए इतिहास की कहानी है यानी चार-पांच दशक पुरानी। उत्खनन से केवल शब्द हाथ लगे हैं। कई बार मुर्दा समय में भी कब्र से इतिहास के हाथ हिलते नजर आते हैं। वह इतिहास, वर्तमान से रिश्ता टटोलना चाहता है, बिलकुल आंखों देखी खबर की तरह। कई बार जिन्हें आप आंखों देखी खबर समझते हैं, वह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का फिक्सन होती है।

भरत सेठ को दिवंगत हुए ग्यारह साल हुए हैं और तूफानी मास्टर को गए पांच साल। यानी प्रेम को परवान चढ़ाने वाले दोनों दोस्तों के प्रस्थान में छह साल का अंतर। इतने में ही में वर्तमान ने आंखें फेर ली हैं। प्रेम की निशानी बची हुई है जिस पर वर्तमान ने खूंखार पैर गड़ा दिए हैं। सेठ के खानदानी बगीचे में, जहां आम के पेड़ के साथ, समय भी बांझ हो चुका है, भरत सेठ की समाधि बनी हुई है। समाधि, समाधि है, जिसका चबूतरा खूबसूरत टाइल्स का बना है। यह खूबसूरती ऊपरी है। अंदर मिट्टी, राख और हड्डियों के चूरे हैं। भरत सेठ की पत्नी ने, भले ही ताउम्र शिकवे-शिकायतों का पुलिंदा आंचल में बांधें रही, बेटे तपेंद्र से जिद्द कर, पति की यादों को बचाने और दिखाने के लिए, इस समाधि का निर्माण कराई थी। हालांकि अब वह भी इस समाधि की बगल में, दूसरी समाधि में तब्दील हो चुकी है। तपेंद्र सेठ खानदान के मुखिया पद पर विराजमान हैं। अब खानदानी सेठगिरी राजनीति के आगे पदावनत हो चुकी है।

लोग बताते हैं कि जबतक तूफानी मियां जिंदा रहे, हर साल चबूतरे के पास जाकर नमाज पढ़ते रहे। वहां बैठकर भरत सेठ की पसंद वाली क़ौवाली गुनगुनाते। चहकतीं, फुदकतीं चिड़ियों को हाजिर-नाजिर मान, चबूतरे पर दोेनों हथेलियों को रख, माथा झुकाते और अपने कद्रदान दोस्त को याद कर चले आते थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने अपने समाजियों को तैयार कर, समाधि के पास, भरत सेठ की पसंद वाला ‘सेठ-सेठानी’ नाटक भी खेला था। उनके पसंदीदा लवंडे को नचाया था।

तूफानी ने वैसी कोई निशानी नहीं छोड़ी थी, सिवाय इसके कि अपने तीन बेटों और दो बेटियों में से बड़े बेटे उमर को ठीकठाक कौवाल बना दिया था। कला की जिस मशाल को तूफानी के बाप-दादों ने जलाई थी, उसे अगली पीढ़ी के हाथों तक पहुंचा कर तूफानी जा चुके थे।

तपेंद्र सेठ, भरत सेठ की तरह कलाप्रेमी नहीं थे। जमींदारी के अवशेषों में जमीन-जायदाद, धन-संपदा अभी पर्याप्त थी। भरत सेठ ने जिन सामाजिक कार्यों में अपनी संपदा का उपयोग किया था, वैसी चाहत तपेंद्र सेठ की नहीं थी। चाहतें, पीढ़ियों के अंतराल में बदल जाती हैं। कुछ बेमतलब की लगने लगती हैं, कुछ जाति-धर्म और मजहब के खांचे में सिमटकर, दंभी हो जाती हैं।

पूर्व जमींदार भरत सेठ, बनिया थे। उनके पिता और दादा, इलाके के एकमात्र गैर ठाकुर जमींदार रहे। सेठ की सतर्कता और जमींदारी की उदंडता, दोनों तत्वों का समावेश तपेंद्र में हुआ था। बाप का रसिक मिजाज उन्हें छू नहीं पाया था।

पैंतालीस की उम्र में बेटे का जन्म, एक िंकंवदंती के रूप में याद की जाती है। किस्सा पुराण यह है कि पास के बाजार में भरत सेठ की एक गल्ले की दुकान थी। दुकान खानदानी थी। दादा, परदादा के जमाने से आबाद थी। अब उस दुकान को उनका खास कारिंदा, दिलावर खान संभालता था। भरत सेठ दिन में एकाध बार खाता-बही का निरीक्षण करने जाते। पैसे का हिसाब करते और हवेली लौट आते। एक बार वह अपनी दुकान पर मसनद लगाए, हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, तभी एक फकीर आया था, चोंगा बजाते, गाते। गले में लाल-हरे, काले, पीले मालाओं से लदा-भरा। उसकी आवाज में खनक थी। चिपके चेहरे पर तेज था। नाखून बड़े-बड़े, बाल लटियाए, बेतरतीब, सुफियाना अंदाज बिखेरते हुए। बड़ी अंगुली की अंगूठी, चोंगे पर बेहतरीन धुन निकालती थी। ‘आबाद रहे घर-बार, चहके परिवार! अल्लाह की रहमत से बढ़े व्यापार!… जय हो सेठ जी की! खुदा घर आबाद रखें।’ फकीर ने दुआ दी और अपना चोंगा आगे बढ़ा दिया था।

भरत सेठ मुस्करा उठे थे। फकीर और बाबाओं की दुआ पर वह मुस्कराते जरूर थे। हँसी-मजाक से जीवन को तर रखना, सेठ को भाता था। कई बार वह हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते। उनकी तोंद उछलने लगती।

भरत सेठ, समय के पाबंद थे। सुबह की पूजा के बाद, लाल रोली और चंदन का गोल टीका, सफेद झकाझक धोती पहनकर, सेठ का तानाबाना बनाते। कुछ देर दरबार लगाते। गांव वालों या कारिंदों से हँसी-मजाक और फिर कस्बे की ओर खिसक जाते।

फकीर का चोंगा हवा में सामने था। सेठ ने दिलावर की ओर देखा। दिलावर ने संदूक की ओर और फिर पचास पैसा का सिक्का उठाकर उसके चोंगे में डाल दिया था। वह चाहता तो एक रुपए भी डाल सकता था, पर नहीं, हाथ रोक कर खर्च करना ही उसकी खासियत थी। फालतू खर्च से परहेज को सेठ सराहते। रियाया, सेठ से ज्यादा दिलावर को कंजूस बताती।

