वरिष्ठ लेखक, भाषाविद और अनुवादक।

रूस ने 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन से युद्ध शुरू किया था।अब तक काफी लोग हताहत हो चुके हैं।रूस अपने आक्रमण को विशेष सैनिक अभियान कह रहा है।उसका मानना है कि यूक्रेन में नव-नाजियों की सरकार है।दूसरा तर्क है कि यूक्रेन में लगातार नाटों सैनिकों का जमावड़ा हो रहा है।पुतिन का मानना है कि रूस अपने हितों की रक्षा और यूक्रेन में रहने वाले रूसी मूल के लोगों के लिए अपनी कुर्बानी दे रहा है।वह खुद को पीड़ित मानता है।

अमेरिका और अन्य यूरोपीय देश इन सभी बातों को नकार कर रूस के हमले को यूक्रेन की स्वतंत्रता एवं संप्रभुता पर आघात और उसके अस्तित्व को मिटाने की एक खतरनाक साजिश कह रहे हैं।इस युद्ध से बरबादी का मंजर हृदय को दहलाने वाला है।युद्ध में मारे जा रहे निरपराध लोगों, व्यापक स्तर पर हो रहे विध्वंस और विस्थापन से विश्व का प्रबुद्ध वर्ग विचलित है।

विश्व के नोबेल पुरस्कार विजेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, कलाकारों, एक्टिविस्टों आदि ने विभिन्न मंचों से कई खुले पत्र जारी किए गए हैं, बयान दिए हैं और भविष्य में युद्ध के भयावह परिणामों से लोगों को आगाह किया है।उनमें से कुछ की बानगी यहां देखी जा सकती है।

नोबल पुरस्कार प्राप्त विद्वानों का खुला पत्र

रोनाल्ड हॉफमैन, पीटर ग्रे, फ्रांसिस एच. आर्नोल्ड सहित विश्व के 163 नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षरित एक खुला पत्र 2 मार्च, 2022 को जारी किया गया था।इसमें कहा गया हैः

‘यह आक्रमण हमें नाजी जर्मनी द्वारा 1939 में पोलैंड पर और खुद रूस पर 1941 में किए गए कुख्यात हमले की याद दिलाता है। …हम नहीं मानते कि इस हमले में रूस की जनता की कोई भूमिका है।हम सामूहिक रूप से पुतिन द्वारा की गई इस सैन्य कार्रवाई और यूक्रेन के अस्तित्व की वैधता को अस्वीकार करने की घोर निंदा करते हैं।’

पत्र में सुझाव है कि विवादों को मिटाने का हमेशा एक शांतिपूर्ण तरीका होता है, ‘जहां तक रूस की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का मामला है तो उसका समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर, 1975 के हेलसिंकी-अंतिम अधिनियम और 1990 के पेरिस चार्टर के ढांचे में किया जा सकता है।’

खुले पत्र में आगे है, ‘रूसी आक्रमण आगामी दशकों में खुद रूस की अंतरराष्ट्रीय छवि को दागदार बनाएगा।यह उसकी अर्थव्यवस्था में भी रुकावट पैदा करेगा और उसके जनजीवन को कठिनाइयों से भर देगा।उसपर लगाए गए प्रतिबंधों से उसके प्रतिभाशाली और मेहनती लोगों को विश्व के अन्य हिस्सों में आवाजाही में पाबंदियां लगेंगी।रूस और दुनिया के बीच अब यह घेराबंदी क्यों?’

