एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। पंडितजी, पंडिताइन और उनकी इकलौती संतान बारह साल की पुत्री के अलावा उनके परिवार में और कोई नहीं था। जब तक पंडितजी जिंदा रहे, उन्होंने कथा-पुराण बांचकर अपनी गृहस्थी की गाड़ी घसीटी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी अधेड़ उम्र की पत्नी ने शोक और अभाववश खाट पकड़ ली और वह भी एक दिन नहीं रही। उनकी पुत्री पर वज्राघात-सा हुआ। रोते-रोते उसकी आंखें सूज गईं।

पास पड़ोस की औरतों में से कोई कहती- ‘पंडिताइन जिंदा है और कोई कहती मर गई है!’ ब्राह्मण कन्या बड़ी उलझन में पड़ी। उसने पड़ोस के एक बुद्धिमान व्यक्ति के घर जाकरे रोते-बिलखते हुए कहा- ‘चाचाजी, चलकर आप देखिए न!’ बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा, ‘बेटी तुम्हारी मां ताजिंदगी मुझसे पर्दा करती रहीं। मैंने उनका मुंह कभी नहीं देखा। अब यह पाप भला कैसे कर सकता हूँ!’

उन्होंने धुनी हुई थोड़ी-सी रुई ब्राह्मण कन्या के हाथ में देकर कहा- ‘अपनी मां के नाक के छिद्र के पास इसे रखना, यदि रुई हिले तो समझना कि सांसें चल रही हैं।’

उदास लड़की के जाने के बाद पत्नी ने आड़े हाथों लिया- ‘बड़े पाखंडी हैं आप! मरे का मुंह देखने में कैसा अधर्म?’

बुद्धिमान व्यक्ति ने अपने मन की बात बताई- ‘पाप नहीं लगेगा, लेकिन वहां जाने पर पंडिताइन के लिए कफन वगैरह का इंतजाम मुझे  ही करना पड़ता!’