वह खुशी का साल था। खानदान और तालुकेदारी वंश परंपरा को चलाने के लिए जिस पूत की कमी थी, वह पूरी हो गई। सेठ के घर बेटे का जन्म हुआ। पुरोहित सुने तो भागे आए। पतरा खोले, गुन मिलाए और बेटे का नाम तपेंद्र सुझाया।

सुल्तानपुर और परमेश्वरपुर आधे कोस के फासले पर थे। सुल्तानपुर गरीबों और भूमिहीनों का गांव था। उसमें ज्यादातर मुसलमान पंवरिया गायक थे। उनकी पीढ़ियां बाहर से आकर बसी थीं। जमींदारों के इलाके में गायकी की कीमत मिल जाया करती और पेट पल जाता था। समय के साथ जमींदारी की ठाठ नहीं रही। ज्यादातर कलाकारों ने भी धंधा बदल लिया। जो बचे वे बेटों की पैदाइश पर सोहर गाकर पेट पालने लगे।

जब तपेंद्र सेठ का जन्म हुआ था तब भरत सेठ के घर, तीन दिन तक पंवरियों ने सोहर गाया था। बोराभर अनाज और रुपये-पैसे लेने के बावजूद, उन्होंने भरत सेठ के दुआर पर कैंजा जमाए रखा। कभी बच्चे को गोद में लेकर खेलाते, कभी सेठानी से हंसुली मांगते और कभी चिढ़ाते हुए गाते। सेठ और सेठाइन, बुरा नहीं मानते, मन गदगद था। हजार से कम रुपये न लुटाए थे दोनों ने, तब भी गहना लेने की जिद्द में जमे रहे पंवरिया। मजा तो तब आया था जब पंवरियों के साथ-साथ हिजड़ों का भी एक दल आ धमका था। उन्होंने भरत सेठ के गालों को सहलाकर, गुदगुदाकर और धोती सरका कर, सोने की अंगूठी निकलवा ली थी।

पंवरिया और हिजड़े अपनी बख्शीश ले गए। तूफानी मियां ने पूरी तैयारी कर बरमबाबा के अथान पर नाच खेलने की योजना बनाई। शिवरात्रि के दिन चोप और शामियाना तना । तूफानी मास्टर ने अपने दोस्त की खुशी में पूरी रात नाचा, गाया। वह बिना किसी सट्टा का नाच था। कोई तय-वय नहीं। दोस्त की खुशी को अपनी खुशी में शामिल कर, नाचे थे तूफानी। अभी दो माह पूर्व, उनके यहां भी बेटा हुआ था, दो बेटियों के बाद। तब तूफानी ने सिर्फ अल्लाह को याद किया था। बस इतनी सी खुशी, इतना ही इजहार। कलाकारों का धंधा बारहों महीने नहीं चलता। पेट पालने के लिए मेहनत-मजूरी करनी पड़ती। परमेश्वरपुर में मजदूरों की जरूरत थी, वह सुल्तानपुर से पूरी हो जाती। लुहारी, बढ़ईगिरी या धोबी का काम सुल्तानपुर में होता। वहां के दो नाइयों की वजह से परेमश्वरपुर के गालों पर चिकनाई दिखाई देती।

अंग्रेजों के जमाने में भरत सेठ के पिता के पास आठ गांवों की जमींदारी थी। देश आजाद हो गया और जमींदारी उन्मूलन कानून बना तब भी भरत सेठ की जमींदारी की ठाठ, बिना जागीर बनी रही। वह इलाके के सबसे ज्यादा जमीन के वारिस थे। गैरमजरुआ जमीनें भी भरत सेठ के कब्जे में थीं।  अनपढ़ किसानों को जमीन के कायदे-कानून पता न थे। पटवारी की जरीब किधर खिसक जाए, किसका खेत किसके नाम हो जाए, यह गांव के अमीरों के हाथ में था।

जमींदारी के न रहने पर, राजसी ठाट-बाट बनाए रखने के लिए भरत सेठ की कुछ जमीनें बिकीं। तपेंद्र सेठ को नई-नई बड़ी गाड़ियों का शौक था। राजनीति में पांव जमाने के लिए बड़ी गाड़ियों के काफिलों का होना जरूरी था। कस्बे की दुकान, देख-रेख के अभाव में टूट चुकी थी। ऐसे में हर शौक, खेत बेच कर पूरा कर लिया जाता।

भरत सेठ के मरने के बाद, तपेंद्र सेठ ने राजनीति में पांव बढ़ा दिए थे। गांव में तो उनकी निर्द्वंद्व सत्ता थी पर राजनीति में प्रतिद्वंद्विता ही प्रतिद्वंद्विता। कस्बे के एक नेता की प्रतिद्वंद्विता के चलते, तपेंद्र सेठ को विधायकी का टिकट नहीं मिला । पार्टी ने ब्लॉक प्रमुखी लड़ने को कहा। वह मान गए। गांव-देहात की राजनीति का उन्हें अनुभव था। उस अनुभव के बल पर ब्लॉक प्रमुख चुन लिए गए। चुनना क्या था, सभी ग्राम प्रधानों को एक दिन पहले उठवाकर, बसडीला मठ में ठहरा दिया था। हर एक को दो-दो लाख नकद और एक-एक छोटा-मोटा ठेका का वादा, बस इसी पर मत जुटा लिया था।

सुल्तानपुर में तूफानी के अब्बा भी बाहर से आकर बसे थे। तूफानी और उनके भाई-बहनों का जन्म सुल्तानपुर गांव में ही हुआ था। अब्बा उम्दा कौव्वाल थे। उन्होंने पांच लोगों का एक दल बनाया था, एक हारमोनिया, एक ढोलक और दो झांझ बजाने वाले। वह कभी हारमोनिया बजाते तो कभी हाथों की ताली। कभी-कभार, शादी-ब्याह, निकाह, मेले, उर्स या हाट-बाजारों में मजमा जमा देते। जमींदारों को कौवाली सुनाते तो खाने-पीने की व्यवस्था हो जाती थी। गायकी के कुछ गुण तूफानी ने अपने अब्बा से सीखा और अब्बा के मरने के बाद, उसमें रमे रहे।