वे कहते हैं, ‘हम यूक्रेन के लोगों की शांति और शक्ति का सम्मान करते हैं।हम यूक्रेनियनों के साथ हैं।हम उन सभी यूक्रेनियन और रसियन लोगों के परिवारों एवं मित्रों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं, जो मारे जा चुके हैं या घायल हैं।हमारी कामना है कि इस खूबसूरत दुनिया के इस हिस्से में शांति बहाल हो।’ जिस वेबसाइट में नोबल पत्र प्रकाशित हुआ उसमें दलाई लामा तथा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर एवं बराक ओबामा और अन्य नोबल विद्वान भी शामिल थे।वे इस मुद्दे पर व्यक्तिगत विचार व्यक्त करते रहते हैं।इस पत्र में पूर्ववर्ती हस्ताक्षरकर्ताओं के साथ-साथ हारोल्ड इ. वारमुश, राबर्ट एफ. एंगल, विलियम मोयर्नर, जैक जोस्तक जैसे प्रख्यात वैज्ञानिक भी शामिल हैं, जिन्हें विगत दशक में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नोबल पुरस्कार से सम्मानित ओरहान पामुक, स्वेतलाना एलेक्सीविच, ओल्गा तोकार्चुक, सलमान रुश्दी, मार्गरेट एटवुड सहित विश्व के कई अन्य नोबल विद्वानों, लेखकों-कवियों द्वारा हस्ताक्षरित एक और पत्र जारी किया गया है।इसमें यूक्रेन पर आक्रमण का विरोध करते हुए कहा गया है कि हम जीवन की अंधेरी घड़ियों से गुजर रहे हैं।यह युद्ध न केवल यूक्रेन, बल्कि अन्य देशों की आजादी और लोकतंत्र पर प्रहार है।इस बात पर जोर डाला गया है कि स्वतंत्र और सुरक्षित यूक्रेन के बिना आजाद और सुरक्षित यूरोप की कल्पना नहीं की जा सकती।

रूसी लेखकोंबुद्धिजीवियों द्वारा जारी बयानः

युद्ध की कार्रवाई के खिलाफ रूस के सैकड़ों लोगों ने अपना विरोध प्रकट किया है और सरकार से आग्रह किया है कि युद्ध तत्काल बंद किया जाए।पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में लेखक विक्टर शेनडेरोविच, एलिना विटुखनोवक्स्या, इतिहासकार और राजनेता एंड्री जुबोव, एंड्री नेचाएव, निदेशक गैरी बार्डिन, मीडियाकर्मी तातियाना लेजारेवा, संगीतकार एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता लेव पोनोमैरियोव, वैलेरी बार्शचेव, स्वेतलाना गैनुशकिना, रसियन फेडरेशन के कलाकार लिया एखेडझाकोवा सहित विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी शामिल हैं।

पत्र में कहा गया है कि कोई भी रूसी राजनेता नागरिकों से उनके मतों को जानने की कोशिश नहीं कर रहा है।कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं हो रही है।इस लड़ाई के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, इसपर चर्चा नहीं हो रही है।पत्र में कहा गया हैः

‘हम रूस के जिम्मेदार नागरिक और देशभक्त रूस के राजनीतिक नेतृत्व से अपील करते हैं कि वे इसे रोकें।हम खुले तौर पर और सार्वजनिक रूप से युद्ध-प्रेमी लोगों से भी आह्वान करते हैं कि वे युद्ध के खिलाफ खड़े हों। …हम रूस के उस समाज के दृष्टिकोण को प्रस्तुत कर रहे हैं जो युद्ध नहीं चाहते, जो हमले को सैनिक-शक्ति का गैर-कानूनी उपयोग मानते हैं। …हम युद्ध को नकारते हैं।  … हम रूसी जनता की शांति और समृद्धि का समर्थन करते हैं, जबकि आप राजनीतिक खेल की खातिर हमारे जीवन को दांव पर लगा रहे हैं।आप रूसी जनता की ओर से नहीं बोल रहे हैं, हम बोल रहे हैं।दशकों से, पिछले युद्धों में लाखों की संख्या में जान गँवाने वाले रूसी लोगों की कामना रही है कि काश कोई युद्ध नहीं होता।क्या आप इसे भूल गए हैं?

