युवा कवयित्री, लेखक और अनुवादक।प्रमुख किताबें एवं अनुवाद- एक थी इंदिरा’(जीवनी), ‘भारत का इतिहास’ (माइकल एडवर्ड), ‘मत्वेया कोझेम्याकिन की ज़िंदगी और स्वीकार’ (मैक्सिम गोर्की),‘ग्वाला’’ (अन्ना बर्न्स) आदि।

 

एक पारसी कहावत है कि यह जीवन एक गुलाब है, इसकी महक लें और उस महक को वापस दुनिया को सौंपते रहें।लेकिन जीवन की तुलना गुलाब से ही क्यों? किसी और फूल से क्यों नहीं? शायद इसलिए कि जैसे गुलाब के तत्व को, उसके स्वत्व को गंध होकर ही महसूस किया जा सकता है।रंग होकर ही देखा जा सकता है।बीज होकर ही रचा जा सकता है, वैसे ही इस एक जीवन को जीने का ढंग भी यही होना चाहिए कि हम जीवन को ढोएँ, नहीं बस जी जाएँ।फिर हर क्षण में रंग होगा, हर क्षण में रस!

भूलने और याद रखने बीच फैले वे आधा दर्जन दिन

मुझे याद है
घने कोहरे की वह सर्द शाम
जब मैं डूबा हुआ था
तिर्यक और समानांतर रेखाओं को सुलझाने में
तब मेरी चौड़ी-चकली हथेली पर
फैलाकर अपने हाथों की रेखाएं
पूछा था तुमने उनका गणित
और मैं उलझा रह गया था
तुम्हारे माथे पर फैले बेपरवाह सवालों में

मुझे याद है
नए साल का दूसरा-तीसरा दिन
जब अपने दामन का आखिरी गुलाब पोटली में बांधते हुए
तुमने कहा था
‘गुलाब पर जमी ओस की बूंदें, आंसू हैं आसमान के’
और मैं ढूंढता रह गया था
तुम्हारे गालों पर से पोंछ दिए गए
पानी के निशान

मुझे याद है
कालिंदी के किनारे सूखे पत्तों पर दौड़ते हुए
तुम खेल रही थी खेल पकड़म-पकड़ाई का
अपने ही अक्स के साथ
और अचानक दोनों हाथ उठाकर कहा था तुमने
‘इफ़ विंटर कम्स, कैन स्प्रिंग बी फार विहाइंड’*
और मुझे हठात महसूस हुई
एक कच्ची देह से रह-रह उठती बसंत गंध

मुझे याद है
हमारी पहली मुलाक़ात का वह आखिरी लम्हा
जब शाला के हाजिरी रजिस्टर में
मीरा, राधा और हरपरसाद के बीच
दुबके बैठे ऋचाओं जैसे तुम्हारे नाम पर
ठहर गया था मेरा लाल पेन
तब रंगीन रिबन में बंधे
तुम्हारे काले बालों और स़फेद चेहरे के बीच
पुतलियों से ढंकी एक स्याह इबारत
लिख रही थीं व्याख्याएं रश्मिरथी की…

लेकिन मैं भूल जाना चाहता हूँ
वह झुलसती दोपहर
जब सुनसान पगडंडी के संकरे मोड़ पर टकराए थे
हम दोनों
शायद पूरे आधा दर्जन दिन बाद
इन आधा दर्जन दिनों में कुछ भी तो नहीं बदला था
इस गांव के भूगोल में
अलबत्ता तुमने बदल दिया अपना इतिहास
हमेशा सवालों की पोटली दबाए फिरने वाली तुम
कैसे सीख गई मौन की भाषा
बस आधा दर्जन दिनों में?
मैं पूछना चाहता था तुमसे
मगर अपने छोटे-छोटे कंधों पर
औचक बड़े हो जाने का बोझ उठाए
तुम चली गई समेटकर अपनी धूप
और मैं देखता रह गया
बरमूडा एंगल्स में गुम होती
अपने हिस्से की छांव…

मामूली आदमी का प्यार

मामूली आदमी का प्यार
नहीं होता मामूली
बेरोजगारी और
आत्महत्या के बारे में
सोचते हुए भी
वह नहीं रहने देता बाँझ
सपनों के खेत
मामूली आदमी का प्यार
घिसी हुई चप्पल के परों पर
उड़ता है भरपूर
नापता है आसमान
तोड़ना चाहता है तारे
और उगाना चाहता है
एक अदद गुलाब
मामूली आदमी का प्यार…

जंगली गुलाब

सारी शाम
उदास रहने के बाद
वह बहा देना चाहती है
दिन भर से छलकते आंसू
लेकिन
कोई साथ भी तो होना चाहिए
बस यही सोच कर
खोंस लिया है
उसने अपनी जुल्फों में
जंगली गुलाब
यों कोई
अकेला रोता है भला!

प्रेम

गेहूं और गुलाब के देश में
प्रेम से कठिन है
प्रेम की भाषा
प्रेम में पुरुष वाचाल हो जाता है
शब्दकोश के तमाम शब्द यूं लुढ़कने लगते हैं
उसके होठों से
जैसे खुल जाए अचानक ही
किसी कंजूस की तिजोरी के कपाट
और खाली फर्श पर उठ खड़ा हो
उन तमाम नए-पुराने सिक्कों का पहाड़
जिन्हें जारी करने के बाद सरकार भी भूल जाती है
जिनकी खैरियत बांचना

यूं प्रेम तो स्त्री भी करती है
पर नहीं बनाती
आवाज़ों के घर प्रेम में
प्रेम में
स्मृति कोश के तमाम शब्द
ऐसे चिपक जाते हैं
उसके अधरों पर
जैसे बारिश में भीगे नोट।