तूफानी मियां ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। हिंदी ठीक-ठाक पढ़-लिख लेते। खेती-बारी थी नहीं तो, मेहनत-मजूरी करते। वह दूसरों के खेतों में काम करते और गुनगुनाते। सरेह में लोग सुनते और अपने-अपने खेतों से ‘जीअ हो तूफानी’ बोल कर उत्साह बढ़ाते।

तूफानी के स्वर को सुन, एक दिन महंत बसडीला के एक कबीर पंथी ने कहा था- ‘का हो मियां, सुर तो आपका बेजोड़ है। आ जाया कीजिए मठ पर, शाम की सबद गायकी में। स्वर निखर जाएगा और साधुओं के साथ खाने-पीने का जुगाड़ भी हो जाएगा।’

तूफानी को बात जंची। रोजाना शाम को मठ पर जाने लगे। निर्गुन में रमे तो दिल का दर्द, कबीर की बानियों में उतरता गया। वहां उन्होंने अपनी गायकी को बुलंद किया, हारमोनिया को निखारा। कबीर पंथी, कपूरचंद बेजोड़ गायक और वादक थे। तूफानी ने उन्हें अपना गुरु मान लिया।

तूफानी मियां का मन नौटंकी मास्टर बनने का था। वह नाच पार्टी बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने बढ़िया नगाड़ा मास्टर की तलाश की। चार लवंडों को पटाया। हारमोनिया मास्टर, गांव के पंवरिया दल से ले लिया। ढोलक के पुराने उस्ताद अभी जिंदा थे। देखते ही देखते सुल्तानपुर में ‘तूफानी नाच पार्टी’ खड़ी हो गई। गांव के बाहर पीपल के बड़का पेड़ के नीचे, रोज पाठ खेला जाने लगा। कलाकार मजने लगे। तूफानी कुछ नया प्रयोग करते। समाजियों को समझाते। सालभर के अंदर, सट्टा लिखने का काम शुरू हो गया।  लैला-मंजनू, दही वाली गुजरिया, डाकू सुल्ताना, सेठ-सेठानी….. नाटकों की सूची बढ़ती जा रही थी। वह जब लैला-मंजनू नाच प्रस्तुत करते, भरत सेठ उठ कर गाने लगते- ‘लैला लैला पुकारूं मैं मन में, मोरी लैला छिपी कवनी वन में। हाय! लैला!’ और नोटों की पूरी गड्डी लैला बने लवंडा के ऊपर लुटाने लगते।

धीरे-धीरे शादी-ब्याह में सट्टा लिखवाने वालों का जमावड़ा बढ़ने लगा। मांग ज्यादा होने से कभी नाच खाली नहीं रहता। सीजन के हिसाब से मोलभाव होता।

अपने गुरु कपूरचंद के सहयोग से तूफानी ने सोहरत की बुलंदी छूनी शुरू की। वह उनकी खुशहाली के दिन थे। न जाति-धर्म का भेदभाव, न हिंदू-मुसलमान। जब वह करताल झटकते तो नचदेखवा उचक जाते। जुल्फों को लहराते तो सीटीबाज, सीटी मारने लगते। माहौल मदमस्त हो जाता, शामियाने के बावन चोप हिल जाते। जोकर किनारे खिसक, अपने लिए जगह बनाता और लवंडा यानी नचनिया, तूफानी के इशारों पर थिरकने लगता। तूफानी, दाढ़ी और मूंछ नहीं रखते थे। आवश्यकतानुसार स्त्री वेष भी बनाना पड़ता था। नाच की शुरुआत वंदना से होती- ‘मइया सुरसती के करीं, सुमिरनवे ना…।’ शामियाने में प्रवेश करते ही उनके स्वर निकल पड़ते थे।

भरत सेठ, पक्का नचदेखवा और पक्का लवंडाबाज थे। चुन-चुन कर नाच देखने जाते। उनके कारिंदे इलाके के हर मशहूर नाच की जानकारी देते। भरत सेठ अपने घोड़े को तैयार कराते। उस पर खुद सवार होते और दो-तीन कारिंदें साथ में लाठी लिए पीछे दौड़ते चलते। बाद में जब मोटर सायकिल का जमाना आया तब वह मोटर सायकिल दौड़ाने लगे। एक कारिंदा साथ में और एक, सायकिल से पहले पहुंच जाता। भरत सेठ जहां नाच देखने जाते, वहां का नाच मास्टर अपने को धन्य समझता। एक तो नाच का मान बढ़ जाता और दूसरा, सेठ का बटुवा लवंडों के लिए खुला रहता।

विरह के गानों पर भरत सेठ की तड़प देखने वाली होती थी। वह लवंडों पर बिना गिने रुपए लुटाते।  कभी-कभी उनका दिल डोल जाता था। पकड़ लेते लवंडों को। शेरो-शायरी की झड़ी लगा देते। जवाब-सवाल । जब कोई लवंडा शेर सुनाता, भरत सेठ तुरंत उसका जवाब देते। मौका मिलते ही लवंडों का हाथ पकड़, झूमने लगते। ‘जीय सेठ… जीय!’ नचदेखवा उन्हें हूट करते। लवंडा शरमा कर, हाथ छुड़ाकर भाग जाता मगर सेठ को फर्क न पड़ता। वह रंग में डूबे होते।

भरत सेठ अपने चेलों से यह भी पता करते कि किस नाच में कौन लवंडा सुंदर है। कौन बढ़िया गाता है। बस क्या, सेठ की मोटर सायकिल फटफटाने लगती। कारिंदें और कुछ मित्र मंडली, चाय-पानी या पान-तंबाकू के बहाने तैयार रहती।

भरत सेठ, तूफानी मियां की कला के दीवाने थे। वह तूफानी मियां को अपना दोस्त बताते। तूफानी, उन्हें ‘सेठ साहब’ पुकारते। सुदामा-कृष्ण की दोस्ती बताते। तूफानी अपनी कौवालियों में दोस्ती का जिक्र कर, भरत सेठ का मन मोह लेते। जब वह सेठ को कृष्ण बताते तो सेठ आभार से झुक जाते। तूफानी ने अपने दोस्त के मिजाज और पसंद का ख्याल रखना शुरू कर दिया था। उनकी नाच पार्टी में एक से एक सुंदर लवंडों को रखा जाने लगा। किस्म-किस्म की रंगीन चोली, साड़ी और मेकअप का ख्याल रखा जाने लगा। लवंडे भी चतुर निकलेे। सेठ को रिझाने के लिए एक से एक गाने ढूंढ लाते। उनका एक मशहूर गाना सेठ को हिला देता- ‘लवंडा बदनाम हुआ, सेठ जी, तेरे लिए। सेठ जी तेरे लिए, जानेमन तेरे लिए।’