‘…हमारा मत बिलकुल सीधा है।रूस यूक्रेन और पश्चिमी देशों के साथ युद्ध नहीं चाहता।कोई हमें धमका नहीं रहा है, कोई हम पर आक्रमण नहीं कर रहा है।इस तरह के युद्ध पर आधारित नीतियां अनैतिक और दायित्वहीन हैं और रूसी जनता के नाम पर इसे नहीं लड़ा जाना चाहिए।इस युद्ध के पीछे कोई वैधिक कारण नहीं है और न ही कोई नैतिक आधार।रूसी कूटनीति युद्ध की नीति को खारिज करने के सिवा कोई अन्य मत नहीं अपनाए।

‘इस तरह के युद्ध से रूस का कोई हित नहीं होगा, बल्कि देश के अस्तित्व पर खतरा पैदा होगा।देश के राजनेताओं का पागलपनभरा यह कार्य रूस में एक बड़े युद्ध-विरोधी अभियान के लिए हमें बाध्य कर रहा है।अतः हममें से प्रत्येक को इसमें अपनी भूमिका निभाई पड़ेगी।’

लेकिन यूक्रेन पर आक्रमण को लेकर रूस की बहुसंख्यक आबादी उत्साह में है।आक्रमण को लेकर ब्लादिमिर पुतिन को 70-71 प्रतिशत लोगों का अनुमोदन प्राप्त हुआ है।उनकी लोकप्रियता में उछाल आया है।यह तथ्य पश्चिमी मीडिया में प्रचारित इस बात को झुठलाता है कि यह हमला पुतिन के अहं और पागलपन से भरी सोच का नतीजा है।इससे लगता है कि यह युद्ध केवल पुतिन का नहीं, रूस का भी माना जा सकता है।

युद्ध के खिलाफ रूस में सामूहिक रूप से किए गए विरोध के अलावा व्यक्तिगत रूप से भी विरोधी के स्वर उभरे हैं।कई रूसी राजनयिकों ने यूक्रेन पर रूसी हमले को अन्यायपूर्ण और क्रूर करार करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।संयुक्त राष्ट्र के रूसी मिशन में 20 सालों तक काम करने वाले रूस के राजनयिक बोरिस बंदारेव ने इस्तीफा देते हुए कहा है कि वे इस अनावश्यक और तर्कहीन युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते।

युद्ध के भयावह परिणाम

युद्ध चाहे कहीं भी हो, इसकी कीमत मानव जाति को चुकानी पड़ती है।रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए आक्रमण ने पूरी दुनिया पर काफी प्रभाव डाला है।लाखों लोग यूक्रेन से विस्थापित हुए हैं।ज्यों-ज्यों सैनिक संघर्ष बढ़ रहा है, आर्थिक दुरवस्था गहरा रही है।नागरिकों की मौत की संख्या बढ़ती जा रही है।

यूक्रेन के मानवाधिकारों पर संसदीय आयोग द्वारा कुछ सप्ताह पूर्व दिए गए आंकड़े के अनुसार इस युद्ध के कारण लगभग 38,000 इमारतें नष्ट हो गईं।लगभग 1900 शैक्षणिक संस्थानों को नुकसान पहुंचा चुका है।करीब 50 अस्पताल बरबाद हो गए।यूक्रेन छोड़कर दूसरे देशों में पलायन करने वालों की संख्या एक करोड़ के आसपास पहुंच गई है।70 लाख से ज्यादा लोग तो यूक्रेन के भीतर विस्थापित हैं।

यूरोपियन डॉयलॉग के ऐकेडमिक निदेशक इवगेनी गोंतमाखेर के मुताबिक पश्चिमी देशों ने करीब 300 अरब डॉलर मूल्य के रूसी सोने और विदेशी मुद्रा के भंडार को जब्त कर लिया है।मई के अंत तक यूक्रेन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 35 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो चुका है।यूके्रन लगभग 600 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान इस समय तक झेल चुका है।

युद्ध का प्रभाव विश्व के अन्य देशों पर कम नहीं है।एक ओर जहां महंगाई पूरी दुनिया में बढ़ रही है, वहीं खाद्य सामग्री की किल्लत भी दुनिया की बड़ी आबादी को झेलना पड़ रहा है।कच्चे तेल की कीमत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है।गेहूं की किल्लत हो गई है और जन सामान्य परेशान है।फिर से एक बड़ा खाद्य संकट आने वाला है।