जब भरत सेठ नाच देख, लवंडों की स्मृतियों में खोए, पान कचरते गांव लौटते और नौकर-चाकरों से आंख बचाते, घर में प्रवेश करते तो सेठानी बिगड़ खड़ी होतीं। कहतीं- ‘का करने घर आए हैं। जाइए लुटा आइए धन-दौलत? लोग-लड़िका नहीं हैं तो यही सब कीजिए? लवंडा पटा लिए हैं न! उन्हीं के साथ सोइए। रहिए रात दिन वहीं।’ और फिर आंखों में आंसू भर, नाक चुवाने लगतीं- ‘मेरी तो करम जल गई थी कि ऐसे आदमी के पल्ले पड़ी। अरे अपना काम-धाम छोड़, लवंडों के पीछे घूमते हैं। हे भगवान! कितनी बदनामी हो रही है? लोग का-का कह रहे हैं? सेठ, लवंडाबाज हो गए हैं। गांव की महिलाएं हँसती हैं। कहती हैं- काहे सेठानी सिंगार करती हैं? सेठ को तो लवंडे पसंद हैं?’

भरत सेठ के पास सेठानी के आरोपों का कोई जवाब न था। वह अपराध बोध से दब जाते। माना कि वह दिलफेंक थे, पर आदमी बुरे न थे। कला के पारखी थे। केवल सुंदर लवंडों को देख कर मचलते। गायकी, शेरों-शायरी, वाक्पटुता पर भी रीझते थे। तूफानी मियां यह सब समझते थे। उन्हें मालूम था कि सेठ में नौटंकी के प्रति जो लगाव है, वह उनकी कला मर्मज्ञता के कारण है। वे सामान्य नचदेखवा न थे। वह लवंडों से मजाक करते, छेड़ते और कहते- ‘का हो हमार लवंडा, आज तड़पाओगे का?’

समय का पहिया घूमा। टीवी और आरकेस्ट्रा के अवतरण के बाद, नाच पार्टियां इतिहास की चीजें हो गईं। लवंडे बिला गए। उनके गाने मुंबइया फिल्मों के लटके-झटके बनें- ‘मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए।’ यह वक्त का व्यावसायिक रूपांतरण था।

जब भरत सेठ का देहांत हुआ, तब तपेंद्र बीस के आसपास होंगे। बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच रहे तूफानी, एकाएक अनाथ हो गए। उनकी दुनिया उजड़ गई। सुरों ने चुप्पी साध ली। बहुत दिनों तक उनकी बकार नहीं निकली। आंखों के आंसू गमछे में सूखते रहे। जिस दोस्ती की सीढ़ियां, दरबार के गलियारे में उतरतीं थीं, उनकी फंटियां उखड़ गईं। तब उन्हें महसूस हुआ कि उनकी कला के अंतर्मन में दोस्त की साया थी। साए के साथ वह परवान चढ़ी थी, साए के विलुप्त होते ही ढलान पर आ गई। जीवन के अंतिम छोर तक उन्होंने बचाने की कोशिश बहुत की। उमर को संभालने की नसीहतें दीं मगर कला और कलाकार जब लुढ़कते हैं तब विरले सम्भलते हैं। समाजी छिटकते गए। सबसे पहले नाच की जान, नगड़िया किसी और पार्टी में चला गया। तूफानी नाच पार्टी, कौवाल पार्टी में बदल गई।

तूफानी जब तक जिंदा रहे, दरबार के दरवाजे पर जाते। स्मृतियों की एक-एक पोटली खोलते। राजा द्वारा रंक का सम्मान, अंतर्मन में महसूस करते। वर्तमान से कुढ़ते पर अदब से तपेंद्र सेठ को सलाम करते। कभी-कभी उमर को साथ लाते। दरबार को सलाम करने, बैठने, उनसे बात करने के सलीके सिखाते। नौकरों से सेठाइन तक सलाम पहुंचाते और फिर चले आते।

कभी-कभी तूफानी, उमर से कुछ सुनाने को कहते। उमर, तपेंद्र सेठ की ओर निहारते। एक झिझक उन्हें झिड़कती। वह अब्बा का हुक्म मान, सुनाते, मगर तपेंद्र सेठ की निगाहें, पार्टी कार्यकर्ताओं पर टिकी रहतीं। कला की कद्र से वे वेपरवाह थीं। तूफानी के अंदर कुछ खालीपन महसूस होता। उठते हुए बोलते, ‘सरकार! उमर अभी कच्चे हैं। निगाह रखिएगा। जल्द सुर-ताल में सध जाएंगे। दरबार की बहुत कृपा रही है हम पर। अब आप ही माई-बाप हैं।

तपेंद्र सेठ हूँ, हां से ज्यादा कुछ बोलते नहीं। वह बोलते नहीं तो तूफानी के चेहरे का रंग मुरझा जाता। वह सलाम बंदगी करते। उमर को इशारा करते और घर लौट आते।

भरत सेठ के जाने के बाद फिर कभी दरबार में महफिल न जमी, न तूफानी का नाच हुआ और न तपेंद्र सेठ के हाथों इनाम मिला।

तूफानी के देहांत के बाद उमर का दरबार से नाता छीजता गया। वह दरबार के लिए कलाकार से मजदूर में रूपांतरित हो चुके थेे। जब हुकुम होता, मजदूर बन, चले जाते। कई बार पत्नी को भी ले जाते। जो मजदूरी मिलती, हँसी-खुशी ले लेते। दरबार का एहसान, अब्बा ने समझा रखा था। वह उस एहसान तले दबे रहते। अब्बा और बड़े सेठ की दोस्ती याद आती। उनके बीच की बतकही, हँसी-ठिठोली की यादें, वर्तमान से सहमतीं, मन को मसलती, वह घायल मन, घर को लौट आते।

तपेंद्र सेठ की दिलचस्पी नचनिया-बजनिया में नहीं थी। वह रामलीला कलाकारों को कलाकार मानते थे। उनकी राजनीति राष्ट्रवादी थी, जिसमें रैलियां थीं। भाड़े की भीड़ थी। सत्ता को साधने के साधन थे। सुल्तानपुर जुलाहों और हजामों का गांव था, जो दिहाड़ी मजदूरी पर जब-तब रैली की भीड़ का हिस्सा बन जाते। उमर का परिवार भी उसमें शामिल होता।

उमर, बिन बुलाए दरबार की ओर नहीं जाते। जाते भी तो याचक से ज्यादा का ओहदा नहीं मिलता। दरबार का बरामदा, बदल गया था। वहां एक राजनीतिक पार्टी का बोर्ड टंगा था। कस्बे की दुकान पर बड़ा बोर्ड था। वह पार्टी का कार्यालय बन गया था। वहां बाइक फटफटाने वाले लड़कों का जमावड़ा लगा रहता। दिलावर खान का जमाना खत्म हो चुका था और नया कारिंदा, रामदीन ने उसे बेदखल कर, दारू-नमकीन की व्यवस्था में, स्वयं को सीमित कर दिया था।

एक साथ हवा में कई वायरस फैले थे। कुछ लोगों को देशद्रोही और कुछ को गद्दार बना रहे थे। उसी समय संसद से सी.ए.ए. कानून पास हुआ था। अपने नागरिक अपरचित लगने लगे थे। उनकी पहचान के लिए नेशनल रजिस्टर जरूरी बताया जा रहा था। एक रजिस्टर का आतंक शहर से गांव-देहात तक आ पहुंचा था। कुछ अंदर-अंदर गदगद थे। उन्हें बताया जा रहा था, मुसलमानों को भगाकर, उनकी जमीनें, दलितों और ओबीसी में बांटी जाएंगी। झूठ और सच का घालमेल पकड़ना मुश्किल था।

तपेंद्र सेठ की गतिविधियां बढ़ गई थीं। शहरों में शुरू हुए विरोध और समर्थन की धमक गावों में सुनाई दे रही थी। तरह-तरह की बातें मोबाइलों से प्रचारित हो रही थीं। इसी बीच उन्होंने अपने कस्बे के कार्यालय पर पार्टी पदाधिकारियों की बैठक बुलाई थी। बैठक में पुराने जमींदारों और ताल्लुकेदारों को बुलाया गया था।

– ‘अरे हमीं लोग तो यहां के असली बासिंदे हैं? कभी सारी जमीनों पर हमारा कब्जा था। हमारे पास दस्तावेज हैं। जिनके पास दस्तावेज हैं, उन्हीं के लिए सी.ए.ए. कानून है।’ बैठक के शुरू में ही तपेंद्र सेठ ने अपनी बात रखी थी।

-‘ठीक कह रहे हैं भइया! नेशनल रजिस्टर बड़ा काम का होगा? घुसपैठिए बाहर होंगे।’ रमेश ठाकुर बोले थे।

-‘आपको क्या काम का लग रहा है, बताइए रमेश बाबू?’ तपेंद्र सिंह ने कनखियों से देखते हुए पूछा था।

-‘तपेनदर बाबू! इ सब अटखरी-बटखरी किनारे लग जाएंगे?’ भीम सिंह ने मूंछों को तनिक घुमाते और मुस्कराते हुए कहा था।

-‘अटखरी-बटखरी? …अच्छा ! अच्छा!…   इ बताइए, इ सब किनारे लग जाएंगे ….तो कहां जाएंगे?’

– ‘अरे जाएंगे कहां, ऊ .. जो कैंप बन रहा है न?’ रमेश ठाकुर बीच में बोल पड़े थे।

-‘तो हुकुम कौन बजाएगा?’ तपेंद्र सेठ पूछे थे।

-‘इहे बजाएंगे? जितना मजबूर होंगे, उतना बजाएंगे?’

-‘हां मजबूर बनाना बहुत जरूरी है। समझ रहे हैं न रमेश बाबू? इतने सारे जाएंगे कहां? दस-बीस सालों में इनका दिमाग खराब हो गया था, बस उसे ठीक करना जरूरी है।’ भीम सिंह मुस्कराए थे।

-‘मजा मारेंगे तपेंदर भइया!  सबसे ज्यादा फायदा इन्हीं को होगा?’ रमेश ठाकुर ने माहौल को हल्का करने के लिए तपेंद्र सेठ को चिढ़ाया था।

-‘का मजा मारेंगे रमेश बाबू?’

-‘अरे दादा ने सबसे ज्यादा जमीन इन्हीं ससुरों में बांटा है।’

-‘ठीक है। ज्यादा चुटकी मत लीजिए? असल मुद्दे पर आइए।’

-‘असल मुद्दा?’ …और मुस्कराते हुए रमेश बाबू उठ कर तपेंद्र सेठ के कान में फुसफुसाने लगे थे।

-‘हूं!’ तपेंद्र सेठ सुन कर गंभीर हो गए थे। होंठ कुछ बाहर निकाल लिया था। कुछ देर तक चुप रहे। बाकी लोग इस गंभीर मंत्रणा का टोह लेते रहे। गांव के सेठ-साहूकार केवल अटखरी-बटखरी का ही टोह नहीं लेते? अपने भाई-बंधुओं का भी लेते हैं। अर्थशास्त्र का यही सामान्य सिद्धांत है।

-‘अच्छा तो रमेश बाबू! तनी चुप रहिए! धैर्य रखिए। अभी बवाल को शांत रखना जरूरी है। इ नया वायरस ने कुछ संभाला है। पता नहीं अभी तक क्या-क्या?’ कुछ नाराजगी के मूड में दिखे तपेंद्र सेठ।

रमेश ठाकुर मुस्कराने लगे थे। उन्होंने फिर मुंह खोलने की कोशिश की तो तपेंद्र सेठ ने भौंहों को सिकोड़ते हुए कहा- ‘शांत रहिए महराज! उस कोरोना के बजाय, इस कोरोना को साधिए। सब देशद्रोही बनते जा रहे हैं।’ तपेंद्र सेठ ने इशारा किया था।

– ‘अरे तो उ कोरोना के काट में अपना कोरोना फैलाइए न!’ भीम सिंह ने कुछ समझाते हुए खीं..खीं कर हँसना शुरू कर दिया था। रामदीन ने पानी का गिलास घुमाया, मीटिंग चलती रही ।