पिछली सदी के  90 के दशक में शीत युद्ध की समाप्ति के बाद नाटो का विस्तार पूर्व की तरफ हुआ और इसमें वे देश भी शामिल हुए जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे।रूस ने इसे खतरे के रूप में देखा।यूक्रेन अभी इसका सदस्य तो नहीं है, लेकिन यूक्रेन द्वारा नाटो देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास और अमेरिकी एंटी-टैंक मिसाइल जैसे हथियारों के हासिल करने से रूस सतर्क हो गया है।पुतिन के मुताबिक नाटो रूस पर मिसाइल के हमले के लिए यूक्रेन का लांचपैड के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है।नाटो और अमेरिका वर्षों से यूक्रेन की सेना को प्रशिक्षण दे रहे हैं।अमेरिका ने यूक्रेन में परमाणु हथियार प्रयोगशाला स्थापित की है।इस प्रकार कहा जा रहा है कि पश्चिमी देश यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाकर रूस का दम घोंटना चाहते हैं।

नाटो और पश्चिमी देशों के अड़ियल रवैए के कारण रूस-यूक्रेन के मुद्दे सुलझने की जगह और उलझते गए हैं।सीरिया, इराक, लीबिया, लेबनान, वेनेजुएला जैसे कई देशों में पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने समर्थित सरकारों को बिठाकर उन देशों में उनके जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण का जो हठ किया है उसका दुष्परिणाम गंभीर है।शीत युद्ध में इसी तरह की विभीषिका कई बार यूरोप, एशियाई और अफ्रीकी देशों में देखने को मिली थी।रूस और यूक्रेन अपने मुद्दों को अपने इतिहास और संस्कृति के मद्देनजर परस्पर सुझला सकते हैं, पर पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप ने इस संघर्ष को जटिल बना दिया है।

रूस का मानना है कि सारी समस्याओं के मूल में अमेरिका है, जो यूक्रेन की राजनीति में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहा है और यूक्रेन के कंधे पर बंदूक रखकर रूस की सुरक्षा में सेंध लगा रहा है।इसके प्रमाण के रूप में वह अमेरिका द्वारा यूक्रेन को युद्ध-सामग्री की लगातार आपूर्ति को पेश कर रहा है।यही नहीं, वह एक प्रॉक्सी युद्ध भी कर रहा है।वह 1990 के दशक से ही अमेरिका नाटो ढांचे के बाहर यूक्रेन का एक महत्वपूर्ण सहयोगी बना हुआ है।ये सारी स्थितियां युद्ध की बुनियाद के रूप में काम कर रही हैं।

विश्व में नया नैरेटिव

इधर, रूसी सैनिक अभियान से विश्व में एक नया नैरेटिव शुरू हो गया है, जिसमें नैतिकता, ईसाइयत की अच्छाइयों को आधार बनाकर एक खास विचारधारा सामने लाने की कोशिश हो रही है।अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन के वारसा के उस भाषण में इसके सूत्र ढूंढे जा सकते हैं, जहां वे पोप का आवाहन करते हैं और एक जैसी सोच वाले देशों को एकजुट होकर पुतिन के खिलाफ खड़े होने की अपील करते हैं।इस नैरेटिव में वारसा का पुनर्निर्माण बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में चित्रित किया जाता है और इसे वर्तमान में यूक्रेन की राष्ट्रीय भावना के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

दूसरी ओर, ब्लादिमिर पुतिन कहते हैं कि अपने दोस्तों के लिए अपना जीवन समर्पित कर देने से बड़ा प्रेम और कुछ नहीं हो सकता।दरअसल यह बाइबल से उद्धृत पंक्ति है, जो ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने के एक दिन पहले के कथन को थोड़े हेर-फेर से कही गई है।ईसा मसीह से विश्वासघात करने वाले यहूदी थे।पुतिन प्रकारांतर से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के यहूदी होने और उनकी विचारधारा पर प्रहार करते हैं।पुतिन का आरोप है कि जेलेंस्की पश्चिमी देशों के साथ मिलकर आम जनता के खिलाफ कार्य कर रहे हैं।