सुल्तानपुर गांव में आजकल अजीब सा सन्नाटा है। घरों से धुआं सहम कर निकलता है। अंधेरा होते ही गांव दम साध लेता है। लोग-एक दूजे के चेहरे की इबारत पढ़ने की कोशिश में, भूखे सो जाते हैं।

कई दिनों से उमर की पत्नी, जुमनी की सूनी आंखें, मरद को निहारा करती थीं। वह पूछना चाहती थी कुछ मगर शब्द अटक जाते थे। जैसे कोई गला दबा रखा हो। वक्त की ऐसी घेराबंदी, पहले कभी नहीं देखी थी उसने। मरद के सामने खाना परोसकर, मरद की आंखों में ताकती जुमनी। आंखें झपकती नहीं, काठ की तरह घसी जान पड़तीं। झपकाने की कोशिश में अंदर धंसतीं, भयावह लगतीं।

मरद को पानी दे दिया है। खाने की थाली सामने रखा, सोचती है- ‘कितनी मुश्किल से कौर निगलते हैं आजकल।’

उमर चुपचाप खाने बैठ गए हैं। आवाज नहीं फूटती। शरीर गलता जा रहा है। कौर मुंह में डालने के पहले पूछते हैं- ‘बच्चों ने?’

-‘खा लिया है। आप खाइए!’ बताते हुए आंखें नीचे गड़ा देती है जुमनी।

उमर दो-चार कौर मुंह में डालते हैं फिर थाली बीवी की ओर सरकाकर उठ जाते हैं। उन्हें लगता है, जुमनी कई दिनों से ठीक से खाई नहीं है।

-‘और खा लीजिए!’ मरद को उठता देख बोलती है जुमनी।

-‘खा लिया। और मन नहीं।’ हाथ धोने उठ गए थे उमर।

-‘सुलेमान, नन्हकी दिन भर क्या किए? पढ़ने गए थे?’

-‘गए थेे। …पर कह रहे हैं कि मदरसे में पढ़ाई नहीं हो रही है।’

-‘काहे?’

-‘वहां भी कागज-पत्तर, कोरोना की बात..।’

-‘और लड़िका तो जा रहे?’

-‘अब का बताएं?’ हिचक-हिचक कर रोने लगी थी जुमनी।

– ‘हूं! या अल्लाह!’ कहते हुए खरिका लेकर दांत खोदने लगे थे उमर। उमर हालात को जानते हैं। ‘यही साले कोरोना फैला रहे हैं।’ परसों बाजार में सुना था उन्होंने और चुपचाप घर की ओर खिसक आए थे।

सुल्तानपुर बीमार लग रहा है। गांव के लोग दम साधे, खुसुरफुसुर कर रहे हैं। खुल कर कोई आवाज नहीं। कहीं कोई ठट्ठा, हँसी-मजाक नहीं। एक डर अंदरखाने उमड़ता-घुमड़ता है। सन्नाटा अपने आप को काटने दौड़ता है। गांव की सड़कों पर दौड़ते मुर्गे-मुर्गियां, बकरियां और भैंसों ने बोलना बंद कर दिया है। मानुष चित्त से अनभिज्ञ जानवर नहीं रहते। कौवाली पार्टी की बैठकी बंद है। कहीं कोई कार्यक्रम नहीं। कार्यक्रम होते भी तो कौवाली नहीं। परमेश्वरपुर मेले में दो दिन रामकथा प्रवचन हुआ। आखिरी दिन कवि सम्मेलन। पहली बार शायरों को नहीं बुलाया गया था। वीर रस वाले कवियों ने मंच पर घमासान मचा रखा था।

किधर जाएं, सोशल डिस्टेंसिंग के जमाने में? मजदूरी मिल नहीं रही। उमर मियां की सांस रुकने लगी है। कपार तपने लगा है। सूखी खांसी का दौर है। इलाके की गंध, दुर्गंध में बदल चुकी है इसलिए उमर ने कहीं आना-जाना बंद कर दिया है।

-‘नेउर चाचा, फरीदी और रहमत चाचा कह रहे थे कि रात में नींद उचट जाती है। पूरी रात बैठ कर बिताते हैं।’ जुमनी बोली थी।

– ‘या अल्लाह!’ उमर चटाई पर लेटे, आसमान की ओर निहारते, बोले थे। नींद तो उन्हें भी नहीं आ रही आजकल। अभी पिछली रात सपने में पुलिस आई थी। पकड़ कर ले जा रही थी। वह गिड़गिड़ाए। बीवी-बच्चे रोने लगे थे। तभी किसी ने सुल्तानपुर में आग लगा दी। गांव जलने लगा। वह कांपते हुए उठ बैठे थे।

-‘मेहनत-मजूरी की आफत! कागज-वागज की आफत! अब कोरोना की आफत!’ जुमनी भनभनाते मच्छरों को हाथों से भगाने लगी थी।

-‘सो जाओ। चिंता करके का करोगी? आधे से ज्यादा लोगों के पास तो एक धूर जमीन ना है? …बीरनी का करेगी? उ तो किसकी औलाद है, पता नहीं? जनम के समय फेंकी मिली थी। हारमोनिया मास्टर उठा लाए थे। पाले-पोसे। बकरी का दूध पिलाए। बड़ी हुई तो परमेश्वरपुर दरबार की सेवा कर, पेट पाली।’

– ‘हम लोग को पुलिस कहां ले जाएगी?’

– ‘का बताऊं?… कहीं नहीं ले जाएगी। सो जाओ।’ उमर खीझ पड़े थे।

– ‘जाइए न सेठ जी के दुआरे। उहे हम सब के मलिकार हैं। कोई रास्ता सुझाएंगे।’ सुझाई थी जुमनी।

– ‘अब्बा का जमाना और था। अब दरबार का जमाना और है?’ उमर के मस्तिष्क की तंत्रिकाएं कुछ ऐसे विचारों को जन्म दे रही थीं। कह रही थीं, तूफानी की दुनिया का अंत हो चुका है।

-‘एक बार हो आइए। सेठ साहब कुछ तो रहम करेंगे?’

-‘तुम समझती नहीं?’

-‘समझती हूं? कोई भीख न देगा तो तुमड़ी तो न फोड़ेगा?’