गिल्बर्ट अशकर नामक प्रख्यात लेखक ने अपनी किताब ‘द क्लैश ऑफ बार्बरिज्म्स’ में कहा है कि नैतिकता और धार्मिकता के परदे के पीछे से काम करना इस सभ्यता का काला पक्ष है।इस दशा में राष्ट्र-राज्य हिंसा, तबाही और दूसरों की बरबादी के लिए कार्य करते हैं।अतः धार्मिकता और नैतिक चरमवाद के आधार पर निर्मित राजनीतिक विमर्श राज्यों के अपनी जिम्मेदारी से बचने और दूसरों के कार्यों को नकारने का काम करते हैं।यहां तर्क के लिए स्पेस नहीं होता।

क्या युद्ध जल्दी रुकेगा?

यह एक जरूरी सवाल है कि क्या यह युद्ध जल्दी रुकेगा? प्रारंभ में कई देशों ने रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थता कर युद्ध को समाप्त करने की पहल की, पर नतीजा नहीं निकला।दरअसल युद्ध को पुतिन ने शुरू किया है और वही इसे खत्म कर सकते हैं।पश्चिमी देशों के बल पर यूक्रेन का जीतना कठिन ही नहीं, असंभव है।पुतिन एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर पूरी दुनिया को चौंकाते हुए युद्ध रोक सकते हैं।रूसी मामलों के जानकार कीर जाइल्स ने कहा है, ‘रूस अगर एकतरफा सीजफायर करता है तो यह एक चाल होगी।रूस यूक्रेन का क्षेत्र भी ले लेगा और काल्पनिक शांति के बदले उससे सरेंडर भी करा लेगा।यूरोपीय देश भी चाहेंगे कि सीजफायर हो जाए।’ फ्रांस, जर्मनी और इटली में इस बात की चर्चा भी हो रही है कि अब युद्ध को बढ़ाने का कोई कारण नहीं है।

दुनिया को आर्थिक मंदी से बचाने के लिए सीजफायर जरूरी है।और कहीं ऐसा हुआ कि अमेरिका और नाटो की सम्मिलित ताकत से यूक्रेन युद्ध जीतने की स्थिति में आगे बढ़े तो यूक्रेन ही नहीं दुनिया के विनाश का अंतिम अध्याय परमाणु युद्ध से शुरू हो जाएगा।इतिहासकार नियाल फर्ग्यूसन कहते हैं कि पुतिन युद्ध हारने की स्थिति में परमाणु हथियार के प्रयोग से बाज नहीं आएंगे।

दावोस के विश्व आर्थिक सम्मेलन में 24 मई, 2022 को विश्व के एक बड़े निवेशक जार्ज सोरोस द्वारा व्यक्त की गई चिंता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि रूस द्वारा यूक्रेन पर किया गया आक्रमण कभी भी तीसरे विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है, क्योंकि इसके लक्षण इसी ओर संकेत करते हैं।तीसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका को विश्व झेल नहीं पाएगा और मानव सभ्यता नष्ट हो जाएगी।उनका इशारा रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की जुगलबंदी की ओर था, जो भयानक खतरे का संकेत देती है।वे चेताते हैं कि पूरे विश्व को आज इकट्ठा होकर इस खतरे का मुकाबला करना चाहिए।सभी प्रकार के संसाधनों को संग्रहीत कर इस युद्ध को जितना जल्द हो सके समाप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।फिलहाल यह काफी उलझा मामला है, जिसके पक्ष या विपक्ष में सहजता से कुछ कहना बेहद कठिन है।बड़ी हकीकत यह है कि इस समय दुनिया के 200 करोड़ लोग भय और हिंसा के क्षेत्र में जी रहे हैं।

(आलेख में शामिल सभी चित्र यूक्रेन के बच्चों के द्वारा युद्ध के दौरान बनाए गए हैं. स्रोत गूगल)