उमर सोच में डूबे थे। कई बार उन्होंने पांव परमेश्वरपुर की ओर बढ़ाए थे, हर बार पांव ठिठक गए। मन की कड़ुवाहट डरा गई। चाहकर भी मन को बहला नहीं पाए। पर एक दिन चल पड़े, बेमन!

दुआर पर तपेंद्र सेठ, ऊंची कुर्सी पर विराजमान थे। जनवरी की धूप और कुछ कारिंदों की दांतनिपोरी जारी थी। सामने की टेबल पर दो अखबार, चाय के खाली कप और मालिश के लिए रखा कड़ुवा तेल अपनी जगह पर जमे थे। दरबार का पुराना नौकर दशरथ, भैंस की नांद में चारा डाल रहा था और मेहतरानी साफ-सफाई में इधर-उधर आ-जा रही थी।

उमर मियां ने पास जाकर सिर झुकाया। हाथ उठाकर सलाम किया। तपेंद्र सेठ ने गरदन घुमाई। उमर की ओर देखा। चेहरे के भाव, निष्प्रभावी रहेे। आंखों के इशारे से सोशल डिस्टेंसिंग और जमीन पर बैठने का इशारा मिला। दलित और मुसलमानों को सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में बचपन से पता होता है। उमर मियां, थोड़ी दूरी पर उकड़ू बैठ गए थे।

राजा और प्रजा के बीच चुप्पियां थीं। नौकरों की दिनचर्याएं थीं और गांव की खटपट। कई बार चुप्पियां भी बड़े और छोटे का भान करा देती हैं। उमर का अंतर्मन इसे बखूबी जानता था।

दशरथ ने उमर मियां की ओर निहारा। उमर मियां ने चुपचाप हाथ उठा कर सलाम किया। दशरथ ने, बिना संबोधन, गरदन हिलाई। उमर ने उसके इशारों को जब्त कर लिया। दशरथ ने मुंह दूसरी ओर किया और ट्रैक्टर के पास रखी सूखी लकड़ियां उठा कर बाहरी कमरे में ले जाने लगा।

उमर को सेठ साहब की आवाज का इंतजार था। शायद कुछ पूछें। बीवी-बच्चों का हालचाल, सुल्तानपुर की खैरियत। कुछ भी। अब्बा और बड़का सेठ में कृष्ण-सुदामा जस दोस्ती रही है। दरबार की कृपा से उनके पास दस कट्ठे जमीन है। रोटी का जुगाड़ हो जाता है। इसी दरबार का नमक खाकर अब्बा ने परिवार पाला है। अब उमर दरबार की दहलीज पर हैं। और कहां जाएं? उन्हें उम्मीद थी, तपेंद्र सेठ थोड़ा कड़क मिजाज हैं पर हैं तो जागीरदार ही। बुरे दिनों में नजर नहीं फेरेंगे।

तपेंद्र सेठ ने कुछ पूछा नहीं। उमर ने खुद मुंह खोला- ‘महराज! पश्चिम के चक में इस साल गन्ना बहुत बढ़िया है।’

तपेंद्र सुने-अनसुने रहे।

-‘महराज! सब खैरियत है न!’  बड़ी मुश्किल से दुबारा गला खखार कर बोले उमर। उनके अब्बा तो नौकरों द्वारा सेठाइन को भी सलाम बोलते थे, मगर नई सेठानी जो एक साल पहले आई थीं, उन्हें सलाम बोलने की हिम्मत न थी उमर में।

– ‘ऊं, …?’ चुप्पी तोड़े थे तपेंद्र सेठ।

-‘महराज के दरबार में बीवी-बच्चों ने भेजा है।’ बोले थे उमर। फिर उन्हें लगा, कुछ गलत बोल गए। ऐसा नहीं बोलना चाहिए? बीवी बच्चे न कहते, तो दरबार न आते? दरबार नहीं आएंगे तो जाएंगे कहां? अपराधबोध से चुप्पी लगा गए थे उमर।

सेठ ने दशरथ को हजाम बुलाने को कहा। दशरथ भागता हुआ गांव में चला गया।

-‘इ का सुनाई दे रहा है महराज?’ फिर पूछे थे उमर।

-‘का सुनाई दे रहा?

– ‘लोग कह रहे हैं कि कवनों रजिस्टर बन रहा है। उसमें मियां लोगों का नाम लिखा जाएगा। नाम लिखवाने के लिए इकहत्तर के पहिले का जमीन-जायदाद का कागज-पत्तर देना होगा? जो नहीं देगा, उसे जेलखाना!’ – ‘कहां सुने हो बकलोल?’ सेठ के शब्दों का कसैलापन उमर के तन-मन तक आया था। उमर हम उम्र थे मगर संबोधन में सेठ ने कभी कोई लिहाज न बरता। उमर सकपका गए थे। तपेंद्र सेठ ने कनखियों से उमर को घूरा। आंखों की ऊपरी भौंहें तलवार की तरह खिचीं थीं। उमर चुपाए रहे। उत्तर न सूझा था।

दशरथ आया और गया पर उमर को चाय न पिलाई। दरबार के नियम बदल गए थे। पहले, अलग रखे सीसे के गिलास में चाय मिलती थी।

-‘का बताएं महराज! एने-ओने सुना रहा है । लोग कह रहे हैं। बाजार में भी लोग बतिया रहे थे कि रजिस्टर में उन्हीं का नाम लिखा जाएगा, जिनके पास सत्तर से पहिले के जमीन-जायदाद का सबूत होगा। जो नहीं देगा उ घुसपैठिया…।’

-‘तो?… कौन बाउर बात है? जो सबूत ना देगा, वह घुसपैठिया होगा? उन्हें कपार पर हगने-मूतने के लिए तो नहीं बैठाया जाएगा न?’ दहाड़े थे सेठ।

सेठ की कड़क आवाज दूर तक गई थी। भैंंस की नांद में पानी डाल रहे दशरथ ने गरदन घुमा कर सेठ की ओर निहारा था। भैंस भी उचक गई थी। पड़ोस में चारा मशीन चला रही धन्नो ने मशीन का हैंडिल छोड़, सेठ की दुआर की ओर निहारना शुरू कर दिया था। वैसे धन्नो को सेठ साहब की ऊंची आवाज सुनने की आदत है। आसपास के लोग भी सेठ का बमकना जानते थे।

सेठ की ठस बोली से उमर की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। कलेजा बैठने लगा था। बड़का सेठ और अब्बा! मन मस्तिष्क में दोनों उतर आए थे। गहरी चिंता में डूब गए थे उमर- ‘वक्त कितना बदल गया है? समय कितना उचट गया है?’

कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।

-‘बोलो, और क्या-क्या सुने हो?’ इधर-उधर गरदन घुमाते, फिर पूछे थे सेठ।

-‘महराज! आप हमारे मालिक हैं। कोई बात सुनूंगा तो आप को ही बताऊंगा। आप से ही पुछूंगा। आप के सिवा और कौन है हमारा?’ उमर लाचारी की मुद्रा में थे।

-‘हमने कब मना किया?’

-‘कभी नहीं सरकार!’ आवाज दबाकर बोले थे उमर।

-‘फिर काहे, आसमान कपार पर उठा लिए हो? कोई कहेगा कि कउवा कान ले गया, तो कान देखोगे कि कउवा के पीछे भागोगे?’

-‘जी महराज! समझ गया। हमार मउगी कह रही थी, दरबार को बता आइए, तो बता दिया हजूर।’

दरबार ने फिर चुप्पियों का लबादा ओढ़ा।

-‘का बताएं महराज! कई घरों में चूल्हा नहीं जल रहा है। सब लोग कपार पकड़े बैठे हैं।’

– ‘तो हम चूल्हा जलाने चलें?’ दरबार के फिर तेबर बदलने लगे थे। उमर सकपका गए।

– ‘ना हजूर। आप की कृपा ही बहुत है। हम अनपढ़ लोग का जानेे देश-दुनिया का हाल? आप तो देश-दुनिया देखे हैं, सब जानते हैं। सोचा, आप से ही समझ लूं। आप के परिवार के सिवाय हमारे लिए कोई और आसरा नहीं है?’ उमर की आवाज धीमी होते-होते अटक गई थी। वह तपेंद्र सेठ के अंग-प्रत्यंग की हरकतों को दयाभाव से निहार रहे थे।

तपेंद्र कुछ सोच रहे थे। उमर भी कुछ सोच रहे थे। फिर बोल पड़े-

-‘सरकार! कोई कह रहा था, सुल्तानपुर के लोग बाहर के हैं, जेलखाने में रहेंगे।’

-‘बकवास बंद करो। चुनाव आने वाला है न! सारे देशद्रोही तमाशा बनाए हैं। लोगों को भड़का रहे हैं। इ साले खाते हैं यहां का, गाते हैं पाकिस्तान का।’ तपेंद्र सेठ की मारक आवाज ऊंची होती जा रही थी। वे बार-बार हाथों को झटक रहे थे और कभी दोनों हथेलियों को आपस में दबा रहे थे।

देशद्रोही!… यही शब्द उस दिन बाजार में उमर ने सुना था। उनका गला सूखने लगा था। लगा कि अब और बैठना संभव न होगा।

-‘कहां तूफानी और कहां तुम ससुर बकलोल? सुर-संगीत से कोई वास्ता नहीं। नाच, गाना-बजाना जानते नहीं? बाप का नाम डुबो दिए।’ सेठ ने विषय बदला।

-‘महराज! अब गाना-बजाना कोई सुनता नहीं? सब आरकेस्ट्रा देखते हैं। नाच पार्टी टूट गई। लवंडे बिला गए। थोड़ा बहुत कौवाली गा लेता हूं, मगर हजूर कभी मौका नहीं देते?’

‘कौवाली? अब हम कौवाली सुनेंगे? तुम्हारे बाप तो भजन गाते थे। तूफानी के कपार पर सुरसती मइया सवार रहती थीं। तू बकलोल, कौवाली-औवाली के चक्कर में पड़ गए हो। अब कागज-पत्तर तलाश रहे हो?… किसी मौलवी ने समझाया है क्या?’

उमर ने चुप्पी साध ली। वर्तमान बहुत रूखा था। वह जहां सांस ले रहे थे, वह तूफानी के बाद की दुनिया थी। इसलिए बोले नहीं। टुकुर-टुकुर सेठ की ओर ताकते रहे। मन अंदर-अंदर करक रहा था। जिस सकून के लिए दरबार आए थे, वह दरक गया था। ‘सेठ को कौवाली से नफरत है। बड़े सेठ, कौवाली पर झूमते थे।’ उमर सोच में डूबे थे और उदास मन, दरबार को निहार रहे थे।

‘बड़का सेठ की जमीन, अब्बा की जमीन थी। अब्बा की कला, बड़का सेठ की दीवानगी थी। वक्त बदल गया है। बड़का सेठ की नजरें इनायत हुईं, हम लोग जमीन वाले हो गए’ उमर के मन मस्तिष्क में खलबली मची थी। संवेदनाओं के मारे कांप रहे थे।

-‘महाराज, आपका खाता हूं। …मदद कीजिएगा हजूर!’

-‘ठीक है, तुम्हें कोई भूमिहीन नहीं बना रहा है? जाओ, जोतो-बोओ, खाओ।’

-‘सत्तर के पहले का कागज ना है हजूर! आप कोई रास्ता बताइए।’

सेठ ने उमर की बात को ध्यान से सुना। ‘ये सब इतने बकलोल नहीं है।’ तपेंद्र सोचने लगे थे।

‘महराज! जब हमारा नाम रजिस्टर में ना लिखेगा, तो हम इहां के नागरिक ना रहेंगे? नागरिक ना रहेंगे तब जमीन ना रहेगी?

-‘इ ज्ञान कौन दिया है तुमको?’ तपेंद्र एक बार फिर चौंके थे।

-‘रमेश बाबू कह रहे थे सरकार!’ बोले थे उमर। सेठ कुर्सी से उठ गए थे। उन्हें उठता देख, उमर भी उठ गए थे। बहुत देर से जमीन पर बैठे-बैठे पैरों में झुनझुनी समा गई थी। कुछ ठहरकर चलने के पहले सेठ को झुककर सलाम किया था।

-‘अच्छा!’ गंभीर हो गए थे सेठ। सोचने लगे-‘रमेश बाबू के पेट में कुछ पचता नहीं।’…और उमर की ओर देखे बिना, उठकर हवेली की ओर चले गए थे तपेंद्र सेठ।

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